Sri Guru Granth Sahib Ji — Ang 964 (hindi)
ਪਉੜੀ ॥
पउड़ीं ।
ਸਭੇ ਦੁਖ ਸੰਤਾਪ ਜਾਂ ਤੁਧਹੁ ਭੁਲੀਐ ॥
जब हे प्रभू ! तेरी याद से टूट जाएं तो (मन को) सारे दुख-कलेश (आ व्यापते हैं)।
ਜੇ ਕੀਚਨਿ ਲਖ ਉਪਾਵ ਤਾਂ ਕਹੀ ਨ ਘੁਲੀਐ ॥
(तेरी याद के बिना और) अगर लाखों यतन भी किए जायं। किसी भी उपाय से (उन दुखों-कलेशों से) खलासी नहीं होती।
ਜਿਸ ਨੋ ਵਿਸਰੈ ਨਾਉ ਸੁ ਨਿਰਧਨੁ ਕਾਂਢੀਐ ॥
(हे भाई !) जिस मनुष्य को प्रभू का नाम (सिमरना) भूल जाए वह कंगाल कहा जाता है
ਜਿਸ ਨੋ ਵਿਸਰੈ ਨਾਉ ਸੋ ਜੋਨੀ ਹਾਂਢੀਐ ॥
जिस मनुष्य को प्रभू का नाम (सिमरना) भूल जाए (जैसे कोई कंगाल मंगता दर-दर पर भटकता है। वैसे ही) वह जूनियों में भटकता फिरता है।
ਜਿਸੁ ਖਸਮੁ ਨ ਆਵੈ ਚਿਤਿ ਤਿਸੁ ਜਮੁ ਡੰਡੁ ਦੇ ॥
जिस मनुष्य के चिक्त में पति-प्रभू नहीं आता उसको जमराज सजा देता है
ਜਿਸੁ ਖਸਮੁ ਨ ਆਵੀ ਚਿਤਿ ਰੋਗੀ ਸੇ ਗਣੇ ॥
जिस मनुष्य के चिक्त में पति-प्रभू नहीं आता ऐसे लोग रोगी गिने जाते हैं।
ਜਿਸੁ ਖਸਮੁ ਨ ਆਵੀ ਚਿਤਿ ਸੁ ਖਰੋ ਅਹੰਕਾਰੀਆ ॥
ऐसा सख्श बहुत अहंकारी होता है (हर वक्त 'मैं मैं' ही करता है)।
ਸੋਈ ਦੁਹੇਲਾ ਜਗਿ ਜਿਨਿ ਨਾਉ ਵਿਸਾਰੀਆ ॥੧੪॥
जिस मनुष्य ने प्रभू का नाम भुला दिया है वही जगत में दुखी है। 14।
ਸਲੋਕ ਮਃ ੫ ॥
श्लोक महला ५॥
ਤੈਡੀ ਬੰਦਸਿ ਮੈ ਕੋਇ ਨ ਡਿਠਾ ਤੂ ਨਾਨਕ ਮਨਿ ਭਾਣਾ ॥
हे (गुरू) नानक (जी) ! तेरी कोई बात मुझे बंदिश नहीं लगती। मैं तो तुझे (बल्कि) मन में प्यारा लगने वाला देखा है।
ਘੋਲਿ ਘੁਮਾਈ ਤਿਸੁ ਮਿਤ੍ਰ ਵਿਚੋਲੇ ਜੈ ਮਿਲਿ ਕੰਤੁ ਪਛਾਣਾ ॥੧॥
मैं उस प्यारे बिचोलिए (गुरू) से सदके हूँ जिसको मिल के मैंने अपने पति-प्रभू को पहचाना है (पति-प्रभू के साथ सांझ डाल ली है)। 1।
ਮਃ ੫ ॥
महला ५।
ਪਾਵ ਸੁਹਾਵੇ ਜਾਂ ਤਉ ਧਿਰਿ ਜੁਲਦੇ ਸੀਸੁ ਸੁਹਾਵਾ ਚਰਣੀ ॥
वह पैर सुंदर हैं जो तेरी ओर चलते हैं। वह सिर भाग्यशाली है जो तेरे कदमों पर गिरता है;
ਮੁਖੁ ਸੁਹਾਵਾ ਜਾਂ ਤਉ ਜਸੁ ਗਾਵੈ ਜੀਉ ਪਇਆ ਤਉ ਸਰਣੀ ॥੨॥
मुँह मन-मोहक लगता है जो तेरा यश गाता है। जीवात्मा खूबसूरत लगने लगती है जब तेरी शरण पड़ती है। 2।
ਪਉੜੀ ॥
पउड़ी।
ਮਿਲਿ ਨਾਰੀ ਸਤਸੰਗਿ ਮੰਗਲੁ ਗਾਵੀਆ ॥
जिस जीव-स्त्री ने सत्संग में मिल के प्रभू की सिफत-सालाह के गीत गाए।
