Sri Guru Granth Sahib Ji — Ang 581 (hindi)
ਹਉ ਮੁਠੜੀ ਧੰਧੈ ਧਾਵਣੀਆ ਪਿਰਿ ਛੋਡਿਅੜੀ ਵਿਧਣਕਾਰੇ ॥
जब तक मैं माया की आहर में माया की दौड़-भाग में ठॅगी जा रही हूँ।तब तक पति-विहीन स्त्री वाले कर्मों के कारण पति-प्रभू ने मुझे त्यागा हुआ है।
ਘਰਿ ਘਰਿ ਕੰਤੁ ਮਹੇਲੀਆ ਰੂੜੈ ਹੇਤਿ ਪਿਆਰੇ ॥
पति-प्रभू तो हरेक जीव-स्त्री के हृदय में बस रहा है।उसकी असल सि्त्रयां वही हैं जो उस सुंदर प्रभू के प्यार में प्रेम में मगन रहती हैं।
ਮੈ ਪਿਰੁ ਸਚੁ ਸਾਲਾਹਣਾ ਹਉ ਰਹਸਿਅੜੀ ਨਾਮਿ ਭਤਾਰੇ ॥੭॥
जितना समय मैं सदा स्थिर प्रभू-पति की सिफत सालाह करती हूँ उस पति के नाम में जुड़े रहने के कारण मेरा तन-मन खिला रहता है। 7।
ਗੁਰਿ ਮਿਲਿਐ ਵੇਸੁ ਪਲਟਿਆ ਸਾ ਧਨ ਸਚੁ ਸੀਗਾਰੋ ॥
अगर गुरू मिल जाए तो जीव-स्त्री की काया ही पलट जाती है।जीव-स्त्री सदा-स्थिर प्रभू के नाम को अपना श्रृंगार बना लेती है।
ਆਵਹੁ ਮਿਲਹੁ ਸਹੇਲੀਹੋ ਸਿਮਰਹੁ ਸਿਰਜਣਹਾਰੋ ॥
हे सहेलियो ! (हे सत्संगियो !) आओ।मिल के बैठें।मिल जुल के सृजनहार का सिमरन करो।
ਬਈਅਰਿ ਨਾਮਿ ਸੋੁਹਾਗਣੀ ਸਚੁ ਸਵਾਰਣਹਾਰੋ ॥
जो जीव-स्त्री प्रभू के नाम में जुड़ती है वह सुहाग-भाग वाली हो जाती है।सदा स्थिर प्रभू उसके जीवन को खूबसूरत बना देता है।
ਗਾਵਹੁ ਗੀਤੁ ਨ ਬਿਰਹੜਾ ਨਾਨਕ ਬ੍ਰਹਮ ਬੀਚਾਰੋ ॥੮॥੩॥
हे नानक ! (कह– हे सहेलियो !) प्रभू-पति की सिफत सालाह के गीत गाओ।प्रभू के गुणों को अपने हृदय में बसाओ।फिर कभी उससे विछोड़ा नहीं होगा (दुनिया वाले विछोड़े तो एक अटल नियम है।ये तो होते ही रहने हैं)। 8। 3।
ਵਡਹੰਸੁ ਮਹਲਾ ੧ ॥
वडहंसु महला १ ॥
ਜਿਨਿ ਜਗੁ ਸਿਰਜਿ ਸਮਾਇਆ ਸੋ ਸਾਹਿਬੁ ਕੁਦਰਤਿ ਜਾਣੋਵਾ ॥
( हे भाई !) जिस परमात्मा ने जगत पैदा करके इसको अपने आप में लीन करने की ताकत भी अपने पास रखी है उस मालिक को इस कुदरति में बसता समझ।
ਸਚੜਾ ਦੂਰਿ ਨ ਭਾਲੀਐ ਘਟਿ ਘਟਿ ਸਬਦੁ ਪਛਾਣੋਵਾ ॥
(हे भाई !) सदा-स्थिर रहने वाले परमात्मा को (रची कुदरत से) दूर (किसी और जगह) तलाशने का यत्न नहीं करना चाहिए।हरेक शरीर में उसी का हुकम बरतता पहचान।
ਸਚੁ ਸਬਦੁ ਪਛਾਣਹੁ ਦੂਰਿ ਨ ਜਾਣਹੁ ਜਿਨਿ ਏਹ ਰਚਨਾ ਰਾਚੀ ॥
(हे भाई !) जिस परमात्मा ने ये रचना रची है उसको इससे दूर (कहीं अलग) ना समझो।(हरेक शरीर में) उसका अटॅल हुकम बरतता पहचानो।
ਨਾਮੁ ਧਿਆਏ ਤਾ ਸੁਖੁ ਪਾਏ ਬਿਨੁ ਨਾਵੈ ਪਿੜ ਕਾਚੀ ॥
