Sri Guru Granth Sahib Ji — Ang 513 (hindi)
ਨਾਨਕ ਗੁਰਮੁਖਿ ਉਬਰੇ ਜਿ ਆਪਿ ਮੇਲੇ ਕਰਤਾਰਿ ॥੨॥
हे नानक ! जिन गुरमुखों को करतार ने खुद (अपने साथ) जोड़ा है वही इस (लालच रूपी समुंद्र) में से बच निकलते हैं। 2।
ਪਉੜੀ ॥
पउड़ी।
ਭਗਤ ਸਚੈ ਦਰਿ ਸੋਹਦੇ ਸਚੈ ਸਬਦਿ ਰਹਾਏ ॥
बंदगी करने वाले सच्चे प्रभू की हजूरी में शोभा पाते हैं।(प्रभू की हजूरी में वह) सच्चे शबद के द्वारा टिके रहते हैं।
ਹਰਿ ਕੀ ਪ੍ਰੀਤਿ ਤਿਨ ਊਪਜੀ ਹਰਿ ਪ੍ਰੇਮ ਕਸਾਏ ॥
उनके अंदर प्रभू का प्यार पैदा होता है।(वह) प्रभू के प्यार के खिंचे हुए हैं।
ਹਰਿ ਰੰਗਿ ਰਹਹਿ ਸਦਾ ਰੰਗਿ ਰਾਤੇ ਰਸਨਾ ਹਰਿ ਰਸੁ ਪਿਆਏ ॥
वह सदा प्रभू के प्यार में रहते हैं।प्रभू के रंग में रंगे रहते हैं और जीभ से प्रभू का नाम-रस पीते हैं।
ਸਫਲੁ ਜਨਮੁ ਜਿਨੑੀ ਗੁਰਮੁਖਿ ਜਾਤਾ ਹਰਿ ਜੀਉ ਰਿਦੈ ਵਸਾਏ ॥
जिन्होंने गुरू के सन्मुख हो के रॅब को पहचाना है और दिल में बसाया है उनका पैदा होना मुबारक है।
ਬਾਝੁ ਗੁਰੂ ਫਿਰੈ ਬਿਲਲਾਦੀ ਦੂਜੈ ਭਾਇ ਖੁਆਏ ॥੧੧॥
गुरू के बिना सृष्टि और-और प्यार में गलतान है बिलकती फिरती है। 11।
ਸਲੋਕੁ ਮਃ ੩ ॥
श्लोक महला ३॥
ਕਲਿਜੁਗ ਮਹਿ ਨਾਮੁ ਨਿਧਾਨੁ ਭਗਤੀ ਖਟਿਆ ਹਰਿ ਉਤਮ ਪਦੁ ਪਾਇਆ ॥
इस झमेलों भरे जगत में परमात्मा का नाम (ही) खजाना है।जिसने बंदगी करके (ये खजाना) कमा लिया है उसने प्रभू (का मेल रूप) उच्च दर्जा पा लिया है।
ਸਤਿਗੁਰ ਸੇਵਿ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਮਨਿ ਵਸਾਇਆ ਅਨਦਿਨੁ ਨਾਮੁ ਧਿਆਇਆ ॥
गुरू के हुकम में चल के उसने प्रभू का नाम अपने मन में बसाया है और हर वक्त नाम सिमरा है।
ਵਿਚੇ ਗ੍ਰਿਹ ਗੁਰ ਬਚਨਿ ਉਦਾਸੀ ਹਉਮੈ ਮੋਹੁ ਜਲਾਇਆ ॥
सतिगुरू के वचन में (चल के) वह गृहस्थ में ही उदासी है (क्योंकि) उसने अहंकार से मोह जला लिया है।
ਆਪਿ ਤਰਿਆ ਕੁਲ ਜਗਤੁ ਤਰਾਇਆ ਧੰਨੁ ਜਣੇਦੀ ਮਾਇਆ ॥
वह (इस झमेलों भरे संसार-समुंद्र से) खुद लांघ गया है।सारे जगत को भी लंघाता है।धंन है उसकी पैदा करने वाली माँ !ऐसा गुरू (जिसको मिल के मनुष्य ‘आपि तरिआ कुल जगतु तराइआ’)
ਐਸਾ ਸਤਿਗੁਰੁ ਸੋਈ ਪਾਏ ਜਿਸੁ ਧੁਰਿ ਮਸਤਕਿ ਹਰਿ ਲਿਖਿ ਪਾਇਆ ॥
उसी आदमी को मिलता है जिसके माथे पर धुर से करतार ने (बंदगी करने के लेख) लिख के रख दिए हैं।
