Sri Guru Granth Sahib Ji — Ang 617 (hindi)
ਸੋਰਠਿ ਮਹਲਾ ੫ ਘਰੁ ੨ ਦੁਪਦੇ
सोरठि महला ५ घरु २ दुपदे
ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है।
ਸਗਲ ਬਨਸਪਤਿ ਮਹਿ ਬੈਸੰਤਰੁ ਸਗਲ ਦੂਧ ਮਹਿ ਘੀਆ ॥
हे भाई ! जैसे सब पौधों में आग (गुप्त रूप में मौजूद) है।जैसे हरेक किस्म के दूध में घी (मक्खन) गुप्त मौजूद है।
ਊਚ ਨੀਚ ਮਹਿ ਜੋਤਿ ਸਮਾਣੀ ਘਟਿ ਘਟਿ ਮਾਧਉ ਜੀਆ ॥੧॥
वैसे अच्छे-बुरे सब जीवों में प्रभू की ज्योति समाई हुई है।परमात्मा हरेक शरीर में है।सब जीवों में है। 1।
ਸੰਤਹੁ ਘਟਿ ਘਟਿ ਰਹਿਆ ਸਮਾਹਿਓ ॥
हे संत जनो ! परमात्मा हरेक शरीर में मौजूद है।
ਪੂਰਨ ਪੂਰਿ ਰਹਿਓ ਸਰਬ ਮਹਿ ਜਲਿ ਥਲਿ ਰਮਈਆ ਆਹਿਓ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
वह पूरी तरह सारे शरीरों में व्यापक है।वह सुंदर राम पानी में है।धरती में है। 1।रहाउ।
ਗੁਣ ਨਿਧਾਨ ਨਾਨਕੁ ਜਸੁ ਗਾਵੈ ਸਤਿਗੁਰਿ ਭਰਮੁ ਚੁਕਾਇਓ ॥
हे भाई ! नानक (उस) गुणों के खजाने परमात्मा की सिफत सालाह के गीत गाता है।गुरू ने (नानक का) भुलेखा दूर कर दिया है
ਸਰਬ ਨਿਵਾਸੀ ਸਦਾ ਅਲੇਪਾ ਸਭ ਮਹਿ ਰਹਿਆ ਸਮਾਇਓ ॥੨॥੧॥੨੯॥
(तभी तो नानक को यकीन है कि) परमात्मा सब जीवों में बसता है (फिर भी) सदा (माया के मोह से) निर्लिप है।सब जीवों में समा रहा है। 2। 1। 29।
ਸੋਰਠਿ ਮਹਲਾ ੫ ॥
सोरठि महला ५ ॥
ਜਾ ਕੈ ਸਿਮਰਣਿ ਹੋਇ ਅਨੰਦਾ ਬਿਨਸੈ ਜਨਮ ਮਰਣ ਭੈ ਦੁਖੀ ॥
हे भाई ! जिस प्रभू के सिमरन से तू खुशियों भरा जीवन जी सकता है तेरे जनम-मरण के सारे डर और दुख दूर हो सकते हैं।
ਚਾਰਿ ਪਦਾਰਥ ਨਵ ਨਿਧਿ ਪਾਵਹਿ ਬਹੁਰਿ ਨ ਤ੍ਰਿਸਨਾ ਭੁਖੀ ॥੧॥
तू (धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष) चारों पदार्थ और दुनिया के नौ के नौ खजाने हासिल कर सकता है।(जिसके सिमरन से) तुझे माया की प्यास भूख फिर नहीं व्यापेगी (उसका सिमरन हरेक सांस के साथ करता रह)। 1।
ਜਾ ਕੋ ਨਾਮੁ ਲੈਤ ਤੂ ਸੁਖੀ ॥
हे जीव ! जिस परमात्मा का नाम सिमरने से तू सुखी हो सकता है।
