Sri Guru Granth Sahib Ji — Ang 583 (hindi)
ਆਪੁ ਛੋਡਿ ਸੇਵਾ ਕਰੀ ਪਿਰੁ ਸਚੜਾ ਮਿਲੈ ਸਹਜਿ ਸੁਭਾਏ ॥
स्वै भाव त्याग के मैं उनकी सेवा करती हूँ।हे सखी ! सदा कायम रहने वाला प्रभू-पति आत्मिक अडोलता में टिकने से प्रेम में जुड़ने से ही मिलता है।
ਪਿਰੁ ਸਚਾ ਮਿਲੈ ਆਏ ਸਾਚੁ ਕਮਾਏ ਸਾਚਿ ਸਬਦਿ ਧਨ ਰਾਤੀ ॥
सदा-स्थिर प्रभू आ के उस जीव-स्त्री को मिल जाता है।जो सदा-स्थिर हरी-नाम सिमरन की कमाई करती है।जो सदा स्थिर हरी-नाम सिमरन में जुड़ी रहती है।
ਕਦੇ ਨ ਰਾਂਡ ਸਦਾ ਸੋਹਾਗਣਿ ਅੰਤਰਿ ਸਹਜ ਸਮਾਧੀ ॥
जो गुरू के शबद में रंगी रहती है।वह जीव-स्त्री सदा सुहाग वाली रहती है।वह कभी पति-विहीन नहीं होती।उसके अंदर आत्मिक अडोलता की समाधि लगी रहती है।
ਪਿਰੁ ਰਹਿਆ ਭਰਪੂਰੇ ਵੇਖੁ ਹਦੂਰੇ ਰੰਗੁ ਮਾਣੇ ਸਹਜਿ ਸੁਭਾਏ ॥
हे सखी ! प्रभू-पति हर जगह मौजूद है।उसे तू अपने अंग-संग बसता देख।आत्मिक अडोलता में टिक के।प्रेम में जुड़ के उसके मिलाप का आनंद ले।
ਜਿਨੀ ਆਪਣਾ ਕੰਤੁ ਪਛਾਣਿਆ ਹਉ ਤਿਨ ਪੂਛਉ ਸੰਤਾ ਜਾਏ ॥੩॥
हे सखी ! जिन संत-जनों ने अपने प्रभू-पति के साथ सांझ डाल ली है।मैं जा के उनसे पूछती हूँ (कि उसका मिलाप किस तरह हो सकता है। )। 3।
ਪਿਰਹੁ ਵਿਛੁੰਨੀਆ ਭੀ ਮਿਲਹ ਜੇ ਸਤਿਗੁਰ ਲਾਗਹ ਸਾਚੇ ਪਾਏ ॥
हे सखी ! हम जीव-सि्त्रयां प्रभू-पति से विछुड़ी हुई फिर भी उसको मिल सकती हैं अगर हम सच्चे सतिगुरू के चरणों में लगें।
ਸਤਿਗੁਰੁ ਸਦਾ ਦਇਆਲੁ ਹੈ ਅਵਗੁਣ ਸਬਦਿ ਜਲਾਏ ॥
हे सखी ! गुरू सदा दयावान है।वह (शरण पड़े के) अवगुण (अपने) शबद में (जोड़ के) जला देता है।
ਅਉਗੁਣ ਸਬਦਿ ਜਲਾਏ ਦੂਜਾ ਭਾਉ ਗਵਾਏ ਸਚੇ ਹੀ ਸਚਿ ਰਾਤੀ ॥
(हे सखी ! गुरू की शरण पड़ने वाले के अवगुण शबद द्वारा जला देता है।माया का प्यार दूर कर देता है)।(गुरू के चरणों में लगी हुई जीव-स्त्री) सदा-स्थिर रहने वाले परमात्मा (की याद) में ही रंगी रहती है।
ਸਚੈ ਸਬਦਿ ਸਦਾ ਸੁਖੁ ਪਾਇਆ ਹਉਮੈ ਗਈ ਭਰਾਤੀ ॥
सदा-स्थिर प्रभू की सिफत सालाह के शबद में जुड़ के वह सदा आनंद लेती है।उसका अहंकार उसकी भटकना दूर हो जाती है।
ਪਿਰੁ ਨਿਰਮਾਇਲੁ ਸਦਾ ਸੁਖਦਾਤਾ ਨਾਨਕ ਸਬਦਿ ਮਿਲਾਏ ॥
हे नानक ! प्रभू-पति पवित्र करने वाला है।सदा सुख देने वाला है।(अपने गुरू) शबद के माध्यम से उससे मिला देता है।
ਪਿਰਹੁ ਵਿਛੁੰਨੀਆ ਭੀ ਮਿਲਹ ਜੇ ਸਤਿਗੁਰ ਲਾਗਹ ਸਾਚੇ ਪਾਏ ॥੪॥੧॥
हे सखी ! हम जीव-सि्त्रयां प्रभू-पति से विछुड़ी हुई फिर भी उसको मिल सकती हैं।यदि हम सच्चे सतिगुरू के चरण लगें। 4। 1।
ਵਡਹੰਸੁ ਮਹਲਾ ੩ ॥