ਘਰ ਕਾ ਹੋਆ ਬੰਧਾਨੁ ਬਹੁੜਿ ਨ ਧਾਵੀਆ ॥
उसके शरीर घर का ठुक बन गया (उसकी सारी ज्ञान-इन्द्रियाँ उसके वश में आ गई)।
ਬਿਨਠੀ ਦੁਰਮਤਿ ਦੁਰਤੁ ਸੋਇ ਕੂੜਾਵੀਆ ॥
वह फिर (माया के पीछे) भटकती नहीं। (उसके अंदर से) बुरी मति पाप व नाशवंत पदार्थों की झाक खत्म हो जाती है।
ਸੀਲਵੰਤਿ ਪਰਧਾਨਿ ਰਿਦੈ ਸਚਾਵੀਆ ॥
ऐसी जीव-स्त्री अच्छे स्वभाव वाली हो जाती है। (सहेलियों में) आदर-मान पाती है। उसके हृदय में प्रभू के प्रति लगन टिकी रहती है।
ਅੰਤਰਿ ਬਾਹਰਿ ਇਕੁ ਇਕ ਰੀਤਾਵੀਆ ॥
उसको अपने अंदर व सारी सृष्टि में एक प्रभू ही दिखता है। बस ! यही उसकी जीवन-जुगति बन जाती है।
ਮਨਿ ਦਰਸਨ ਕੀ ਪਿਆਸ ਚਰਣ ਦਾਸਾਵੀਆ ॥
उस जीव-स्त्री के मन में प्रभू के दीदार की तमन्ना बनी रहती है। वह प्रभू के चरणों की ही दासी बनी रहती है।
ਸੋਭਾ ਬਣੀ ਸੀਗਾਰੁ ਖਸਮਿ ਜਾਂ ਰਾਵੀਆ ॥
जब उस जीव-स्त्री को पति-प्रभू ने अपने साथ मिला लिया। तो ये मिलाप ही उसके लिए शोभा और श्रृंगार होता है !
ਮਿਲੀਆ ਆਇ ਸੰਜੋਗਿ ਜਾਂ ਤਿਸੁ ਭਾਵੀਆ ॥੧੫॥
जब उस प्रभू को वह जिंद-वधू प्यारी लग जाती है। तो प्रभू की संयोग-सक्ता की बरकति से वह प्रभू की ज्योति में मिल जाती है। 15।
ਸਲੋਕ ਮਃ ੫ ॥
श्लोक महला ५॥
ਹਭਿ ਗੁਣ ਤੈਡੇ ਨਾਨਕ ਜੀਉ ਮੈ ਕੂ ਥੀਏ ਮੈ ਨਿਰਗੁਣ ਤੇ ਕਿਆ ਹੋਵੈ ॥
हे नानक ! (कह- हे प्रभू) जी ! सारे गुण तेरे ही हैं। तुझसे ही मुझे मिले हैं। मुझ गुण-हीन से कुछ नहीं हो सकता।
ਤਉ ਜੇਵਡੁ ਦਾਤਾਰੁ ਨ ਕੋਈ ਜਾਚਕੁ ਸਦਾ ਜਾਚੋਵੈ ॥੧॥
तेरे जितना बड़ा कोई दातार नहीं है। मैं मँगते ने सदा तुझसे ही माँगना है। 1।
ਮਃ ੫ ॥
महला ५॥
ਦੇਹ ਛਿਜੰਦੜੀ ਊਣ ਮਝੂਣਾ ਗੁਰਿ ਸਜਣਿ ਜੀਉ ਧਰਾਇਆ ॥
मेरा शरीर जर्जर होता जा रहा था। चिक्त में खिचाव सा हो रहा था और चिंतातुर हो रहा था;
ਹਭੇ ਸੁਖ ਸੁਹੇਲੜਾ ਸੁਤਾ ਜਿਤਾ ਜਗੁ ਸਬਾਇਆ ॥੨॥
पर जब प्यारे सतिगुरू ने जीवात्मा को धरवास दिया तो (अब) सारे ही सुख मिल गए है। मैं सकून में टिका हुआ हूँ। (ऐसा प्रतीत होता है जैसे मैंने) सारा जहान जीत लिया है। 2।
ਪਉੜੀ ॥
पउड़ी।
ਵਡਾ ਤੇਰਾ ਦਰਬਾਰੁ ਸਚਾ ਤੁਧੁ ਤਖਤੁ ॥
हे प्रभू ! तेरा दरबार बड़ा है। तेरा तख्त सदा स्थिर रहने वाला है।
ਸਿਰਿ ਸਾਹਾ ਪਾਤਿਸਾਹੁ ਨਿਹਚਲੁ ਚਉਰੁ ਛਤੁ ॥
तेरा चवर और छत्र अटल है। तू (दुनिया के सारे) शाहों के सिर पर पातशाह है।
