Sri Guru Granth Sahib Ji — Ang 809 (hindi)
ਪਾਵਉ ਧੂਰਿ ਤੇਰੇ ਦਾਸ ਕੀ ਨਾਨਕ ਕੁਰਬਾਣੀ ॥੪॥੩॥੩੩॥
हे नानक ! (कह- हे प्रभू ! मेहर कर) मैं तेरे सेवक के पैरों की खाक़ हासिल कर सकूँ। मैं तेरे सेवक पर से सदके जाऊँ। 4। 3। 33।
ਬਿਲਾਵਲੁ ਮਹਲਾ ੫ ॥
बिलावलु महला ५ ॥
ਰਾਖਹੁ ਅਪਨੀ ਸਰਣਿ ਪ੍ਰਭ ਮੋਹਿ ਕਿਰਪਾ ਧਾਰੇ ॥
हे प्रभू ! मेहर करके तू मुझे अपनी ही शरण में रख।
ਸੇਵਾ ਕਛੂ ਨ ਜਾਨਊ ਨੀਚੁ ਮੂਰਖਾਰੇ ॥੧॥
मैं नीच जीवन वाला हूँ। मैं मूर्ख हूँ। मुझ में तेरी सेवा-भक्ति करने की समझ-अक्ल नहीं है। 1।
ਮਾਨੁ ਕਰਉ ਤੁਧੁ ਊਪਰੇ ਮੇਰੇ ਪ੍ਰੀਤਮ ਪਿਆਰੇ ॥
हे मेरे प्रीतम ! हे मेरे प्यारे ! हम जीव सदा अपराध करते रहते हैं। भूलें करते रहते हैं।
ਹਮ ਅਪਰਾਧੀ ਸਦ ਭੂਲਤੇ ਤੁਮੑ ਬਖਸਨਹਾਰੇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
तू हमेशा हमें क्षमा करने वाला है (इसलिए) मैं तेरे पर ही (तेरी बख्शिश पर ही) भरोसा रखता हूँ। 1। रहाउ।
ਹਮ ਅਵਗਨ ਕਰਹ ਅਸੰਖ ਨੀਤਿ ਤੁਮੑ ਨਿਰਗੁਨ ਦਾਤਾਰੇ ॥
हे प्रभू ! हम हमेशा ही अनगिनत अवगुण करते रहते हैं। तू (फिर भी) हम गुण-हीनों को अनेकों दातें देने वाला है।
ਦਾਸੀ ਸੰਗਤਿ ਪ੍ਰਭੂ ਤਿਆਗਿ ਏ ਕਰਮ ਹਮਾਰੇ ॥੨॥
हे प्रभू ! हमारे नित्य के कर्म तो ये हैं कि हम तुझे भुला के तेरी सेविका (माया) की संगति में टिके रहते हैं। 2।
ਤੁਮੑ ਦੇਵਹੁ ਸਭੁ ਕਿਛੁ ਦਇਆ ਧਾਰਿ ਹਮ ਅਕਿਰਤਘਨਾਰੇ ॥
हे प्रभू ! हम (जीव) अकृतघ्न हैं (एहसान फरामोश हैं)। तू (फर भी) मेहर करके हमें हरेक चीज़ देता है।
ਲਾਗਿ ਪਰੇ ਤੇਰੇ ਦਾਨ ਸਿਉ ਨਹ ਚਿਤਿ ਖਸਮਾਰੇ ॥੩॥
हे पति-प्रभू ! हम तुझे अपने चिक्त में नहीं बसाते। सदा तेरी दी हुई दातों को ही चिपके रहते हैं। 3।
ਤੁਝ ਤੇ ਬਾਹਰਿ ਕਿਛੁ ਨਹੀ ਭਵ ਕਾਟਨਹਾਰੇ ॥
हे (जीवों के) जन्मों के चक्र काटने वाले ! (जगत में) कोई भी चीज तुझसे आकी नहीं हो सकती (हमें भी सही जीवन-राह पर डाले रख)।
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਸਰਣਿ ਦਇਆਲ ਗੁਰ ਲੇਹੁ ਮੁਗਧ ਉਧਾਰੇ ॥੪॥੪॥੩੪॥
हे नानक ! कह- हे दया के श्रोत गुरू ! हम तेरी शरण आए हैं। हम मूर्खों को (अवगुणों व भूलों से) बचाए रख। 4। 4। 34।
ਬਿਲਾਵਲੁ ਮਹਲਾ ੫ ॥
बिलावलु महला ५ ॥
ਦੋਸੁ ਨ ਕਾਹੂ ਦੀਜੀਐ ਪ੍ਰਭੁ ਅਪਨਾ ਧਿਆਈਐ ॥
हे मेरे मन ! (अपनी की हुई भूलों के कारण मिल रहे दुखों के बारे) किसी और को दोष नहीं देना चाहिए (इन दुखों से बचने के लिए) अपने परमात्मा को (ही) याद करना चाहिए
ਜਿਤੁ ਸੇਵਿਐ ਸੁਖੁ ਹੋਇ ਘਨਾ ਮਨ ਸੋਈ ਗਾਈਐ ॥੧॥