ਸਾਸਿ ਸਾਸਿ ਧਿਆਵਹੁ ਠਾਕੁਰ ਕਉ ਮਨ ਤਨ ਜੀਅਰੇ ਮੁਖੀ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
उस पालनहार प्रभू को अपने मन से तन से मुँह से हरेक सांस से सिमरा कर। 1।रहाउ।
ਸਾਂਤਿ ਪਾਵਹਿ ਹੋਵਹਿ ਮਨ ਸੀਤਲ ਅਗਨਿ ਨ ਅੰਤਰਿ ਧੁਖੀ ॥
(हे भाई ! सिमरन की बरकति से) तू शांति हासिल कर लेगा।तू अंतरात्मे शीतलता से भर जाएगा।तेरे अंदर तृष्णा की आग नहीं धधकेगी।
ਗੁਰ ਨਾਨਕ ਕਉ ਪ੍ਰਭੂ ਦਿਖਾਇਆ ਜਲਿ ਥਲਿ ਤ੍ਰਿਭਵਣਿ ਰੁਖੀ ॥੨॥੨॥੩੦॥
हे भाई ! गुरू ने (मुझे) नानक को वह परमात्मा पानी में धरती में वृक्षों में सारे संसार में बसता दिखा दिया है। 2। 2। 30।
ਸੋਰਠਿ ਮਹਲਾ ੫ ॥
सोरठि महला ५ ॥
ਕਾਮ ਕ੍ਰੋਧ ਲੋਭ ਝੂਠ ਨਿੰਦਾ ਇਨ ਤੇ ਆਪਿ ਛਡਾਵਹੁ ॥
हे प्रभू ! काम-क्रोध-लोभ-झूठ-निंदा (आदि) इन (सारे विकारों) से तू मुझे स्वयं छुड़ा ले।
ਇਹ ਭੀਤਰ ਤੇ ਇਨ ਕਉ ਡਾਰਹੁ ਆਪਨ ਨਿਕਟਿ ਬੁਲਾਵਹੁ ॥੧॥
मेरे इस मन में से इन (विकारों) को निकाल दे।मुझे अपने चरणों में जोड़े रख। 1।
ਅਪੁਨੀ ਬਿਧਿ ਆਪਿ ਜਨਾਵਹੁ ॥
हे प्रभू ! अपनी भक्ति की विधि तू मुझे खुद सिखा।
ਹਰਿ ਜਨ ਮੰਗਲ ਗਾਵਹੁ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
मुझे प्रेरणा दे कि कि मैं तेरे संत जनों के साथ मिल के तेरी सिफत सालाह के गीत गाया करूँ। 1।रहाउ।
ਬਿਸਰੁ ਨਾਹੀ ਕਬਹੂ ਹੀਏ ਤੇ ਇਹ ਬਿਧਿ ਮਨ ਮਹਿ ਪਾਵਹੁ ॥
हे प्रभू ! मेरे मन में तू ऐसी शिक्षा डाल दे कि मेरे हृदय में से तू कभी ना बिसरे।
ਗੁਰੁ ਪੂਰਾ ਭੇਟਿਓ ਵਡਭਾਗੀ ਜਨ ਨਾਨਕ ਕਤਹਿ ਨ ਧਾਵਹੁ ॥੨॥੩॥੩੧॥
हे दास नानक ! तुझे बड़े भाग्यों से पूरा गुरू मिल गया है।अब तू किसी और की तरफ ना दौड़ता फिर। 2। 3। 31।
ਸੋਰਠਿ ਮਹਲਾ ੫ ॥
सोरठि महला ५ ॥
ਜਾ ਕੈ ਸਿਮਰਣਿ ਸਭੁ ਕਛੁ ਪਾਈਐ ਬਿਰਥੀ ਘਾਲ ਨ ਜਾਈ ॥
हे भाई ! जिस प्रभू के सिमरन की बरकति से हरेक पदार्थ मिल सकता है।(सिमरन की) की हुई मेहनत व्यर्थ नहीं जाती।
ਤਿਸੁ ਪ੍ਰਭ ਤਿਆਗਿ ਅਵਰ ਕਤ ਰਾਚਹੁ ਜੋ ਸਭ ਮਹਿ ਰਹਿਆ ਸਮਾਈ ॥੧॥
