Sri Guru Granth Sahib Ji — Ang 512 (hindi)
ਹਰਿ ਸੁਖਦਾਤਾ ਮਨਿ ਵਸੈ ਹਉਮੈ ਜਾਇ ਗੁਮਾਨੁ ॥
सुखों का दाता परमात्मा मन में आ बसेगा।अहम्-अहंकार नाश हो जाएगा।
ਨਾਨਕ ਨਦਰੀ ਪਾਈਐ ਤਾ ਅਨਦਿਨੁ ਲਾਗੈ ਧਿਆਨੁ ॥੨॥
हे नानक ! जब प्रभू अपनी मेहर की नजर से मिलता है तो हर वक्त सुरति उसमें जुड़ी रहती है। 2।
ਪਉੜੀ ॥
पउड़ी॥
ਸਤੁ ਸੰਤੋਖੁ ਸਭੁ ਸਚੁ ਹੈ ਗੁਰਮੁਖਿ ਪਵਿਤਾ ॥
जो मनुष्य गुरू का हो के रहता है वह पवित्र (जीवन वाला) हो जाता है।उसको सत-संतोष प्राप्त होता है।उसे हर जगह प्रभू दिखता है।
ਅੰਦਰਹੁ ਕਪਟੁ ਵਿਕਾਰੁ ਗਇਆ ਮਨੁ ਸਹਜੇ ਜਿਤਾ ॥
उसके मन में से खोट विकार दूर हो जाते हैं।वह आसानी से ही मन को वश में कर लेता है;
ਤਹ ਜੋਤਿ ਪ੍ਰਗਾਸੁ ਅਨੰਦ ਰਸੁ ਅਗਿਆਨੁ ਗਵਿਤਾ ॥
इस अवस्था में (पहुँच के उसके अंदर परमात्मा की) ज्योति का प्रकाश हो जाता है।आत्मिक आनंद की उसको चाट लग जाती है और अज्ञान दूर हो जाता है।
ਅਨਦਿਨੁ ਹਰਿ ਕੇ ਗੁਣ ਰਵੈ ਗੁਣ ਪਰਗਟੁ ਕਿਤਾ ॥
(फिर) वह हर वक्त परमात्मा के गुण गाता है।(रॅबी) गुण उसके अंदर प्रकट हो जाते हैं;
ਸਭਨਾ ਦਾਤਾ ਏਕੁ ਹੈ ਇਕੋ ਹਰਿ ਮਿਤਾ ॥੯॥
(उसे ये यकीन बन जाता है कि) एक प्रभू सारे जीवों का दाता है और मित्र है। 9।
ਸਲੋਕੁ ਮਃ ੩ ॥
श्लोक महला ३ ॥
ਬ੍ਰਹਮੁ ਬਿੰਦੇ ਸੋ ਬ੍ਰਾਹਮਣੁ ਕਹੀਐ ਜਿ ਅਨਦਿਨੁ ਹਰਿ ਲਿਵ ਲਾਏ ॥
जो मनुष्य ब्रहम का पहचानता है हर वक्त परमात्मा में सुरति जोड़ता है उसको ब्राहमण कहना चाहिए।
ਸਤਿਗੁਰ ਪੁਛੈ ਸਚੁ ਸੰਜਮੁ ਕਮਾਵੈ ਹਉਮੈ ਰੋਗੁ ਤਿਸੁ ਜਾਏ ॥
(वह ब्राहमण) सतिगुरू के कहे पर चलता है।‘सच’ रूपी संयम रखता है।(और इस तरह) उसका अहंकार-रोग देर होता है;
ਹਰਿ ਗੁਣ ਗਾਵੈ ਗੁਣ ਸੰਗ੍ਰਹੈ ਜੋਤੀ ਜੋਤਿ ਮਿਲਾਏ ॥
वह हरी के गुण गाता है।(रॅबी) गुण एकत्र करता है और परम-ज्योति में अपनी आत्मा मिलाए रखता है।
ਇਸੁ ਜੁਗ ਮਹਿ ਕੋ ਵਿਰਲਾ ਬ੍ਰਹਮ ਗਿਆਨੀ ਜਿ ਹਉਮੈ ਮੇਟਿ ਸਮਾਏ ॥
मानस जनम में कोई विरला ही है जो परमात्मा (ब्रहम) को जानता है जो अहंकार दूर करके ब्रहम में जुड़ा रहता है।
