Sri Guru Granth Sahib Ji — Ang 558 (hindi)
ਨਾ ਮਨੀਆਰੁ ਨ ਚੂੜੀਆ ਨਾ ਸੇ ਵੰਗੁੜੀਆਹਾ ॥
पलंघ की बाहियां ही तोड़ डाल और अपनी सजाई हुई बाँहें ही तोड़ डाल क्योंकि ना उन बाँहों को सजाने वाला मनियार ही तेरा कुछ सवार सका।
ਜੋ ਸਹ ਕੰਠਿ ਨ ਲਗੀਆ ਜਲਨੁ ਸਿ ਬਾਹੜੀਆਹਾ ॥
ना ही उसकी दी हुई चूड़ियाँ और कंगन किसी काम आए।जल जाएं वे (सजी हुई) बाँहें जो पति के गले से ना लग सकीं।(भाव।अगर जीव-स्त्री सारी उम्र धार्मिक भेष करने में ही गुजार दे।इसको धर्मोपदेश देने वाला भी अगर बाहरी भेष की तरफ ही उसे प्रेरित करता रहे।तो ये सारे उद्यम व्यर्थ चले गए।क्योंकि।धार्मिक वेश-भूसा से ईश्वर को प्रसन्न नहीं किया जा सकता।उससे तो सिर्फ आत्मिक मिलाप ही हो सकता है)।
ਸਭਿ ਸਹੀਆ ਸਹੁ ਰਾਵਣਿ ਗਈਆ ਹਉ ਦਾਧੀ ਕੈ ਦਰਿ ਜਾਵਾ ॥
(प्रभू-चरणों में जुड़ने वाली) सारी सहेलियाँ (तो) प्रभू पति को प्रसन्न करने के यतन कर रही हैं (पर।मैं जो निरे दिखावे के ही धर्म-वेष करती रही) मैं कर्म जली किसके दर पर जाऊँ।
ਅੰਮਾਲੀ ਹਉ ਖਰੀ ਸੁਚਜੀ ਤੈ ਸਹ ਏਕਿ ਨ ਭਾਵਾ ॥
हे सखी ! मैं (इन धर्म-भेषों पर ही टेक रख के) अपनी ओर से तो बड़ी अच्छी करतूत वाली बनी बैठी हूँ।पर।(हे) प्रभू पति ! किसी एक भी गुण के कारण मैं तुझे पसंद नहीं आ रही।
ਮਾਠਿ ਗੁੰਦਾੲਂੀ ਪਟੀਆ ਭਰੀਐ ਮਾਗ ਸੰਧੂਰੇ ॥
मैं सवार-सवार के चोटियाँ गूँदती हूँ।मेरी पटियों के चीर में सिंदूर भी भरा जाता है।
ਅਗੈ ਗਈ ਨ ਮੰਨੀਆ ਮਰਉ ਵਿਸੂਰਿ ਵਿਸੂਰੇ ॥
पर तेरी हजूरी में मैं फिर भी प्रवान नहीं हो रही।(इस वास्ते) झुर झुर के मर रही हूँ।
ਮੈ ਰੋਵੰਦੀ ਸਭੁ ਜਗੁ ਰੁਨਾ ਰੁੰਨੜੇ ਵਣਹੁ ਪੰਖੇਰੂ ॥
(प्रभू-पति से विछुड़ के) मैं इतनी दुखी हो रही हूँ (कि) सारा जगत मेरे पर तरस कर रहा है।जंगल के पक्षी भी (मेरी दुखी हालत पर) तरस कर रहे हैं।
ਇਕੁ ਨ ਰੁਨਾ ਮੇਰੇ ਤਨ ਕਾ ਬਿਰਹਾ ਜਿਨਿ ਹਉ ਪਿਰਹੁ ਵਿਛੋੜੀ ॥
सिर्फ ये मेरे अंदर का विछोड़ा ही है जो तरस नहीं करता (जो मेरी खलासी नहीं करता)।इसने मुझे प्रभू-पति से विछोड़ा हुआ है।
ਸੁਪਨੈ ਆਇਆ ਭੀ ਗਇਆ ਮੈ ਜਲੁ ਭਰਿਆ ਰੋਇ ॥
(हे पति !) मुझे तू सपने में मिला (सपना खत्म हुआ।और तू) फिर चला गया।(विछोड़े के दुख में) मैं आूंसू भर के रोई।
ਆਇ ਨ ਸਕਾ ਤੁਝ ਕਨਿ ਪਿਆਰੇ ਭੇਜਿ ਨ ਸਕਾ ਕੋਇ ॥
हे प्यारे ! मैं (निमाणी) तेरे पास पहुँच नहीं सकती।मैं (गरीब) किसी को तेरे पास भेज नहीं सकती (जो मेरी हालत तुझे बताए।नींद के आगे ही तरले करती हूँ-)
ਆਉ ਸਭਾਗੀ ਨੀਦੜੀਏ ਮਤੁ ਸਹੁ ਦੇਖਾ ਸੋਇ ॥
हे सौभाग्यशाली सुंदर नींद ! तू (मेरे पास आ) शायद (तेरे द्वारा ही) मैं अपने पति-प्रभू का दीदार कर सकूँ।
ਤੈ ਸਾਹਿਬ ਕੀ ਬਾਤ ਜਿ ਆਖੈ ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਕਿਆ ਦੀਜੈ ॥
हे नानक ! (प्रभू-दर पर) कह– हे मेरे मालिक ! अगर कोई गुरमुखि मुझे तेरी कोई बात सुनाए तो मैं उसके आगे कौन सी भेटा रखूँ !
