Sri Guru Granth Sahib Ji — Ang 629 (hindi)
ਗੁਰੁ ਪੂਰਾ ਆਰਾਧੇ ॥
हे संत जनो ! जिन मनुष्यों ने पूरे गुरू का ध्यान धरा।
ਕਾਰਜ ਸਗਲੇ ਸਾਧੇ ॥
उन्होंने अपने सारे काम सवार लिए।
ਸਗਲ ਮਨੋਰਥ ਪੂਰੇ ॥
उनकी सारी मनोकामनाएं पूरी हो गई।
ਬਾਜੇ ਅਨਹਦ ਤੂਰੇ ॥੧॥
उनके अंदर प्रभू की सिफत सालाह के बाजे एक-रस बजते रहते हैं। 1।
ਸੰਤਹੁ ਰਾਮੁ ਜਪਤ ਸੁਖੁ ਪਾਇਆ ॥
हे संत जनो !परमात्मा का नाम जप के वे आत्मिक सुख लेते हैं।
ਸੰਤ ਅਸਥਾਨਿ ਬਸੇ ਸੁਖ ਸਹਜੇ ਸਗਲੇ ਦੂਖ ਮਿਟਾਇਆ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
जो मनुष्य साध-संगति में आ टिकते हैं।वे आत्मिक अडोलता में लीन रह के आत्मिक आनंद हासिल करते हैं। वे अपने सारे दुख दूर कर लेते हैं। 1।रहाउ।
ਗੁਰ ਪੂਰੇ ਕੀ ਬਾਣੀ ॥
पूरे गुरू की बाणी- ये बाणी
ਪਾਰਬ੍ਰਹਮ ਮਨਿ ਭਾਣੀ ॥
परमात्मा के मन को (भी) प्यारी लगती है (क्योंकि) ये (पढ़ने वाले का जीवन) पवित्र करने वाली है।
ਨਾਨਕ ਦਾਸਿ ਵਖਾਣੀ ॥
हे नानक ! (किसी विरले) दास ने ही (आत्मिक अडोलता में टिक के) उचारी है।
ਨਿਰਮਲ ਅਕਥ ਕਹਾਣੀ ॥੨॥੧੮॥੮੨॥
ये बाणी उस प्रभू की सिफत सालाह है जिसका स्वरूप बयान नहीं किया जा सकता। 2। 18। 82।
ਸੋਰਠਿ ਮਹਲਾ ੫ ॥
सोरठि महला ५ ॥
ਭੂਖੇ ਖਾਵਤ ਲਾਜ ਨ ਆਵੈ ॥
हे भाई ! जैसे (किसी मनुष्य को कुछ खाने को मिल जाए।तो वह) भूखा मनुष्य खाते हुए शर्म महसूस नहीं करता।
ਤਿਉ ਹਰਿ ਜਨੁ ਹਰਿ ਗੁਣ ਗਾਵੈ ॥੧॥
इसी तरह परमात्मा का सेवक (अपनी आत्मिक भूख मिटाने के लिए बड़े चाव से) परमात्मा की सिफत सालाह के गीत गाता है। 1।
ਅਪਨੇ ਕਾਜ ਕਉ ਕਿਉ ਅਲਕਾਈਐ ॥
हे भाई ! अपने (असल) काम की खातिर कभी भी आलस नहीं करना चाहिएं1।
ਜਿਤੁ ਸਿਮਰਨਿ ਦਰਗਹ ਮੁਖੁ ਊਜਲ ਸਦਾ ਸਦਾ ਸੁਖੁ ਪਾਈਐ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
जिस सिमरन की बरकति से परमात्मा की हजूरी में सुर्खरू होते हैं।और।सदा ही आत्मिक आनंद लेते हैं (वह सिमरन ही हमारा असल काम है।रहाउ।
ਜਿਉ ਕਾਮੀ ਕਾਮਿ ਲੁਭਾਵੈ ॥
हे भाई ! जैसे कोई कामी मनुष्य काम-वासना में मगन रहता है।
ਤਿਉ ਹਰਿ ਦਾਸ ਹਰਿ ਜਸੁ ਭਾਵੈ ॥੨॥
वैसे ही परमात्मा के सेवक को परमात्मा की सिफत सालाह ही अच्छी लगती है। 2।
ਜਿਉ ਮਾਤਾ ਬਾਲਿ ਲਪਟਾਵੈ ॥
हे भाई ! जैसे माँ अपने बच्चे (के मोह) से चिपकी रहती है।
ਤਿਉ ਗਿਆਨੀ ਨਾਮੁ ਕਮਾਵੈ ॥੩॥
वैसे ही आत्मिक जीवन की सूझ वाला मनुष्य नाम (-सिमरन की) कमाई करता है। 3।
ਗੁਰ ਪੂਰੇ ਤੇ ਪਾਵੈ ॥