ਨਾਨਕ ਤਿਸ ਨੋ ਮਿਲਿਆ ਸਦਾ ਸੁਖੁ ਪਾਈਐ ਜਿ ਅਨਦਿਨੁ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਧਿਆਏ ॥੧॥
हे नानक ! जो (ब्रहमज्ञानी ब्राहमण) हर वक्त नाम सिमरता है उसे मिलने पर सदा सुख मिलता है। 1।
ਮਃ ੩ ॥
महला ३॥
ਅੰਤਰਿ ਕਪਟੁ ਮਨਮੁਖ ਅਗਿਆਨੀ ਰਸਨਾ ਝੂਠੁ ਬੋਲਾਇ ॥
अपने मन के पीछे चलने वाला मनुष्य जाहल है।उसके अंदर खोट है और जीभ से झूठ (भाव।अंदरूनी खोट के उलट) बोलता है (भाव।अंदर से और और बाहर से और);
ਕਪਟਿ ਕੀਤੈ ਹਰਿ ਪੁਰਖੁ ਨ ਭੀਜੈ ਨਿਤ ਵੇਖੈ ਸੁਣੈ ਸੁਭਾਇ ॥
(इस तरह) ठॅगी करने से प्रसन्न नहीं होता।(क्योंकि वह सहज ही (हमारा हरेक छुपा हुआ काम भी) ) देखता है और (छुपे हुए बोल व विचार भी) सुनता है।
ਦੂਜੈ ਭਾਇ ਜਾਇ ਜਗੁ ਪਰਬੋਧੈ ਬਿਖੁ ਮਾਇਆ ਮੋਹ ਸੁਆਇ ॥
मनमुख (खुद) माया के मोह में है पर जा के लोगों को उपदेश करता है।माया मोह उर स्वार्थ के विकारो से घिरा है
ਇਤੁ ਕਮਾਣੈ ਸਦਾ ਦੁਖੁ ਪਾਵੈ ਜੰਮੈ ਮਰੈ ਫਿਰਿ ਆਵੈ ਜਾਇ ॥
ये करतूत करने से वह सदा ही दुख पाता हे।पैदा होता है मरता है।बार बार पैदा होता है मरता है।
ਸਹਸਾ ਮੂਲਿ ਨ ਚੁਕਈ ਵਿਚਿ ਵਿਸਟਾ ਪਚੈ ਪਚਾਇ ॥
उसके अंदर का तौखला कभी मिटता नहीं।वह मानो।गंदगी में पड़ा जलता रहता है। पर।
ਜਿਸ ਨੋ ਕ੍ਰਿਪਾ ਕਰੇ ਮੇਰਾ ਸੁਆਮੀ ਤਿਸੁ ਗੁਰ ਕੀ ਸਿਖ ਸੁਣਾਇ ॥
जिस मनुष्य पर मेरा मालिक मेहर करता है उसको गुरू का उपदेश सुनाता है;
ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਧਿਆਵੈ ਹਰਿ ਨਾਮੋ ਗਾਵੈ ਹਰਿ ਨਾਮੋ ਅੰਤਿ ਛਡਾਇ ॥੨॥
वह मनुष्य प्रभू का नाम सिमरता है।नाम ही गाता है।नाम ही उसको आखिर (इस संशय से) छुड़वाता है। 2।
ਪਉੜੀ ॥
पउड़ी।
ਜਿਨਾ ਹੁਕਮੁ ਮਨਾਇਓਨੁ ਤੇ ਪੂਰੇ ਸੰਸਾਰਿ ॥
वह मनुष्य जगत में सर्व-गुण-संपूर्ण बर्तन है जिनसे परमात्मा (अपना) हुकम मनाता है।
ਸਾਹਿਬੁ ਸੇਵਨਿੑ ਆਪਣਾ ਪੂਰੈ ਸਬਦਿ ਵੀਚਾਰਿ ॥
वह बंदे गुरू के शबद में चित्त जोड़ के अपने मालिक की बंदगी करते हैं।
ਹਰਿ ਕੀ ਸੇਵਾ ਚਾਕਰੀ ਸਚੈ ਸਬਦਿ ਪਿਆਰਿ ॥
प्रभू की बंदगी हो ही तब सकती है अगर सच्चे शबद से प्यार करें (शाब्दिक-सच्चे शबद में प्यार के द्वारा)।
