Sri Guru Granth Sahib Ji — Ang 623 (hindi)
ਤਿਨਿ ਸਗਲੀ ਲਾਜ ਰਾਖੀ ॥੩॥
शबद ने उसकी सारी इज्जत रख ली (उसको विकारों के जाल में फंसने से बचा लिया)। 3।
ਬੋਲਾਇਆ ਬੋਲੀ ਤੇਰਾ ॥
हे प्रभू !जब तू प्रेरणा देता है तब ही मैं तेरी सिफत-सालाह कर सकता हूं।
ਤੂ ਸਾਹਿਬੁ ਗੁਣੀ ਗਹੇਰਾ ॥
तू हमारा मालिक है।तू गुणों का खजाना है।तू गहरे जिगरे वाला है।
ਜਪਿ ਨਾਨਕ ਨਾਮੁ ਸਚੁ ਸਾਖੀ ॥
हे नानक ! सदा स्थिर प्रभू का नाम जपा कर।यही सदा हामी भरने वाला है।
ਅਪੁਨੇ ਦਾਸ ਕੀ ਪੈਜ ਰਾਖੀ ॥੪॥੬॥੫੬॥
प्रभू अपने सेवक की (सदा) इज्जत रखता आया है। 4। 6। 56।
ਸੋਰਠਿ ਮਹਲਾ ੫ ॥
सोरठि महला ५ ॥
ਵਿਚਿ ਕਰਤਾ ਪੁਰਖੁ ਖਲੋਆ ॥
सर्व-व्यापक करतार खुद उसकी सहायता करता है।
ਵਾਲੁ ਨ ਵਿੰਗਾ ਹੋਆ ॥
(उसकी आत्मिक राशि-पूँजी का) रक्ती भर भी नुकसान नहीं होता।
ਮਜਨੁ ਗੁਰ ਆਂਦਾ ਰਾਸੇ ॥
(हे भाई ! साध-संगति में जिस मनुष्य का) आत्मिक स्नान गुरू ने सफल कर दिया।
ਜਪਿ ਹਰਿ ਹਰਿ ਕਿਲਵਿਖ ਨਾਸੇ ॥੧॥
वह मनुष्य सदा परमात्मा का नाम जप-जप के (अपने सारे) पाप नाश कर लेता है।1।
ਸੰਤਹੁ ਰਾਮਦਾਸ ਸਰੋਵਰੁ ਨੀਕਾ ॥
हे संत जनो ! साध-संगति (एक) सुंदर (स्थान) है।
ਜੋ ਨਾਵੈ ਸੋ ਕੁਲੁ ਤਰਾਵੈ ਉਧਾਰੁ ਹੋਆ ਹੈ ਜੀ ਕਾ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
जो मनुष्य (साध-संगति में) आत्मिक स्नान करता है (मन को नाम-जल से पवित्र करता है)।उसके जीवन का (विकारों से) पार-उतारा हो जाता है।वह अपनी सारी कुल को भी (संसार समुंद्र से) पार लंघा लेता है। 1।रहाउ।
ਜੈ ਜੈ ਕਾਰੁ ਜਗੁ ਗਾਵੈ ॥
सारा जगत उसकी शोभा के गीत गाता है।
ਮਨ ਚਿੰਦਿਅੜੇ ਫਲ ਪਾਵੈ ॥
वह मनुष्य मन-वांछित फल हासिल कर लेता है।
ਸਹੀ ਸਲਾਮਤਿ ਨਾਇ ਆਏ ॥ ਅਪਣਾ ਪ੍ਰਭੂ ਧਿਆਏ ॥੨॥
(हे भाई ! वह मनुष्य इस सत्संग-सरोवर में आत्मिक) स्नान कर के अपनी आत्मिक जीवन की राशि-पूँजी को पूर्ण-तौर पर बचा लेता है। (जो मनुष्य राम के दासों के सरोवर में टिक के) अपने परमात्मा की आराधना करता है।2।
ਸੰਤ ਸਰੋਵਰ ਨਾਵੈ ॥
हे भाई ! जो मनुष्य संतो के सरोवर में (साध-संगति में) आत्मिक स्नान करता है।
ਸੋ ਜਨੁ ਪਰਮ ਗਤਿ ਪਾਵੈ ॥
वह मनुष्य सबसे उच्च आत्मिक अवस्था हासिल कर लेता है।
ਮਰੈ ਨ ਆਵੈ ਜਾਈ ॥
वह जनम-मरण के चक्कर में नहीं पड़ता।
ਹਰਿ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਧਿਆਈ ॥੩॥
जो मनुष्य सदा परमात्मा का नाम सिमरता रहता है। 3।