ਸੀਸੁ ਵਢੇ ਕਰਿ ਬੈਸਣੁ ਦੀਜੈ ਵਿਣੁ ਸਿਰ ਸੇਵ ਕਰੀਜੈ ॥
अपना सिर काट के मैं उसके बैठने के लिए आसन बना दूँ (भाव। ) स्वै भाव दूर करके मैं उसकी सेवा करूँ।
ਕਿਉ ਨ ਮਰੀਜੈ ਜੀਅੜਾ ਨ ਦੀਜੈ ਜਾ ਸਹੁ ਭਇਆ ਵਿਡਾਣਾ ॥੧॥੩॥
जब हमारा प्रभू-पति (हमारी मूर्खता के कारण) हमसे अलग हो जाए (तो उसे दुबारा अपना बनाने के लिए यही एक तरीका है कि) हम स्वैभाव मार दें। और अपनी जिंद उस पर सदके कर दें। 1। 3।
ਵਡਹੰਸੁ ਮਹਲਾ ੩ ਘਰੁ ੧
वडहंसु महला ३ घरु १
ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है।
ਮਨਿ ਮੈਲੈ ਸਭੁ ਕਿਛੁ ਮੈਲਾ ਤਨਿ ਧੋਤੈ ਮਨੁ ਹਛਾ ਨ ਹੋਇ ॥
हे भाई ! अगर मनुष्य का मन (विकारों की) मैल से भरा रहे (तो उतने वक्त मनुष्य जो कुछ करता है) सब कुछ विकार ही करता है।शरीर को (तीर्थ आदि के) स्नान करवाने से मन पवित्र नहीं हो सकता।
ਇਹ ਜਗਤੁ ਭਰਮਿ ਭੁਲਾਇਆ ਵਿਰਲਾ ਬੂਝੈ ਕੋਇ ॥੧॥
पर ये संसार (तीर्थ-स्नान आदि से मन की पवित्रता मिल जाने के) भुलेखे में पड़ के गलत राह पर चला जा रहा है।कोई दुर्लभ मनुष्य ही (इस सच्चाई को) समझता है। 1।
ਜਪਿ ਮਨ ਮੇਰੇ ਤੂ ਏਕੋ ਨਾਮੁ ॥
हे मेरे मन ! तू (विकारों से बचने के लिए) सिर्फ परमात्मा का नाम जपा कर।
ਸਤਿਗੁਰਿ ਦੀਆ ਮੋ ਕਉ ਏਹੁ ਨਿਧਾਨੁ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
यह (नाम-) खजाना गुरू ने बख्शा है। 1।रहाउ।
ਸਿਧਾ ਕੇ ਆਸਣ ਜੇ ਸਿਖੈ ਇੰਦ੍ਰੀ ਵਸਿ ਕਰਿ ਕਮਾਇ ॥
अगर मनुष्य चमत्कारी योगियों वाले आसन सीख ले।अगर काम-वासना को जीत के (आसनों के अभ्यास की) कमाई करने लग जाए।
ਮਨ ਕੀ ਮੈਲੁ ਨ ਉਤਰੈ ਹਉਮੈ ਮੈਲੁ ਨ ਜਾਇ ॥੨॥
तो भी मन की मैल नहीं उतरती।(मन में से) अहंकार की मैल नहीं जाती। 2।
ਇਸੁ ਮਨ ਕਉ ਹੋਰੁ ਸੰਜਮੁ ਕੋ ਨਾਹੀ ਵਿਣੁ ਸਤਿਗੁਰ ਕੀ ਸਰਣਾਇ ॥
हे भाई ! गुरू की शरण पड़े बिना और कोई यत्न इस मन को पवित्र नहीं कर सकता।
ਸਤਗੁਰਿ ਮਿਲਿਐ ਉਲਟੀ ਭਈ ਕਹਣਾ ਕਿਛੂ ਨ ਜਾਇ ॥੩॥
अगर गुरू मिल जाए तो मन बिरती संसार से पलट जाती है (और मन की ऐसी ऊँची दशा बन जाती है जो) बयान नहीं की जा सकती। 3।
ਭਣਤਿ ਨਾਨਕੁ ਸਤਿਗੁਰ ਕਉ ਮਿਲਦੋ ਮਰੈ ਗੁਰ ਕੈ ਸਬਦਿ ਫਿਰਿ ਜੀਵੈ ਕੋਇ ॥
नानक कहता है– जो मनुष्य गुरू को मिल के (विकारों से) अछूता हो जाता है।और।फिर गुरू के शबद में जुड़ के आत्मिक जीवन हासिल कर लेता है
