Sri Guru Granth Sahib Ji — Ang 731 (hindi)
ਮੇਰੇ ਲਾਲ ਜੀਉ ਤੇਰਾ ਅੰਤੁ ਨ ਜਾਣਾ ॥
हे मेरे सुंदर प्रभू जी ! मैं तेरे गुणों का अंत नहीं जान सकता (मुझे ये समझ नहीं आ सकती कि तेरे में कितनी सिफतें हैं)।
ਤੂੰ ਜਲਿ ਥਲਿ ਮਹੀਅਲਿ ਭਰਿਪੁਰਿ ਲੀਣਾ ਤੂੰ ਆਪੇ ਸਰਬ ਸਮਾਣਾ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
तू पानी में भरपूर है।तू धरती के अंदर व्यापक है।तू आकाश में हर जगह मौजूद है।तू खुद ही सब जीवों में सब जगहों में समाया हुआ है। 1।रहाउ।
ਮਨੁ ਤਾਰਾਜੀ ਚਿਤੁ ਤੁਲਾ ਤੇਰੀ ਸੇਵ ਸਰਾਫੁ ਕਮਾਵਾ ॥
हे प्रभू ! अगर मेरा मन तराजू बन जाए।यदि मेरा चिक्त तोलने वाला बाँट बन जाए।अगर मैं तेरी सेवा कर सकूँ।तेरा सिमरन कर सकूँ (अगर ये सेवा-सिमरन मेरे वास्ते) सर्राफ़ बन जाए (तो भी।तेरे गुणों का मैं अंत नहीं पा सकूँगा।
ਘਟ ਹੀ ਭੀਤਰਿ ਸੋ ਸਹੁ ਤੋਲੀ ਇਨ ਬਿਧਿ ਚਿਤੁ ਰਹਾਵਾ ॥੨॥
पर हाँ) इन तरीकों से मैं अपने चिक्त को तेरे चरणों में टिका के रख सकूँगा।(हे भाई !) मैं अपने हृदय में ही उस पति-प्रभू को बैठा जाच सकूँगा। 2।
ਆਪੇ ਕੰਡਾ ਤੋਲੁ ਤਰਾਜੀ ਆਪੇ ਤੋਲਣਹਾਰਾ ॥
(हे भाई ! प्रभू हरेक जगह व्यापक है।अपनी उपमा भी वह स्वयं ही जानता है और उस महानता की पैमायश कर सकता है।वह) खुद ही तराजू है।खुद ही तराजू का बाँट है।खुद ही तराजू की सूई है।और खुद ही (अपने गुणों को) तोलने वाला है।
ਆਪੇ ਦੇਖੈ ਆਪੇ ਬੂਝੈ ਆਪੇ ਹੈ ਵਣਜਾਰਾ ॥੩॥
वह खुद ही सब जीवों की संभाल करता है।खुद ही सबके दिलों की समझता है।खुद ही जीव-रूप हो के जगत में (नाम) का व्यापार कर रहा है। 3।
ਅੰਧੁਲਾ ਨੀਚ ਜਾਤਿ ਪਰਦੇਸੀ ਖਿਨੁ ਆਵੈ ਤਿਲੁ ਜਾਵੈ ॥
जो (मन माया के मोह में) अंधा हुआ पड़ा है जो (जन्मों-जन्मांतरों के विकारों की मैल से) नीच जाति का बना हुआ है।जो सदा भटकता रहता है। थोड़ा सा भी कहीं एक जगह पर टिक नहीं सकता
ਤਾ ਕੀ ਸੰਗਤਿ ਨਾਨਕੁ ਰਹਦਾ ਕਿਉ ਕਰਿ ਮੂੜਾ ਪਾਵੈ ॥੪॥੨॥੯॥
(हे नानक तेरी ) संगति सदा उस मन से है(तू) परमात्मा के गुणों की कद्र नहीं पा सकता।। 4। 2। 9।
ਰਾਗੁ ਸੂਹੀ ਮਹਲਾ ੪ ਘਰੁ ੧
रागु सूही महला ४ घरु १
ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
ਮਨਿ ਰਾਮ ਨਾਮੁ ਆਰਾਧਿਆ ਗੁਰ ਸਬਦਿ ਗੁਰੂ ਗੁਰ ਕੇ ॥