ਇਹੁ ਬ੍ਰਹਮ ਬਿਚਾਰੁ ਸੁ ਜਾਨੈ ॥
हे भाई ! परमात्मा के मिलाप की इस विचार को वही मनुष्य समझता है
ਜਿਸੁ ਦਇਆਲੁ ਹੋਇ ਭਗਵਾਨੈ ॥
जिस पर परमात्मा खुद दयावान होता है।
ਬਾਬਾ ਨਾਨਕ ਪ੍ਰਭ ਸਰਣਾਈ ॥
हे नानक ! (कह–) हे भाई ! जो मनुष्य परमात्मा की शरण पड़ा रहता है।
ਸਭ ਚਿੰਤਾ ਗਣਤ ਮਿਟਾਈ ॥੪॥੭॥੫੭॥
वह अपनी हरेक किस्म की चिंता-फिक्र दूर कर लेता है। 4। 7। 57।
ਸੋਰਠਿ ਮਹਲਾ ੫ ॥
सोरठि महला ५ ॥
ਪਾਰਬ੍ਰਹਮਿ ਨਿਬਾਹੀ ਪੂਰੀ ॥
(हे भाई ! सदा से ही) परमात्मा ने अपने सेवक से प्रीति आखिर तक निभाई है।
ਕਾਈ ਬਾਤ ਨ ਰਹੀਆ ਊਰੀ ॥
सेवक को किसी बात की कोई कमी नहीं रहती।
ਗੁਰਿ ਚਰਨ ਲਾਇ ਨਿਸਤਾਰੇ ॥
गुरू ने (सेवकों को सदा ही) चरणों से लगा के (संसार-समुंद्र से) पार लंघाया है।
ਹਰਿ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਸਮੑਾਰੇ ॥੧॥
सेवक सदा परमात्मा का नाम अपने दिल में संभाल के रखता है।1।
ਅਪਨੇ ਦਾਸ ਕਾ ਸਦਾ ਰਖਵਾਲਾ ॥
हे भाई ! परमात्मा अपने सेवक का सदा रक्षक बना रहता है।
ਕਰਿ ਕਿਰਪਾ ਅਪੁਨੇ ਕਰਿ ਰਾਖੇ ਮਾਤ ਪਿਤਾ ਜਿਉ ਪਾਲਾ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
जैसे माँ-बाप (बच्चों को) पालते हैं।वैसे ही प्रभू कृपा करके अपने सेवकों को अपने बनाए रखता है। 1।रहाउ।
ਵਡਭਾਗੀ ਸਤਿਗੁਰੁ ਪਾਇਆ ॥
हे भाई ! बड़े भाग्यों वाले मनुष्यों ने (वह) गुरू पा लिया।
ਜਿਨਿ ਜਮ ਕਾ ਪੰਥੁ ਮਿਟਾਇਆ ॥
जिस (गुरू) ने (उनके वास्ते) जम के देश को ले जाने वाला रास्ता मिटा दिया (क्योंकि गुरू की कृपा से)
ਹਰਿ ਭਗਤਿ ਭਾਇ ਚਿਤੁ ਲਾਗਾ ॥
उनका मन परमात्मा की भक्ति में प्रभू के प्रेम में मगन रहता है।
ਜਪਿ ਜੀਵਹਿ ਸੇ ਵਡਭਾਗਾ ॥੨॥
वे भाग्यशाली मनुष्य परमात्मा का नाम जप जप के आत्मिक जीवन प्राप्त कर लेते हैं। 2।
ਹਰਿ ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਬਾਣੀ ਗਾਵੈ ॥
(हे भाई ! परमात्मा का सेवक) परमात्मा की आत्मिक जीवन देने वाली बाणी गाता रहता है
ਸਾਧਾ ਕੀ ਧੂਰੀ ਨਾਵੈ ॥
सेवक गुरमुखों के चरणों की धूड़ में स्नान करता रहता है (सवै भाव मिटा के संत जनों की शरण पड़ा रहता है)।
ਅਪੁਨਾ ਨਾਮੁ ਆਪੇ ਦੀਆ ॥
परमात्मा ने खुद ही (अपने सेवक को) अपना नाम बख्शा है।
ਪ੍ਰਭ ਕਰਣਹਾਰ ਰਖਿ ਲੀਆ ॥੩॥
सृजनहार प्रभू ने खुद ही (सदा से अपने सेवक को विकारों से) बचाया है। 3।
ਹਰਿ ਦਰਸਨ ਪ੍ਰਾਨ ਅਧਾਰਾ ॥
हे भाई ! परमात्मा के दर्शन ही (सेवक की) जिंदगी का आसरा हैं,
