Sri Guru Granth Sahib Ji — Ang 970 (hindi)
ਪੂਰਬ ਜਨਮ ਹਮ ਤੁਮੑਰੇ ਸੇਵਕ ਅਬ ਤਉ ਮਿਟਿਆ ਨ ਜਾਈ ॥
हे प्रभू ! मैं तो पहले जन्मों में भी तेरा ही सेवक रहा हूँ। अब भी तेरे दर से हटा नहीं जा सकता।
ਤੇਰੇ ਦੁਆਰੈ ਧੁਨਿ ਸਹਜ ਕੀ ਮਾਥੈ ਮੇਰੇ ਦਗਾਈ ॥੨॥
तेरे दर पर रहने से (मनुष्य के अंदर) अडोल अवस्था की रौंअ (चल पड़ती है। वह रौंअ) मुझे भी प्राप्त हो गई है। 2।
ਦਾਗੇ ਹੋਹਿ ਸੁ ਰਨ ਮਹਿ ਜੂਝਹਿ ਬਿਨੁ ਦਾਗੇ ਭਗਿ ਜਾਈ ॥
जिनके माथे पर मालिक का (ये भक्ति का) निशान होता है। वे रण-भूमि में लड़ मरते हैं। जो इस निशान से वंचित हैं वह (मुकाबला होने पर) भांझ खा जाते हैं।
ਸਾਧੂ ਹੋਇ ਸੁ ਭਗਤਿ ਪਛਾਨੈ ਹਰਿ ਲਏ ਖਜਾਨੈ ਪਾਈ ॥੩॥
जो मनुष्य प्रभू का भक्त बनता है। वही भक्ति से सांझ डालता है और प्रभू उसको अपने दर पर प्रवान कर लेता है। 3।
ਕੋਠਰੇ ਮਹਿ ਕੋਠਰੀ ਪਰਮ ਕੋਠੀ ਬੀਚਾਰਿ ॥
(मनुष्य का शरीर। जैसे। एक छोटा सा कोठा है। इस) छोटे से सुंदर कोठे में (दिमाग। बुद्धि एक और) छोटी सी कोठरी है।
ਗੁਰਿ ਦੀਨੀ ਬਸਤੁ ਕਬੀਰ ਕਉ ਲੇਵਹੁ ਬਸਤੁ ਸਮੑਾਰਿ ॥੪॥
परमात्मा के नाम के विचार की बरकति सेये छोटी सी कोठरी और भी सुंदर बनती जाती है। मुझ कबीर को मेरे गुरू ने नाम-वस्तु दी (और। कहने लगे) ये वस्तु (एक छोटी सी कोठड़ी में) संभाल के रख ले। 4।
ਕਬੀਰਿ ਦੀਈ ਸੰਸਾਰ ਕਉ ਲੀਨੀ ਜਿਸੁ ਮਸਤਕਿ ਭਾਗੁ ॥
मैं कबीर ने ये नाम-वस्तु जगत के लोगों को (भी बाँट) दी। पर किसी भाग्यशाली ने (ही) हासिल की।
ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਰਸੁ ਜਿਨਿ ਪਾਇਆ ਥਿਰੁ ਤਾ ਕਾ ਸੋਹਾਗੁ ॥੫॥੪॥
जिस किसी ने इस नाम-अमृत का स्वाद चखा है। वह सदा के लिए भाग्यशाली हो गया है। 5। 4।
ਜਿਹ ਮੁਖ ਬੇਦੁ ਗਾਇਤ੍ਰੀ ਨਿਕਸੈ ਸੋ ਕਿਉ ਬ੍ਰਹਮਨੁ ਬਿਸਰੁ ਕਰੈ ॥
ब्राह्मण उस प्रभू को क्यों बिसारता है। जिसके मुँह में से वेद और गयात्री (आदि) निकले (ऐसा तू मानता) है।
ਜਾ ਕੈ ਪਾਇ ਜਗਤੁ ਸਭੁ ਲਾਗੈ ਸੋ ਕਿਉ ਪੰਡਿਤੁ ਹਰਿ ਨ ਕਹੈ ॥੧॥
पण्डित उस परमात्मा को क्यों नहीं सिमरता। जिसके चरणों पर सारा संसार पड़ता है। 1।
ਕਾਹੇ ਮੇਰੇ ਬਾਮੑਨ ਹਰਿ ਨ ਕਹਹਿ ॥
हे मेरे ब्राह्मण ! तू परमात्मा का नाम क्यों नहीं सिमरता।
ਰਾਮੁ ਨ ਬੋਲਹਿ ਪਾਡੇ ਦੋਜਕੁ ਭਰਹਿ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
हे पंडित ! तू राम नहीं बोलता। और दोज़क (नर्क का दुख) सह रहा है। 1। रहाउ।
ਆਪਨ ਊਚ ਨੀਚ ਘਰਿ ਭੋਜਨੁ ਹਠੇ ਕਰਮ ਕਰਿ ਉਦਰੁ ਭਰਹਿ ॥
हे ब्राह्मण ! तू अपने आप को ऊँची कुल का (समझता है)। पर भोजन पाता है (अपने से) नीची कुल वाले घरों में से। तू हठ वाले कर्म करके (और लोगों को दिखा-दिखा के) अपना पेट पालता है।