जिस मनुष्य ने गुरू के शबद में जुड़ के परमात्मा का नाम सिमरा है।
ਸਭਿ ਇਛਾ ਮਨਿ ਤਨਿ ਪੂਰੀਆ ਸਭੁ ਚੂਕਾ ਡਰੁ ਜਮ ਕੇ ॥੧॥
उसके मन में तन में (उपजी) सारी इच्छाएं पूरी हो जाती हैं (उसके दिल में से) जम का सारा डर उतर जाता है। 1।
ਮੇਰੇ ਮਨ ਗੁਣ ਗਾਵਹੁ ਰਾਮ ਨਾਮ ਹਰਿ ਕੇ ॥
हे मेरे मन ! परमात्मा के नाम के गुण गाया कर।
ਗੁਰਿ ਤੁਠੈ ਮਨੁ ਪਰਬੋਧਿਆ ਹਰਿ ਪੀਆ ਰਸੁ ਗਟਕੇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
अगर (किसी मनुष्य पर) गुरू दयावान हो जाए।तो (उसका) मन (माया के मोह की नींद में से) जाग पड़ता है।वह मनुष्य परमात्मा के नाम का रस स्वाद से पीता है। 1।रहाउ।
ਸਤਸੰਗਤਿ ਊਤਮ ਸਤਿਗੁਰ ਕੇਰੀ ਗੁਨ ਗਾਵੈ ਹਰਿ ਪ੍ਰਭ ਕੇ ॥
हे भाई ! गुरू की साध-संगति बड़ी श्रेष्ठ जगह है (साध-संगति में मनुष्य) हरी-प्रभू के गुण गाता है।
ਹਰਿ ਕਿਰਪਾ ਧਾਰਿ ਮੇਲਹੁ ਸਤਸੰਗਤਿ ਹਮ ਧੋਵਹ ਪਗ ਜਨ ਕੇ ॥੨॥
हे हरी ! मेहर कर।मुझे साधसंगति मिला (वहाँ) मैं तेरे संतजनों के पैर धोऊँगा। 2।
ਰਾਮ ਨਾਮੁ ਸਭੁ ਹੈ ਰਾਮ ਨਾਮਾ ਰਸੁ ਗੁਰਮਤਿ ਰਸੁ ਰਸਕੇ ॥
हे भाई ! परमात्मा का नाम हरेक को सुख देने वाला है।(पर) गुरू की मति पर चल कर ही हरी-नाम के रस का स्वाद लिया जा सकता है।
ਹਰਿ ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਹਰਿ ਜਲੁ ਪਾਇਆ ਸਭ ਲਾਥੀ ਤਿਸ ਤਿਸ ਕੇ ॥੩॥
जिस मनुष्य ने आत्मिक जीवन देने वाला नाम-जल प्राप्त कर लिया।उसकी (माया की) सारी प्यास बुझ गई। 3।
ਹਮਰੀ ਜਾਤਿ ਪਾਤਿ ਗੁਰੁ ਸਤਿਗੁਰੁ ਹਮ ਵੇਚਿਓ ਸਿਰੁ ਗੁਰ ਕੇ ॥
हे भाई ! गुरू ही मेरी जाति है।गुरू ही मेरी इज्जत है।मैंने अपना सिर गुरू के पास बेच दिया है।
ਜਨ ਨਾਨਕ ਨਾਮੁ ਪਰਿਓ ਗੁਰ ਚੇਲਾ ਗੁਰ ਰਾਖਹੁ ਲਾਜ ਜਨ ਕੇ ॥੪॥੧॥
हे दास नानक ! (कह–) हे गुरू ! मेरा नाम ‘गुरू का सिख’ पड़ गया है।अब तू अपने इस सेवक की इज्जत रख ले।(और।हरी-नाम की दाति बख्शे रख)। 4। 1।
ਸੂਹੀ ਮਹਲਾ ੪ ॥
सूही महला ४ ॥
ਹਰਿ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਭਜਿਓ ਪੁਰਖੋਤਮੁ ਸਭਿ ਬਿਨਸੇ ਦਾਲਦ ਦਲਘਾ ॥
हे भाई ! जिस मनुष्य ने परमात्मा का नाम जपा है।हरी उक्तम पुरुख को जपा है।उसके सारे दरिद्र।दलों के दल नाश हो गए हैं।
ਭਉ ਜਨਮ ਮਰਣਾ ਮੇਟਿਓ ਗੁਰ ਸਬਦੀ ਹਰਿ ਅਸਥਿਰੁ ਸੇਵਿ ਸੁਖਿ ਸਮਘਾ ॥੧॥