ਮਮਤਾ ਕੀ ਮਲੁ ਉਤਰੈ ਇਹੁ ਮਨੁ ਹਛਾ ਹੋਇ ॥੪॥੧॥
(उसके अंदर से माया की) ममता की मैल उतर जाती है।उसका ये मन पवित्र हो जाता है। 4। 1।
ਵਡਹੰਸੁ ਮਹਲਾ ੩ ॥
वडहंसु महला ३ ॥
ਨਦਰੀ ਸਤਗੁਰੁ ਸੇਵੀਐ ਨਦਰੀ ਸੇਵਾ ਹੋਇ ॥
(हे भाई !) परमात्मा की मेहर की निगाह से ही गुरू की शरण पड़ सकते हैं।मेहर की नजर से ही परमात्मा की सेवा भक्ति हो सकती है।
ਨਦਰੀ ਇਹੁ ਮਨੁ ਵਸਿ ਆਵੈ ਨਦਰੀ ਮਨੁ ਨਿਰਮਲੁ ਹੋਇ ॥੧॥
मेहर की निगाह से ही ये मन काबू में आता है।और पवित्र हो जाता है। 1।
ਮੇਰੇ ਮਨ ਚੇਤਿ ਸਚਾ ਸੋਇ ॥
हे (मेरे) मन ! उस सदा कायम रहने वाले परमात्मा को याद किया कर।
ਏਕੋ ਚੇਤਹਿ ਤਾ ਸੁਖੁ ਪਾਵਹਿ ਫਿਰਿ ਦੂਖੁ ਨ ਮੂਲੇ ਹੋਇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
अगर तू उस एक परमात्मा को याद करता रहेगा तो सुख हासिल करेगा।और तुझे कभी भी कोई दुख नहीं छू सकेगा। 1।रहाउ।
ਨਦਰੀ ਮਰਿ ਕੈ ਜੀਵੀਐ ਨਦਰੀ ਸਬਦੁ ਵਸੈ ਮਨਿ ਆਇ ॥
(हे भाई !) परमात्मा की कृपा की नजर से ही विकारों से हट के आत्मिक जीवन हासिल किया जाता है।और गुरू का शबद मन में आ बसता है।
ਨਦਰੀ ਹੁਕਮੁ ਬੁਝੀਐ ਹੁਕਮੇ ਰਹੈ ਸਮਾਇ ॥੨॥
मेहर की निगाह से ही परमात्मा की रजा को समझा जा सकता है।और रजा में सदा टिके रहा जाता है। 2।
ਜਿਨਿ ਜਿਹਵਾ ਹਰਿ ਰਸੁ ਨ ਚਖਿਓ ਸਾ ਜਿਹਵਾ ਜਲਿ ਜਾਉ ॥
हे भाई ! जिस जीभ ने कभी परमात्मा के नाम का स्वाद नहीं चखा वह जीभ जलने योग्य ही है।
ਅਨ ਰਸ ਸਾਦੇ ਲਗਿ ਰਹੀ ਦੁਖੁ ਪਾਇਆ ਦੂਜੈ ਭਾਇ ॥੩॥
(क्योंकि जिस मनुष्य की जीभ) अन्य रसों के स्वाद में लगी रहती है। वह मनुष्य माया के मोह में फंस के दुख (ही) पाता रहता है। 3।
ਸਭਨਾ ਨਦਰਿ ਏਕ ਹੈ ਆਪੇ ਫਰਕੁ ਕਰੇਇ ॥
(हे भाई ! वैसे तो) सब जीवों पर एक परमात्मा की ही कृपा की नजर रहती है।(पर कोई अच्छा बन जाता है कोई विकारी हो जाता है।
ਨਾਨਕ ਸਤਗੁਰਿ ਮਿਲਿਐ ਫਲੁ ਪਾਇਆ ਨਾਮੁ ਵਡਾਈ ਦੇਇ ॥੪॥੨॥
यह) फर्क (भी) परमात्मा खुद ही बनाता है (क्योंकि) हे नानक ! अगर गुरू मिल जाए (तो ही परमात्मा की मेहर की निगाह का) फल मिलता है (परमात्मा गुरू के द्वारा अपना) नाम बख्शता है (ये नाम-प्राप्ति ही सब से बड़ी) इज्जत (है)। 4। 2।