ਇਹੁ ਪੂਰਨ ਬਿਮਲ ਬੀਚਾਰਾ ॥
(प्रभू के सेवक का) ये पवित्र और पूर्ण विचार बना रहता है
ਕਰਿ ਕਿਰਪਾ ਅੰਤਰਜਾਮੀ ॥
हे सबके दिलों की जानने वाले ! हे स्वामी ! (मेरे पर) मेहर कर।
ਦਾਸ ਨਾਨਕ ਸਰਣਿ ਸੁਆਮੀ ॥੪॥੮॥੫੮॥
हे दास नानक ! (तू भी प्रभू दर पर अरदास कर।और कह–)मैं तेरी शरण आया हूँ। 4। 8। 58।
ਸੋਰਠਿ ਮਹਲਾ ੫ ॥
सोरठि महला ५ ॥
ਗੁਰਿ ਪੂਰੈ ਚਰਨੀ ਲਾਇਆ ॥
(हे भाई जिस मनुष्य को) पूरे गुरू ने (परमात्मा के) चरणों में जोड़ दिया।
ਹਰਿ ਸੰਗਿ ਸਹਾਈ ਪਾਇਆ ॥
उसने वह परमात्मा पा लिया जो हर वक्त अंग-संग बसता है।और (जीवन का) मददगार है।
ਜਹ ਜਾਈਐ ਤਹਾ ਸੁਹੇਲੇ ॥
(अगर प्रभू चरणों में जुड़े रहें तो) जहाँ भी जाएं। वहीं सुखी रह सकते हैं
ਕਰਿ ਕਿਰਪਾ ਪ੍ਰਭਿ ਮੇਲੇ ॥੧॥
(पर जिन्हें चरणों में मिलाया है) प्रभू ने (खुद ही) कृपा करके मिलाया है। 1।
ਹਰਿ ਗੁਣ ਗਾਵਹੁ ਸਦਾ ਸੁਭਾਈ ॥
हे भाई ! सदा प्यार से परमात्मा के सिफत सालाह के गीत गाते रहा करो।
ਮਨ ਚਿੰਦੇ ਸਗਲੇ ਫਲ ਪਾਵਹੁ ਜੀਅ ਕੈ ਸੰਗਿ ਸਹਾਈ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
(सिफत सालाह की बरकति से) मन मांगे फल (प्रभू के दर से) प्राप्त करते रहोगे।परमात्मा जीवन के साथ (बसता) साथी (प्रतीत होता रहेगा)। 1।रहाउ।
ਨਾਰਾਇਣ ਪ੍ਰਾਣ ਅਧਾਰਾ ॥
परमात्मा जीवन का आसरा है।
ਹਮ ਸੰਤ ਜਨਾਂ ਰੇਨਾਰਾ ॥
मैं तो संत जनों की धूड़ बना रहता हूँ।
ਪਤਿਤ ਪੁਨੀਤ ਕਰਿ ਲੀਨੇ ॥
विकारों में गिरे हुओं को (भी) पवित्र जीवन वाला बना लेते हैं।
ਕਰਿ ਕਿਰਪਾ ਹਰਿ ਜਸੁ ਦੀਨੇ ॥੨॥
संत जन कृपा करके परमात्मा की सिफत सालाह की दाति देते हैं।2।
ਪਾਰਬ੍ਰਹਮੁ ਕਰੇ ਪ੍ਰਤਿਪਾਲਾ ॥
परमात्मा खुद (सिफत सालाह करने वालों की) रक्षा करता है।
ਸਦ ਜੀਅ ਸੰਗਿ ਰਖਵਾਲਾ ॥
सदा उनके प्राणों के साथ रक्षक बना रहता है।
ਹਰਿ ਦਿਨੁ ਰੈਨਿ ਕੀਰਤਨੁ ਗਾਈਐ ॥
हे भाई ! दिन-रात (हर समय) परमात्मा की सिफत सालाह के गीत गाते रहना चाहिए।
ਬਹੁੜਿ ਨ ਜੋਨੀ ਪਾਈਐ ॥੩॥
(सिफत सालाह की बरकति से) दुबारा जनम-मरन का चक्कर नहीं पड़ता।3।
ਜਿਸੁ ਦੇਵੈ ਪੁਰਖੁ ਬਿਧਾਤਾ ॥
जिसे सृजनहार सर्व-व्यापक प्रभू खुद (ये दाति) देता है।
ਹਰਿ ਰਸੁ ਤਿਨ ਹੀ ਜਾਤਾ ॥
उस मनुष्य ने ही परमात्मा के नाम का स्वाद समझा है (कद्र जानी है)।
ਜਮਕੰਕਰੁ ਨੇੜਿ ਨ ਆਇਆ ॥
जम दूत भी उसके नजदीक नहीं फटकते।
ਸੁਖੁ ਨਾਨਕ ਸਰਣੀ ਪਾਇਆ ॥੪॥੯॥੫੯॥
हे नानक ! परमात्मा की शरण पड़ा रह के वह आत्मिक आनंद लेता रहता है। 4। 9। 49।