Sri Guru Granth Sahib Ji — Ang 732 (hindi)
ਮੇਰੇ ਮਨ ਹਰਿ ਰਾਮ ਨਾਮਿ ਕਰਿ ਰੰਙੁ ॥
हे मेरे मन ! परमात्मा के नाम में प्यार जोड़।
ਗੁਰਿ ਤੁਠੈ ਹਰਿ ਉਪਦੇਸਿਆ ਹਰਿ ਭੇਟਿਆ ਰਾਉ ਨਿਸੰਙੁ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
अगर (किसी मनुष्य पर) गुरू मेहरवान हो के उसको हरी-नाम का उपदेश दे।तो उस मनुष्य को प्रभू-पातशाह जरूर मिल जाता है। 1।रहाउ।
ਮੁੰਧ ਇਆਣੀ ਮਨਮੁਖੀ ਫਿਰਿ ਆਵਣ ਜਾਣਾ ਅੰਙੁ ॥
हे भाई ! जो अंजान जीव-स्त्री (गुरू का आसरा छोड़ के) अपने ही मन के पीछे चलती है।उसके जनम-मरण के चक्करों का आसरा बना रहता है।
ਹਰਿ ਪ੍ਰਭੁ ਚਿਤਿ ਨ ਆਇਓ ਮਨਿ ਦੂਜਾ ਭਾਉ ਸਹਲੰਙੁ ॥੨॥
उस (जीव-स्त्री) के स्मर्ण में हरी प्रभू नहीं बसता।उसके मन में माया का मोह ही साथी रहता है। 2।
ਹਮ ਮੈਲੁ ਭਰੇ ਦੁਹਚਾਰੀਆ ਹਰਿ ਰਾਖਹੁ ਅੰਗੀ ਅੰਙੁ ॥
हे हरी ! हम जीव ! (विकारों की) मैल से भरे रहते हैं।हम दुराचारी हैं।हे अंग पालने वाले प्रभू ! हमारी रक्षा कर।हमारी सहायता कर।
ਗੁਰਿ ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਸਰਿ ਨਵਲਾਇਆ ਸਭਿ ਲਾਥੇ ਕਿਲਵਿਖ ਪੰਙੁ ॥੩॥
हे भाई ! गुरू ने (जिस मनुष्य को) आत्मिक जीवन देने वाले नाम-जल सरोवर में स्नान करा दिया।(उसके अंदर से) सारे पाप उतर जाते है।पापों के कीचड़ धुल जाता है। 3।
ਹਰਿ ਦੀਨਾ ਦੀਨ ਦਇਆਲ ਪ੍ਰਭੁ ਸਤਸੰਗਤਿ ਮੇਲਹੁ ਸੰਙੁ ॥
हे अति कंगालों पर दया करने वाले हरी-प्रभू ! मुझे साध-संगति के साथ मिला।
ਮਿਲਿ ਸੰਗਤਿ ਹਰਿ ਰੰਗੁ ਪਾਇਆ ਜਨ ਨਾਨਕ ਮਨਿ ਤਨਿ ਰੰਙੁ ॥੪॥੩॥
हे दास नानक ! (कह–) जिस मनुष्य ने साध-संगति में मिल के परमात्मा के नाम का प्रेम प्राप्त कर लिया।उसके मन में उसके हृदय में वह प्रेम (सदा टिका रहता है)। 4। 3।
ਸੂਹੀ ਮਹਲਾ ੪ ॥
सूही महला ४ ॥
ਹਰਿ ਹਰਿ ਕਰਹਿ ਨਿਤ ਕਪਟੁ ਕਮਾਵਹਿ ਹਿਰਦਾ ਸੁਧੁ ਨ ਹੋਈ ॥
हे भाई ! (जो मनुष्य गुरू की शरण में नहीं आते वैसे) ज़ुबानी-ज़ुबानी राम-राम उचारते रहते हैं।सदा धोखा-फरेब (भी) करते रहते हैं।उनका दिल पवित्र नहीं हो सकता।
ਅਨਦਿਨੁ ਕਰਮ ਕਰਹਿ ਬਹੁਤੇਰੇ ਸੁਪਨੈ ਸੁਖੁ ਨ ਹੋਈ ॥੧॥
वह मनुष्य (तीर्थ स्नान आदि निहित) अनेकों धार्मिक कर्म हर वक्त करते रहते हैं।पर उन्हें कभी सपने में भी आत्मिक आनंद नहीं मिलता। 1।
