Sri Guru Granth Sahib Ji — Ang 993 (hindi)
ਰਾਗੁ ਮਾਰੂ ਮਹਲਾ ੧ ਘਰੁ ੫
रागु मारू महला १ घरु ५
ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ੴ सतिगुर प्रसादि॥
ਅਹਿਨਿਸਿ ਜਾਗੈ ਨੀਦ ਨ ਸੋਵੈ ॥
नाम-अमृत का व्यापारी जीव दिन-रात सचेत रहता है। वह माया के मोह की नींद में सोता नहीं।
ਸੋ ਜਾਣੈ ਜਿਸੁ ਵੇਦਨ ਹੋਵੈ ॥
नाम-अमृत की कद्र जानता भी वही मनुष्य है जिसके अंदर परमात्मा से विछोड़े के अहिसास की तड़प हो।
ਪ੍ਰੇਮ ਕੇ ਕਾਨ ਲਗੇ ਤਨ ਭੀਤਰਿ ਵੈਦੁ ਕਿ ਜਾਣੈ ਕਾਰੀ ਜੀਉ ॥੧॥
जिस के शरीर में प्रभू-प्रेम के तीर लगे हों। शारीरिक रोगों का इलाज करने वाला व्यक्ति बिरह-रोग का इलाज नहीं जानता। 1।
ਜਿਸ ਨੋ ਸਾਚਾ ਸਿਫਤੀ ਲਾਏ ॥ ਗੁਰਮੁਖਿ ਵਿਰਲੇ ਕਿਸੈ ਬੁਝਾਏ ॥
सदा कायम रहने वाला परमात्मा अपनी सिफत सालाह में जिस किसी विरले व्यक्ति को गुरू के माध्यम से जोड़ता है और सिफत सालाह की कद्र समझाता है।
ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਕੀ ਸਾਰ ਸੋਈ ਜਾਣੈ ਜਿ ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਕਾ ਵਾਪਾਰੀ ਜੀਉ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
आत्मिक जीवन देने वाली सिफत सालाह की कद्र वही व्यक्ति समझता है क्योंकि वह इस नाम-अमृत का व्यापारी बन जाता है। 1। रहाउ।
ਪਿਰ ਸੇਤੀ ਧਨ ਪ੍ਰੇਮੁ ਰਚਾਏ ॥
जैसे स्त्री (अपना आपा अर्थात स्वै वार के) अपने पति से प्यार करती है।
ਗੁਰ ਕੈ ਸਬਦਿ ਤਥਾ ਚਿਤੁ ਲਾਏ ॥
वैसे ही जो जीव-स्त्री गुरू के शबद में चिक्त जोड़ती है।
ਸਹਜ ਸੇਤੀ ਧਨ ਖਰੀ ਸੁਹੇਲੀ ਤ੍ਰਿਸਨਾ ਤਿਖਾ ਨਿਵਾਰੀ ਜੀਉ ॥੨॥
वह जीव-स्त्री आत्मिक अडोलता में टिक के बहुत सुखी हो जाती है। वह (अपने अंदर से) माया की तृष्णा माया की प्यास दूर कर लेती है। 2।
ਸਹਸਾ ਤੋੜੇ ਭਰਮੁ ਚੁਕਾਏ ॥
जो जीव-स्त्री अडोलता में टिक के परमात्मा की सिफत-सालाह का धनुष (बाण) कसती है
ਸਹਜੇ ਸਿਫਤੀ ਧਣਖੁ ਚੜਾਏ ॥
(उसकी सहायता से अपने अंदर से) सहम-डर समाप्त कर लेती है माया वाली भटकना खत्म करती है।
ਗੁਰ ਕੈ ਸਬਦਿ ਮਰੈ ਮਨੁ ਮਾਰੇ ਸੁੰਦਰਿ ਜੋਗਾਧਾਰੀ ਜੀਉ ॥੩॥
वह गुरू शबद में जुड़ के (स्वैभाव को) मारती है अपने मन को वश में रखती है वह जीव-स्त्री प्रभू-मिलाप के आसरे वाली हो जाती है (भाव। प्रभू-चरणों का मिलाप उसके जीवन का आसरा बन जाता है)। 3।
ਹਉਮੈ ਜਲਿਆ ਮਨਹੁ ਵਿਸਾਰੇ ॥
जो जीव अहंकार में जला रह के (आत्मिक जीवन के अंकुर को जला के) परमात्मा को अपने मन से भुला देता है