वडहंसु महला ३ ॥
ਸੁਣਿਅਹੁ ਕੰਤ ਮਹੇਲੀਹੋ ਪਿਰੁ ਸੇਵਿਹੁ ਸਬਦਿ ਵੀਚਾਰਿ ॥
हे प्रभू-पति की जीव सि्त्रयो ! (मेरी बात) सुन लेनी (वह ये है कि) गुरू शबद के द्वारा प्रभू के गुणों पर विचार करके प्रभू-पति की सेवा-भक्ति किया करो।
ਅਵਗਣਵੰਤੀ ਪਿਰੁ ਨ ਜਾਣਈ ਮੁਠੀ ਰੋਵੈ ਕੰਤ ਵਿਸਾਰਿ ॥
जो जीव-स्त्री प्रभू-पति के साथ गहरी सांझ नहीं डालती।वह अवगुणों से भरी रहती है।प्रभू-पति को भुला के वह आत्मिक जीवन लुटा बैठती है।और।दुखी होती है।पर।
ਰੋਵੈ ਕੰਤ ਸੰਮਾਲਿ ਸਦਾ ਗੁਣ ਸਾਰਿ ਨਾ ਪਿਰੁ ਮਰੈ ਨ ਜਾਏ ॥
जो जीव-स्त्री पति को हृदय में बसा के प्रभू के गुण सदा याद कर कर के (प्रभू के दर पर सदा) आरजू करती रहती है।उसका पति (-प्रभू) कभी मरता नहीं।उसे कभी छोड़ के नहीं जाता।
ਗੁਰਮੁਖਿ ਜਾਤਾ ਸਬਦਿ ਪਛਾਤਾ ਸਾਚੈ ਪ੍ਰੇਮਿ ਸਮਾਏ ॥
जो जीव-स्त्री गुरू की शरण पड़ कर प्रभू के साथ गहरी सांझ बना लेती है।गुरू के शबद के माध्यम से प्रभू के साथ जान-पहचान बनाती है।वह सदा कायम रहने वाले प्रभू के प्रेम में लीन रहती है।
ਜਿਨਿ ਅਪਣਾ ਪਿਰੁ ਨਹੀ ਜਾਤਾ ਕਰਮ ਬਿਧਾਤਾ ਕੂੜਿ ਮੁਠੀ ਕੂੜਿਆਰੇ ॥
जिस जीव-स्त्री ने अपने उस प्रभू-पति के साथ सांझ नहीं बनाई जो सब जीवों को उनके कर्मों के अनुसार पैदा करने वाला है।
ਸੁਣਿਅਹੁ ਕੰਤ ਮਹੇਲੀਹੋ ਪਿਰੁ ਸੇਵਿਹੁ ਸਬਦਿ ਵੀਚਾਰੇ ॥੧॥
उस झूठ की बंजारन को माया का मोह ठॅगे रखता है (इस वास्ते) हे प्रभू-पति की जीव-सि्त्रयो ! (मेरी विनती) सुन लेनी- गुरू शबद के द्वारा प्रभू के गुणों की विचार करके प्रभू की सेवा-भक्ति किया करो। 1।
ਸਭੁ ਜਗੁ ਆਪਿ ਉਪਾਇਓਨੁ ਆਵਣੁ ਜਾਣੁ ਸੰਸਾਰਾ ॥
हे भाई ! सारा जगत और जगत का जनम मरण परमात्मा ने खुद बनाया है।माया का मोह (पैदा करके इस मोह में जगत को परमात्मा ने) आप ही भुलाया हुआ है (तभी तो) बार बार पैदा होता मरता रहता है।
ਮਾਇਆ ਮੋਹੁ ਖੁਆਇਅਨੁ ਮਰਿ ਜੰਮੈ ਵਾਰੋ ਵਾਰਾ ॥
(माया के मोह में फस के जीव) बार बार पैदा होता मरता रहता है।
ਮਰਿ ਜੰਮੈ ਵਾਰੋ ਵਾਰਾ ਵਧਹਿ ਬਿਕਾਰਾ ਗਿਆਨ ਵਿਹੂਣੀ ਮੂਠੀ ॥
(इसमें) विकार बढ़ते रहते हैं।आत्मिक जीवन की सूझ से वंचित दुनिया आत्मिक जीवन की राशि-पूँजी लुटा बैठती है।
ਬਿਨੁ ਸਬਦੈ ਪਿਰੁ ਨ ਪਾਇਓ ਜਨਮੁ ਗਵਾਇਓ ਰੋਵੈ ਅਵਗੁਣਿਆਰੀ ਝੂਠੀ ॥
गुरू के शबद के बिना जीव-स्त्री प्रभू-पति का मिलाप हासिल नहीं कर सकती।अपना जन्म व्यर्थ गवा लेती है; अवगुणों से भरी हुई।और झूठे मोह में फसी हुई दुखी होती रहती है। पर।
ਪਿਰੁ ਜਗਜੀਵਨੁ ਕਿਸ ਨੋ ਰੋਈਐ ਰੋਵੈ ਕੰਤੁ ਵਿਸਾਰੇ ॥