जब मनुष्य परमात्मा का नाम सिमरता है तब आत्मिक आनंद पाता है (और विकारों का जोर भी इस पर नहीं पड़ सकता।पर) प्रभू के नाम के बिना दुनिया विकारों से मुकाबला जीतने में असमर्थ हो जाती है।
ਜਿਨਿ ਥਾਪੀ ਬਿਧਿ ਜਾਣੈ ਸੋਈ ਕਿਆ ਕੋ ਕਹੈ ਵਖਾਣੋ ॥
जिस परमात्मा ने रचना रची है वही इसकी रक्षा की विधि भी जानता है।कोई जीव (उसके उलट) कोई (और) उपदेश नहीं कर सकता।
ਜਿਨਿ ਜਗੁ ਥਾਪਿ ਵਤਾਇਆ ਜਾਲੋੁ ਸੋ ਸਾਹਿਬੁ ਪਰਵਾਣੋ ॥੧॥
जिस प्रभू ने जगत पैदा करके (इसके ऊपर माया के मोह का) जाल बिछा रखा है वही जाना-माना मालिक है (और वही इस जाल में से जीवों को बचाने के समर्थ है)। 1।
ਬਾਬਾ ਆਇਆ ਹੈ ਉਠਿ ਚਲਣਾ ਅਧ ਪੰਧੈ ਹੈ ਸੰਸਾਰੋਵਾ ॥
हे भाई ! जो भी जीव (जगत में जन्म ले के) आया है उसने जरूर (यहाँ से) चले जाना है (जीव आया है यहाँ प्रभू का नाम-धन का व्यापार करने।नाम के बिना) जगत जन्म-मरण के चक्कर में पड़ा रहता है।
ਸਿਰਿ ਸਿਰਿ ਸਚੜੈ ਲਿਖਿਆ ਦੁਖੁ ਸੁਖੁ ਪੁਰਬਿ ਵੀਚਾਰੋਵਾ ॥
सदा-स्थिर रहने वाले परमात्मा ने हरेक जीव के सिर पर उसके पूर्बले समय के किए कर्मों के विचार अनुसार दुख और सुख (भोगने) के लेख लिख दिए हैं।
ਦੁਖੁ ਸੁਖੁ ਦੀਆ ਜੇਹਾ ਕੀਆ ਸੋ ਨਿਬਹੈ ਜੀਅ ਨਾਲੇ ॥
जैसा कर्म जीव ने किया वैसा ही सुख और दुख उसको परमात्मा ने दे दिया है।हरेक जीव के किए कर्मों का समूह उसके साथ ही निभता है।(पर जीवों के भी क्या वश।)
ਜੇਹੇ ਕਰਮ ਕਰਾਏ ਕਰਤਾ ਦੂਜੀ ਕਾਰ ਨ ਭਾਲੇ ॥
ईश्वर स्वयं ही जैसे कर्म जीवों से करवाता है (वैसे ही कर्म जीव करते हैं) कोई भी जीव (प्रभू की मर्जी से बाहर जा के) कोई और कर्म नहीं कर सकता।
ਆਪਿ ਨਿਰਾਲਮੁ ਧੰਧੈ ਬਾਧੀ ਕਰਿ ਹੁਕਮੁ ਛਡਾਵਣਹਾਰੋ ॥
परमात्मा खुद तो (कर्मों से) निर्लिप है।दुनिया (अपने-अपने किए कर्मों के मुताबिक माया के) आहर में बँधी हुई है।(माया के इन बँधनों से भी) परमात्मा खुद ही हुकम करके छुड़वाने के समर्थ है।
ਅਜੁ ਕਲਿ ਕਰਦਿਆ ਕਾਲੁ ਬਿਆਪੈ ਦੂਜੈ ਭਾਇ ਵਿਕਾਰੋ ॥੨॥
(जीव माया के प्रभाव में नाम-सिमरन से आलस करता रहता है) आज सिमरन करते हैं।सवेरे करेंगे (यही टाल-मटोल) करते मौत आ दबोचती है।(प्रभू को बिसार के) और ही मोह में फंसा हुआ व्यर्थ के काम करता रहता है। 2।
ਜਮ ਮਾਰਗ ਪੰਥੁ ਨ ਸੁਝਈ ਉਝੜੁ ਅੰਧ ਗੁਬਾਰੋਵਾ ॥
