Sri Guru Granth Sahib Ji — Ang 861 (hindi)
ਜਿਸ ਤੇ ਸੁਖ ਪਾਵਹਿ ਮਨ ਮੇਰੇ ਸੋ ਸਦਾ ਧਿਆਇ ਨਿਤ ਕਰ ਜੁਰਨਾ ॥
हे मेरे मन ! जिस प्रभू से तू सारे सुख पा रहा है। उसको सदा ही दोनों हाथ जोड़ के (पूरी निम्रता से) सिमरा कर।
ਜਨ ਨਾਨਕ ਕਉ ਹਰਿ ਦਾਨੁ ਇਕੁ ਦੀਜੈ ਨਿਤ ਬਸਹਿ ਰਿਦੈ ਹਰੀ ਮੋਹਿ ਚਰਨਾ ॥੪॥੩॥
हे हरी ! (अपने) दास नानक को एक ख़ैर डाल कि तेरे चरण मेरे हृदय में सदा ही बसते रहें। 4। 3।
ਗੋਂਡ ਮਹਲਾ ੪ ॥
गोंड महला ४ ॥
ਜਿਤਨੇ ਸਾਹ ਪਾਤਿਸਾਹ ਉਮਰਾਵ ਸਿਕਦਾਰ ਚਉਧਰੀ ਸਭਿ ਮਿਥਿਆ ਝੂਠੁ ਭਾਉ ਦੂਜਾ ਜਾਣੁ ॥
हे मन ! (जगत में) जितने भी शाह-पातशाह अमीर सरदार चौधरी (दिखाई देते हैं) ये सारे नाशवंत हैं। (ऐसे) माया के प्यार को झूठा समझ।
ਹਰਿ ਅਬਿਨਾਸੀ ਸਦਾ ਥਿਰੁ ਨਿਹਚਲੁ ਤਿਸੁ ਮੇਰੇ ਮਨ ਭਜੁ ਪਰਵਾਣੁ ॥੧॥
सिर्फ परमात्मा ही नाश-रहित है। सदा कायम रहने वाला है। अटल है। हे मेरे मन ! उस परमात्मा का नाम जपा कर। तभी कबूल होगा। 1।
ਮੇਰੇ ਮਨ ਨਾਮੁ ਹਰੀ ਭਜੁ ਸਦਾ ਦੀਬਾਣੁ ॥
हे मेरे मन ! सदा प्रभू का नाम सिमरा कर। यही अटल आसरा है।
ਜੋ ਹਰਿ ਮਹਲੁ ਪਾਵੈ ਗੁਰ ਬਚਨੀ ਤਿਸੁ ਜੇਵਡੁ ਅਵਰੁ ਨਾਹੀ ਕਿਸੈ ਦਾ ਤਾਣੁ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
जो मनुष्य गुरू के बचनों पर चल कर प्रभू के चरणों में निवास हासिल कर लेता है। उस मनुष्य के आत्मिक बल जितना और किसी का बल नहीं। 1। रहाउ।
ਜਿਤਨੇ ਧਨਵੰਤ ਕੁਲਵੰਤ ਮਿਲਖਵੰਤ ਦੀਸਹਿ ਮਨ ਮੇਰੇ ਸਭਿ ਬਿਨਸਿ ਜਾਹਿ ਜਿਉ ਰੰਗੁ ਕਸੁੰਭ ਕਚਾਣੁ ॥
हे मेरे मन ! (दुनिया में) जितने भी धनवान। ऊँची कुल वाले। जमीनों के मालिक दिखाई दे रहे हैं। ये सारे नाश हो जाएंगे। (इनका बड़प्पन वैसे ही कच्चा है) जैसे कुसंभ का रंग कच्चा है।
ਹਰਿ ਸਤਿ ਨਿਰੰਜਨੁ ਸਦਾ ਸੇਵਿ ਮਨ ਮੇਰੇ ਜਿਤੁ ਹਰਿ ਦਰਗਹ ਪਾਵਹਿ ਤੂ ਮਾਣੁ ॥੨॥
हे मेरे मन ! उस परमात्मा को सदा सिमर। जो सदा कायम रहने वाला है। जो माया के प्रभाव से परे है। और जिसके माध्यम से तू प्रभू की हजूरी में आदर हासिल करेगा। 2।
ਬ੍ਰਾਹਮਣੁ ਖਤ੍ਰੀ ਸੂਦ ਵੈਸ ਚਾਰਿ ਵਰਨ ਚਾਰਿ ਆਸ੍ਰਮ ਹਹਿ ਜੋ ਹਰਿ ਧਿਆਵੈ ਸੋ ਪਰਧਾਨੁ ॥
