Sri Guru Granth Sahib Ji — Ang 948 (hindi)
ਸੋ ਸਹੁ ਸਾਂਤਿ ਨ ਦੇਵਈ ਕਿਆ ਚਲੈ ਤਿਸੁ ਨਾਲਿ ॥
(पर इस तरह) वह पति (प्रभू) (हृदय में) शांति नहीं देता। उसके साथ कोई जोर नहीं चल सकता। (पर।
ਗੁਰ ਪਰਸਾਦੀ ਹਰਿ ਧਿਆਈਐ ਅੰਤਰਿ ਰਖੀਐ ਉਰ ਧਾਰਿ ॥
हाँ) सतिगुरू की मेहर से प्रभू को सिमरा जा सकता है और हृदय में बसाया जा सकता है।
ਨਾਨਕ ਘਰਿ ਬੈਠਿਆ ਸਹੁ ਪਾਇਆ ਜਾ ਕਿਰਪਾ ਕੀਤੀ ਕਰਤਾਰਿ ॥੧॥
हे नानक ! (गुरू की मेहर से) मैंने घर में बैठे ही पति को पा लिया। जब करतार ने (मेरे पर) कृपा की (और गुरू मिलाया)।
ਮਃ ੩ ॥
महला ३॥
ਧੰਧਾ ਧਾਵਤ ਦਿਨੁ ਗਇਆ ਰੈਣਿ ਗਵਾਈ ਸੋਇ ॥
जो मनुष्य अपने मन के पीछे चलता है उसका (सारा) दिन (दुनिया के) धंधों में भटकते हुए बीत जाता है। और रात को वह सो के गवा लेता है।
ਕੂੜੁ ਬੋਲਿ ਬਿਖੁ ਖਾਇਆ ਮਨਮੁਖਿ ਚਲਿਆ ਰੋਇ ॥
(इन धंधों में पड़ा हुआ) झूठ बोल के जहर खाता है (भाव। दुनिया के पदार्थ भोगता है) और (अंत को यहाँ से) रो के चल पड़ता है।
ਸਿਰੈ ਉਪਰਿ ਜਮ ਡੰਡੁ ਹੈ ਦੂਜੈ ਭਾਇ ਪਤਿ ਖੋਇ ॥
उसके सिर पर मौत का डंडा (तैयार रहता) है। (भाव। हर वक्त मौत से डरता है)। (प्रभू को बिसार के) और में प्यार के कारण (अपनी) इज्जत गवा लेता है;
ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਕਦੇ ਨ ਚੇਤਿਓ ਫਿਰਿ ਆਵਣ ਜਾਣਾ ਹੋਇ ॥
उसने परमात्मा का नाम तो कभी याद नहीं किया होता। (इसलिए) बार-बार जनम-मरण का चक्कर (उसे नसीब) होता है।
ਗੁਰ ਪਰਸਾਦੀ ਹਰਿ ਮਨਿ ਵਸੈ ਜਮ ਡੰਡੁ ਨ ਲਾਗੈ ਕੋਇ ॥
(पर जिस मनुष्य के) मन में सतिगुरू की मेहर से परमात्मा बसता है उसको कोई मौत का डंडा नहीं लगता (भाव। उसे मौत डरा नहीं सकती)।
ਨਾਨਕ ਸਹਜੇ ਮਿਲਿ ਰਹੈ ਕਰਮਿ ਪਰਾਪਤਿ ਹੋਇ ॥੨॥
हे नानक ! वह अडोल अवस्था में टिका रहता है (यह अवस्था उसको) परमात्मा की कृपा से मिल जाती है। 2।
ਪਉੜੀ ॥
पउड़ी ॥
ਇਕਿ ਆਪਣੀ ਸਿਫਤੀ ਲਾਇਅਨੁ ਦੇ ਸਤਿਗੁਰ ਮਤੀ ॥
(इस 'वेकी सृष्टि' में। प्रभू ने) कई जीवों को सतिगुरू की मति दे के अपनी सिफतसालाह में लगाया हुआ है।
ਇਕਨਾ ਨੋ ਨਾਉ ਬਖਸਿਓਨੁ ਅਸਥਿਰੁ ਹਰਿ ਸਤੀ ॥
कई जीवों को सदा कायम रहने वाले हरी ने अपना सदा-स्थिर रहने वाला 'नाम' बख्शा हुआ है।
ਪਉਣੁ ਪਾਣੀ ਬੈਸੰਤਰੋ ਹੁਕਮਿ ਕਰਹਿ ਭਗਤੀ ॥
हवा। पानी। आग (आदि तत्व भी) उसके हुकम में चल के उसकी भक्ति कर रहे हैं।
ਏਨਾ ਨੋ ਭਉ ਅਗਲਾ ਪੂਰੀ ਬਣਤ ਬਣਤੀ ॥
