Sri Guru Granth Sahib Ji — Ang 937 (hindi)
ਆਪੁ ਗਇਆ ਦੁਖੁ ਕਟਿਆ ਹਰਿ ਵਰੁ ਪਾਇਆ ਨਾਰਿ ॥੪੭॥
(गुरू-शबद से जिसका) अहंकार दूर हुआ है (स्वै। अहम् का) दुख काटा गया है उस जीव-स्त्री ने प्रभू-पति को पा लिया है। 47।
ਸੁਇਨਾ ਰੁਪਾ ਸੰਚੀਐ ਧਨੁ ਕਾਚਾ ਬਿਖੁ ਛਾਰੁ ॥
(आम तौर जगत में) सोना-चाँदी ही इकट्ठा किया जाता है। पर ये धन होछा है। विष (-रूप। भाव दुखदाई) है। तुच्छ है।
ਸਾਹੁ ਸਦਾਏ ਸੰਚਿ ਧਨੁ ਦੁਬਿਧਾ ਹੋਇ ਖੁਆਰੁ ॥
जो मनुष्य (ये) धन जोड़ के (अपने आप को) शाह कहलवाता है वह मेर-तेर में दुखी होता है।
ਸਚਿਆਰੀ ਸਚੁ ਸੰਚਿਆ ਸਾਚਉ ਨਾਮੁ ਅਮੋਲੁ ॥
सच्चे व्यापारियों ने सदा-स्थिर रहने वाला नाम-धन इकट्ठा किया है। सच्चा अमूल्य नाम-धन सम्भाला है। उज्जवल और पवित्र प्रभू (का नाम कमाया है)।
ਹਰਿ ਨਿਰਮਾਇਲੁ ਊਜਲੋ ਪਤਿ ਸਾਚੀ ਸਚੁ ਬੋਲੁ ॥
उनको सच्ची इज्जत मिलती है (प्रभू के) सच्चे (मीठे आदर वाले) बोल (मिलते हैं)।
ਸਾਜਨੁ ਮੀਤੁ ਸੁਜਾਣੁ ਤੂ ਤੂ ਸਰਵਰੁ ਤੂ ਹੰਸੁ ॥
(हे पांडे ! तू भी मन की तख्ती पर गोपाल का नाम लिख और उसके आगे ऐसे अरदास कर - हे प्रभू !) तू ही (सच्चा) समझदार सज्जन-मित्र है। तू ही (जगत-रूप) सरोवर है और तू ही (इस सरोवर का जीव-रूप) हँस है;
ਸਾਚਉ ਠਾਕੁਰੁ ਮਨਿ ਵਸੈ ਹਉ ਬਲਿਹਾਰੀ ਤਿਸੁ ॥
मैं सदके हूँ उस (हँस) से जिसके मन में तू सच्चा ठाकुर बसता है।
ਮਾਇਆ ਮਮਤਾ ਮੋਹਣੀ ਜਿਨਿ ਕੀਤੀ ਸੋ ਜਾਣੁ ॥
(हे पांडे !) उस गोपाल को याद रख जिसने मोहनी माया की ममता (जीवों को) लगा दी है।
ਬਿਖਿਆ ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਏਕੁ ਹੈ ਬੂਝੈ ਪੁਰਖੁ ਸੁਜਾਣੁ ॥੪੮॥
जिस किसी ने उस सुजान पुरख को समझ लिया है। उसके लिए सिर्फ (नाम-) अमृत ही 'माया' है। 48।
ਖਿਮਾ ਵਿਹੂਣੇ ਖਪਿ ਗਏ ਖੂਹਣਿ ਲਖ ਅਸੰਖ ॥
(मोहनी माया की ममता से पैदा हुए भेदभाव के कारण) क्षमा-हीन हो के बेअंत। लाखों अनगिनत जीव खप के मर गए हैं।
ਗਣਤ ਨ ਆਵੈ ਕਿਉ ਗਣੀ ਖਪਿ ਖਪਿ ਮੁਏ ਬਿਸੰਖ ॥