(सारी उम्र माया की दौड़-भाग में रह के परमात्मा का नाम भुलाने के कारण आखिर मौत आने पर) जीव यम वाला रास्ता पकड़ता है (जो इसके लिए) उजाड़ ही उजाड़ है जहाँ इसे घोर अंधकार प्रतीत होता है।
ਨਾ ਜਲੁ ਲੇਫ ਤੁਲਾਈਆ ਨਾ ਭੋਜਨ ਪਰਕਾਰੋਵਾ ॥
जीव को कुछ नहीं सूझता (कि इस बिपता में से कैसे निकलूँ)।(सारी उम्र दुनिया के पदार्थ एकत्र करता रहा।पर यम के राह पर पड़ के) ना पानी।ना लेफ।ना तुलाई।ना किसी किस्म का भोजन।
ਭੋਜਨ ਭਾਉ ਨ ਠੰਢਾ ਪਾਣੀ ਨਾ ਕਾਪੜੁ ਸੀਗਾਰੋ ॥
ना ठंडा पानी।ना ही सुंदर कपड़ा (ये सारे पदार्थ मौत ने छीन लिए।दुनिया में ही धरे रह गए)।
ਗਲਿ ਸੰਗਲੁ ਸਿਰਿ ਮਾਰੇ ਊਭੌ ਨਾ ਦੀਸੈ ਘਰ ਬਾਰੋ ॥
जमराज जीव के गले में (माया के मोह का) संगल डाल के इसके सिर पर खड़ा चोटें मारता है।(इन चोटों से बचने के लिए) इसको कोई आसरा नहीं दिखाई देता।
ਇਬ ਕੇ ਰਾਹੇ ਜੰਮਨਿ ਨਾਹੀ ਪਛੁਤਾਣੇ ਸਿਰਿ ਭਾਰੋ ॥
(जब जम की चोटें पड़ रही होती हैं) उस वक्त बीजे हुए (सिमरन सेवा आदि के बीज) उग नहीं सकते।तब पछताता है।किए पापों का भार सिर पर पड़ा है (जो उतर नहीं सकता)।
ਬਿਨੁ ਸਾਚੇ ਕੋ ਬੇਲੀ ਨਾਹੀ ਸਾਚਾ ਏਹੁ ਬੀਚਾਰੋ ॥੩॥
हे भाई ! इस अॅटल सच्चाई को याद रखो कि सदा-स्थिर रहने वाले परमात्मा के बिना और कोई साथी नहीं बनता। 3।
ਬਾਬਾ ਰੋਵਹਿ ਰਵਹਿ ਸੁ ਜਾਣੀਅਹਿ ਮਿਲਿ ਰੋਵੈ ਗੁਣ ਸਾਰੇਵਾ ॥
हे भाई ! जो मनुष्य परमात्मा का नाम सिमरते हैं और वैरागवान होते हैं वह (लोक-परलोक में) आदर पाते हैं।जो भी जीव साध-संगति में मिल के प्रभू के गुण हृदय में बसाता है और वैरागवान होता है (वह आदर पाता है)।
ਰੋਵੈ ਮਾਇਆ ਮੁਠੜੀ ਧੰਧੜਾ ਰੋਵਣਹਾਰੇਵਾ ॥
पर जिस जीव-स्त्री को माया के मोह ने लूट लिया है वही दुखी होती है।(मोह में फसे हुए जीव सारी उम्र) धंधा ही पिटते हें और दुखी होते हैं।
ਧੰਧਾ ਰੋਵੈ ਮੈਲੁ ਨ ਧੋਵੈ ਸੁਪਨੰਤਰੁ ਸੰਸਾਰੋ ॥
जो जीव (सारी उम्र) माया का आहर करता ही दुखी रहता है।और कभी (अपने मन की) माया की मैल नहीं धोता।उसके वास्ते संसार (भाव।सारी ही उम्र) एक सपना ही बना रहा (भाव उसने यहाँ कमाया कुछ भी नहीं।जैसे मनुष्य सपने में दौड़-भाग तो करता है पर जाग आने पर उसके पल्ले कुछ भी नहीं रहता)।
ਜਿਉ ਬਾਜੀਗਰੁ ਭਰਮੈ ਭੂਲੈ ਝੂਠਿ ਮੁਠੀ ਅਹੰਕਾਰੋ ॥