गुरू के शबद में जुड़ के उस मनुष्य के जनम-मरण का डर भी खत्म कर लिया।सदा-स्थिर रहने वाले परमात्मा की सेवा-भक्ति करके वह आनंद में लीन हो गया। 1।
ਮੇਰੇ ਮਨ ਭਜੁ ਰਾਮ ਨਾਮ ਅਤਿ ਪਿਰਘਾ ॥
हे मेरे मन ! सदा परमात्मा का अति प्यारा नाम सिमरा कर।
ਮੈ ਮਨੁ ਤਨੁ ਅਰਪਿ ਧਰਿਓ ਗੁਰ ਆਗੈ ਸਿਰੁ ਵੇਚਿ ਲੀਓ ਮੁਲਿ ਮਹਘਾ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
हे भाई ! मैंने अपना सिर महँगे मूल्य पर बेच दिया है (मैंने सिर के बदले में कीमती हरी-नाम ले लिया है)। 1।रहाउ।
ਨਰਪਤਿ ਰਾਜੇ ਰੰਗ ਰਸ ਮਾਣਹਿ ਬਿਨੁ ਨਾਵੈ ਪਕੜਿ ਖੜੇ ਸਭਿ ਕਲਘਾ ॥
हे भाई ! दुनिया के राजे-महाराजे (माया के) रंग-रस भोगते रहते हैं।उन सबको आत्मिक मौत पकड़ कर आगे लगा लेती है।
ਧਰਮ ਰਾਇ ਸਿਰਿ ਡੰਡੁ ਲਗਾਨਾ ਫਿਰਿ ਪਛੁਤਾਨੇ ਹਥ ਫਲਘਾ ॥੨॥
जब उन्हें किए कर्मों का फल मिलता है।जब उनके सिर पर परमात्मा का डंडा बजता है।तब पछताते हैं। 2।
ਹਰਿ ਰਾਖੁ ਰਾਖੁ ਜਨ ਕਿਰਮ ਤੁਮਾਰੇ ਸਰਣਾਗਤਿ ਪੁਰਖ ਪ੍ਰਤਿਪਲਘਾ ॥
हे हरी ! हे पालनहार सर्व-व्यापक ! हम तेरे (पैदा किए हुए) निमाणे से जीव हैं।हम तेरी शरण आए हैं।तू खुद (अपने) सेवकों की रक्षा कर।
ਦਰਸਨੁ ਸੰਤ ਦੇਹੁ ਸੁਖੁ ਪਾਵੈ ਪ੍ਰਭ ਲੋਚ ਪੂਰਿ ਜਨੁ ਤੁਮਘਾ ॥੩॥
हे प्रभू ! मैं तेरा दास हूँ।दास की तमन्ना पूरी कर।इस दास को संत जनों की संगति बख्श (ता कि ये दास) आत्मिक आनंद प्राप्त कर सके। 3।
ਤੁਮ ਸਮਰਥ ਪੁਰਖ ਵਡੇ ਪ੍ਰਭ ਸੁਆਮੀ ਮੋ ਕਉ ਕੀਜੈ ਦਾਨੁ ਹਰਿ ਨਿਮਘਾ ॥
हे प्रभू ! हे सबसे बड़े मालिक ! तू सारी ताकतों का मालिक पुरुख है।मुझे एक छिन के वास्ते ही अपने नाम का दान दे।
ਜਨ ਨਾਨਕ ਨਾਮੁ ਮਿਲੈ ਸੁਖੁ ਪਾਵੈ ਹਮ ਨਾਮ ਵਿਟਹੁ ਸਦ ਘੁਮਘਾ ॥੪॥੨॥
हे दास नानक ! (कह–) जिसको प्रभू का नाम प्राप्त होता है।वह आनंद लेता है।मैं सदा हरी-नाम से सदके हूँ। 4। 2।
ਸੂਹੀ ਮਹਲਾ ੪ ॥
सूही महला ४ ॥
ਹਰਿ ਨਾਮਾ ਹਰਿ ਰੰਙੁ ਹੈ ਹਰਿ ਰੰਙੁ ਮਜੀਠੈ ਰੰਙੁ ॥
हे भाई ! हरी-नाम का सिमरन (मनुष्य के मन में) हरी का प्यार पैदा करता है।और।ये हरी के साथ प्यार मजीठ के रंग जैसा प्यार होता है।
ਗੁਰਿ ਤੁਠੈ ਹਰਿ ਰੰਗੁ ਚਾੜਿਆ ਫਿਰਿ ਬਹੁੜਿ ਨ ਹੋਵੀ ਭੰਙੁ ॥੧॥
अगर (किसी मनुष्य पर) गुरू प्रसन्न हो के उसको हरी-ना का रंग चढ़ा दे तो दोबारा उस रंग (प्यार) का कभी नाश नहीं होता। 1।