ਚਉਦਸ ਅਮਾਵਸ ਰਚਿ ਰਚਿ ਮਾਂਗਹਿ ਕਰ ਦੀਪਕੁ ਲੈ ਕੂਪਿ ਪਰਹਿ ॥੨॥
चौदवीं और अमावस्या (आदि तिथियाँ बनावटी) बना-बना के तू (जजमानों से) माँगता है; तू (अपने आप को विद्वान समझता है पर यह विद्या-रूप) दीया हाथों पर रख कर (भी) कूँएं में गिर रहा है। 2।
ਤੂੰ ਬ੍ਰਹਮਨੁ ਮੈ ਕਾਸੀਕ ਜੁਲਹਾ ਮੁਹਿ ਤੋਹਿ ਬਰਾਬਰੀ ਕੈਸੇ ਕੈ ਬਨਹਿ ॥
तू (अपने आप को ऊँची कुल का) ब्राहमण (समझता है)। मैं (तेरी नजरों में) काशी का (गरीब) जुलाहा हूँ। सो। मेरी तेरी बराबरी कैसे हो सकती है। (भाव। तू मेरी बात अपने गुमान के कारण सुनने को तैयार नहीं हो सकता)।
ਹਮਰੇ ਰਾਮ ਨਾਮ ਕਹਿ ਉਬਰੇ ਬੇਦ ਭਰੋਸੇ ਪਾਂਡੇ ਡੂਬਿ ਮਰਹਿ ॥੩॥੫॥
पर हम (जुलाहे तो) परमात्मा का नाम सिमर के (संसार-समुंद्र से) बच रहे हैं। और तुम। हे पांडे ! वेदों के (बताए हुए कर्म-काण्ड के) भरोसे रह के ही डूब के मर रहे हो। 3। 5।
ਤਰਵਰੁ ਏਕੁ ਅਨੰਤ ਡਾਰ ਸਾਖਾ ਪੁਹਪ ਪਤ੍ਰ ਰਸ ਭਰੀਆ ॥
(गुरू के सन्मुख हुए ऐसे मनुष्य को ये समझ आ जाती है कि) संसार एक वृक्ष (के समान) है। (जगत के जीव-जंतु। मानो। उस वृक्ष की) बेअंत डालियाँ और टहनियाँ हैं। जो फूलों। पक्तों और रस भरे फलों से लदी हुई हैं।
ਇਹ ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਕੀ ਬਾੜੀ ਹੈ ਰੇ ਤਿਨਿ ਹਰਿ ਪੂਰੈ ਕਰੀਆ ॥੧॥
ये संसार अमृत की एक बागीची है। जो उस पूर्ण परमात्मा ने बनाई है। 1।
ਜਾਨੀ ਜਾਨੀ ਰੇ ਰਾਜਾ ਰਾਮ ਕੀ ਕਹਾਨੀ ॥
हे भाई ! जो कोई मनुष्य अपने आप को गुरू के हवाले करता है। वह प्रकाश-रूप परमात्मा के मेल की अवस्था को समझ लेता है।
ਅੰਤਰਿ ਜੋਤਿ ਰਾਮ ਪਰਗਾਸਾ ਗੁਰਮੁਖਿ ਬਿਰਲੈ ਜਾਨੀ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
उसके अंदर ज्योति जग उठती है। उसके अंदर राम का प्रकाश हो जाता है। पर इस अवस्था से जान-पहचान करने वाला होता कोई विरला ही है। 1। रहाउ।
ਭਵਰੁ ਏਕੁ ਪੁਹਪ ਰਸ ਬੀਧਾ ਬਾਰਹ ਲੇ ਉਰ ਧਰਿਆ ॥
(जैसे) एक भौरा फूल के रस में मस्त हो के फूल की खिली हुई पंखुड़ियों में अपने आप को जा बँधाता है। (जैसे कोई पक्षी अपने पंखों से) हवा को हिलौरे दे के आकाश में उड़ता है।
ਸੋਰਹ ਮਧੇ ਪਵਨੁ ਝਕੋਰਿਆ ਆਕਾਸੇ ਫਰੁ ਫਰਿਆ ॥੨॥
वैसे ही वह गुरमुखि नाम-रस में मस्त हो के पूर्ण-खिलाव को हृदय में टिकाता है। और सोच-मण्डल में हिलौरे दे के प्रभू-चरणों में उड़ानें भरता है। 2।
ਸਹਜ ਸੁੰਨਿ ਇਕੁ ਬਿਰਵਾ ਉਪਜਿਆ ਧਰਤੀ ਜਲਹਰੁ ਸੋਖਿਆ ॥