ਜੋ ਭਾਵੈ ਪਾਰਬ੍ਰਹਮ ਸੋਈ ਸਚੁ ਨਿਆਉ ॥
(हे भाई !) वह न्याय अटल है जो परमात्मा को अच्छा लगता है।
ਜੇ ਭਾਵੈ ਪਾਰਬ੍ਰਹਮ ਨਿਥਾਵੇ ਮਿਲੈ ਥਾਉ ॥
अगर उसे ठीक लगे तो निआसरों को आसरा मिल जाता है।
ਜੋ ਕੀਨੑੀ ਕਰਤਾਰਿ ਸਾਈ ਭਲੀ ਗਲ ॥
(जीवों के लिए) वही बात ठीक है जो करतार ने (खुद उनके लिए) की है।
ਜਿਨੑੀ ਪਛਾਤਾ ਖਸਮੁ ਸੇ ਦਰਗਾਹ ਮਲ ॥
जिन लोगों ने पति-प्रभू के साथ सांझ डाल ली। वह हजूरी पहलवान बन जाते हैं (कोई विकार उनको छू नहीं सकता)।
ਸਹੀ ਤੇਰਾ ਫੁਰਮਾਨੁ ਕਿਨੈ ਨ ਫੇਰੀਐ ॥
हे प्रभू ! तेरा हुकम (सदा) ठीक होता है। किसी जीव ने (कभी) वह मोड़ा नहीं।
ਕਾਰਣ ਕਰਣ ਕਰੀਮ ਕੁਦਰਤਿ ਤੇਰੀਐ ॥੧੬॥
हे सृष्टि के रचयता ! हे जीवों पर बख्शिश करने वाले ! (ये सारी) तेरी ही (रची हुई) कुदरति है। 16।
ਸਲੋਕ ਮਃ ੫ ॥
श्लोक महला ५।
ਸੋਇ ਸੁਣੰਦੜੀ ਮੇਰਾ ਤਨੁ ਮਨੁ ਮਉਲਾ ਨਾਮੁ ਜਪੰਦੜੀ ਲਾਲੀ ॥
(हे प्रभू !) तेरी शोभा सुन के मेरा तन मन हरा हो आता है। तेरा नाम जपते हुए मुझे खुशी की लाली चढ़ जाती है।
ਪੰਧਿ ਜੁਲੰਦੜੀ ਮੇਰਾ ਅੰਦਰੁ ਠੰਢਾ ਗੁਰ ਦਰਸਨੁ ਦੇਖਿ ਨਿਹਾਲੀ ॥੧॥
तेरे राह पर चलते हुए मेरा हृदय ठंडा हो जाता है और सतिगुरू का दीदार करके मेरा मन खिल उठता है। 1।
ਮਃ ੫ ॥
महला ५॥
ਹਠ ਮੰਝਾਹੂ ਮੈ ਮਾਣਕੁ ਲਧਾ ॥
मैंने अपने हृदय में एक लाल पाया है।
ਮੁਲਿ ਨ ਘਿਧਾ ਮੈ ਕੂ ਸਤਿਗੁਰਿ ਦਿਤਾ ॥
(पर वह मैंने कोई) मोल दे के नहीं लिया। (ये लाल) मुझे सतिगुरू ने दिया है।
ਢੂੰਢ ਵਞਾਈ ਥੀਆ ਥਿਤਾ ॥
(इसकी बरकति से) मेरी भटकना समाप्त हो गई है। मैं टिक गया हूँ।
ਜਨਮੁ ਪਦਾਰਥੁ ਨਾਨਕ ਜਿਤਾ ॥੨॥
हे नानक ! मैंने मानस जीवन-रूपी कीमती वस्तु (का लाभ) हासिल कर लिया है। 2।
ਪਉੜੀ ॥
पउड़ी॥
ਜਿਸ ਕੈ ਮਸਤਕਿ ਕਰਮੁ ਹੋਇ ਸੋ ਸੇਵਾ ਲਾਗਾ ॥
जिस मनुष्य के माथे पर प्रभू की कृपा (के लेख) हों वह प्रभू की सेवा-भक्ति में लगता है।
ਜਿਸੁ ਗੁਰ ਮਿਲਿ ਕਮਲੁ ਪ੍ਰਗਾਸਿਆ ਸੋ ਅਨਦਿਨੁ ਜਾਗਾ ॥
गुरू को मिल के जिस मनुष्य का हृदय-कमल खिल उठता है। वह (विकारों के हमलों से) सदा सचेत रहता है।
ਲਗਾ ਰੰਗੁ ਚਰਣਾਰਬਿੰਦ ਸਭੁ ਭ੍ਰਮੁ ਭਉ ਭਾਗਾ ॥
जिस मनुष्य (के मन) में प्रभू के सुंदर चरणों का प्यार होता है। उसकी भटकना उसका डर-भय दूर हो जाता है।