Sri Guru Granth Sahib Ji — Ang 685 (hindi)
ਜੋਬਨੁ ਧਨੁ ਪ੍ਰਭਤਾ ਕੈ ਮਦ ਮੈ ਅਹਿਨਿਸਿ ਰਹੈ ਦਿਵਾਨਾ ॥੧॥
जवानी।धन। ताकत के नशे में जगत दिन-रात पागल हुआ रहता है। 1।
ਦੀਨ ਦਇਆਲ ਸਦਾ ਦੁਖ ਭੰਜਨ ਤਾ ਸਿਉ ਮਨੁ ਨ ਲਗਾਨਾ ॥
जो परमात्मा दीनों पर दया करने वाला है।जो सारे दुखों का नाश करने वाला है।जगत उससे अपना मन नहीं जोड़ता।
ਜਨ ਨਾਨਕ ਕੋਟਨ ਮੈ ਕਿਨਹੂ ਗੁਰਮੁਖਿ ਹੋਇ ਪਛਾਨਾ ॥੨॥੨॥
हे दास नानक ! (कह–) करोड़ों में से किसी विरले (दुर्लभ) मनुष्य ने गुरू की शरण पड़ कर परमात्मा के साथ सांझ डाली है। 2। 2।
ਧਨਾਸਰੀ ਮਹਲਾ ੯ ॥
धनासरी महला ९ ॥
ਤਿਹ ਜੋਗੀ ਕਉ ਜੁਗਤਿ ਨ ਜਾਨਉ ॥
हे भाई ! मैं समझता हूँ कि उस जोगी को (सही) जीवन-जाच (अभी) नहीं आई,
ਲੋਭ ਮੋਹ ਮਾਇਆ ਮਮਤਾ ਫੁਨਿ ਜਿਹ ਘਟਿ ਮਾਹਿ ਪਛਾਨਉ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
जिस (जोगी) के हृदय में लोभ माया के मोह और ममता (की लहरें उठ रही) देखता हूँ। 1।रहाउ।
ਪਰ ਨਿੰਦਾ ਉਸਤਤਿ ਨਹ ਜਾ ਕੈ ਕੰਚਨ ਲੋਹ ਸਮਾਨੋ ॥
हे भाई ! जिस मनुष्य के हृदय में पराई निंदा नहीं है।पराई खुशमद नहीं है।जिसको सोना लोहा एक जैसे ही दिखते हैं।
ਹਰਖ ਸੋਗ ਤੇ ਰਹੈ ਅਤੀਤਾ ਜੋਗੀ ਤਾਹਿ ਬਖਾਨੋ ॥੧॥
जो मनुष्य खुशी गमी से निर्लिप रहता है; उसको ही जोगी कह। 1।
ਚੰਚਲ ਮਨੁ ਦਹ ਦਿਸਿ ਕਉ ਧਾਵਤ ਅਚਲ ਜਾਹਿ ਠਹਰਾਨੋ ॥
हे नानक ! कह– (हे भाई !) ये सदा भटकता रहने वाला मन दसों दिशाओं में दौड़ता फिरता है।जिस मनुष्य ने इसे अडोल करके टिका लिया है।
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਇਹ ਬਿਧਿ ਕੋ ਜੋ ਨਰੁ ਮੁਕਤਿ ਤਾਹਿ ਤੁਮ ਮਾਨੋ ॥੨॥੩॥
जो मनुष्य इस किस्म का है।समझ लें उसे विकारों से खलासी मिल गई है। 2। 3।
ਧਨਾਸਰੀ ਮਹਲਾ ੯ ॥
धनासरी महला ९ ॥
ਅਬ ਮੈ ਕਉਨੁ ਉਪਾਉ ਕਰਉ ॥
हे भाई ! अब मैं कौन सा यतन करूँ
ਜਿਹ ਬਿਧਿ ਮਨ ਕੋ ਸੰਸਾ ਚੂਕੈ ਭਉ ਨਿਧਿ ਪਾਰਿ ਪਰਉ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
(जिससे मेरे) मन का सहम खत्म हो जाए।और मैं संसार-समुंद्र से पार लांघ जाऊँ। 1।रहाउ।
ਜਨਮੁ ਪਾਇ ਕਛੁ ਭਲੋ ਨ ਕੀਨੋ ਤਾ ਤੇ ਅਧਿਕ ਡਰਉ ॥
हे भाई ! मानस जन्म प्राप्त करके मैंने कोई भलाई नहीं की।इसलिए मैं बहुत डरता रहता हूँ।
ਮਨ ਬਚ ਕ੍ਰਮ ਹਰਿ ਗੁਨ ਨਹੀ ਗਾਏ ਯਹ ਜੀਅ ਸੋਚ ਧਰਉ ॥੧॥
