Sri Guru Granth Sahib Ji — Ang 766 (hindi)
ਸਾਝ ਕਰੀਜੈ ਗੁਣਹ ਕੇਰੀ ਛੋਡਿ ਅਵਗਣ ਚਲੀਐ ॥
(गुरमुखों से) गुणों की सांझ करनी चाहिए।इस तरह (अंदर से) अवगुण त्याग के जीवन-यात्रा पर चला जा सकता है।
ਪਹਿਰੇ ਪਟੰਬਰ ਕਰਿ ਅਡੰਬਰ ਆਪਣਾ ਪਿੜੁ ਮਲੀਐ ॥
सबसे प्रेम भरा बर्ताव करके भलाई के सुंदर उद्यम करके विकारों से मुकाबला और जीवन-युद्ध को जीता जा सकता है।
ਜਿਥੈ ਜਾਇ ਬਹੀਐ ਭਲਾ ਕਹੀਐ ਝੋਲਿ ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਪੀਜੈ ॥
(गुरमुखों की संगति की बरकति से फिर) जहाँ भी जा के बैठें भलाई की बात ही की जा सकती है।और बुरी ओर से हट के आत्मिक जीवन देने वाला नाम-जल पीया जा सकता है।
ਗੁਣਾ ਕਾ ਹੋਵੈ ਵਾਸੁਲਾ ਕਢਿ ਵਾਸੁ ਲਈਜੈ ॥੩॥
(हे भाई !) अगर किसी को गुणों का डब्बा मिल जाए तो वह डब्बा खोल के (डब्बे की) सुगंधि लेनी चाहिए।
ਆਪਿ ਕਰੇ ਕਿਸੁ ਆਖੀਐ ਹੋਰੁ ਕਰੇ ਨ ਕੋਈ ॥
(जगत में अनेकों ही जीव गुण कमा रहे हैं।अनेकों ही अवगुण कमा रहे हैं।ये परमात्मा की अपनी ही रची हुई खेल है) परमात्मा स्वयं ही (ये सब कुछ) कर रहा है।उसके बिना और कोई नहीं कर सकता। (
ਆਖਣ ਤਾ ਕਉ ਜਾਈਐ ਜੇ ਭੂਲੜਾ ਹੋਈ ॥
तभी तो) किसी और के पास (इसके संबंध में) कोई गिला-शिकवा आदि नहीं किया जा सकता।(फिर जो कुछ वह प्रभू करता है ठीक करता है) वह टूटा हुआ नहीं हैं।इस वास्ते (किसी कमी के बारे में) उसे कुछ कहने की आवश्यक्ता ही नहीं पड़ती।
ਜੇ ਹੋਇ ਭੂਲਾ ਜਾਇ ਕਹੀਐ ਆਪਿ ਕਰਤਾ ਕਿਉ ਭੁਲੈ ॥
अगर वह टूटा हुआ (व भटका हुआ) हो तो जा के कुछ कहें भी।पर स्वयं करतार कोई भूल नहीं कर सकता।
ਸੁਣੇ ਦੇਖੇ ਬਾਝੁ ਕਹਿਐ ਦਾਨੁ ਅਣਮੰਗਿਆ ਦਿਵੈ ॥
वह सब जीवों की अरदासें सुनता है वह सब जीवों के किए कर्मों को देखता है।माँगे बिना ही सबको दान देता है।
ਦਾਨੁ ਦੇਇ ਦਾਤਾ ਜਗਿ ਬਿਧਾਤਾ ਨਾਨਕਾ ਸਚੁ ਸੋਈ ॥
हे नानक ! वह सृजनहार ही सदा-स्थिर रहने वाला है।
ਆਪਿ ਕਰੇ ਕਿਸੁ ਆਖੀਐ ਹੋਰੁ ਕਰੇ ਨ ਕੋਈ ॥੪॥੧॥੪॥
वह सब कुछ स्वयं ही करता है।कोई और (उससे आकी हो के) कुछ नहीं कर सकता।किसी और के पास जा के कोई गिला नहीं किया जा सकता। 4। 1। 4।
ਸੂਹੀ ਮਹਲਾ ੧ ॥
सूही महला १ ॥