ਜਮ ਪੁਰਿ ਵਜਹਿ ਖੜਗ ਕਰਾਰੇ ॥
उसको जम के शहर में करारे खड़ग बजते हैं (भाव। इतने आत्मिक कलेश होते हैं। मानो। तलवारों की जोरदार चोटें बज रही हों)।
ਅਬ ਕੈ ਕਹਿਐ ਨਾਮੁ ਨ ਮਿਲਈ ਤੂ ਸਹੁ ਜੀਅੜੇ ਭਾਰੀ ਜੀਉ ॥੪॥
उस वक्त (जब मार पड़ रही होती है) तरले लेने से नाम (सिमरन का मौका) नहीं मिलता। (हे जीव ! अगर तू सारी उम्र इतना गाफिल रहा है तो) वह बड़ा दुख (अब) सहता रह (उस बहुत बड़े कष्ट से तुझे कोई निकाल नहीं सकता)। 4।
ਮਾਇਆ ਮਮਤਾ ਪਵਹਿ ਖਿਆਲੀ ॥
हे जीव ! अगर तू अब माया की ममता के ख्यालों में ही पड़ा रहेगा
ਜਮ ਪੁਰਿ ਫਾਸਹਿਗਾ ਜਮ ਜਾਲੀ ॥
(अगर तू सारी उम्र माया जोड़ने के आहरों में ही रहेगा। तो आखिर) जम की नगरी में जम के जाल में फंसेगा।
ਹੇਤ ਕੇ ਬੰਧਨ ਤੋੜਿ ਨ ਸਾਕਹਿ ਤਾ ਜਮੁ ਕਰੇ ਖੁਆਰੀ ਜੀਉ ॥੫॥
(उस वक्त) तू मोह के बँधन नहीं तोड़ पाएगा। (तभी तो) तब ही जमराज तेरी बेइज्जती करेगा। 5।
ਨਾ ਹਉ ਕਰਤਾ ਨਾ ਮੈ ਕੀਆ ॥
(पर। हे प्रभू ! तेरी माया के मुकाबले में मैं बेचारा क्या चीज हूँ। माया के बँधनों से बचने के लिए) ना ही मैं अब कुछ कर रहा हॅूँ। ना ही इससे पहले कुछ कर पाया हूँ।
ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਨਾਮੁ ਸਤਿਗੁਰਿ ਦੀਆ ॥
मुझे तो सतिगुरू ने (मेहर करके) तेरा आत्मिक जीवन देने वाला नाम बख्शा है।
ਜਿਸੁ ਤੂ ਦੇਹਿ ਤਿਸੈ ਕਿਆ ਚਾਰਾ ਨਾਨਕ ਸਰਣਿ ਤੁਮਾਰੀ ਜੀਉ ॥੬॥੧॥੧੨॥
जिसको तू (गुरू के द्वारा अपना अमृत-नाम) देता है उसको कोई और तदबीर करने की आवश्यक्ता ही नहीं रह जाती। हे नानक ! (प्रभू दर पर अरदास कर और कह- हे प्रभू !) मैं तेरी शरण आया हॅूँ। 6। 1। 12।
ਮਾਰੂ ਮਹਲਾ ੩ ਘਰੁ ੧
मारू महला ३ घरु १
ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ੴ सतिगुर प्रसादि॥
ਜਹ ਬੈਸਾਲਹਿ ਤਹ ਬੈਸਾ ਸੁਆਮੀ ਜਹ ਭੇਜਹਿ ਤਹ ਜਾਵਾ ॥
हे प्रभू ! (जब मैं आत्मिक अडोलता में लीन रहूँगा। तब) जहाँ तू मुझे बैठाएगा मैं वहीं बैठा रहूँगा। जहाँ तू मुझे भेजेगा मैं वहीं जाऊँगा (भाव। मैं हर वक्त तेरी रजा में रहूँगा)।
ਸਭ ਨਗਰੀ ਮਹਿ ਏਕੋ ਰਾਜਾ ਸਭੇ ਪਵਿਤੁ ਹਹਿ ਥਾਵਾ ॥੧॥
हे स्वामी ! सारी सृष्टि में मुझे तू ही एक पातशाह (दिखेगा। तेरी व्यापकता के कारण धरती के) सारी ही जगहें मुझे पवित्र लगेंगी। 1।
ਬਾਬਾ ਦੇਹਿ ਵਸਾ ਸਚ ਗਾਵਾ ॥
हे प्रभू ! तू (मुझे ये दान) दे कि मैं तेरी साध-संगति में टिका रहॅूँ।