मैं (अपने) अंदर (हर वक्त) यही चिंता करता रहता हूँ कि मैंने अपने मन से अपने वचन से।कर्म से (कभी भी) परमात्मा के गुण नहीं गाए। 1।
ਗੁਰਮਤਿ ਸੁਨਿ ਕਛੁ ਗਿਆਨੁ ਨ ਉਪਜਿਓ ਪਸੁ ਜਿਉ ਉਦਰੁ ਭਰਉ ॥
हे भाई ! गुरू की मति सुन के मेरे अंदर आत्मिक जीवन की कुछ भी सूझ पैदा नहीं हुई।मैं पशू की तरह (रोज) अपना पेट भर लेता हूँ।
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਪ੍ਰਭ ਬਿਰਦੁ ਪਛਾਨਉ ਤਬ ਹਉ ਪਤਿਤ ਤਰਉ ॥੨॥੪॥੯॥੯॥੧੩॥੫੮॥੪॥੯੩॥
हे नानक ! कह– हे प्रभू ! मैं विकारी तब ही (संसार-समुंद्र से) पार लांघ सकता हूँ अगर तू अपना मूल कदीमों वाला प्यार वाला स्वभाव याद रखे। 2। 4। 9। 9। 13। 58। 4। 93।
ਧਨਾਸਰੀ ਮਹਲਾ ੧ ਘਰੁ ੨ ਅਸਟਪਦੀਆ
धनासरी महला १ घरु २ असटपदीआ
ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है।
ਗੁਰੁ ਸਾਗਰੁ ਰਤਨੀ ਭਰਪੂਰੇ ॥
गुरू (मानो) एक समुन्द्र (है जो प्रभू की सिफत सालाह से) नाको नाक भरा हुआ है।
ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਸੰਤ ਚੁਗਹਿ ਨਹੀ ਦੂਰੇ ॥
गुरमुख सिख (उस सागर में से) आत्मिक जीवन देने वाली खुराक (प्राप्त करते हैं जैसे हंस मोती) चुगते हैं।(और गुरू से) दूर नहीं रहते।
ਹਰਿ ਰਸੁ ਚੋਗ ਚੁਗਹਿ ਪ੍ਰਭ ਭਾਵੈ ॥
प्रभू की मेहर के अनुसार संत-हंस हरी-नाम रस (की) चोग चुगते हैं।
ਸਰਵਰ ਮਹਿ ਹੰਸੁ ਪ੍ਰਾਨਪਤਿ ਪਾਵੈ ॥੧॥
(गुरसिख) हंस (गुरू-) सरोवर में (टिका रहता है।और) जिंद के मालिक प्रभू को पा लेता है। 1।
ਕਿਆ ਬਗੁ ਬਪੁੜਾ ਛਪੜੀ ਨਾਇ ॥
बिचारा बगुला छपड़ी में क्यों नहाता है।
ਕੀਚੜਿ ਡੂਬੈ ਮੈਲੁ ਨ ਜਾਇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
(कुछ नहीं मिलता।बल्कि छपड़ी में नहा के) कीचड़ में डूबता है।(उसकी ये) मैल दूर नहीं होती (जो मनुष्य गुरू समुन्द्र को छोड़ के देवी-देवताओं आदि अन्य के आसरे तलाशता है वह।मानो।छपड़ी में ही नहा रहा है।वहाँ से वह और भी ज्यादा माया-मोह की मैल चिपका लेता है)। 1।रहाउ।
ਰਖਿ ਰਖਿ ਚਰਨ ਧਰੇ ਵੀਚਾਰੀ ॥
गुरसिख बड़ा सचेत हो के पूरा विचारवान हो के (जीवन-यात्रा में) पैर रखता है।
ਦੁਬਿਧਾ ਛੋਡਿ ਭਏ ਨਿਰੰਕਾਰੀ ॥
परमात्मा के बिना किसी और आसरे की तलाश छोड़ के परमात्मा का ही बन जाता है।
ਮੁਕਤਿ ਪਦਾਰਥੁ ਹਰਿ ਰਸ ਚਾਖੇ ॥
परमात्मा के नाम का रस चख के गुरसिख वह पदार्थ हासिल कर लेता है जो माया के मोह से खलासी दिलवा देता है।