ਮੇਰਾ ਮਨੁ ਰਾਤਾ ਗੁਣ ਰਵੈ ਮਨਿ ਭਾਵੈ ਸੋਈ ॥
(परमात्मा के प्यार में) रंगा हुआ मेरा मन (ज्यों-ज्यों परमात्मा के) गुण चेते करता है (त्यों-त्यों) मेरे मन में वह परमात्मा ही प्यारा लगता जाता है।
ਗੁਰ ਕੀ ਪਉੜੀ ਸਾਚ ਕੀ ਸਾਚਾ ਸੁਖੁ ਹੋਈ ॥
परमात्मा के गुण गाने।मानो।एक सीढ़ी है जो गुरू ने दी है और इस सीढ़ी के माध्यम से सदा-स्थिर रहने वाले परमात्मा तक पहुँचा जा सकता है।(इस सीढ़ी पर चढ़ने की बरकति से मेरे अंदर) सदा-स्थिर रहने वाला आनंद बन रहा है।
ਸੁਖਿ ਸਹਜਿ ਆਵੈ ਸਾਚ ਭਾਵੈ ਸਾਚ ਕੀ ਮਤਿ ਕਿਉ ਟਲੈ ॥
जो मनुष्य (इस सीढ़ी की बरकति से) आत्मिक आनंद में आत्मिक अडोलता में पहुँचता है वह सदा-स्थिर प्रभू को प्यारा लगता है।सदा-स्थिर प्रभू के गुण गाने वाली उसकी मति अटल हो जाती है।परमात्मा अटल है।
ਇਸਨਾਨੁ ਦਾਨੁ ਸੁਗਿਆਨੁ ਮਜਨੁ ਆਪਿ ਅਛਲਿਓ ਕਿਉ ਛਲੈ ॥
(अगर गुण गाने वाली मति नहीं बनी तो) कोई स्नान।कोई दान।कोई ज्ञान की चोंच-चर्चा।और कोई तीर्थ स्नान परमात्मा को खूश नहीं कर सकते।
ਪਰਪੰਚ ਮੋਹ ਬਿਕਾਰ ਥਾਕੇ ਕੂੜੁ ਕਪਟੁ ਨ ਦੋਈ ॥
(गुण गाने वाले मनुष्य के मन में से) धोखे-फरेब।मोह के चमत्कार।विकार आदि सब समाप्त हो जाते हैं।उसके अंदर ना झूठ रह जाता है।ना ठॅगी रहती है।ना ही मेर-तेर रहती है।
ਮੇਰਾ ਮਨੁ ਰਾਤਾ ਗੁਣ ਰਵੈ ਮਨਿ ਭਾਵੈ ਸੋਈ ॥੧॥
(प्रभू के प्यार में) रंगा हुआ मेरा मन (ज्यों-ज्यों प्रभू के) गुण गाता है (त्यों-त्यों) मेरे मन में वह प्रभू ही प्यारा लगता जा रहा है। 1।
ਸਾਹਿਬੁ ਸੋ ਸਾਲਾਹੀਐ ਜਿਨਿ ਕਾਰਣੁ ਕੀਆ ॥
उस मालिक प्रभू की सिफत-सालाह करनी चाहिए जिसने जगत पैदा किया है।
ਮੈਲੁ ਲਾਗੀ ਮਨਿ ਮੈਲਿਐ ਕਿਨੈ ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਪੀਆ ॥
(सिफत-सालाह किए बिना मनुष्य के मन में विकारों की) मैल लगी रहती है।और अगर मन (विकारों से) मैला टिका रहे तो कोई भी नाम-अमृत पी नहीं सकता।
ਮਥਿ ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਪੀਆ ਇਹੁ ਮਨੁ ਦੀਆ ਗੁਰ ਪਹਿ ਮੋਲੁ ਕਰਾਇਆ ॥
