Sri Guru Granth Sahib Ji — Ang 954 (hindi)
ਸੀਤਾ ਲਖਮਣੁ ਵਿਛੁੜਿ ਗਇਆ ॥
सीता लक्ष्मण विछुड़े तब राम जी भी रोए।
ਰੋਵੈ ਦਹਸਿਰੁ ਲੰਕ ਗਵਾਇ ॥ ਜਿਨਿ ਸੀਤਾ ਆਦੀ ਡਉਰੂ ਵਾਇ ॥
रावण। लंका गवा के रोया। जिसने साधू बन के सीता (का हरण करके) ले आया था
ਰੋਵਹਿ ਪਾਂਡਵ ਭਏ ਮਜੂਰ ॥ ਜਿਨ ਕੈ ਸੁਆਮੀ ਰਹਤ ਹਦੂਰਿ ॥
(पाँचों) पाण्डव। जब (राजा वैराट के) मजदूर बने तब रोए। जिनके पास श्री कृष्ण जी रहते थे (भाव। जिनका पक्ष करते थे)।
ਰੋਵੈ ਜਨਮੇਜਾ ਖੁਇ ਗਇਆ ॥
राजा जनमेजा चूक गया (18 ब्राहमणों को जान से मार बैठा। प्रायश्चित के लिए 'महाभारत' सुना। पर शंका की। इस)
ਏਕੀ ਕਾਰਣਿ ਪਾਪੀ ਭਇਆ ॥
एक गलती के कारण पापी ही बना रहा (भाव। कोढ़ ना हटा) और रोया।
ਰੋਵਹਿ ਸੇਖ ਮਸਾਇਕ ਪੀਰ ॥
शेख पीर आदि भी रोते हैं कि
ਅੰਤਿ ਕਾਲਿ ਮਤੁ ਲਾਗੈ ਭੀੜ ॥
कहीं ऐसा ना हो कि अंत के समय कोई बिपता आ पड़े।
ਰੋਵਹਿ ਰਾਜੇ ਕੰਨ ਪੜਾਇ ॥
(भरथरी गोपीचंद आदिक) राजा। जोगी बन के दुखी होते हैं
ਘਰਿ ਘਰਿ ਮਾਗਹਿ ਭੀਖਿਆ ਜਾਇ ॥
जब घर-घर जा के भिक्षा माँगते हैं।
ਰੋਵਹਿ ਕਿਰਪਨ ਸੰਚਹਿ ਧਨੁ ਜਾਇ ॥
कँजूस धन इकट्ठा करते हैं पर रोते हैं ज बवह धन (उनके पास से) चला जाता है।
ਪੰਡਿਤ ਰੋਵਹਿ ਗਿਆਨੁ ਗਵਾਇ ॥
ज्ञान की कमी के कारण पण्डित भी ख्वार होते हैं।
ਬਾਲੀ ਰੋਵੈ ਨਾਹਿ ਭਤਾਰੁ ॥
स्त्री रोती है जब (सिर पर) पति ना रहे।
ਨਾਨਕ ਦੁਖੀਆ ਸਭੁ ਸੰਸਾਰੁ ॥
हे नानक ! सारा जगत ही दुखी है।
ਮੰਨੇ ਨਾਉ ਸੋਈ ਜਿਣਿ ਜਾਇ ॥
जो मनुष्य प्रभू के नाम को मानता है (भाव। जिसका मन प्रभू के नाम में पतीजता है)
ਅਉਰੀ ਕਰਮ ਨ ਲੇਖੈ ਲਾਇ ॥੧॥
वह (जिंदगी की बाजी) जीत के जाता है। ('नाम' के बिना) कोई और काम (जिंदगी की बाजी जीतने के लिए) सफल नहीं होता।
ਮਃ ੨ ॥
महला २॥
ਜਪੁ ਤਪੁ ਸਭੁ ਕਿਛੁ ਮੰਨਿਐ ਅਵਰਿ ਕਾਰਾ ਸਭਿ ਬਾਦਿ ॥
यदि मन प्रभू के नाम में पतीज जाए जो जप-तप आदि हरेक उद्यम (उसी में आ जाता है)। (नाम के बिना) और सारे कर्म व्यर्थ हैं।
ਨਾਨਕ ਮੰਨਿਆ ਮੰਨੀਐ ਬੁਝੀਐ ਗੁਰ ਪਰਸਾਦਿ ॥੨॥
हे नानक ! 'नाम' को मानने वाला आदर पाता है। ये बात गुरू की कृपा से समझी जा सकती है। 2।
ਪਉੜੀ ॥
पउड़ी॥