ਆਵਣ ਜਾਣ ਰਹੇ ਗੁਰਿ ਰਾਖੇ ॥੨॥
जिसकी गुरू ने सहायता कर दी उसके जन्म-मरण के चक्कर समाप्त हो गए। 2।
ਸਰਵਰ ਹੰਸਾ ਛੋਡਿ ਨ ਜਾਇ ॥
(जैसे) हंस मानसरोवर को छोड़ के नहीं जाता (वैसे ही जो सिख गुरू का दर छोड़ के नहीं जाता वह)
ਪ੍ਰੇਮ ਭਗਤਿ ਕਰਿ ਸਹਜਿ ਸਮਾਇ ॥
प्रेमा भक्ति की बरकति से अडोल आत्मिक अवस्था में लीन हो जाता है।
ਸਰਵਰ ਮਹਿ ਹੰਸੁ ਹੰਸ ਮਹਿ ਸਾਗਰੁ ॥
जो गुरसिख-हंस गुरू-सरोवर में टिकता है।उसके अंदर गुरू-सरोवर अपना आप प्रगट करता है (उस सिख के अंदर गुरू बस जाता है) -
ਅਕਥ ਕਥਾ ਗੁਰ ਬਚਨੀ ਆਦਰੁ ॥੩॥
यह कथा अकथ है (भाव। इस आत्मिक अवस्था का बयान नहीं किया जा सकता।सिर्फ ये कह सकते हैं कि) गुरू के बचनों पर चल के वह (लोक-परलोक में) आदर पाता है। 3।
ਸੁੰਨ ਮੰਡਲ ਇਕੁ ਜੋਗੀ ਬੈਸੇ ॥
जे कोई विरला प्रभू चरणों में जुड़ा हुआ सख्श शून्य अवस्था में टिकता है।
ਨਾਰਿ ਨ ਪੁਰਖੁ ਕਹਹੁ ਕੋਊ ਕੈਸੇ ॥
उसके अंदर स्त्री-मर्द वाला भेद नहीं रह जाता (भाव।उसके काम चेष्टा अपना प्रभाव नहीं डालती)।बताओ।कोई ये संकल्प कर भी कैसे सकता है।
ਤ੍ਰਿਭਵਣ ਜੋਤਿ ਰਹੇ ਲਿਵ ਲਾਈ ॥
क्योंकि वह तो सदा उस परमात्मा में सुरति जोड़े रखता है जिसकी ज्योति तीनों भवनों में व्यापक है और देवते
ਸੁਰਿ ਨਰ ਨਾਥ ਸਚੇ ਸਰਣਾਈ ॥੪॥
मनुष्य नाथ आदि सभी जिस सदा-स्थिर की शरण लिए रखते हैं। 4।
ਆਨੰਦ ਮੂਲੁ ਅਨਾਥ ਅਧਾਰੀ ॥
(गुरमुख-हंस गुरू-सागर में टिक के उस प्राणपति-प्रभू को मिलता है) जो आत्मिक आनंद का श्रोत है जो निआसरों का आसरा है।
ਗੁਰਮੁਖਿ ਭਗਤਿ ਸਹਜਿ ਬੀਚਾਰੀ ॥
गुरमुख उसकी भक्ति के द्वारा और उसके गुणों के विचार के माध्यम से अडोल आत्मिक अवस्था में टिके रहते हैं।
ਭਗਤਿ ਵਛਲ ਭੈ ਕਾਟਣਹਾਰੇ ॥
वह प्रभू (अपने सेवकों की) भक्ति से प्रेम करता है।उनके सारे डर दूर करने के समर्थ है।
ਹਉਮੈ ਮਾਰਿ ਮਿਲੇ ਪਗੁ ਧਾਰੇ ॥੫॥
गुरमुखि अहंकार को मार के और (साध-संगति में) टिक के उस आनंद-मूल प्रभू (के चरनों) में जुड़ते हैं। 5।
ਅਨਿਕ ਜਤਨ ਕਰਿ ਕਾਲੁ ਸੰਤਾਏ ॥
अनेकों अन्य ही जतन करने के कारण (सहेड़ी हुई)
ਮਰਣੁ ਲਿਖਾਇ ਮੰਡਲ ਮਹਿ ਆਏ ॥
आत्मिक मौत (का लेख ही अपने माथे पर) लिखा के इस जगत में आया (और यहाँ भी आत्मिक मौत ही गले पड़वाता रहा)।