Sri Guru Granth Sahib Ji — Ang 728 (hindi)
ੴ ਸਤਿ ਨਾਮੁ ਕਰਤਾ ਪੁਰਖੁ ਨਿਰਭਉ ਨਿਰਵੈਰੁ ਅਕਾਲ ਮੂਰਤਿ ਅਜੂਨੀ ਸੈਭੰ ਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
वह अद्वैत ईश्वर (ऑकारस्वरूप) केवल एक है, नाम उसका सत्य है। वह आदिपुरुष सृष्टि को रचने वाला है, सब कुछ करने में परिपूर्ण (शक्तिवान) है। उसे किसी प्रकार का कोई भय नहीं, उसका किसी से कोई वैर नहीं, सब पर समदृष्टि होने के कारण वह प्रेमस्वरूप है। वह कालातीत ब्रह्म मूर्ति सदा अमर है, अतः जन्म-मरण से रहित है, वह स्वजन्मा है, जिसकी लधि गुरु की कृपा से होती है।
ਰਾਗੁ ਸੂਹੀ ਮਹਲਾ ੧ ਚਉਪਦੇ ਘਰੁ ੧
रागु सूही महला १ चउपदे घरु १
ਭਾਂਡਾ ਧੋਇ ਬੈਸਿ ਧੂਪੁ ਦੇਵਹੁ ਤਉ ਦੂਧੈ ਕਉ ਜਾਵਹੁ ॥
(मक्खन हासिल करने के लिए हे भाई !) तुम (पहले) बर्तन धो के बैठ के (उस बर्तन को) धूप में धो के तब दूध लेने जाते हो (फिर जाग लगा के उसको जमाते हो।इसी तरह यदि हरी-नाम प्राप्त करना है।तो)
ਦੂਧੁ ਕਰਮ ਫੁਨਿ ਸੁਰਤਿ ਸਮਾਇਣੁ ਹੋਇ ਨਿਰਾਸ ਜਮਾਵਹੁ ॥੧॥
हृदय को पवित्र करके मन को रोको - ये इस हृदय-बर्तन को धूप दो।तब दूध लेने जाओ।रोजाना की किरत-कार दूध है।प्रभू-चरनों में (हर वक्त) सुरति जोड़े रखनी (रोजाना के किरत-कार में) जाग लगाना है।(जुड़ी सुरति की बरकति से) दुनिया की आशाओं से ऊपर उठो।इस तरह ये दूध जमाओ (भाव।जुड़ी हुई सुरति की सहायता से रोजाना काम-काज करते हुए भी माया की ओर से उपरामता ही रहेगी)। 1।
ਜਪਹੁ ਤ ਏਕੋ ਨਾਮਾ ॥
(हे भाई ! अगर प्रभू को प्रसन्न करना है) तो सिर्फ प्रभू का नाम ही जपो
ਅਵਰਿ ਨਿਰਾਫਲ ਕਾਮਾ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
(सिमरन छोड़ के प्रभू को प्रसन्न करने के) और सारे उद्यम व्यर्थ हैं। 1।रहाउ।
ਇਹੁ ਮਨੁ ਈਟੀ ਹਾਥਿ ਕਰਹੁ ਫੁਨਿ ਨੇਤ੍ਰਉ ਨੀਦ ਨ ਆਵੈ ॥
(दूध मथने के वक्त तुम नेत्रे की गिटियाँ हाथ में पकड़ते हो) अपने इस मन को वश में करो (आत्मिक जीवन के लिए इस तरह ये मन-रूप) गीटियाँ हाथ में पकड़ो।माया के मोह की नींद (मन पर) प्रभाव ना डाल सके- ये है नेत्रा।
ਰਸਨਾ ਨਾਮੁ ਜਪਹੁ ਤਬ ਮਥੀਐ ਇਨ ਬਿਧਿ ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਪਾਵਹੁ ॥੨॥
जीभ से परमात्मा का नाम जपो (ज्यों-ज्यों नाम जपोगे) त्यों-त्यों (ये रोजाना काम-काज रूपी दूध) मथता रहेगा।इन तरीकों से (रोजाना काम-काज करते हुए ही) नाम-अमृत प्राप्त कर लोगे। 2।
ਮਨੁ ਸੰਪਟੁ ਜਿਤੁ ਸਤ ਸਰਿ ਨਾਵਣੁ ਭਾਵਨ ਪਾਤੀ ਤ੍ਰਿਪਤਿ ਕਰੇ ॥