हे भाई ! प्रभू खुद ही जगत का जीवन (-आधार) है।किसी की आत्मिक मौत मरने पर रोना भी क्या हुआ।(जीव-स्त्री) प्रभू-पति को भुला के दुखी होती रहती है।
ਸਭੁ ਜਗੁ ਆਪਿ ਉਪਾਇਓਨੁ ਆਵਣੁ ਜਾਣੁ ਸੰਸਾਰੇ ॥੨॥
हे भाई ! सारे जगत को प्रभू ने खुद ही पैदा किया है।जगत का जनम-मरण भी प्रभू ने खुद ही बनाया है। 2।
ਸੋ ਪਿਰੁ ਸਚਾ ਸਦ ਹੀ ਸਾਚਾ ਹੈ ਨਾ ਓਹੁ ਮਰੈ ਨ ਜਾਏ ॥
हे भाई ! वह प्रभू-पति सदा जीवित है।सदा ही जीता है।वह ना मरता है ना पैदा होता है।
ਭੂਲੀ ਫਿਰੈ ਧਨ ਇਆਣੀਆ ਰੰਡ ਬੈਠੀ ਦੂਜੈ ਭਾਏ ॥
अंजान जीव-स्त्री उससे वंचित हुई फिरती है।माया के मोह में फंस के प्रभू से विछुड़ी रहती है।औरों के प्यार के कारण प्रभू से विछुड़ी रहती है।
ਰੰਡ ਬੈਠੀ ਦੂਜੈ ਭਾਏ ਮਾਇਆ ਮੋਹਿ ਦੁਖੁ ਪਾਏ ਆਵ ਘਟੈ ਤਨੁ ਛੀਜੈ ॥
माया के मोह में फंस के दुख सहती है।(इस मोह में इसकी) उम्र गुजरती जाती है।और।शरीर कमजोर होता जाता है।
ਜੋ ਕਿਛੁ ਆਇਆ ਸਭੁ ਕਿਛੁ ਜਾਸੀ ਦੁਖੁ ਲਾਗਾ ਭਾਇ ਦੂਜੈ ॥
(जगत का नियम तो है ही ये कि) जो कुछ यहाँ पैदा हुआ है वह सब कुछ नाश हो जाता है।पर माया के मोह के कारण (इस अॅटल नियम को भुला के जीव को किसी के मरने पर) दुख होता है।
ਜਮਕਾਲੁ ਨ ਸੂਝੈ ਮਾਇਆ ਜਗੁ ਲੂਝੈ ਲਬਿ ਲੋਭਿ ਚਿਤੁ ਲਾਏ ॥
जगत (सदैव) माया की खातिर लड़ता-झगड़ता है।उसको (सिर पर) मौत नहीं सूझती।लब में लोभ में चिक्त लगाए रखता है।
ਸੋ ਪਿਰੁ ਸਾਚਾ ਸਦ ਹੀ ਸਾਚਾ ਨਾ ਓਹੁ ਮਰੈ ਨ ਜਾਏ ॥੩॥
हे भाई ! वह प्रभू-पति सदा जीता है।सदा ही जीवित है।वह ना मरता है ना पैदा होता है। 3।
ਇਕਿ ਰੋਵਹਿ ਪਿਰਹਿ ਵਿਛੁੰਨੀਆ ਅੰਧੀ ਨਾ ਜਾਣੈ ਪਿਰੁ ਨਾਲੇ ॥
कई जीव-सि्त्रयां ऐसी हैं जो प्रभू-पति से विछुड़ के दुखी रहती हैं।माया के मोह में अंधी हुई जीव स्त्री ये नहीं समझती कि प्रभू-पति हर वक्त साथ बसता है।
ਗੁਰ ਪਰਸਾਦੀ ਸਾਚਾ ਪਿਰੁ ਮਿਲੈ ਅੰਤਰਿ ਸਦਾ ਸਮਾਲੇ ॥
गुरू की कृपा से जो जीव स्त्री प्रभू-पति को सदा अपने हृदय में बसाए रखती है।उसे सदा जीता-जागता प्रभू मिल जाता है।
ਪਿਰੁ ਅੰਤਰਿ ਸਮਾਲੇ ਸਦਾ ਹੈ ਨਾਲੇ ਮਨਮੁਖਿ ਜਾਤਾ ਦੂਰੇ ॥
वह जीव-स्त्री सदा प्रभू-पति को अपने दिल में बसाए रखती है उसको वह सदा अंग-संग दिखाई देता है।पर।अपने मन के पीछे चलने वाली प्रभू को दूर बसता समझती है।
ਇਹੁ ਤਨੁ ਰੁਲੈ ਰੁਲਾਇਆ ਕਾਮਿ ਨ ਆਇਆ ਜਿਨਿ ਖਸਮੁ ਨ ਜਾਤਾ ਹਦੂਰੇ ॥
हे भाई ! जिस जीव-स्त्री ने प्रभू-पति को अंग-संग बसता नहीं समझा।उसका ये शरीर (विकारों में) बेकार होता रहता है।और किसी काम नहीं आता।