ਜਨ ਨਾਨਕ ਬਲਿਹਾਰੀ ਗੁਰ ਆਪਣੇ ਵਿਟਹੁ ਜਿਨਿ ਭ੍ਰਮਿ ਭੁਲਾ ਮਾਰਗਿ ਪਾਇਆ ॥੧॥
हे दास नानक ! (कह–) मैं अपने गुरू से सदके हूँ जिसने मुझे भटके हुए को सद्-मार्ग पर डाला है। 1।
ਮਃ ੩ ॥
महला ३॥
ਤ੍ਰੈ ਗੁਣ ਮਾਇਆ ਵੇਖਿ ਭੁਲੇ ਜਿਉ ਦੇਖਿ ਦੀਪਕਿ ਪਤੰਗ ਪਚਾਇਆ ॥
(सारे जीव। क्या विद्वान और क्या त्यागी) त्रैगुणी माया को देख के (जीवन के सही राह से) भटक रहे हैं (और दुखी हो रहे हें) जैसे पतंगा (दीपक को) देख के दीपक पर ही जलता है;
ਪੰਡਿਤ ਭੁਲਿ ਭੁਲਿ ਮਾਇਆ ਵੇਖਹਿ ਦਿਖਾ ਕਿਨੈ ਕਿਹੁ ਆਣਿ ਚੜਾਇਆ ॥
पण्डित (वैसे तो औरों को कथा सुनाते हैं। पर) बार-बार भटक के माया की ओर ही देखते हैं कि देखें किसी ने कुछ ला के भेटा रखी है (अथवा नहीं)।
ਦੂਜੈ ਭਾਇ ਪੜਹਿ ਨਿਤ ਬਿਖਿਆ ਨਾਵਹੁ ਦਯਿ ਖੁਆਇਆ ॥
सो माया के प्यार में वह (असल में) सदा माया (की संथ्या ही) पढ़ते हैं।परमात्मा ने उनको (अपने) नाम से वंचित कर दिया है।
ਜੋਗੀ ਜੰਗਮ ਸੰਨਿਆਸੀ ਭੁਲੇ ਓਨੑਾ ਅਹੰਕਾਰੁ ਬਹੁ ਗਰਬੁ ਵਧਾਇਆ ॥
जोगी-जंगम और सन्यासी (अपनी तरफ से संयासी बने हुए हैं।पर ये भी जीवन के राह से) भटके हुए हैं (क्योंकि एक तो अपने ‘त्याग’ का ही) इनके गुमान ने अहंकार को बढ़ाया हुआ है।
ਛਾਦਨੁ ਭੋਜਨੁ ਨ ਲੈਹੀ ਸਤ ਭਿਖਿਆ ਮਨਹਠਿ ਜਨਮੁ ਗਵਾਇਆ ॥
गृहस्थियों से आदर-मान से मिला कपड़ा व भोजन-रूप भिक्षा नहीं लेते (भाव।थोड़ी चीज मिलने पर उन्हें घूरते हैं;सो।इन्होंने भी) मन के हठ से (इस धारण किए हुए ‘त्याग’ के कारण) अपनी जिंदगी व्यर्थ गवाई है।
ਏਤੜਿਆ ਵਿਚਹੁ ਸੋ ਜਨੁ ਸਮਧਾ ਜਿਨਿ ਗੁਰਮੁਖਿ ਨਾਮੁ ਧਿਆਇਆ ॥
इन सभी में से वही मनुष्य पूर्ण-अवस्था वाला है जिसने सनमुख हो के नाम सिमरा है।पर।
ਜਨ ਨਾਨਕ ਕਿਸ ਨੋ ਆਖਿ ਸੁਣਾਈਐ ਜਾ ਕਰਦੇ ਸਭਿ ਕਰਾਇਆ ॥੨॥
हे दास ! (इस त्रैगुणी माया के हाथ से) और किस के आगे पुकार करें।सभी तो प्रभू के प्रेरे हुए ही काम कर रहे हैं।(सो।इस माया से बचने के लिए प्रभू के आगे की हुई अरदास ही सहायता करती है)। 2।
ਪਉੜੀ ॥
पउड़ी ॥
ਮਾਇਆ ਮੋਹੁ ਪਰੇਤੁ ਹੈ ਕਾਮੁ ਕ੍ਰੋਧੁ ਅਹੰਕਾਰਾ ॥
माया का मोह।काम।क्रोध व अहंकार (ये। जैसे) भूत हैं;
ਏਹ ਜਮ ਕੀ ਸਿਰਕਾਰ ਹੈ ਏਨੑਾ ਉਪਰਿ ਜਮ ਕਾ ਡੰਡੁ ਕਰਾਰਾ ॥
ये सारे जमराज की प्रजा हैं।इन पर यमराज का डंडा (तगड़ा शासन) चलता है।
ਮਨਮੁਖ ਜਮ ਮਗਿ ਪਾਈਅਨਿੑ ਜਿਨੑ ਦੂਜਾ ਭਾਉ ਪਿਆਰਾ ॥