ਜਾ ਤੇ ਸਹਜੇ ਸਹਜਿ ਸਮਾਵਾ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
जिसकी बरकति से मैं सदा आत्मिक अडोलता में लीन रहूँ। 1। रहाउ।
ਬੁਰਾ ਭਲਾ ਕਿਛੁ ਆਪਸ ਤੇ ਜਾਨਿਆ ਏਈ ਸਗਲ ਵਿਕਾਰਾ ॥
हे भाई ! अहंकार के कारण मनुष्य किसी को बुरा और किसी को अच्छा समझता है। ये अहंकार ही सारे विकारों का मूल बनती है।
ਇਹੁ ਫੁਰਮਾਇਆ ਖਸਮ ਕਾ ਹੋਆ ਵਰਤੈ ਇਹੁ ਸੰਸਾਰਾ ॥੨॥
(साध-संगति की बरकति से आत्मिक अडोलता में रहने वाले को दिखता है कि) ये भी पति-प्रभू का हुकम ही हो रहा है। ये हुकम ही सारे जगत में बरत रहा है। 2।
ਇੰਦ੍ਰੀ ਧਾਤੁ ਸਬਲ ਕਹੀਅਤ ਹੈ ਇੰਦ੍ਰੀ ਕਿਸ ਤੇ ਹੋਈ ॥
(हे भाई ! सारी सृष्टि में) ये बात कही जा रही है कि इन्द्रियों की दौड़-भाग बहुत बलवान है; पर (साध-संगति की बरकति से सहज अवस्था में टिका हुआ) कोई विरला मनुष्य ऐसे समझता है कि (काम-वासना आदि वाली) इंद्री भी (परमात्मा के बिना) किसी और से नहीं बनी।
ਆਪੇ ਖੇਲ ਕਰੈ ਸਭਿ ਕਰਤਾ ਐਸਾ ਬੂਝੈ ਕੋਈ ॥੩॥
(वह यह समझता है कि) सारे करिश्मे करतार स्वयं ही कर रहा है। 3।
ਗੁਰ ਪਰਸਾਦੀ ਏਕ ਲਿਵ ਲਾਗੀ ਦੁਬਿਧਾ ਤਦੇ ਬਿਨਾਸੀ ॥
(हे भाई ! साध-संगति में रह के जब) गुरू की कृपा से एक परमात्मा का प्यार (हृदय में) बन जाता है। तब (मनुष्य के अंदर से) मेर-तेर दूर हो जाती है।
ਜੋ ਤਿਸੁ ਭਾਣਾ ਸੋ ਸਤਿ ਕਰਿ ਮਾਨਿਆ ਕਾਟੀ ਜਮ ਕੀ ਫਾਸੀ ॥੪॥
जो कुछ परमात्मा को अच्छा लगता है वह मनुष्य उसको ठीक मानता है। और। उसकी आत्मिक मौत वाली फाही काटी जाती है। 4।
ਭਣਤਿ ਨਾਨਕੁ ਲੇਖਾ ਮਾਗੈ ਕਵਨਾ ਜਾ ਚੂਕਾ ਮਨਿ ਅਭਿਮਾਨਾ ॥
नानक कहता है- (साध-संगति की बरकति से) जब मनुष्य के मन में (बसता) अहंकार समाप्त हो जाता है तब कोई भी (उससे उसके बुरे कर्मों का) लेखा नहीं माँग सकता (क्योंकि उसके अंदर कोई बुराई रह ही नहीं जाती)।
ਤਾਸੁ ਤਾਸੁ ਧਰਮ ਰਾਇ ਜਪਤੁ ਹੈ ਪਏ ਸਚੇ ਕੀ ਸਰਨਾ ॥੫॥੧॥
(साध-संगति में रहने वाले व्यक्ति) उस सदा-स्थिर प्रभू की शरण पड़े रहते हैं जिसकी हजूरी में धर्मराज भी कहता रहता है- मैं तेरी शरण हूँ। मैं तेरी शरण हूँ। 5। 1।
ਮਾਰੂ ਮਹਲਾ ੩ ॥
मारू महला ३॥
ਆਵਣ ਜਾਣਾ ਨਾ ਥੀਐ ਨਿਜ ਘਰਿ ਵਾਸਾ ਹੋਇ ॥
(हे सिमरन का सदका) जनम-मरण (चक्कर) नहीं रहता। अपने असल घर में (प्रभू की हजूरी में) सुरति टिकी रहती है।
ਸਚੁ ਖਜਾਨਾ ਬਖਸਿਆ ਆਪੇ ਜਾਣੈ ਸੋਇ ॥੧॥
पर सदा-स्थिर प्रभू का यह नाम-खजाना (उसने स्वयं ही) बख्शा है। वह प्रभू खुद ही जानता है (कि कौन इस दाति के योग्य है)। 1।