Sri Guru Granth Sahib Ji — Ang 602 (hindi)
ਜਨਮ ਜਨਮ ਕੇ ਕਿਲਬਿਖ ਦੁਖ ਕਾਟੇ ਆਪੇ ਮੇਲਿ ਮਿਲਾਈ ॥ ਰਹਾਉ ॥
परमात्मा स्वयं उनके जनम मरण के दुख-पाप काट देता है।और उन्हें अपने चरणों में मिला लेता है।रहाउ।
ਇਹੁ ਕੁਟੰਬੁ ਸਭੁ ਜੀਅ ਕੇ ਬੰਧਨ ਭਾਈ ਭਰਮਿ ਭੁਲਾ ਸੈਂਸਾਰਾ ॥
हे भाई ! (गुरू की रजा में चले बिना) ये (अपना) परिवार भी जीव के लिए निरा मोह का बंधन बन जाता है।(तभी तो) जगत (गुरू से) भटक के गलत रास्ते पर पड़ा रहता है।
ਬਿਨੁ ਗੁਰ ਬੰਧਨ ਟੂਟਹਿ ਨਾਹੀ ਗੁਰਮੁਖਿ ਮੋਖ ਦੁਆਰਾ ॥
गुरू की शरण आए बिना ये बंधन टूटते नहीं।गुरू की शरण पड़ने वाला मनुष्य (मोह के बंधनों से) निजात पाने का राह तलाश लेता है।
ਕਰਮ ਕਰਹਿ ਗੁਰ ਸਬਦੁ ਨ ਪਛਾਣਹਿ ਮਰਿ ਜਨਮਹਿ ਵਾਰੋ ਵਾਰਾ ॥੨॥
जो लोग निरे दुनिया के काम-धंधे ही करते हैं।और गुरू के शबद के साथ सांझ नहीं डालते।वे बार-बार पैदा होते मरते रहते हैं। 2।
ਹਉ ਮੇਰਾ ਜਗੁ ਪਲਚਿ ਰਹਿਆ ਭਾਈ ਕੋਇ ਨ ਕਿਸ ਹੀ ਕੇਰਾ ॥
हे भाई ! ‘मैं बड़ा हूँ’।‘ये धन आदि मेरा है’ - इसमें ही जगत उलझा हुआ है (वैसे) कोई भी किसी का (सदा साथी) नहीं बन सकता।
ਗੁਰਮੁਖਿ ਮਹਲੁ ਪਾਇਨਿ ਗੁਣ ਗਾਵਨਿ ਨਿਜ ਘਰਿ ਹੋਇ ਬਸੇਰਾ ॥
गुरू की शरण पड़ने वाले मनुष्य परमात्मा की सिफत सालाह करते हैं।और परमात्मा की हजूरी प्राप्त किए रहते हैं।उनका (आत्मिक) निवास प्रभू चरणों में हुआ रहता है।
ਐਥੈ ਬੂਝੈ ਸੁ ਆਪੁ ਪਛਾਣੈ ਹਰਿ ਪ੍ਰਭੁ ਹੈ ਤਿਸੁ ਕੇਰਾ ॥੩॥
जो मनुष्य इस जीवन में ही (इस भेत को) समझ लेता है।वह अपने आत्मिक जीवन को पड़तालता रहता है (आत्म चिंतन करता है)।परमात्मा उस मनुष्य का सहायक बना रहता है। 3।
ਸਤਿਗੁਰੂ ਸਦਾ ਦਇਆਲੁ ਹੈ ਭਾਈ ਵਿਣੁ ਭਾਗਾ ਕਿਆ ਪਾਈਐ ॥
हे भाई ! गुरू हर समय ही दयावान रहता है (माया-ग्रसित मनुष्य गुरू की शरण नहीं आता) किस्मत के बिना (गुरू से) क्या मिले।
ਏਕ ਨਦਰਿ ਕਰਿ ਵੇਖੈ ਸਭ ਊਪਰਿ ਜੇਹਾ ਭਾਉ ਤੇਹਾ ਫਲੁ ਪਾਈਐ ॥
गुरू सबको एक प्यार की निगाह से देखता है।(पर हमारी जीवों की) जैसी भावना होती है वैसा ही फल (हमें गुरू से) मिल जाता है।
ਨਾਨਕ ਨਾਮੁ ਵਸੈ ਮਨ ਅੰਤਰਿ ਵਿਚਹੁ ਆਪੁ ਗਵਾਈਐ ॥੪॥੬॥
हे नानक ! (अगर गुरू की शरण पड़ के अपने) अंदर से स्वै भाव दूर कर लें तो परमात्मा का नाम मन में आ बसता है। 4। 6।
ਸੋਰਠਿ ਮਹਲਾ ੩ ਚੌਤੁਕੇ ॥
सोरठि महला ३ चौतुके ॥