पर जो (ये दाति) पूरे गुरू से हासिल करता है।
ਜਨ ਨਾਨਕ ਨਾਮੁ ਧਿਆਵੈ ॥੪॥੧੯॥੮੩॥
हे दास नानक ! (वही मनुष्य परमात्मा का) नाम सिमरता है 4। 19। 83।
ਸੋਰਠਿ ਮਹਲਾ ੫ ॥
सोरठि महला ५ ॥
ਸੁਖ ਸਾਂਦਿ ਘਰਿ ਆਇਆ ॥
वही पूरी आत्मिक अरोगता से अपने हृदय-घर में (सदा के लिए) टिक गया।
ਨਿੰਦਕ ਕੈ ਮੁਖਿ ਛਾਇਆ ॥
उस की निंदा करने वाले के मुँह पर राख ही पड़ी (प्रभू के दास के निंदक ने सदा बदनामी का टिका ही कमाया)।
ਪੂਰੈ ਗੁਰਿ ਪਹਿਰਾਇਆ ॥
(हे संत जनो ! परमात्मा की कृपा से जिस मनुष्य को) पूरे गुरू ने आदर-मान बख्शा।
ਬਿਨਸੇ ਦੁਖ ਸਬਾਇਆ ॥੧॥
उसके सारे ही दुख दूर हो गए। 1।
ਸੰਤਹੁ ਸਾਚੇ ਕੀ ਵਡਿਆਈ ॥
हे संत जनो ! (देखो) बड़ी शान उस सदा कायम रहने वाले परमात्मा की।
ਜਿਨਿ ਅਚਰਜ ਸੋਭ ਬਣਾਈ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
जिस ने (अपने दास की सदा ही) हैरान कर देने वाली शोभा बना दी है। 1।रहाउ।
ਬੋਲੇ ਸਾਹਿਬ ਕੈ ਭਾਣੈ ॥
हे नानक ! (प्रभू के जिस सेवक को गुरू ने इज्जत दी।वह सेवक सदा) परमात्मा की रजा में ही वचन बोलता है।
ਦਾਸੁ ਬਾਣੀ ਬ੍ਰਹਮੁ ਵਖਾਣੈ ॥
वह सेवक (परमात्मा की सिफत सालाह की) बाणी सदा उचारता है।परमात्मा का नाम उचारता है।
ਨਾਨਕ ਪ੍ਰਭ ਸੁਖਦਾਈ ॥
वह सदा (अपने सेवक को) सुख देने वाला है।
ਜਿਨਿ ਪੂਰੀ ਬਣਤ ਬਣਾਈ ॥੨॥੨੦॥੮੪॥
हे भाई ! जिस परमात्मा ने (गुरू की शरण पड़ के नाम-सिमरन की ये) कभी गलत ना साबित होने वाली योजना (विधि) बना दी है। 2। 20। 84।
ਸੋਰਠਿ ਮਹਲਾ ੫ ॥
सोरठि महला ५ ॥
ਪ੍ਰਭੁ ਅਪੁਨਾ ਰਿਦੈ ਧਿਆਏ ॥
हे संत जनो ! जो मनुष्य परमात्मा का नाम अपने दिल में बसाए रखता है।
ਘਰਿ ਸਹੀ ਸਲਾਮਤਿ ਆਏ ॥
वह मनुष्य अपनी आत्मिक जीवन की राशि-पूँजी को विकारों से पूरी तरह बचा के हृदय-घर में टिका रहता है।
ਸੰਤੋਖੁ ਭਇਆ ਸੰਸਾਰੇ ॥
दुनिया के कार्य-व्यवहार करते हुए भी (उसके मन में माया के प्रति) संतोष बना रहता है।
ਗੁਰਿ ਪੂਰੈ ਲੈ ਤਾਰੇ ॥੧॥
पूरे गुरू ने उसकी बाँह पकड़ के उसको (संसार-समुंद्र से) पार लंघा लिया होता है। 1।
ਸੰਤਹੁ ਪ੍ਰਭੁ ਮੇਰਾ ਸਦਾ ਦਇਆਲਾ ॥
हे संत जनो ! मेरा प्रभू (अपने सेवकों पर) सदा ही दयावान रहता है।
ਅਪਨੇ ਭਗਤ ਕੀ ਗਣਤ ਨ ਗਣਈ ਰਾਖੈ ਬਾਲ ਗੁਪਾਲਾ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
प्रभू अपने भक्तों के कर्मों का लेखा नहीं विचारता।(क्योंकि) सृष्टि का पालक प्रभू बच्चों की तरह (सेवकों को विकारों से) बचाए रखता है (इसलिए उनके विकारों का कोई लेखा नहीं रह जाता)। 1।रहाउ।
ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਰਿਦੈ ਉਰਿ ਧਾਰੇ ॥
हे संत जनो ! जो मनुष्य परमात्मा का नाम अपने हृदय में बसाए रखता है
ਤਿਨਿ ਸਭੇ ਥੋਕ ਸਵਾਰੇ ॥
(यकीन जानिए) उसने अपने सारे आत्मिक गुण सुंदर बना लिए हैं।
ਗੁਰਿ ਪੂਰੈ ਤੁਸਿ ਦੀਆ ॥
हे नानक ! पूरे गुरू ने (जिस मनुष्य को) प्रसन्न हो के नाम की दाति बख्शी।
ਫਿਰਿ ਨਾਨਕ ਦੂਖੁ ਨ ਥੀਆ ॥੨॥੨੧॥੮੫॥
उसे दुबारा कभी कोई दुख नहीं व्याप सका। 2। 21। 85।
ਸੋਰਠਿ ਮਹਲਾ ੫ ॥
सोरठि महला ५ ॥
ਹਰਿ ਮਨਿ ਤਨਿ ਵਸਿਆ ਸੋਈ ॥
हे भाई ! जिस मनुष्य के मन में तन में वह परमात्मा ही बसा रहता है।
ਜੈ ਜੈ ਕਾਰੁ ਕਰੇ ਸਭੁ ਕੋਈ ॥
हरेक जीव उसकी शोभा करता है।
ਗੁਰ ਪੂਰੇ ਕੀ ਵਡਿਆਈ ॥
(पर ये) पूरे गुरू की ही बख्शिश है
ਤਾ ਕੀ ਕੀਮਤਿ ਕਹੀ ਨ ਜਾਈ ॥੧॥
(जिसकी मेहर से परमात्मा की याद किसी भाग्यशाली के मन तन में बसती है) गुरू की कृपा का मूल्य नहीं पड़ सकता। 1।
ਹਉ ਕੁਰਬਾਨੁ ਜਾਈ ਤੇਰੇ ਨਾਵੈ ॥
हे मेरे प्यारे प्रभू ! मैं तेरे नाम से सदके जाता हूँ।
ਜਿਸ ਨੋ ਬਖਸਿ ਲੈਹਿ ਮੇਰੇ ਪਿਆਰੇ ਸੋ ਜਸੁ ਤੇਰਾ ਗਾਵੈ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
तू जिस मनुष्य पर कृपा करता है।वह सदा तेरी सिफत सालाह के गीत गाता है। 1।रहाउ।
ਤੂੰ ਭਾਰੋ ਸੁਆਮੀ ਮੇਰਾ ॥
हे प्रभू ! तू मेरा बड़ा मालिक है।
ਸੰਤਾਂ ਭਰਵਾਸਾ ਤੇਰਾ ॥
तेरे संतों को (भी) तेरा ही सहारा रहता है।
ਨਾਨਕ ਪ੍ਰਭ ਸਰਣਾਈ ॥
हे नानक ! जो मनुष्य प्रभू की शरण पड़ा रहता है
ਮੁਖਿ ਨਿੰਦਕ ਕੈ ਛਾਈ ॥੨॥੨੨॥੮੬॥
(उसका दुख दूर करने वाले) निंदक के मुँह पर राख ही पड़ती है (प्रभू की शरण पड़े मनुष्य का कोई कुछ बिगाड़ नहीं सकता)। 2। 22। 86।
ਸੋਰਠਿ ਮਹਲਾ ੫ ॥
सोरठि महला ५ ॥
ਆਗੈ ਸੁਖੁ ਮੇਰੇ ਮੀਤਾ ॥
हे मेरे मित्र ! जिस मनुष्य के आगे आने वाले जीवन में प्रभू ने सुख बना दिया।
ਪਾਛੇ ਆਨਦੁ ਪ੍ਰਭਿ ਕੀਤਾ ॥
जिसके बीत चुके जीवन में भी प्रभू ने आनंद बनाए रखा।
ਪਰਮੇਸੁਰਿ ਬਣਤ ਬਣਾਈ ॥
जिस मनुष्य के लिए परमेश्वर ने ऐसी योजना बना रखी।
ਫਿਰਿ ਡੋਲਤ ਕਤਹੂ ਨਾਹੀ ॥੧॥
वह मनुष्य (लोक-परलोक में) कहीं भी डोलता नहीं। 1।
ਸਾਚੇ ਸਾਹਿਬ ਸਿਉ ਮਨੁ ਮਾਨਿਆ ॥
हे भाई ! जिस मनुष्य का मन सदा कायम रहने वाले मालिक (के नाम) से पतीज जाता है।
ਹਰਿ ਸਰਬ ਨਿਰੰਤਰਿ ਜਾਨਿਆ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
वह मनुष्य उस मालिक प्रभू को सब में एक-रस बसता पहचान लेता है। 1।रहाउ।