ਹਰਿ ਕਾ ਮਹਲੁ ਤਿਨੑੀ ਪਾਇਆ ਜਿਨੑ ਹਉਮੈ ਵਿਚਹੁ ਮਾਰਿ ॥
जो मनुष्य अंदर से अहंकार को मारते हैं उनको परमात्मा की हजूरी प्राप्त होती है।
ਨਾਨਕ ਗੁਰਮੁਖਿ ਮਿਲਿ ਰਹੇ ਜਪਿ ਹਰਿ ਨਾਮਾ ਉਰ ਧਾਰਿ ॥੧੦॥
हे नानक ! गुरू के सन्मुख रहने वाले लोग परमात्मा का नाम हृदय में परो के नाम जप के परमात्मा में जुड़े रहते हैं। 10।
ਸਲੋਕੁ ਮਃ ੩ ॥
श्लोक महला ३॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਧਿਆਨ ਸਹਜ ਧੁਨਿ ਉਪਜੈ ਸਚਿ ਨਾਮਿ ਚਿਤੁ ਲਾਇਆ ॥
जो मनुष्य गुरू के सन्मुख होता है उसके अंदर जुड़ी सुरति और अडोलता की रौं चल पड़ती है।वह सच्चे नाम में चित्त जोड़े रखता है।
ਗੁਰਮੁਖਿ ਅਨਦਿਨੁ ਰਹੈ ਰੰਗਿ ਰਾਤਾ ਹਰਿ ਕਾ ਨਾਮੁ ਮਨਿ ਭਾਇਆ ॥
हर वक्त प्रभू का नाम उसे मन में मीठा लगता है।
ਗੁਰਮੁਖਿ ਹਰਿ ਵੇਖਹਿ ਗੁਰਮੁਖਿ ਹਰਿ ਬੋਲਹਿ ਗੁਰਮੁਖਿ ਹਰਿ ਸਹਜਿ ਰੰਗੁ ਲਾਇਆ ॥
गुरमुख बंदे रॅब को ही (हर जगह) देखते हैं।रॅब की सिफत ही (हर समय) उचारते हैं।और रॅबी मेल वाली अडोलता में प्यार डालते हैं।
ਨਾਨਕ ਗੁਰਮੁਖਿ ਗਿਆਨੁ ਪਰਾਪਤਿ ਹੋਵੈ ਤਿਮਰ ਅਗਿਆਨੁ ਅਧੇਰੁ ਚੁਕਾਇਆ ॥
हे नानक ! गुरमुख को उच्च ज्ञान (ऊँची समझ) की प्राप्ति होती है।उसका अज्ञान-रूपी घोर अंधेरा दूर हो जाता है।
ਜਿਸ ਨੋ ਕਰਮੁ ਹੋਵੈ ਧੁਰਿ ਪੂਰਾ ਤਿਨਿ ਗੁਰਮੁਖਿ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਧਿਆਇਆ ॥੧॥
उसी गुरमुख ने नाम जपा है जिस पर धुर से (करतार द्वारा) पूरी मेहर हुई है। 1।
ਮਃ ੩ ॥
महला ३॥
ਸਤਿਗੁਰੁ ਜਿਨਾ ਨ ਸੇਵਿਓ ਸਬਦਿ ਨ ਲਗੋ ਪਿਆਰੁ ॥
जिन मनुष्यों ने गुरू का हुकम नहीं माना।जिनका गुरू-शबद से प्यार नहीं बना।
ਸਹਜੇ ਨਾਮੁ ਨ ਧਿਆਇਆ ਕਿਤੁ ਆਇਆ ਸੰਸਾਰਿ ॥
जिन्होंने शांत-चित्त हो के नाम नहीं सिमरा।वे जगत में किसलिए आए।
ਫਿਰਿ ਫਿਰਿ ਜੂਨੀ ਪਾਈਐ ਵਿਸਟਾ ਸਦਾ ਖੁਆਰੁ ॥
ऐसा आदमी बारंबार जूनियों में पड़ता है।वह जैसे।गंदगी में पड़ के दुखी होता है।
ਕੂੜੈ ਲਾਲਚਿ ਲਗਿਆ ਨਾ ਉਰਵਾਰੁ ਨ ਪਾਰੁ ॥
(गुरू और परमात्मा को विसार के) झूठे लालच में फंसने से (फंसे ही रहते हैं।क्योंकि इस लालच का) ना इस पार का पता चलता है ना उस पार का।