जो प्रभू सारी सृष्टि में मौजूद है उसे छोड़ के किस तरफ मस्त हो रहे हो। 1।
ਹਰਿ ਹਰਿ ਸਿਮਰਹੁ ਸੰਤ ਗੋਪਾਲਾ ॥
हे संत जनो ! सृष्टि के पालनहार को सदा सिमरते रहो।
ਸਾਧਸੰਗਿ ਮਿਲਿ ਨਾਮੁ ਧਿਆਵਹੁ ਪੂਰਨ ਹੋਵੈ ਘਾਲਾ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
साध-संगति में मिल के प्रभू का नाम सिमरा करो।(सिमरन की) मेहनत जरूर सफल हो जाती है। 1।रहाउ।
ਸਾਰਿ ਸਮਾਲੈ ਨਿਤਿ ਪ੍ਰਤਿਪਾਲੈ ਪ੍ਰੇਮ ਸਹਿਤ ਗਲਿ ਲਾਵੈ ॥
हे भाई ! वह परमात्मा (सब जीवों की) सार ले के संभाल करता है।सदैव पालना करता है (सिमरन करने वालों को) प्रेम से अपने गले से लगा लेता है।
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਪ੍ਰਭ ਤੁਮਰੇ ਬਿਸਰਤ ਜਗਤ ਜੀਵਨੁ ਕੈਸੇ ਪਾਵੈ ॥੨॥੪॥੩੨॥
हे नानक ! कह– हे प्रभू ! तुझे विसार के जीव तुझे कैसे मिल सकता है।और।तू ही सारे जीवों की जिंदगी का सहारा है। 2। 4। 32।
ਸੋਰਠਿ ਮਹਲਾ ੫ ॥
सोरठि महला ५ ॥
ਅਬਿਨਾਸੀ ਜੀਅਨ ਕੋ ਦਾਤਾ ਸਿਮਰਤ ਸਭ ਮਲੁ ਖੋਈ ॥
हे भाई ! उस परमात्मा का सिमरन करने से (मन से विकारों की) सारी मैल उतर जाती है जो नाश-रहित है।और।जो सारे जीवों को दातें देने वाला है।
ਗੁਣ ਨਿਧਾਨ ਭਗਤਨ ਕਉ ਬਰਤਨਿ ਬਿਰਲਾ ਪਾਵੈ ਕੋਈ ॥੧॥
वह प्रभू सारे गुणों का खजाना है।भक्तों के वास्ते हर वक्त का सहारा है।पर।कोई विरला मनुष्य ही उसका मिलाप हासिल करता है। 1।
ਮੇਰੇ ਮਨ ਜਪਿ ਗੁਰ ਗੋਪਾਲ ਪ੍ਰਭੁ ਸੋਈ ॥
हे मेरे मन ! उस प्रभू को जपा करो जो सबसे बड़ा है।जो सृष्टि को पालने वाला है।और।
ਜਾ ਕੀ ਸਰਣਿ ਪਇਆਂ ਸੁਖੁ ਪਾਈਐ ਬਾਹੁੜਿ ਦੂਖੁ ਨ ਹੋਈ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
जिसका आसरा लेने से सुख प्राप्त कर लिया जाता है।फिर कभी दुख नहीं व्याप्ता। 1।रहाउ।
ਵਡਭਾਗੀ ਸਾਧਸੰਗੁ ਪਰਾਪਤਿ ਤਿਨ ਭੇਟਤ ਦੁਰਮਤਿ ਖੋਈ ॥
हे भाई ! बड़ी किस्मत से भले मनुष्यों की संगति हासिल होती है।उनको मिलने से खोटी बुद्धि नाश हो जाती है।