ਗਿਆਨੀ ਗੁਰ ਬਿਨੁ ਭਗਤਿ ਨ ਹੋਈ ॥
हे ज्ञानवान ! गुरू की शरण पड़े बिना भगती नहीं हो सकती (मन पर प्रभू की भगती का रंग नहीं चढ़ सकता।
ਕੋਰੈ ਰੰਗੁ ਕਦੇ ਨ ਚੜੈ ਜੇ ਲੋਚੈ ਸਭੁ ਕੋਈ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
जैसे) चाहे हरेक मनुष्य तरले करता फिरे।कभी कोरे कपड़े पर रंग नहीं चढ़ता। 1।रहाउ।
ਜਪੁ ਤਪ ਸੰਜਮ ਵਰਤ ਕਰੇ ਪੂਜਾ ਮਨਮੁਖ ਰੋਗੁ ਨ ਜਾਈ ॥
हे भाई ! अपने मन के पीछे चलने वाला मनुष्य (मंत्रों का) जाप (धूनियों का) तपाना (आदिक) कष्ट देने वाले साधन करता है।ब्रत रखता है।पर अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्य का (आत्मिक) रोग दूर नहीं होता।
ਅੰਤਰਿ ਰੋਗੁ ਮਹਾ ਅਭਿਮਾਨਾ ਦੂਜੈ ਭਾਇ ਖੁਆਈ ॥੨॥
उसके मन में अहंकार का बड़ा रोग टिका रहता है।वह माया के मोह में फंस के गलत राह पर पड़ा रहता है। 2।
ਬਾਹਰਿ ਭੇਖ ਬਹੁਤੁ ਚਤੁਰਾਈ ਮਨੂਆ ਦਹ ਦਿਸਿ ਧਾਵੈ ॥
हे भाई ! (गुरू से टूटा हुआ मनुष्य) लोगों को दिखाने के लिए धार्मिक भेस बनाता है।बहुत सारी चुस्ती-चालाकी दिखाता है।पर उसका कोझा मन दसों दिशाओं में दौड़ता फिरता है।
ਹਉਮੈ ਬਿਆਪਿਆ ਸਬਦੁ ਨ ਚੀਨੑੈ ਫਿਰਿ ਫਿਰਿ ਜੂਨੀ ਆਵੈ ॥੩॥
अहंकार-घमंड में फसा हुआ वह मनुष्य गुरू के शबद से सांझ नहीं डालता।वह बार-बार जूनियों के चक्कर में पड़ा रहता है। 3।
ਨਾਨਕ ਨਦਰਿ ਕਰੇ ਸੋ ਬੂਝੈ ਸੋ ਜਨੁ ਨਾਮੁ ਧਿਆਏ ॥
हे नानक ! (कह–हे भाई !) जिस मनुष्य पर परमात्मा मेहर की निगाह करता है।वह (आत्मिक जीवन के रास्ते को) समझ लेता है।वह मनुष्य (सदा) परमात्मा का नाम सिमरता है।
ਗੁਰ ਪਰਸਾਦੀ ਏਕੋ ਬੂਝੈ ਏਕਸੁ ਮਾਹਿ ਸਮਾਏ ॥੪॥੪॥
गुरू की कृपा से वह एक परमात्मा के साथ ही सांझ बनाए रखता है।वह एक परमात्मा में ही लीन रहता है। 4। 4।
ਸੂਹੀ ਮਹਲਾ ੪ ਘਰੁ ੨
सूही महला ४ घरु २
ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
ਗੁਰਮਤਿ ਨਗਰੀ ਖੋਜਿ ਖੋਜਾਈ ॥
हे भाई ! गुरू की मति ले के मैंने अपने शरीर-नगर की अच्छी तरह खोज की है।
ਹਰਿ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਪਦਾਰਥੁ ਪਾਈ ॥੧॥
और (शरीर में से ही) परमात्मा का कीमती नाम मैंने पा लिया है। 1।
ਮੇਰੈ ਮਨਿ ਹਰਿ ਹਰਿ ਸਾਂਤਿ ਵਸਾਈ ॥
हे भाई ! (गुरू ने मुझे हरी-नाम की दाति दे के) मेरे मन में ठंड डाल दी है।