इन (तत्वों) को उस मालिक का बड़ा भय रहता है (सो। जगत का क्या आश्चर्य) सम्पूर्ण संरचना बनी हुई है।
ਸਭੁ ਇਕੋ ਹੁਕਮੁ ਵਰਤਦਾ ਮੰਨਿਐ ਸੁਖੁ ਪਾਈ ॥੩॥
हर जगह प्रभू का ही हुकम चल रहा है। (प्रभू के हुकम को) मानने (भाव। हुकम में चलने से ही) सुख पाया जा सकता है। 3।
ਸਲੋਕੁ ॥
श्लोक ॥
ਕਬੀਰ ਕਸਉਟੀ ਰਾਮ ਕੀ ਝੂਠਾ ਟਿਕੈ ਨ ਕੋਇ ॥
हे कबीर ! परमात्मा की कसवटी (ऐसा निखेड़ा करने वाली है कि इस) पर झूठा मनुष्य पूरा नहीं उतर सकता;
ਰਾਮ ਕਸਉਟੀ ਸੋ ਸਹੈ ਜੋ ਮਰਜੀਵਾ ਹੋਇ ॥੧॥
परमात्मा की परख पर वही पूरा उतरता है जो दुनिया की तरफ से मर के ईश्वर के लिए जीता है। 1।
ਮਃ ੩ ॥
महला ३॥
ਕਿਉ ਕਰਿ ਇਹੁ ਮਨੁ ਮਾਰੀਐ ਕਿਉ ਕਰਿ ਮਿਰਤਕੁ ਹੋਇ ॥
कैसे इस मन को मारे। कैसे ये मन दुनियावी चस्कों से हटे।
ਕਹਿਆ ਸਬਦੁ ਨ ਮਾਨਈ ਹਉਮੈ ਛਡੈ ਨ ਕੋਇ ॥
कोई भी मनुष्य कहने से (भाव। समझाने से) ना गुरू के शबद को मानता है और ना अहंकार छोड़ता है।
ਗੁਰ ਪਰਸਾਦੀ ਹਉਮੈ ਛੁਟੈ ਜੀਵਨ ਮੁਕਤੁ ਸੋ ਹੋਇ ॥
सतिगुरू की मेहर से अहंकार दूर होता है। (जिसका अहंकार नाश हो जाता है) वह मनुष्य जगत में रहता हुआ जगत के चस्कों से दूर रहता है।
ਨਾਨਕ ਜਿਸ ਨੋ ਬਖਸੇ ਤਿਸੁ ਮਿਲੈ ਤਿਸੁ ਬਿਘਨੁ ਨ ਲਾਗੈ ਕੋਇ ॥੨॥
हे नानक ! जिस मनुष्य पर प्रभू मेहर करता है उसको (जीवन मुक्ति का दर्जा) प्राप्त हो जाता है और (उसके जिंदगी के सफर में मायावी रसों के कारण) कोई रुकावट नहीं आती। 2।
ਮਃ ੩ ॥
महला ३॥
ਜੀਵਤ ਮਰਣਾ ਸਭੁ ਕੋ ਕਹੈ ਜੀਵਨ ਮੁਕਤਿ ਕਿਉ ਹੋਇ ॥
(जगत में) जीते हुए (जगत की ओर से) मरने की बातें हर कोई करता है। पर ये 'जीवन मुक्ति' (की अवस्था) प्राप्त कैसे हो।
ਭੈ ਕਾ ਸੰਜਮੁ ਜੇ ਕਰੇ ਦਾਰੂ ਭਾਉ ਲਾਏਇ ॥
अगर मनुष्य (दुनिया के चस्कों का ये जहर दूर करने के लिए) परमात्मा का प्यार (-रूप) दवा प्रयोग करे और प्रभू का डर परहेज बन जाए (भाव। ज्यों-ज्यों मनुष्य ये डर दिल में रखेगा कि प्रभू हर वक्त अंग-संग है उससे कुछ भी छुप नहीं सकता) और
ਅਨਦਿਨੁ ਗੁਣ ਗਾਵੈ ਸੁਖ ਸਹਜੇ ਬਿਖੁ ਭਵਜਲੁ ਨਾਮਿ ਤਰੇਇ ॥
हर रोज नित्य आनंद के साथ अडोलता में टिक के प्रभू के गुण गाए तो प्रभू के नाम से वह इस विष-रूप संसार-समुंद्र को तैर जाता है।
ਨਾਨਕ ਗੁਰਮੁਖਿ ਪਾਈਐ ਜਾ ਕਉ ਨਦਰਿ ਕਰੇਇ ॥੩॥
हे नानक ! जिस पर प्रभू मेहर की नजर करता है उसको ये (जीवन-मुक्ति की अवस्था) सतिगुरू के द्वारा ही मिलती है। 3।
ਪਉੜੀ ॥
पउड़ी ॥
ਦੂਜਾ ਭਾਉ ਰਚਾਇਓਨੁ ਤ੍ਰੈ ਗੁਣ ਵਰਤਾਰਾ ॥