उस गुरमुखि की उस अडोल और अफुर अवस्था में उसके अंदर (कोमलता-रूप) मानो। एक कोमल पौधा उगता है। जो उसके शरीर की तृष्णा को सुखा देता है।
ਕਹਿ ਕਬੀਰ ਹਉ ਤਾ ਕਾ ਸੇਵਕੁ ਜਿਨਿ ਇਹੁ ਬਿਰਵਾ ਦੇਖਿਆ ॥੩॥੬॥
कबीर कहता है- मैं उस गुरमुख का दास हूँ। जिसने (अपने अंदर उगा हुआ) ये कोमल पौधा देखा है। 3। 6।
ਮੁੰਦ੍ਰਾ ਮੋਨਿ ਦਇਆ ਕਰਿ ਝੋਲੀ ਪਤ੍ਰ ਕਾ ਕਰਹੁ ਬੀਚਾਰੁ ਰੇ ॥
हे जोगी ! (मन को विकारों की ओर से) शांति (देनी। ये कानों की) मुंद्रा बना। और (प्रभू के गुणों की) विचार को खप्पर बना।
ਖਿੰਥਾ ਇਹੁ ਤਨੁ ਸੀਅਉ ਅਪਨਾ ਨਾਮੁ ਕਰਉ ਆਧਾਰੁ ਰੇ ॥੧॥
(मैं भी तेरी ही तरह एक जोगी हूँ। पर) मैं अपने शरीर को विकारों से बचाता हूँ। ये मैंने गोदड़ी सिली हुई है। जोगी ! मैंने प्रभू के नाम को (अपनी जिंद का) आसरा बनाया हुआ है (ये मेरा राख विभूति का बटूआ है)। 1।
ਐਸਾ ਜੋਗੁ ਕਮਾਵਹੁ ਜੋਗੀ ॥
बस ! यही योगाभ्यास करो।
ਜਪ ਤਪ ਸੰਜਮੁ ਗੁਰਮੁਖਿ ਭੋਗੀ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
हे जोगी ! गृहस्त में रहते हुए ही सतिगुरू के सन्मुख रहो। गुरू के बताए हुए मार्ग पर चलना ही जप है। यही तप है। और यही संजम है।1। रहाउ।
ਬੁਧਿ ਬਿਭੂਤਿ ਚਢਾਵਉ ਅਪੁਨੀ ਸਿੰਗੀ ਸੁਰਤਿ ਮਿਲਾਈ ॥
(हे जोगी !) अपनी बुद्धि को मैं (ऊँचे ठिकाने प्रभू चरणों में) चढ़ाए रखता हूँ। ये मैंने (शरीर पर) राख मली हुई है; मैंने अपने मन की सुरति को (प्रभू चरणों में) जोड़ा है। ये मेरी सिंज्ञी है।
ਕਰਿ ਬੈਰਾਗੁ ਫਿਰਉ ਤਨਿ ਨਗਰੀ ਮਨ ਕੀ ਕਿੰਗੁਰੀ ਬਜਾਈ ॥੨॥
माया की ओर से वैराग करके मैं भी (साधू बन के) फिरता हूँ। पर मैं अपने ही शरीर रूप नगर में फिरता हूँ (भाव। खोज करता हूँ); मैं अपने मन की ही किंगरी बजाता हूँ (भाव। मन में प्रभू की लगन लगाए रखता हूँ)। 2।
ਪੰਚ ਤਤੁ ਲੈ ਹਿਰਦੈ ਰਾਖਹੁ ਰਹੈ ਨਿਰਾਲਮ ਤਾੜੀ ॥
(हे जोगी !) प्रभू को अपने हृदय में परोए रखो। इस तरह की समाधि एक-टक बनी रहती है।
ਕਹਤੁ ਕਬੀਰੁ ਸੁਨਹੁ ਰੇ ਸੰਤਹੁ ਧਰਮੁ ਦਇਆ ਕਰਿ ਬਾੜੀ ॥੩॥੭॥
कबीर कहता है- हे संत जनो ! सुनो। (प्रभू-चरणों में जुड़ के) धर्म और दया की (अपने) मन में सुंदर सी बगीची बनाओ। 3। 7।
ਕਵਨ ਕਾਜ ਸਿਰਜੇ ਜਗ ਭੀਤਰਿ ਜਨਮਿ ਕਵਨ ਫਲੁ ਪਾਇਆ ॥
कौन से कामों के लिए हम जगत में पैदा हुए। जनम ले के हमने क्या कमाया।
ਭਵ ਨਿਧਿ ਤਰਨ ਤਾਰਨ ਚਿੰਤਾਮਨਿ ਇਕ ਨਿਮਖ ਨ ਇਹੁ ਮਨੁ ਲਾਇਆ ॥੧॥
हमने एक पल भर के लिए भी (उस प्रभू के चरणों में) चिक्त नहीं जोड़ा जो संसार-समुंद्र से तैराने के लिए जहाज़ है। जो। मानो। मन-इच्छित फल देने वाला हीरा है। 1।