ਕਾਇਆ ਹੰਸ ਧੁਰਿ ਮੇਲੁ ਕਰਤੈ ਲਿਖਿ ਪਾਇਆ ॥
शरीर और जीवात्मा का संजोग धुर से करतार ने अपने हुकम के अनुसार बना दिया है।
ਸਭ ਮਹਿ ਗੁਪਤੁ ਵਰਤਦਾ ਗੁਰਮੁਖਿ ਪ੍ਰਗਟਾਇਆ ॥
प्रभू सब जीवों में छुपा हुआ मौजूद है। गुरू के द्वारा प्रकट होता है।
ਗੁਣ ਗਾਵੈ ਗੁਣ ਉਚਰੈ ਗੁਣ ਮਾਹਿ ਸਮਾਇਆ ॥
(जो मनुष्य गुरू की शरण आ के प्रभू के) गुण गाता है गुण उचारता है वह गुणों में लीन हो जाता है।
ਸਚੀ ਬਾਣੀ ਸਚੁ ਹੈ ਸਚੁ ਮੇਲਿ ਮਿਲਾਇਆ ॥
(सतिगुरू की) सच्ची बाणी के द्वारा वह मनुष्य सच्चे प्रभू का रूप हो जाता है। गुरू ने सच्चा प्रभू उसको संगति में (रख के) मिला दिया।
ਸਭੁ ਕਿਛੁ ਆਪੇ ਆਪਿ ਹੈ ਆਪੇ ਦੇਇ ਵਡਿਆਈ ॥੧੪॥
हरेक हस्ती में (अस्तित्व में) प्रभू स्वयं ही मौजूद है और स्वयं ही वडिआई (महानता। महिमा) बख्शता है। 14।
ਸਲੋਕ ਮਃ ੨ ॥
श्लोक महला २॥
ਨਾਨਕ ਅੰਧਾ ਹੋਇ ਕੈ ਰਤਨਾ ਪਰਖਣ ਜਾਇ ॥
हे नानक ! जो मनुष्य खुद अंधा हो और चल पड़े रत्न परखने।
ਰਤਨਾ ਸਾਰ ਨ ਜਾਣਈ ਆਵੈ ਆਪੁ ਲਖਾਇ ॥੧॥
वह रत्नों की कद्र तो जानता नहीं। पर अपने आप को उजागर करा आता है (भाव। अपना अंधापन जाहिर कर आता है)। 1।
ਮਃ ੨ ॥
महला २॥
ਰਤਨਾ ਕੇਰੀ ਗੁਥਲੀ ਰਤਨੀ ਖੋਲੀ ਆਇ ॥
प्रभू के गुण रूपी थैली सतिगुरू ने आ के खोली है।
ਵਖਰ ਤੈ ਵਣਜਾਰਿਆ ਦੁਹਾ ਰਹੀ ਸਮਾਇ ॥
से गुत्थी बेचने वाले सतिगुरू और लेने वाले गुरमुख दोनों के हृदय में टिक रही है (भाव। दोनों को ये गुण प्यारे लग रहे हैं)।
ਜਿਨ ਗੁਣੁ ਪਲੈ ਨਾਨਕਾ ਮਾਣਕ ਵਣਜਹਿ ਸੇਇ ॥
हे नानक ! जिनके पास (भाव। हृदय में) प्रभू की सिफत सालाह के गुण मौजूद हैं वही मनुष्य ही नाम-रत्न का लेन-देन (व्यापार) करते हैं;
ਰਤਨਾ ਸਾਰ ਨ ਜਾਣਨੀ ਅੰਧੇ ਵਤਹਿ ਲੋਇ ॥੨॥
पर जो इन रत्नों की कद्र नहीं जानते वे अंधों की तरह जगत में फिरते हैं। 2।
ਪਉੜੀ ॥
पउड़ी॥
ਨਉ ਦਰਵਾਜੇ ਕਾਇਆ ਕੋਟੁ ਹੈ ਦਸਵੈ ਗੁਪਤੁ ਰਖੀਜੈ ॥
शरीर (मानो एक) किला है। इसकी नौ इन्द्रियों के रूप में गुप्त दरवाजे (प्रकट) हैं। और दसवाँ द्वार गुप्त रखा हुआ है;
ਬਜਰ ਕਪਾਟ ਨ ਖੁਲਨੀ ਗੁਰ ਸਬਦਿ ਖੁਲੀਜੈ ॥
(उस दसवें दरवाजे के) किवाड़ बड़े कठोर हैं खुलते नहीं। खुलते (केवल) सतिगुरू के शबद से ही हैं।