क्योंकि उस परमात्मा की सेवा-भक्ति करने से बहुत सुख मिलता है। उसकी ही सिफत-सालाह के गीत गाने चाहिए। 1।
ਕਹੀਐ ਕਾਇ ਪਿਆਰੇ ਤੁਝੁ ਬਿਨਾ ॥
हे प्यारे प्रभू ! तेरे बिना और किस के पास विनती की जाए
ਤੁਮੑ ਦਇਆਲ ਸੁਆਮੀ ਸਭ ਅਵਗਨ ਹਮਾ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
हे (मेरे) मालिक प्रभू ! तू तो सदा दया का घर है। सारे अवगुण हम जीवों के ही हैं (जिनके कारण हमें दुख-कलेश होते हैं)।। 1। रहाउ।
ਜਿਉ ਤੁਮੑ ਰਾਖਹੁ ਤਿਉ ਰਹਾ ਅਵਰੁ ਨਹੀ ਚਾਰਾ ॥
हे प्रभू ! तू जैसे मुझे रखता है। मैं उसी तरह रह सकता हूँ। (तेरी रजा के उलट) मेरा कोई जोर नहीं चल सकता।
ਨੀਧਰਿਆ ਧਰ ਤੇਰੀਆ ਇਕ ਨਾਮ ਅਧਾਰਾ ॥੨॥
हे प्रभू ! तू ही निओटिओं की ओट है। मुझे तो सिर्फ तेरे नाम का ही आसरा है। 2।
ਜੋ ਤੁਮੑ ਕਰਹੁ ਸੋਈ ਭਲਾ ਮਨਿ ਲੇਤਾ ਮੁਕਤਾ ॥
हे प्रभू ! जो कुछ तू करता है उसको जो मनुष्य (अपने) भले के लिए (होता) मान लेता है। वह (दुखों कलेशों की मार से) बच जाता है।
ਸਗਲ ਸਮਗ੍ਰੀ ਤੇਰੀਆ ਸਭ ਤੇਰੀ ਜੁਗਤਾ ॥੩॥
हे प्रभू ! जगत के सारे पदार्थ तेरे बनाए हुए हैं। सारी ही सामग्री तेरी ही मर्यादा में चल रही है। 3।
ਚਰਨ ਪਖਾਰਉ ਕਰਿ ਸੇਵਾ ਜੇ ਠਾਕੁਰ ਭਾਵੈ ॥
हे प्रभू ! हे मालिक ! अगर तुझे अच्छा लगे। तो मैं तेरी सेवा-भक्ति करके तेरे चरण धोता रहूँ (भाव। अहंकार को त्याग के तेरे दर पर गिरा रहूँ)।
ਹੋਹੁ ਕ੍ਰਿਪਾਲ ਦਇਆਲ ਪ੍ਰਭ ਨਾਨਕੁ ਗੁਣ ਗਾਵੈ ॥੪॥੫॥੩੫॥
हे प्रभू ! दयावान हो। कृपा कर (ताकि तेरी दया और कृपा के बल पर तेरा दास) नानक तेरे गुण गाता रहे। 4। 5। 35।
ਬਿਲਾਵਲੁ ਮਹਲਾ ੫ ॥
बिलावलु महला ५ ॥
ਮਿਰਤੁ ਹਸੈ ਸਿਰ ਊਪਰੇ ਪਸੂਆ ਨਹੀ ਬੂਝੈ ॥
हे भाई ! मौत (हरेक मनुष्य के) सिर पर (खड़ी) हस रही है (कि मूर्ख मनुष्य माया के मोह में फस के अपनी मौत को याद ही नहीं करता। पर) पशु (स्वभाव वाला मनुष्य ये बात) समझता ही नहीं।
ਬਾਦ ਸਾਦ ਅਹੰਕਾਰ ਮਹਿ ਮਰਣਾ ਨਹੀ ਸੂਝੈ ॥੧॥
झगड़ों में (पदार्थों के) स्वादों में। अहंकार में (फस के) मनुष्य को मौत सूझती ही नहीं। 1।
ਸਤਿਗੁਰੁ ਸੇਵਹੁ ਆਪਨਾ ਕਾਹੇ ਫਿਰਹੁ ਅਭਾਗੇ ॥
हे अभागे ! क्यों भटकता फिरता है। अपने गुरू की शरण पड़ा रह।
ਦੇਖਿ ਕਸੁੰਭਾ ਰੰਗੁਲਾ ਕਾਹੇ ਭੂਲਿ ਲਾਗੇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
सुंदर रंग वाला कुसंभी (मन-मोहनी माया) देख क्यों गलत रास्ते पड़ रहा है। 1। रहाउ।
ਕਰਿ ਕਰਿ ਪਾਪ ਦਰਬੁ ਕੀਆ ਵਰਤਣ ਕੈ ਤਾਈ ॥
हे भाई ! (सारी उम्र) पाप कर कर के ही मनुष्य अपने बरतने के लिए धन एकत्र करता रहा।