(हे मन ! हमारे देश में) ब्राहमण। क्षत्रीय। वैश्य। शूद्र - ये चार (प्रसिद्ध) वर्ण हैं। (ब्रहमचर्य। गृहस्थ। वानप्रस्थ व सन्यास- ये) चार आश्रम (प्रसिद्ध) हैं। इनमें से जो भी मनुष्य नाम सिमरता है। वही (सबसे) श्रेष्ठ है (जाति आदि के कारण नहीं)।
ਜਿਉ ਚੰਦਨ ਨਿਕਟਿ ਵਸੈ ਹਿਰਡੁ ਬਪੁੜਾ ਤਿਉ ਸਤਸੰਗਤਿ ਮਿਲਿ ਪਤਿਤ ਪਰਵਾਣੁ ॥੩॥
जैसे चंदन के नजदीक बेचारा अरिण्ड बसता है (और सुगंधित हो जाता है) वैसे ही साध-संगति में मिल के विकारी भी (पवित्र हो के) कबूल हो जाता है। 3।
ਓਹੁ ਸਭ ਤੇ ਊਚਾ ਸਭ ਤੇ ਸੂਚਾ ਜਾ ਕੈ ਹਿਰਦੈ ਵਸਿਆ ਭਗਵਾਨੁ ॥
हे मन ! जिस मनुष्य के हृदय में परमात्मा आ बसता है। वह मनुष्य और सब मनुष्यों से ऊँचा हो जाता है। स्वच्छ हो जाता है।
ਜਨ ਨਾਨਕੁ ਤਿਸ ਕੇ ਚਰਨ ਪਖਾਲੈ ਜੋ ਹਰਿ ਜਨੁ ਨੀਚੁ ਜਾਤਿ ਸੇਵਕਾਣੁ ॥੪॥੪॥
(हे भाई !) दास नानक उस मनुष्य के चरण धोता है। जो प्रभू का सेवक है प्रभू का भक्त है। चाहे वह जाति के आधार पर नीच ही (गिना जाता) है। 4। 4।
ਗੋਂਡ ਮਹਲਾ ੪ ॥
गोंड महला ४ ॥
ਹਰਿ ਅੰਤਰਜਾਮੀ ਸਭਤੈ ਵਰਤੈ ਜੇਹਾ ਹਰਿ ਕਰਾਏ ਤੇਹਾ ਕੋ ਕਰਈਐ ॥
हे मेरे मन ! परमात्मा हरेक के दिल की जानने वाला है। हरेक जगह में मौजूद है। (हरेक जीव के अंदर व्यापक हो के) जैसा काम (किसी जीव से) करवाता है। वैसा ही काम जीव करता है।
ਸੋ ਐਸਾ ਹਰਿ ਸੇਵਿ ਸਦਾ ਮਨ ਮੇਰੇ ਜੋ ਤੁਧਨੋ ਸਭ ਦੂ ਰਖਿ ਲਈਐ ॥੧॥
हे मन ! ऐसी ताकत वाले प्रभू को सदा सिमरता रह। वह तुझे हरेक दुख-कलेश से बचा सकता है। 1।
ਮੇਰੇ ਮਨ ਹਰਿ ਜਪਿ ਹਰਿ ਨਿਤ ਪੜਈਐ ॥
हे मेरे मन ! सदा प्रभू का नाम जपना चाहिए। उचारना चाहिए।
ਹਰਿ ਬਿਨੁ ਕੋ ਮਾਰਿ ਜੀਵਾਲਿ ਨ ਸਾਕੈ ਤਾ ਮੇਰੇ ਮਨ ਕਾਇਤੁ ਕੜਈਐ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
(जब) परमात्मा के बिना (और) कोई नहीं मार सकता है ना जीवित कर सकता है। तो फिर। हे मेरे मन ! (किसी तरह का) चिंता-फिक्र नहीं करना चाहिए। 1। रहाउ।
ਹਰਿ ਪਰਪੰਚੁ ਕੀਆ ਸਭੁ ਕਰਤੈ ਵਿਚਿ ਆਪੇ ਆਪਣੀ ਜੋਤਿ ਧਰਈਐ ॥
हे मन ! ये सारा दिखाई देता जगत करतार ने खुद बनाया है। इस जगत में उसने खुद ही अपनी ज्योति रखी हुई है।