गिने नहीं जा सकते। गिनती का भी क्या लाभ। अगिनत ही जीव (क्षमा-विहीन हो के) दुखी हुए हैं।
ਖਸਮੁ ਪਛਾਣੈ ਆਪਣਾ ਖੂਲੈ ਬੰਧੁ ਨ ਪਾਇ ॥
जो मनुष्य अपने मालिक प्रभू को पहचानता है। वह खुले दिल वाला हो जाता है। तंग-दिली (उसमें) नहीं रहती।
ਸਬਦਿ ਮਹਲੀ ਖਰਾ ਤੂ ਖਿਮਾ ਸਚੁ ਸੁਖ ਭਾਇ ॥
गुरू के शबद के द्वारा वह टिक जाता है (भाव।जिगरे वाला हो जाता है) (हे प्रभू !) तू उसे प्रत्यक्ष रूप से दिखाई दे जाता है। क्षमा और सत्य उसको आसानी से मिल जाते हैं।
ਖਰਚੁ ਖਰਾ ਧਨੁ ਧਿਆਨੁ ਤੂ ਆਪੇ ਵਸਹਿ ਸਰੀਰਿ ॥
(हे प्रभू !) तू ही उसका (जिंदगी के सफर का) खर्च बन जाता है। तू ही उसका खरा (सच्चा) धन हो जाता है। तू स्वयं ही उसका ध्यान (सुरति का निशाना) बन जाता है। तू स्वयं ही उसके शरीर में (प्रत्यक्ष) बसने लग जाता है।
ਮਨਿ ਤਨਿ ਮੁਖਿ ਜਾਪੈ ਸਦਾ ਗੁਣ ਅੰਤਰਿ ਮਨਿ ਧੀਰ ॥
वह मन से। तन से। मुँह से सदा (तुझे ही) जपता है। उसके अंदर (तेरे) गुण पैदा हो जाते हैं। उसके मन में धीरज आ जाता है।
ਹਉਮੈ ਖਪੈ ਖਪਾਇਸੀ ਬੀਜਉ ਵਥੁ ਵਿਕਾਰੁ ॥
(गोपाल के नाम के बिना) दूसरा पदार्थ विकार (-रूप) है। (इसके कारण) जीव अहंकार में खपता-खपाता है।
ਜੰਤ ਉਪਾਇ ਵਿਚਿ ਪਾਇਅਨੁ ਕਰਤਾ ਅਲਗੁ ਅਪਾਰੁ ॥੪੯॥
(आश्चर्यजनक खेल ये है) करतार ने जंतु पैदा करके (अहंकार) में डाल दिए हैं। (पर) वह बेअंत करतार अलग ही रहता है। 49।
ਸ੍ਰਿਸਟੇ ਭੇਉ ਨ ਜਾਣੈ ਕੋਇ ॥
कोई जीव सृजनहार प्रभू का भेद नहीं पा सकता ( और। कोई उसकी रजा में दख़ल नहीं दे सकता।
ਸ੍ਰਿਸਟਾ ਕਰੈ ਸੁ ਨਿਹਚਉ ਹੋਇ ॥
क्योंकि जगत में) अवश्य ही वही होता है जो सृजनहार करतार करता है।
ਸੰਪੈ ਕਉ ਈਸਰੁ ਧਿਆਈਐ ॥
(सृजनहार की यह एक अजब खेल है कि आम तौर पर मनुष्य) धन की खातिर ही परमात्मा को ध्याता है।
ਸੰਪੈ ਪੁਰਬਿ ਲਿਖੇ ਕੀ ਪਾਈਐ ॥
और अबतक की हुई मेहनत के अनुसार धन मिल (भी) जाता है।
ਸੰਪੈ ਕਾਰਣਿ ਚਾਕਰ ਚੋਰ ॥
धन की खातिर मनुष्य दूसरों के नौकर (भी) बनते हैं। चोर (भी) बनते हैं (भाव। चोरी भी करते हैं)। पर।