(पर इस नाम-अमृत की प्राप्ति के लिए भी मूल्य चुकाना पड़ता है) मैंने गुरू से मूल्य डलवाया (तो उसने बताया कि) जिसने अपना ये मन (गुरू के) हवाले किया उसने बार-बार सिमर के नाम-अमृत पी लिया।
ਆਪਨੜਾ ਪ੍ਰਭੁ ਸਹਜਿ ਪਛਾਤਾ ਜਾ ਮਨੁ ਸਾਚੈ ਲਾਇਆ ॥
(गुरू के बताए हुए राह पर चल कर) जब किसी मनुष्य ने अपना मन (मैल से हटा के) सदा-स्थिर प्रभू में जोड़ा तो उसने आत्मिक अडोलता में टिक के अपने प्रीतम प्रभू से गहरी सांझ डाल ली।
ਤਿਸੁ ਨਾਲਿ ਗੁਣ ਗਾਵਾ ਜੇ ਤਿਸੁ ਭਾਵਾ ਕਿਉ ਮਿਲੈ ਹੋਇ ਪਰਾਇਆ ॥
(पर) मैं तब ही प्रभू-चरणों से जुड़ के प्रभू के गुण गा सकता हूँ अगर प्रभू की रजा ही हो (यदि मैं उसे अच्छा लगने लगूँ)।
ਸਾਹਿਬੁ ਸੋ ਸਾਲਾਹੀਐ ਜਿਨਿ ਜਗਤੁ ਉਪਾਇਆ ॥੨॥
प्रभू के साथ ऊपर-ऊपर रहने पर प्रभू के साथ मिलाप नहीं हो सकता।(सो।हे भाई !) उस मालिक प्रभू की (सदा) सिफत सालाह करनी चाहिए जिसने (ये) जगत पैदा किया है। 2।
ਆਇ ਗਇਆ ਕੀ ਨ ਆਇਓ ਕਿਉ ਆਵੈ ਜਾਤਾ ॥
जिस मनुष्य के हृदय में परमात्मा आ बसे।उसे किसी और पदार्थ की लालसा नहीं रह जाती।उसका जनम-मरण समाप्त हो जाता है।
ਪ੍ਰੀਤਮ ਸਿਉ ਮਨੁ ਮਾਨਿਆ ਹਰਿ ਸੇਤੀ ਰਾਤਾ ॥
उसका मन प्रीतम-प्रभू में रीझ जाता है।प्रभू के प्रेम से रंगा जाता है।उसका मन उस मालिक के रंग में रंगा जाता है।
ਸਾਹਿਬ ਰੰਗਿ ਰਾਤਾ ਸਚ ਕੀ ਬਾਤਾ ਜਿਨਿ ਬਿੰਬ ਕਾ ਕੋਟੁ ਉਸਾਰਿਆ ॥
वह उस सदा-स्थिर मालिक की सिफत सालाह की बातें करता रहता है जिसने पानी की बूँद से शरीर किले का निर्माण किया है।
ਪੰਚ ਭੂ ਨਾਇਕੋ ਆਪਿ ਸਿਰੰਦਾ ਜਿਨਿ ਸਚ ਕਾ ਪਿੰਡੁ ਸਵਾਰਿਆ ॥
जो पाँच तत्वों का मालिक है।जो स्वयं ही (शरीर जगत को) पैदा करने वाला है।जिसने अपने रहने के लिए मनुष्य का शरीर सजाया है।
ਹਮ ਅਵਗਣਿਆਰੇ ਤੂ ਸੁਣਿ ਪਿਆਰੇ ਤੁਧੁ ਭਾਵੈ ਸਚੁ ਸੋਈ ॥
हे प्यारे प्रभू ! तू (मेरी विनती) सुन।हम जीव अवगुणों से भरे हुए हैं (तू स्वयं ही अपनी सिफत सालाह की दाति दे के हमें पवित्र करने वाला है) जो जीव (तेरी मेहर से) तुझे पसेंद आ जाता है वह तेरा ही रूप हो जाता है।
ਆਵਣ ਜਾਣਾ ਨਾ ਥੀਐ ਸਾਚੀ ਮਤਿ ਹੋਈ ॥੩॥
उसके जनम-मरन के चक्कर समाप्त हो जाते हैं।उसकी बुद्धि अभुल हो जाती है (वह सद्बुद्धि वाला हो जाता है)। 3।
ਅੰਜਨੁ ਤੈਸਾ ਅੰਜੀਐ ਜੈਸਾ ਪਿਰ ਭਾਵੈ ॥