अपने मन के पीछे चलने वाले बंदे जिन्हें माया का प्यार मीठा लगता है जमराज के राह पर पाए जाते हैं (भाव।वह यम की रईअत कामादिकों के वश पड़ जाते हैं)।
ਜਮ ਪੁਰਿ ਬਧੇ ਮਾਰੀਅਨਿ ਕੋ ਸੁਣੈ ਨ ਪੂਕਾਰਾ ॥
वह मनमुख जम-पुरी में बंधे हुए (भाव।जम की प्रजा कामादिकों के वश में पड़े हुए) मारे जाते हैं (दुखी होते हैं)।कोई उनकी पुकार नहीं सुनता (भाव।इन कामादिकों के पँजों से उन्हें कोई छुड़ा नहीं सकता)।
ਜਿਸ ਨੋ ਕ੍ਰਿਪਾ ਕਰੇ ਤਿਸੁ ਗੁਰੁ ਮਿਲੈ ਗੁਰਮੁਖਿ ਨਿਸਤਾਰਾ ॥੧੨॥
जिस मनुष्य पर प्रभू स्वयं मेहर करे उसको गुरू मिलता है।गुरू के द्वारा (इन भूतों से) छुटकारा होता है। 12।
ਸਲੋਕੁ ਮਃ ੩ ॥
श्लोक महला ३ ॥
ਹਉਮੈ ਮਮਤਾ ਮੋਹਣੀ ਮਨਮੁਖਾ ਨੋ ਗਈ ਖਾਇ ॥
अहंकार और ममता (स्वरूप वाली माया।जैसे) चुड़ैल है जो मन-मर्जी करने वालों को हड़प कर जाती है।
ਜੋ ਮੋਹਿ ਦੂਜੈ ਚਿਤੁ ਲਾਇਦੇ ਤਿਨਾ ਵਿਆਪਿ ਰਹੀ ਲਪਟਾਇ ॥
जो मनुष्य (ईश्वर को छोड़ के किसी) और के मोह में चित्त जोड़ते हैं उनको चिपक के अपने वश में कर लेती है।
ਗੁਰ ਕੈ ਸਬਦਿ ਪਰਜਾਲੀਐ ਤਾ ਏਹ ਵਿਚਹੁ ਜਾਇ ॥
अगर गुरू के शबद से इसे अच्छी तरह जलाएं (जैसे। चिपके हुए भूतों-चुड़ैलों को मांदरी लोग आग से जलाने का डरावा देते सुने जाते हैं) तो ये अंदर से निकलती है;
ਤਨੁ ਮਨੁ ਹੋਵੈ ਉਜਲਾ ਨਾਮੁ ਵਸੈ ਮਨਿ ਆਇ ॥
शरीर और मन स्वच्छ हो जाता है; प्रभू का नाम मन में आ बसता है।
ਨਾਨਕ ਮਾਇਆ ਕਾ ਮਾਰਣੁ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਹੈ ਗੁਰਮੁਖਿ ਪਾਇਆ ਜਾਇ ॥੧॥
हे नानक ! इस माया (संख्या को कुश्ता करने।बेअसर करने) की बूटी एक हरी-नाम ही है जो गुरू से ही मिल सकती है। 1।
ਮਃ ੩ ॥
महला ३॥
ਇਹੁ ਮਨੁ ਕੇਤੜਿਆ ਜੁਗ ਭਰਮਿਆ ਥਿਰੁ ਰਹੈ ਨ ਆਵੈ ਜਾਇ ॥
(मनुष्य का) ये मन कई जुग भटकता रहता है (परमात्मा में) टिकता नहीं और पैदा होता मरता रहता है;
ਹਰਿ ਭਾਣਾ ਤਾ ਭਰਮਾਇਅਨੁ ਕਰਿ ਪਰਪੰਚੁ ਖੇਲੁ ਉਪਾਇ ॥
पर ये बात प्रभू को (इसी तरह) भाती है कि उसने ये ठॅगने वाली (जगत खेल बना के) (जीवों को इसमें) भरमाया हुआ है।
ਜਾ ਹਰਿ ਬਖਸੇ ਤਾ ਗੁਰ ਮਿਲੈ ਅਸਥਿਰੁ ਰਹੈ ਸਮਾਇ ॥
जब प्रभू (स्वयं) मेहर करता है तो (जीव को) गुरू मिलता है।(फिर) यह (प्रभू में) जुड़ के टिका रहता है;