ਅਨਹਦ ਵਾਜੇ ਧੁਨਿ ਵਜਦੇ ਗੁਰ ਸਬਦਿ ਸੁਣੀਜੈ ॥
(जब ये कठोर किवाड़ खुल जाते हैं तो। मानो। ) एक-रस वाले बाजे बज पड़ते हैं जो सतिगुरू के शबद के द्वारा सुने जाते हैं।
ਤਿਤੁ ਘਟ ਅੰਤਰਿ ਚਾਨਣਾ ਕਰਿ ਭਗਤਿ ਮਿਲੀਜੈ ॥
(जिस हृदय में ये आनंद पैदा होता है) उस हृदय में (ज्ञान का) प्रकाश हो जाता है। प्रभू की भक्ति करके वह मनुष्य प्रभू में मिल जाता है।
ਸਭ ਮਹਿ ਏਕੁ ਵਰਤਦਾ ਜਿਨਿ ਆਪੇ ਰਚਨ ਰਚਾਈ ॥੧੫॥
जिस प्रभू ने यह सारी रचना रची है वह सारे जीवों में व्यापक है (पर उस से मेल गुरू के द्वारा ही होता है)। 15।
ਸਲੋਕ ਮਃ ੨ ॥
श्लोक महला २॥
ਅੰਧੇ ਕੈ ਰਾਹਿ ਦਸਿਐ ਅੰਧਾ ਹੋਇ ਸੁ ਜਾਇ ॥
अगर कोई अंधा मनुष्य (किसी और को) राह बताए तो (उस राह पर) वही चलता है जो खुद अंधा हो;
ਹੋਇ ਸੁਜਾਖਾ ਨਾਨਕਾ ਸੋ ਕਿਉ ਉਝੜਿ ਪਾਇ ॥
हे नानक ! आँख वाला मनुष्य (अंधे के कहने पर) गलत राह पर नहीं पड़ता।
ਅੰਧੇ ਏਹਿ ਨ ਆਖੀਅਨਿ ਜਿਨ ਮੁਖਿ ਲੋਇਣ ਨਾਹਿ ॥
(पर आत्मिक जीवन में) ऐसे लोगों को अंधे नहीं कहा जाता जिनके मुँह पर आँखें नहीं हैं।
ਅੰਧੇ ਸੇਈ ਨਾਨਕਾ ਖਸਮਹੁ ਘੁਥੇ ਜਾਹਿ ॥੧॥
हे नानक ! अंधे वही हैं जो मालिक प्रभू से टूटे हुए हैं। 1।
ਮਃ ੨ ॥
महला २॥
ਸਾਹਿਬਿ ਅੰਧਾ ਜੋ ਕੀਆ ਕਰੇ ਸੁਜਾਖਾ ਹੋਇ ॥
जिस मनुष्य को मालिक-प्रभू ने स्वयं अंधा कर दिया है वह तब ही आँख वाला हो सकता है यदि प्रभू स्वयं (आँख वाला) बनाए। (नहीं तो।
ਜੇਹਾ ਜਾਣੈ ਤੇਹੋ ਵਰਤੈ ਜੇ ਸਉ ਆਖੈ ਕੋਇ ॥
अंधा मनुष्य तो) जिस तरह की समझ रखता है उसी तरह किए जाता है चाहे उसको कोई सौ बार समझाए।
ਜਿਥੈ ਸੁ ਵਸਤੁ ਨ ਜਾਪਈ ਆਪੇ ਵਰਤਉ ਜਾਣਿ ॥
जिस मनुष्य के अंदर 'नाम'-रूप पदार्थ की समझ नहीं वहाँ अहंकार वाला व्यवहार ही समझो।
ਨਾਨਕ ਗਾਹਕੁ ਕਿਉ ਲਏ ਸਕੈ ਨ ਵਸਤੁ ਪਛਾਣਿ ॥੨॥
(क्योंकि) हे नानक ! गाहक जिस सौदे को पहचान ही नहीं सकता उसका वह वणज ही कैसे करे। 2।
ਮਃ ੨ ॥
महला २॥
ਸੋ ਕਿਉ ਅੰਧਾ ਆਖੀਐ ਜਿ ਹੁਕਮਹੁ ਅੰਧਾ ਹੋਇ ॥
जो मनुष्य प्रभू की रजा में नेत्र-हीन हो गया उसको हम अंधा नहीं कहते।
ਨਾਨਕ ਹੁਕਮੁ ਨ ਬੁਝਈ ਅੰਧਾ ਕਹੀਐ ਸੋਇ ॥੩॥
हे नानक ! वह मनुष्य अंधा कहा जाता है जो रजा को समझता नहीं। 3।