ਹਰਿ ਏਕੋ ਬੋਲੈ ਹਰਿ ਏਕੁ ਬੁਲਾਏ ਗੁਰਿ ਪੂਰੈ ਹਰਿ ਏਕੁ ਦਿਖਈਐ ॥੨॥
(सब जीवों में वह) करतार स्वयं ही बोल रहा है। (हरेक जीव को) वह प्रभू खुद ही बोलने की ताकत दे रहा है। पूरे गुरू ने (मुझे हर जगह) वह एक प्रभू ही दिखा दिया है। 2।
ਹਰਿ ਅੰਤਰਿ ਨਾਲੇ ਬਾਹਰਿ ਨਾਲੇ ਕਹੁ ਤਿਸੁ ਪਾਸਹੁ ਮਨ ਕਿਆ ਚੋਰਈਐ ॥
हे मन ! (हरेक जीव के) अंदर प्रभू स्वयं ही अंग-संग बसता है। बाहर सारे जगत में भी प्रभू ही हर जगह बसता है। बताओ ! हे मन ! उस (सर्व-व्यापक) से कौन सी बात छुपाई जा सकती है।
ਨਿਹਕਪਟ ਸੇਵਾ ਕੀਜੈ ਹਰਿ ਕੇਰੀ ਤਾਂ ਮੇਰੇ ਮਨ ਸਰਬ ਸੁਖ ਪਈਐ ॥੩॥
मेरे मन ! उस प्रभू की सेवा भक्ति निर्छल हो के करनी चाहिए। तब ही (उससे) सारे सुख हासिल किए जा सकते हैं। 3।
ਜਿਸ ਦੈ ਵਸਿ ਸਭੁ ਕਿਛੁ ਸੋ ਸਭ ਦੂ ਵਡਾ ਸੋ ਮੇਰੇ ਮਨ ਸਦਾ ਧਿਅਈਐ ॥
हे मेरे मन ! जिस परमात्मा के वश में हरेक चीज है। वह सबसे बड़ा है। सदा ही उसका ध्यान धरना चाहिए।
ਜਨ ਨਾਨਕ ਸੋ ਹਰਿ ਨਾਲਿ ਹੈ ਤੇਰੈ ਹਰਿ ਸਦਾ ਧਿਆਇ ਤੂ ਤੁਧੁ ਲਏ ਛਡਈਐ ॥੪॥੫॥
हे दास नानक ! (कह-हे मन !) वह परमात्मा सदा तेरे साथ बसता है। उसका ध्यान धरा कर। तुझे वह (हरेक दुख-कलेश से) बचाने वाला है। 4। 5।
ਗੋਂਡ ਮਹਲਾ ੪ ॥
गोंड महला ४ ॥
ਹਰਿ ਦਰਸਨ ਕਉ ਮੇਰਾ ਮਨੁ ਬਹੁ ਤਪਤੈ ਜਿਉ ਤ੍ਰਿਖਾਵੰਤੁ ਬਿਨੁ ਨੀਰ ॥੧॥
(हे सहेलिए ! उस प्रेम के तीर के कारण अब) मेरा मन परमात्मा के दर्शनों के लिए (इस प्रकार) व्याकुल है (तड़प रहा है) जैसे पानी के बिना प्यासा मनुष्य। 1।
ਮੇਰੈ ਮਨਿ ਪ੍ਰੇਮੁ ਲਗੋ ਹਰਿ ਤੀਰ ॥
हे भाई ! परमात्मा का प्यार मेरे मन को तीर की तरह लगा हुआ है।
ਹਮਰੀ ਬੇਦਨ ਹਰਿ ਪ੍ਰਭੁ ਜਾਨੈ ਮੇਰੇ ਮਨ ਅੰਤਰ ਕੀ ਪੀਰ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
(उस प्रेम-तीर के कारण पैदा हुई) मेरे मन की अंदरूनी पीड़ा-वेदना मेरा हरी मेरा प्रभू ही जानता है। 1। रहाउ।
ਮੇਰੇ ਹਰਿ ਪ੍ਰੀਤਮ ਕੀ ਕੋਈ ਬਾਤ ਸੁਨਾਵੈ ਸੋ ਭਾਈ ਸੋ ਮੇਰਾ ਬੀਰ ॥੨॥
हे सहेलिए ! अब अगर कोई व्यक्ति मुझे मेरे प्रीतम प्रभू की कोई बात सुनाए (तो मुझे ऐसा लगता है कि) वह मनुष्य मेरा भाई है मेरा वीर है। 2।