जैसे बाजीगर (तमाशा दिखाता है।देखने वाला दर्शक उसके तमाशे में खो जाता है।वैसे ही) झूठे मोह में ठॅगी हुई (खोई हुई) जीव स्त्री भटकन में पड़ कर गलत रास्ते पड़ी रहती है।
ਆਪੇ ਮਾਰਗਿ ਪਾਵਣਹਾਰਾ ਆਪੇ ਕਰਮ ਕਮਾਏ ॥
(झूठी माया का) मान करती है।(पर।जीवों के भी कया वश। ) परमात्मा स्वयं ही (जीवों को) सही राह पर डालने वाला है।स्वयं ही (जीवों में व्याप के) कर्म कर रहा है।
ਨਾਮਿ ਰਤੇ ਗੁਰਿ ਪੂਰੈ ਰਾਖੇ ਨਾਨਕ ਸਹਜਿ ਸੁਭਾਏ ॥੪॥੪॥
हे नानक ! जो लोग परमात्मा के नाम-रंग में रंगे रहते हैं।उन्हें पूरे गुरू ने (माया के मोह से) बचा लिया है।वे आत्मिक अडोलता में टिके रहते हैं।वे प्रभू के प्रेम में जुड़े रहते हैं। 4। 4।
ਵਡਹੰਸੁ ਮਹਲਾ ੧ ॥
वडहंसु महला १ ॥
ਬਾਬਾ ਆਇਆ ਹੈ ਉਠਿ ਚਲਣਾ ਇਹੁ ਜਗੁ ਝੂਠੁ ਪਸਾਰੋਵਾ ॥
हे भाई ! (जगत में जो भी जीव जनम ले के) आया है उसने (आखिर यहाँ से) कूच कर जाना है (किसी ने यहाँ सदा बैठे नहीं रहना) ये जगत है ही नाशवंत पसारा।
ਸਚਾ ਘਰੁ ਸਚੜੈ ਸੇਵੀਐ ਸਚੁ ਖਰਾ ਸਚਿਆਰੋਵਾ ॥
यदि सदा स्थिर रहने वाले परमात्मा का सिमरन करें तो सदा-स्थिर रहने वाला ठिकाना मिल जाता है।जो मनुष्य सदा स्थिर प्रभू को सिमरता है वह पवित्र जीवन वाला हो जाता है।वह सदा-स्थिर प्रभू के प्रकाश के योग्य बन जाता है।
ਕੂੜਿ ਲਬਿ ਜਾਂ ਥਾਇ ਨ ਪਾਸੀ ਅਗੈ ਲਹੈ ਨ ਠਾਓ ॥
जो मनुष्य माया के मोह में अथवा माया के लालच में फसा रहता है वह परमात्मा की दरगाह में कबूल नहीं होता।उसको प्रभू की हजूरी में जगह नहीं मिलती।
ਅੰਤਰਿ ਆਉ ਨ ਬੈਸਹੁ ਕਹੀਐ ਜਿਉ ਸੁੰਞੈ ਘਰਿ ਕਾਓ ॥
जैसे सूने घर में गए कौए को (किसी ने रोटी की गिराही आदि नहीं डालनी) (वैसे ही माया के मोह में फंसे जीव को प्रभू की हजूरी में) किसी ने ये नहीं कहना - आओ जी।अंदर आ जाओ बैठ जाओ।
ਜੰਮਣੁ ਮਰਣੁ ਵਡਾ ਵੇਛੋੜਾ ਬਿਨਸੈ ਜਗੁ ਸਬਾਏ ॥
उस मनुष्य को जनम-मरन के चक्र भुगतने पड़ जाते हैं।उसको (इस चक्कर के कारण प्रभू-चरनों से) लंबा विछोड़ा हो जाता है।(माया के मोह में फस के) जगत आत्मिक मौत सहेड़ रहा है (जो भी मोह में फंसते हैं वे) सारे (आत्मिक मौत मरते हैं)।
ਲਬਿ ਧੰਧੈ ਮਾਇਆ ਜਗਤੁ ਭੁਲਾਇਆ ਕਾਲੁ ਖੜਾ ਰੂਆਏ ॥੧॥
लालच के कारण माया के ही आहर में पड़ा हुआ जगत सही जीवन राह से टूटा रहता है।इस सिर पर खड़ा काल इसे दुखी करता रहता है। 1।