ਤਿਸਨਾ ਅਗਨਿ ਬੁਝੀ ਖਿਨ ਅੰਤਰਿ ਗੁਰਿ ਮਿਲਿਐ ਸਭ ਭੁਖ ਗਵਾਈ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
(मेरे अंदर से) एक छिन में (माया की) तृष्णा की आग बुझ गई है।गुरू के मिलने से मेरी सारी (माया की) भूख दूर हो गई है। 1।रहाउ।
ਹਰਿ ਗੁਣ ਗਾਵਾ ਜੀਵਾ ਮੇਰੀ ਮਾਈ ॥
हे मेरी माँ ! (अब ज्यों-ज्यों) मैं परमात्मा के गुण गाता हूँ।मुझे आत्मिक जीवन मिल रहा है।
ਸਤਿਗੁਰਿ ਦਇਆਲਿ ਗੁਣ ਨਾਮੁ ਦ੍ਰਿੜਾਈ ॥੨॥
दया के घर सतिगुरू ने मेरे हृदय में प्रभू के गुण पक्के कर दिए हैं।परमात्मा का नाम पक्का कर दिया है। 2।
ਹਉ ਹਰਿ ਪ੍ਰਭੁ ਪਿਆਰਾ ਢੂਢਿ ਢੂਢਾਈ ॥
हे भाई ! अब मैं प्यारे हरी-प्रभू की तलाश करता हूँ।(सत्संगियों से) तलाश करवाता हूँ।
ਸਤਸੰਗਤਿ ਮਿਲਿ ਹਰਿ ਰਸੁ ਪਾਈ ॥੩॥
साध-संगति में मिल के मैं परमात्मा के नाम का स्वाद लेता हूँ। 3।
ਧੁਰਿ ਮਸਤਕਿ ਲੇਖ ਲਿਖੇ ਹਰਿ ਪਾਈ ॥
हे भाई ! धुर दरगाह से (जिस मनुष्य के) माथे पर प्रभू-मिलाप का लिखा लेख उघड़ता है।
ਗੁਰੁ ਨਾਨਕੁ ਤੁਠਾ ਮੇਲੈ ਹਰਿ ਭਾਈ ॥੪॥੧॥੫॥
उस पर गुरू नानक प्रसन्न होता है और।उसको परमात्मा मिला देता है। 4। 1। 5।
ਸੂਹੀ ਮਹਲਾ ੪ ॥
सूही महला ४ ॥
ਹਰਿ ਕ੍ਰਿਪਾ ਕਰੇ ਮਨਿ ਹਰਿ ਰੰਗੁ ਲਾਏ ॥
हे भाई ! परमात्मा जिस मनुष्य पर मेहर करता है।उसके मन में (अपने चरणों का) प्यार पैदा करता है।
ਗੁਰਮੁਖਿ ਹਰਿ ਹਰਿ ਨਾਮਿ ਸਮਾਏ ॥੧॥
वह मनुष्य गुरू की शरण पड़ कर परमात्मा के नाम में सदा लीन रहता है। 1।
ਹਰਿ ਰੰਗਿ ਰਾਤਾ ਮਨੁ ਰੰਗ ਮਾਣੇ ॥
हे भाई ! जो मनुष्य परमात्मा के प्रेम-रंग में रंगा रहता है।उसका मन आनंद लेता रहता है।
ਸਦਾ ਅਨੰਦਿ ਰਹੈ ਦਿਨ ਰਾਤੀ ਪੂਰੇ ਗੁਰ ਕੈ ਸਬਦਿ ਸਮਾਣੇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
वह मनुष्य दिन-रात हर वक्त आनंद में मगन रहता है।वह पूरे गुरू की बाणी में लीन रहता है। 1।रहाउ।
ਹਰਿ ਰੰਗ ਕਉ ਲੋਚੈ ਸਭੁ ਕੋਈ ॥
हे भाई ! (वैसे तो) हरेक मनुष्य प्रभू (चरणों) के प्यार की खातिर तरले लेता है।
ਗੁਰਮੁਖਿ ਰੰਗੁ ਚਲੂਲਾ ਹੋਈ ॥੨॥
पर गुरू की शरण पड़ के ही (मन पर प्रेम का) गाढ़ा रंग चढ़ता है। 2।
ਮਨਮੁਖਿ ਮੁਗਧੁ ਨਰੁ ਕੋਰਾ ਹੋਇ ॥
हे भाई ! अपने मन के पीछे चलने वाला मूर्ख मनुष्य प्यार से वंचित हृदय वाला ही रहता है।