ਸੰਪੈ ਸਾਥਿ ਨ ਚਾਲੈ ਹੋਰ ॥
धन किसी के साथ नहीं निभता। (मरने पर) औरों का बन जाता है।
ਬਿਨੁ ਸਾਚੇ ਨਹੀ ਦਰਗਹ ਮਾਨੁ ॥
सदा-स्थिर रहने वाला गोपाल (के नाम) के बिना उसकी हजूरी में आदर नहीं मिलता।
ਹਰਿ ਰਸੁ ਪੀਵੈ ਛੁਟੈ ਨਿਦਾਨਿ ॥੫੦॥
जो मनुष्य परमात्मा के नाम का रस पीता है वह (वह धन-संपक्ति के मोह से) अंत को बच जाता है। 50।
ਹੇਰਤ ਹੇਰਤ ਹੇ ਸਖੀ ਹੋਇ ਰਹੀ ਹੈਰਾਨੁ ॥
हे सखी ! (ये बात) देख-देख के मैं हैरान हो रही हूँ कि
ਹਉ ਹਉ ਕਰਤੀ ਮੈ ਮੁਈ ਸਬਦਿ ਰਵੈ ਮਨਿ ਗਿਆਨੁ ॥
(मेरे अंदर) 'मैं मैं' करने वाली 'मैं' मर गई है (भाव। अहंकार करने वाली आदत खत्म हो गई है)। (अब मेरी सुरति) गुरू-शबद में जुड़ रही है। और (मेरे) मन में प्रभू के साथ जान-पहचान बन गई है।
ਹਾਰ ਡੋਰ ਕੰਕਨ ਘਣੇ ਕਰਿ ਥਾਕੀ ਸੀਗਾਰੁ ॥
मैं बहुत सारे हारों-कंगनों के हार श्रृंगार करके थक चुकी थी (पर प्रीतम-प्रभू के मिलाप का सुख ना मिला। भाव। बाहरी धार्मिक उद्यमों से आनंद नहीं मिल पाया। पर। अब जब 'अहंकार' खत्म हो गया)
ਮਿਲਿ ਪ੍ਰੀਤਮ ਸੁਖੁ ਪਾਇਆ ਸਗਲ ਗੁਣਾ ਗਲਿ ਹਾਰੁ ॥
प्रीतम-प्रभू को मिल के सुख मिल गया है (उसके गुण मेरे हृदय में आ बसे हैं। यही उसके) सारे गुणों का मेरे गले में हार है (अब किसी और हार-श्रृंगार की आवश्यक्ता नहीं रही)।
ਨਾਨਕ ਗੁਰਮੁਖਿ ਪਾਈਐ ਹਰਿ ਸਿਉ ਪ੍ਰੀਤਿ ਪਿਆਰੁ ॥
हे नानक ! प्रभू के साथ प्रीत। प्रभू से प्यार। सतिगुरू के माध्यम से ही हो सकता है; और।
ਹਰਿ ਬਿਨੁ ਕਿਨਿ ਸੁਖੁ ਪਾਇਆ ਦੇਖਹੁ ਮਨਿ ਬੀਚਾਰਿ ॥
(बेशक) मन में विचार के देख लो। (भाव। तुम्हे अपनी आत्म-बीती ही बता देगी कि) प्रभू के मेल के बिना कभी किसी को सुख नहीं मिला। (सो।
ਹਰਿ ਪੜਣਾ ਹਰਿ ਬੁਝਣਾ ਹਰਿ ਸਿਉ ਰਖਹੁ ਪਿਆਰੁ ॥
हे पांडे ! अगर सुख तलाशता है तो) प्रभू का नाम पढ़। प्रभू का नाम विचार। प्रभू के साथ ही प्यार बना।
ਹਰਿ ਜਪੀਐ ਹਰਿ ਧਿਆਈਐ ਹਰਿ ਕਾ ਨਾਮੁ ਅਧਾਰੁ ॥੫੧॥