(पुजारी मूर्ति को डिब्बे में डालता है।अगर जीव) अपने मन को डब्बा बनाए (उसमें परमात्मा का नाम टिका के रखे) उस नाम के द्वारा साध-संगति सरोवर में स्नान करे।(मन में टिके हुए प्रभू ठाकुर को) श्रद्धा के पत्रों से प्रसन्न करे।
ਪੂਜਾ ਪ੍ਰਾਣ ਸੇਵਕੁ ਜੇ ਸੇਵੇ ਇਨੑ ਬਿਧਿ ਸਾਹਿਬੁ ਰਵਤੁ ਰਹੈ ॥੩॥
अगर जीव सेवक बन के स्वै भाव छोड़ के (अंदर बसते ठाकुर-प्रभू की) सेवा (सिमरन) करे।तो इन तरीकों से वह जीव मालिक प्रभू को सदा मिला रहता है। 3।
ਕਹਦੇ ਕਹਹਿ ਕਹੇ ਕਹਿ ਜਾਵਹਿ ਤੁਮ ਸਰਿ ਅਵਰੁ ਨ ਕੋਈ ॥
(सिमरन के बिना प्रभू को प्रसन्न करने के अन्य उद्यम) बताने वाले लोग जो अन्य उद्यम बताते हैं।वे बता-बता के जीवन समय व्यर्थ गवा लेते हैं (क्योंकि) हे प्रभू ! तेरे सिमरन जैसा और कोई उद्यम नहीं है।
ਭਗਤਿ ਹੀਣੁ ਨਾਨਕੁ ਜਨੁ ਜੰਪੈ ਹਉ ਸਾਲਾਹੀ ਸਚਾ ਸੋਈ ॥੪॥੧॥
(चाहे) नानक (तेरा) दास भक्ति से वंचित (ही है फिर भी ये यही) विनती करता है कि मैं सदा कायम रहने वाले प्रभू की सदा सिफत-सालाह करता रहूँ। 4। 1।
ਸੂਹੀ ਮਹਲਾ ੧ ਘਰੁ ੨
सूही महला १ घरु २
ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
ਅੰਤਰਿ ਵਸੈ ਨ ਬਾਹਰਿ ਜਾਇ ॥
(सेवक वह है जिसका मन) दुनिया के रस पदार्थों की तरफ नहीं दौड़ता।और अपने अंतरात्मे ही (प्रभू चरणों में) टिका रहता है;
ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਛੋਡਿ ਕਾਹੇ ਬਿਖੁ ਖਾਇ ॥੧॥
परमात्मा का नाम-अमृत छोड़ के वह विषियों का जहर नहीं खाता। 1।
ਐਸਾ ਗਿਆਨੁ ਜਪਹੁ ਮਨ ਮੇਰੇ ॥
हे मन ! परमात्मा के साथ ऐसी गहरी सांझ पक्की कर।
ਹੋਵਹੁ ਚਾਕਰ ਸਾਚੇ ਕੇਰੇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
(जिसकी बरकति से) तू उस सदा कायम रहने वाले प्रभू का (सच्चा) सेवक बन सके। 1।रहाउ।
ਗਿਆਨੁ ਧਿਆਨੁ ਸਭੁ ਕੋਈ ਰਵੈ ॥
ज़्बानी-ज़बानी तो हर कोई कहता है कि मुझे ज्ञान प्राप्त हो गया है।मेरी सुरति जुड़ी हुई है।
ਬਾਂਧਨਿ ਬਾਂਧਿਆ ਸਭੁ ਜਗੁ ਭਵੈ ॥੨॥
पर (देखने में ये आता है कि) सारा जगत माया के मोह के बँधनों में बँधा हुआ भटक रहा है (सिर्फ ज़ुबान से कहने भर से कोई प्रभू का सेवक नहीं बन सकता)। 2।
ਸੇਵਾ ਕਰੇ ਸੁ ਚਾਕਰੁ ਹੋਇ ॥
जो मनुष्य (मन को बाहर भटकने से हटा के प्रभू का) सिमरन करता है वही (प्रभू का) सेवक बनता है।
ਜਲਿ ਥਲਿ ਮਹੀਅਲਿ ਰਵਿ ਰਹਿਆ ਸੋਇ ॥੩॥
उस सेवक को प्रभू जल में।धरती के अंदर।आकाश में हर जगह व्याप्त दिखता है। 3।
ਹਮ ਨਹੀ ਚੰਗੇ ਬੁਰਾ ਨਹੀ ਕੋਇ ॥
नानक विनती करता है– जो मनुष्य (अहंकार का त्याग करता है और) समझता है कि मैं औरों से बढ़िया नहीं।
ਪ੍ਰਣਵਤਿ ਨਾਨਕੁ ਤਾਰੇ ਸੋਇ ॥੪॥੧॥੨॥
ऐसे सेवक को परमात्मा (संसार-समुंद्र की विकार-लहरों से) पार लंघा लेता है। 4। 1। 2।