स्त्री को ऐसा सुर्मा पहनना चाहिए जैसा उसके पति को अच्छा लगे (जीव-स्त्री को प्रभू-पति के मिलाप के लिए ऐसे उद्यम करने चाहिए जो प्रभू-पति को पसंद आए)।
ਸਮਝੈ ਸੂਝੈ ਜਾਣੀਐ ਜੇ ਆਪਿ ਜਾਣਾਵੈ ॥
(पर जीव के भी वश में क्या है। ) जब परमात्मा खुद समझ बख्शे।तब ही जीव (सही रास्ता) समझ सकता है।तब ही जीव को सूझ आ सकती है।तब ही कुछ जाना जा सकता है।
ਆਪਿ ਜਾਣਾਵੈ ਮਾਰਗਿ ਪਾਵੈ ਆਪੇ ਮਨੂਆ ਲੇਵਏ ॥
परमात्मा खुद ही समझ देता है।खुद ही सही रास्ते पर डालता है खुद ही जीव के मन को अपनी ओर प्रेरित करता है।
ਕਰਮ ਸੁਕਰਮ ਕਰਾਏ ਆਪੇ ਕੀਮਤਿ ਕਉਣ ਅਭੇਵਏ ॥
साधारण काम और अच्छे काम परमात्मा खुद ही जीव से करवाता है।पर उस प्रभू का भेद नहीं पाया जा सकता।कोई उसकी कीमत नहीं जान सकता।
ਤੰਤੁ ਮੰਤੁ ਪਾਖੰਡੁ ਨ ਜਾਣਾ ਰਾਮੁ ਰਿਦੈ ਮਨੁ ਮਾਨਿਆ ॥
(परमात्मा का प्यार प्राप्त करने के लिए) मैं कोई जादू-टोना कोई मंत्र आदि पाखण्ड करना नहीं जानती।मैंने तो केवल उस प्रभू को अपने हृदय में बसाया है।मेरा मन उसकी याद में भीग गया है।
ਅੰਜਨੁ ਨਾਮੁ ਤਿਸੈ ਤੇ ਸੂਝੈ ਗੁਰ ਸਬਦੀ ਸਚੁ ਜਾਨਿਆ ॥੪॥
प्रभू-पति को प्रसन्न करने के लिए उसका नाम ही सुर्मा है।इस सुर्मे की सूझ भी उसके पास से ही मिलती है।(जिस जीव को ये सूझ पड़ जाती है वह) गुरू के शबद में जुड़ के उस सदा-स्थिर प्रभू के साथ गहरी सांझ डाल लेता है। 4।
ਸਾਜਨ ਹੋਵਨਿ ਆਪਣੇ ਕਿਉ ਪਰ ਘਰ ਜਾਹੀ ॥
सज्जन प्रभू जी (जिन सौभाग्यशाली बँदों के) अपने बन जाते हैं।वह लोग फिर पराए घरों में नहीं जाते (भाव।प्रभू का सिमरन छोड़ के और तथाकथित धर्म-कर्म नहीं करते फिरते)।
ਸਾਜਨ ਰਾਤੇ ਸਚ ਕੇ ਸੰਗੇ ਮਨ ਮਾਹੀ ॥
वे आदमी अंतरात्मे सदा-स्थिर सज्जन-प्रभू के साथ रंगे रहते हैं।वे अपने मन में सज्जन-प्रभू जी के मिलाप का आनंद ही लेते हैं।
ਮਨ ਮਾਹਿ ਸਾਜਨ ਕਰਹਿ ਰਲੀਆ ਕਰਮ ਧਰਮ ਸਬਾਇਆ ॥ ਅਠਸਠਿ ਤੀਰਥ ਪੁੰਨ ਪੂਜਾ ਨਾਮੁ ਸਾਚਾ ਭਾਇਆ ॥
यही उनके वास्ते सारे धार्मिक कर्म हैं। उनको सदा-स्थिर प्रभू का नाम प्यारा लगता है– यही उनके वास्ते अढ़सठ तीर्थों का स्नान है।यही उनके वास्ते पुंन-दान है और यही उनकी देव-पूजा है।