(जीवों का) माया से प्यार और माया के तीन गुणों का प्रभाव (वरतारा) भी उस सृजनहार ने (स्वयं ही) पैदा किए हैं।
ਬ੍ਰਹਮਾ ਬਿਸਨੁ ਮਹੇਸੁ ਉਪਾਇਅਨੁ ਹੁਕਮਿ ਕਮਾਵਨਿ ਕਾਰਾ ॥
(तीन गुणों से तीनों देवते) ब्रह्मा। विष्णू और शिव उसने (स्वयं ही) पैदा किए हैं। (ये त्रैदेव) उसके हुकम में ही काम कर रहे हैं।
ਪੰਡਿਤ ਪੜਦੇ ਜੋਤਕੀ ਨਾ ਬੂਝਹਿ ਬੀਚਾਰਾ ॥
ज्योतिषी (आदि) विद्वान लोग (विचार वाली पुस्तकें) पढ़ते हैं पर (प्रभू के इस करिश्मे की) विचार को नहीं समझते।
ਸਭੁ ਕਿਛੁ ਤੇਰਾ ਖੇਲੁ ਹੈ ਸਚੁ ਸਿਰਜਣਹਾਰਾ ॥
(हे प्रभू !) (यह जगत रचना) सारा ही तेरा (एक) खेल है। तू (इस खेल को) बनाने वाला है और सदा कायम रहने वाला है।
ਜਿਸੁ ਭਾਵੈ ਤਿਸੁ ਬਖਸਿ ਲੈਹਿ ਸਚਿ ਸਬਦਿ ਸਮਾਈ ॥੪॥
जो तुझे भाता है उस पर (तू) बख्शिश करता है और वह गुरू के शबद के द्वारा तेरे सच्चे स्वरूप में टिका रहता है। 4।
ਸਲੋਕੁ ਮਃ ੩ ॥
श्लोक महला ३॥
ਮਨ ਕਾ ਝੂਠਾ ਝੂਠੁ ਕਮਾਵੈ ॥
मन का झूठा है (भाव। मन में झूठ है। तप के उलट भाव हैं) और झूठ कमाता है (भाव। बाहर से देखने में तपस्वी है पर कर्म उसके उलट हैं)।
ਮਾਇਆ ਨੋ ਫਿਰੈ ਤਪਾ ਸਦਾਵੈ ॥
(जो मनुष्य वैसे तो) माया की खातिर फिरता है (पर अपने आप को) तपा (तपस्वी) कहलवाता है।
ਭਰਮੇ ਭੂਲਾ ਸਭਿ ਤੀਰਥ ਗਹੈ ॥
(अपने आप को तपा समझने के) भुलेखे में भूला हुआ सारे तीथों में भटकता है।
ਓਹੁ ਤਪਾ ਕੈਸੇ ਪਰਮ ਗਤਿ ਲਹੈ ॥
ऐसा तपस्वी उच्च आत्मिक अवस्था कैसे प्राप्त करे।
ਗੁਰ ਪਰਸਾਦੀ ਕੋ ਸਚੁ ਕਮਾਵੈ ॥
हे नानक ! जो तपस्वी गुरू की कृपा से सच कमाता है (भाव। प्रभू के अस्तित्व को अपनी जिंदगी का हिस्सा बनाता है)
ਨਾਨਕ ਸੋ ਤਪਾ ਮੋਖੰਤਰੁ ਪਾਵੈ ॥੧॥
वह अंदरूनी मुक्ति प्राप्त करता है। 1।
ਮਃ ੩ ॥
महला ३॥
ਸੋ ਤਪਾ ਜਿ ਇਹੁ ਤਪੁ ਘਾਲੇ ॥
जो मनुष्य ये तप कमाता है वह (असल) तपस्वी है।
ਸਤਿਗੁਰ ਨੋ ਮਿਲੈ ਸਬਦੁ ਸਮਾਲੇ ॥
जो मनुष्य सतिगुरू को मिलता है (गुरू की शरण पड़ता है) और गुरू का शबद (हृदय में) संभाल के रखता है।
ਸਤਿਗੁਰ ਕੀ ਸੇਵਾ ਇਹੁ ਤਪੁ ਪਰਵਾਣੁ ॥
सतिगुरू की (बताई हुई) कार करनी- ये तप (प्रभू की नजरों में) कबूल है;
ਨਾਨਕ ਸੋ ਤਪਾ ਦਰਗਹਿ ਪਾਵੈ ਮਾਣੁ ॥੨॥
हे नानक ! ये तप करने वाला तपा प्रभू की हजूरी में आदर पाता है। 2।
ਪਉੜੀ ॥
पउड़ी॥
ਰਾਤਿ ਦਿਨਸੁ ਉਪਾਇਅਨੁ ਸੰਸਾਰ ਕੀ ਵਰਤਣਿ ॥
(इस 'वेकी सृष्टि' में) संसार के बर्ताव-व्यवहार के लिए उस (प्रभू ने) रात और दिन पैदा किए हैं;