ਮਾਟੀ ਸਿਉ ਮਾਟੀ ਰਲੀ ਨਾਗਾ ਉਠਿ ਜਾਈ ॥੨॥
(पर मौत आने पर इसके शरीर की) मिट्टी धरती से मिल गई। और जीव खाली हाथ ही उठ के चल पड़ा। 2।
ਜਾ ਕੈ ਕੀਐ ਸ੍ਰਮੁ ਕਰੈ ਤੇ ਬੈਰ ਬਿਰੋਧੀ ॥
जिन संबंधियों की खातिर मनुष्य (धन एकत्र करने की) मेहनत करता है वह (आखिर तक इसका साथ नहीं निबाह सकते। इस वास्ते इसके साथ) वैर करने वाले विरोध करने वाले ही बनते हैं।
ਅੰਤ ਕਾਲਿ ਭਜਿ ਜਾਹਿਗੇ ਕਾਹੇ ਜਲਹੁ ਕਰੋਧੀ ॥੩॥
हे भाई ! तू (इनकी खातिर औरों से वैर सहेड़-सहेड़ के) क्यों क्रोध में जलता है। ये तो आखिरी वक्त पर तेरा साथ छोड़ जाएंगें3।
ਦਾਸ ਰੇਣੁ ਸੋਈ ਹੋਆ ਜਿਸੁ ਮਸਤਕਿ ਕਰਮਾ ॥
हे नानक ! कह- जिस मनुष्य के माथे पर भाग्य जागते हैं।
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਬੰਧਨ ਛੁਟੇ ਸਤਿਗੁਰ ਕੀ ਸਰਨਾ ॥੪॥੬॥੩੬॥
वही मनुष्य प्रभू के भगतों की चरण-धूड़ बनता है। गुरू की शरण पड़ने से (माया के मोह के) बंधन टूट जाते हैं। 4। 6। 36।
ਬਿਲਾਵਲੁ ਮਹਲਾ ੫ ॥
बिलावलु महला ५ ॥
ਪਿੰਗੁਲ ਪਰਬਤ ਪਾਰਿ ਪਰੇ ਖਲ ਚਤੁਰ ਬਕੀਤਾ ॥
(मानो) पिंगले मनुष्य पहाड़ों से पार लांघ जाते हैं। महा मूर्ख मनुष्य समझदार व्याख्यान-कर्ता बन जाते हैं।
ਅੰਧੁਲੇ ਤ੍ਰਿਭਵਣ ਸੂਝਿਆ ਗੁਰ ਭੇਟਿ ਪੁਨੀਤਾ ॥੧॥
अंधे को तीनों भवनों की समझ पड़ जाती है। हे मित्र ! गुरू को मिल के (मनुष्य) पवित्र जीवन वाले हो जाते हैं। 1।
ਮਹਿਮਾ ਸਾਧੂ ਸੰਗ ਕੀ ਸੁਨਹੁ ਮੇਰੇ ਮੀਤਾ ॥
हे मेरे मित्र ! गुरू की संगति की महिमा (ध्यान से) सुन।
ਮੈਲੁ ਖੋਈ ਕੋਟਿ ਅਘ ਹਰੇ ਨਿਰਮਲ ਭਏ ਚੀਤਾ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
(जो भी मनुष्य नित्य गुरू की संगति में बैठता है। उसका) मन पवित्र हो जाता है। (उसके अंदर से विकारों की) मैल दूर हो जाती है। उसके करोड़ों पाप नाश हो जाते हैं। 1। रहाउ।
ਐਸੀ ਭਗਤਿ ਗੋਵਿੰਦ ਕੀ ਕੀਟਿ ਹਸਤੀ ਜੀਤਾ ॥
(हे मित्र ! साध-संगति में आ के की हुई) परमात्मा की भक्ति आश्चर्यजनक (ताकत रखती है। इसकी बरकति से) कीड़ी (विनम्रता) ने हाथी (अहंकार) को जीत लिया है।
ਜੋ ਜੋ ਕੀਨੋ ਆਪਨੋ ਤਿਸੁ ਅਭੈ ਦਾਨੁ ਦੀਤਾ ॥੨॥
(भक्ति पर प्रसन्न हो के) जिस-जिस मनुष्य को (परमात्मा ने) अपना बना लिया। उसको परमात्मा ने निर्भयता की दाति दे दी। 2।
ਸਿੰਘੁ ਬਿਲਾਈ ਹੋਇ ਗਇਓ ਤ੍ਰਿਣੁ ਮੇਰੁ ਦਿਖੀਤਾ ॥
(हे मित्र ! गुरू की संगति की बरकति से) शेर (अहंकार) बिल्ली (निम्रता) बन जाता है। तीला (गरीबी स्वभाव) सुमेर पर्वत (जैसी बहुत बड़ी ताकत) दिखने लग जाता है।