ਸਚੀ ਭਗਤਿ ਸਤਿਗੁਰ ਤੇ ਹੋਵੈ ਸਚੀ ਹਿਰਦੈ ਬਾਣੀ ॥
हे भाई ! गुरू के माध्यम से सदा स्थिर प्रभू की भक्ति हो सकती है।सदा स्थिर प्रभू की सिफत सालाह की बाणी हृदय में टिक जाती है।
ਸਤਿਗੁਰੁ ਸੇਵੇ ਸਦਾ ਸੁਖੁ ਪਾਏ ਹਉਮੈ ਸਬਦਿ ਸਮਾਣੀ ॥
जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ता है।वह सदा सुख पाता है।उसका अहंकार गुरू के शबद में ही समाप्त हो जाता है।
ਬਿਨੁ ਗੁਰ ਸਾਚੇ ਭਗਤਿ ਨ ਹੋਵੀ ਹੋਰ ਭੂਲੀ ਫਿਰੈ ਇਆਣੀ ॥
सच्चे गुरू के बिना भक्ति नहीं हो सकती।जो अंजान दुनिया गुरू के दर पर नहीं आती।वह गलत राह पर पड़ी रहती है।
ਮਨਮੁਖਿ ਫਿਰਹਿ ਸਦਾ ਦੁਖੁ ਪਾਵਹਿ ਡੂਬਿ ਮੁਏ ਵਿਣੁ ਪਾਣੀ ॥੧॥
अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्य भटकते फिरते हैं।सदा दुख पाते हैं; वह जैसे।पानी के बिना ही डूब मरते हैं। 1।
ਭਾਈ ਰੇ ਸਦਾ ਰਹਹੁ ਸਰਣਾਈ ॥
हे भाई ! सदा गुरू की शरण टिका रह।
ਆਪਣੀ ਨਦਰਿ ਕਰੇ ਪਤਿ ਰਾਖੈ ਹਰਿ ਨਾਮੋ ਦੇ ਵਡਿਆਈ ॥ ਰਹਾਉ ॥
(जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ा रहता है उस पर गुरू) अपनी मेहर की निगाह करता है; उसकी इज्जत रखता है।उसे प्रभू का नाम बख्शता है (जो एक बहुत बड़ा) सम्मान है।रहाउ।
ਪੂਰੇ ਗੁਰ ਤੇ ਆਪੁ ਪਛਾਤਾ ਸਬਦਿ ਸਚੈ ਵੀਚਾਰਾ ॥
जिस मनुष्य ने पूरे गुरू के द्वारा अपने आत्मिक जीवन को पड़तालना आरम्भ कर दिया।उसने सदा-स्थिर प्रभू की सिफत सालाह के शबद में जुड़ के प्रभू के गुणों को विचारना शुरू कर दिया।
ਹਿਰਦੈ ਜਗਜੀਵਨੁ ਸਦ ਵਸਿਆ ਤਜਿ ਕਾਮੁ ਕ੍ਰੋਧੁ ਅਹੰਕਾਰਾ ॥
काम-क्रोध-अहंकार (आदि विकार) त्यागने से उसके हृदय में जगत का जीवन प्रभू सदा के लिए आ बसा।
ਸਦਾ ਹਜੂਰਿ ਰਵਿਆ ਸਭ ਠਾਈ ਹਿਰਦੈ ਨਾਮੁ ਅਪਾਰਾ ॥
बेअंत प्रभू का नाम उसके दिल में आ बसने के कारण प्रभू उसको सदा अंग-संग बसता दिखाई दे गया।हर जगह मौजूद दिख गया।
ਜੁਗਿ ਜੁਗਿ ਬਾਣੀ ਸਬਦਿ ਪਛਾਣੀ ਨਾਉ ਮੀਠਾ ਮਨਹਿ ਪਿਆਰਾ ॥੨॥
गुरू के शबद के माध्यम से उसे ये पहचान आ गई कि (परमात्मा के मिलाप का वसीला) हरेक युग में गुरू की बाणी है।परमात्मा का नाम उसको अपने मन में प्यारा लगने लग पड़ा। 2।
ਸਤਿਗੁਰੁ ਸੇਵਿ ਜਿਨਿ ਨਾਮੁ ਪਛਾਤਾ ਸਫਲ ਜਨਮੁ ਜਗਿ ਆਇਆ ॥
जिस मनुष्य ने गुरू की शरण पड़ के परमात्मा के नाम सें सांझ डाल ली।जगत में आ के उसकी जिंदगी कामयाब हो गई।
ਹਰਿ ਰਸੁ ਚਾਖਿ ਸਦਾ ਮਨੁ ਤ੍ਰਿਪਤਿਆ ਗੁਣ ਗਾਵੈ ਗੁਣੀ ਅਘਾਇਆ ॥