(जीभ से) प्रभू का नाम जपें। (मन में) प्रभू को ही सिमरें। और प्रभू का नाम ही (जिंदगी का) आसरा (बनाएं)। 51।
ਲੇਖੁ ਨ ਮਿਟਈ ਹੇ ਸਖੀ ਜੋ ਲਿਖਿਆ ਕਰਤਾਰਿ ॥
हे सखी ! (हमारे किए कर्मों के अनुसार। अहंकार का) जो लेख करतार ने (हमारे माथे पर) लिख दिया है वह (हमारी अपनी चतुराई व हिम्मत से) नहीं मिट सकते।
ਆਪੇ ਕਾਰਣੁ ਜਿਨਿ ਕੀਆ ਕਰਿ ਕਿਰਪਾ ਪਗੁ ਧਾਰਿ ॥
(यह लेख तब ही मिटता है। जब) जिस प्रभू ने खुद ही (इस अहंकार के लेख का) सबब। (भाव। विछोड़ा) बनाया है वह मेहर करके (हमारे अंदर) आ बसे।
ਕਰਤੇ ਹਥਿ ਵਡਿਆਈਆ ਬੂਝਹੁ ਗੁਰ ਬੀਚਾਰਿ ॥
करतार के गुण गाने की दाति करतार के अपने हाथ में है; गुरू के शबद की विचार के द्वारा समझने का यत्न करो (तो समझ आ जाएगी)।
ਲਿਖਿਆ ਫੇਰਿ ਨ ਸਕੀਐ ਜਿਉ ਭਾਵੀ ਤਿਉ ਸਾਰਿ ॥
(हे प्रभू ! अहंकार के) जो संस्कार (हमारे मन में हमारे कर्मों के अनुसार) उकरे जाते हैं वह (हमारी अपनी चतुराई से) बदले नहीं जा सकते; जैसे तुझे अच्छा लगे तू स्वयं (हमारी) संभाल कर।
ਨਦਰਿ ਤੇਰੀ ਸੁਖੁ ਪਾਇਆ ਨਾਨਕ ਸਬਦੁ ਵੀਚਾਰਿ ॥
हे नानक ! (कह-) गुरू के शबद को विचार के (देख लिया है कि हे प्रभू !) तेरी मेहर की नजर से ही सुख मिलता है।
ਮਨਮੁਖ ਭੂਲੇ ਪਚਿ ਮੁਏ ਉਬਰੇ ਗੁਰ ਬੀਚਾਰਿ ॥
जो मनुष्य अपने मन के पीछे चले वह (इस अहंकार के चक्र-व्यूह में फस के) दुखी हुए। बचे वह जो गुरू-शबद की विचार में (जुड़े)।
ਜਿ ਪੁਰਖੁ ਨਦਰਿ ਨ ਆਵਈ ਤਿਸ ਕਾ ਕਿਆ ਕਰਿ ਕਹਿਆ ਜਾਇ ॥
(मनुष्य अपनी चतुराई करे भी क्या। क्योंकि) जो प्रभू (इन आँखों से) दिखता ही नहीं। उसके गुण गाए नहीं जा सकते।
ਬਲਿਹਾਰੀ ਗੁਰ ਆਪਣੇ ਜਿਨਿ ਹਿਰਦੈ ਦਿਤਾ ਦਿਖਾਇ ॥੫੨॥
(तभी तो) मैं अपने गुरू से सदके हूँ जिसने (मुझे मेरे) हृदय में ही (प्रभू) दिखा दिया है। 52।
ਪਾਧਾ ਪੜਿਆ ਆਖੀਐ ਬਿਦਿਆ ਬਿਚਰੈ ਸਹਜਿ ਸੁਭਾਇ ॥
उस पांधे (पंडित व अध्यापक) को विद्वान कहना चाहिए। जो विद्या के द्वारा शांति के स्वभाव में जीवन व्यतीत करता है।