परमात्मा के नाम का स्वाद चख के उसका मन सदा के लिए तृप्त हो जाता है।वह परमात्मा के गुण गाता रहता है।और गुणों के माध्यम से माया की ओर से तृप्त हो जाता है।
ਕਮਲੁ ਪ੍ਰਗਾਸਿ ਸਦਾ ਰੰਗਿ ਰਾਤਾ ਅਨਹਦ ਸਬਦੁ ਵਜਾਇਆ ॥
उसका हृदय-कमल खिल के सदा प्रभू के प्रेम रंग रंगा रहता है।वह (अपने दिल में) एक-रस गुरू शबद (का बाजा) बजाता रहता है।
ਤਨੁ ਮਨੁ ਨਿਰਮਲੁ ਨਿਰਮਲ ਬਾਣੀ ਸਚੇ ਸਚਿ ਸਮਾਇਆ ॥੩॥
पवित्र बाणी की बरकति से उसका मन पवित्र हो जाता है।उसका शरीर पवित्र हो जाता है।वह सदा स्थिर प्रभू में लीन रहता है। 3।
ਰਾਮ ਨਾਮ ਕੀ ਗਤਿ ਕੋਇ ਨ ਬੂਝੈ ਗੁਰਮਤਿ ਰਿਦੈ ਸਮਾਈ ॥
कोई मनुष्य नहीं समझ सकता कि परमात्मा के नाम से कितनी ऊँची आत्मिक अवस्था बन जाती है (वैसे) गुरू की मति लेने से नाम (मनुष्य के) हृदय में आ बसता है।
ਗੁਰਮੁਖਿ ਹੋਵੈ ਸੁ ਮਗੁ ਪਛਾਣੈ ਹਰਿ ਰਸਿ ਰਸਨ ਰਸਾਈ ॥
जो मनुष्य गुरू के सन्मुख हो जाता है वह (परमात्मा के मिलाप का) रास्ता पहचान लेता है।उसकी जीभ नाम-रस के साथ रस जाती है।
ਜਪੁ ਤਪੁ ਸੰਜਮੁ ਸਭੁ ਗੁਰ ਤੇ ਹੋਵੈ ਹਿਰਦੈ ਨਾਮੁ ਵਸਾਈ ॥
गुरू के माध्यम से परमात्मा का नाम दिल में आ बसता है - यही है जप।यही है तप और यही है संजम।
ਨਾਨਕ ਨਾਮੁ ਸਮਾਲਹਿ ਸੇ ਜਨ ਸੋਹਨਿ ਦਰਿ ਸਾਚੈ ਪਤਿ ਪਾਈ ॥੪॥੭॥
हे नानक ! जो मनुष्य प्रभू का नाम हृदय में बसाए रखते हैं।वे सुंदर जीवन वाले बन जाते हैं।सदा स्थिर प्रभू के दर पर उनको सम्मान मिलता है। 4। 7।
ਸੋਰਠਿ ਮਃ ੩ ਦੁਤੁਕੇ ॥
सोरठि मः ३ दुतुके ॥
ਸਤਿਗੁਰ ਮਿਲਿਐ ਉਲਟੀ ਭਈ ਭਾਈ ਜੀਵਤ ਮਰੈ ਤਾ ਬੂਝ ਪਾਇ ॥
हे भाई ! अगर गुरू मिल जाए।तो मनुष्य आत्मिक जीवन की समझ हासिल कर लेता है।मनुष्य की सुरति विकारों से हट जाती है।दुनिया के कार्य-व्यवहार करता हुआ भी मनुष्य विकारों से अछूता हो जाता है।
ਸੋ ਗੁਰੂ ਸੋ ਸਿਖੁ ਹੈ ਭਾਈ ਜਿਸੁ ਜੋਤੀ ਜੋਤਿ ਮਿਲਾਇ ॥੧॥
हे भाई ! जिस मनुष्य की आत्मा को गुरू परमात्मा में मिला देता है।वह (असल) में सिख बन जाता है। 1।
ਮਨ ਰੇ ਹਰਿ ਹਰਿ ਸੇਤੀ ਲਿਵ ਲਾਇ ॥
हे मन ! सदा परमात्मा के साथ सुरति जोड़े रख।
ਮਨ ਹਰਿ ਜਪਿ ਮੀਠਾ ਲਾਗੈ ਭਾਈ ਗੁਰਮੁਖਿ ਪਾਏ ਹਰਿ ਥਾਇ ॥ ਰਹਾਉ ॥
हे मन ! बार बार जप-जप के परमात्मा प्यारा लगने लग जाता है।हे भाई ! गुरू की शरण पड़ने वाले मनुष्य प्रभू के दरबार में स्थान पा लेते हैं।रहाउ।