Sri Guru Granth Sahib Ji — Ang 500 (hindi)
ਗੂਜਰੀ ਮਹਲਾ ੫ ॥
गूजरी महला ५ ॥
ਕਰਿ ਕਿਰਪਾ ਅਪਨਾ ਦਰਸੁ ਦੀਜੈ ਜਸੁ ਗਾਵਉ ਨਿਸਿ ਅਰੁ ਭੋਰ ॥
हे मेरे मालिक ! मेहर कर।मुझे अपना दर्शन दे।मैं दिन-रात तेरी सिफत सालाह के गीत गाता रहूँ।
ਕੇਸ ਸੰਗਿ ਦਾਸ ਪਗ ਝਾਰਉ ਇਹੈ ਮਨੋਰਥ ਮੋਰ ॥੧॥
अपने केशों से तेरे सेवकों के पैर झाड़ता रहूँ- बस ! यही है मेरे मन की तमन्ना। 1।
ਠਾਕੁਰ ਤੁਝ ਬਿਨੁ ਬੀਆ ਨ ਹੋਰ ॥
हे मेरे मालिक ! तेरे बिना मेरा और कोई आसरा नहीं है।
ਚਿਤਿ ਚਿਤਵਉ ਹਰਿ ਰਸਨ ਅਰਾਧਉ ਨਿਰਖਉ ਤੁਮਰੀ ਓਰ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
हे हरी ! मैं अपने चित्त में तुझे ही याद करता हूँ।जीभ से तेरी ही आराधना करता हूँ।(और सदा सहायता के लिए) तेरी ओर ही ताकता रहता हूँ। 1।रहाउ।
ਦਇਆਲ ਪੁਰਖ ਸਰਬ ਕੇ ਠਾਕੁਰ ਬਿਨਉ ਕਰਉ ਕਰ ਜੋਰਿ ॥
हे दया के घर ! हे सर्व-व्यापक ! हे सबके मालिक ! मैं दोनों हाथ जोड़ के तेरे आगे विनती करता हूँ
ਨਾਮੁ ਜਪੈ ਨਾਨਕੁ ਦਾਸੁ ਤੁਮਰੋ ਉਧਰਸਿ ਆਖੀ ਫੋਰ ॥੨॥੧੧॥੨੦॥
(मेहर कर) तेरा दास नानक (सदा तेरा) नाम जपता रहे।(जो) मनुष्य तेरा नाम जपता रहेगा वह (संसार समुंद्र में से) आँख झपकने जितने समय में बच निकलेगा। 2। 11। 20।
ਗੂਜਰੀ ਮਹਲਾ ੫ ॥
गूजरी महला ५ ॥
ਬ੍ਰਹਮ ਲੋਕ ਅਰੁ ਰੁਦ੍ਰ ਲੋਕ ਆਈ ਇੰਦ੍ਰ ਲੋਕ ਤੇ ਧਾਇ ॥
(हे भाई !) माया ब्रहमा।शिव।इन्द्र आदि देवताओं पर भी अपना (प्रभाव डाल के) ब्रहमपुरी।शिवपुरी और इन्द्रपुरी पर हमला करती हुई (सांसारिक जीवों की तरफ) आई है।
ਸਾਧਸੰਗਤਿ ਕਉ ਜੋਹਿ ਨ ਸਾਕੈ ਮਲਿ ਮਲਿ ਧੋਵੈ ਪਾਇ ॥੧॥
(पर) साध-संगति की ओर (तो ये माया) ताक भी नहीं सकती।(ये माया सत्संगियों के) पैर मल-मल के धोती है। 1।
ਅਬ ਮੋਹਿ ਆਇ ਪਰਿਓ ਸਰਨਾਇ ॥
(हे भाई ! संसार को माया की तृष्णा की आग में जलता देख के) अब मैं (अपने सतिगुरू की) शरण आ पड़ा हूँ।
ਗੁਹਜ ਪਾਵਕੋ ਬਹੁਤੁ ਪ੍ਰਜਾਰੈ ਮੋ ਕਉ ਸਤਿਗੁਰਿ ਦੀਓ ਹੈ ਬਤਾਇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
(तृष्णा की) गुझी आग (संसार को) बहुत बुरी तरह जला रही है (इससे बचने के लिए) गुरू ने मुझे (तरीका) बता दिया है। 1।रहाउ।
ਸਿਧ ਸਾਧਿਕ ਅਰੁ ਜਖੵ ਕਿੰਨਰ ਨਰ ਰਹੀ ਕੰਠਿ ਉਰਝਾਇ ॥
योग-साधना में पहुँचे हुए जोगी।योग-साधन करने वाले साधू।जख।किन्नर।मनुष्य - इन सबके गले में माया चिपकी हुई है।पर-
ਜਨ ਨਾਨਕ ਅੰਗੁ ਕੀਆ ਪ੍ਰਭਿ ਕਰਤੈ ਜਾ ਕੈ ਕੋਟਿ ਐਸੀ ਦਾਸਾਇ ॥੨॥੧੨॥੨੧॥
हे नानक ! अपने दासों का पक्ष उस प्रभू ने उस करतार ने किया हुआ है जिसके दर पर इस तरह की (इस माया जैसी) करोड़ों ही दासियां हैं। 2। 12। 21।
ਗੂਜਰੀ ਮਹਲਾ ੫ ॥
गूजरी महला ५ ॥
ਅਪਜਸੁ ਮਿਟੈ ਹੋਵੈ ਜਗਿ ਕੀਰਤਿ ਦਰਗਹ ਬੈਸਣੁ ਪਾਈਐ ॥
(हे भाई ! सिमरन की बरकति से मनुष्य की पहली) बदनामी मिट जाती है।जगत में शोभा होने लगती है।और परमात्मा की दरगाह में बैठने के लिए जगह मिल जाती है।
ਜਮ ਕੀ ਤ੍ਰਾਸ ਨਾਸ ਹੋਇ ਖਿਨ ਮਹਿ ਸੁਖ ਅਨਦ ਸੇਤੀ ਘਰਿ ਜਾਈਐ ॥੧॥
(हे भाई ! सिमरन की सहायता से) मौत का सहम एक पल में खत्म हो जाता है।सुख आनंद से प्रभू-चरणों में पहुँच जाते हैं। 1।
ਜਾ ਤੇ ਘਾਲ ਨ ਬਿਰਥੀ ਜਾਈਐ ॥
इसलिए उसकी नाम-सिमरन की सेवा व्यर्थ नहीं जाती।
ਆਠ ਪਹਰ ਸਿਮਰਹੁ ਪ੍ਰਭੁ ਅਪਨਾ ਮਨਿ ਤਨਿ ਸਦਾ ਧਿਆਈਐ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
हे भाई ! आठों पहर अपने प्रभू का सिमरन करते रहो।हे भाई ! मन में हृदय में सदा प्रभू का ध्यान करना चाहिए। 1।रहाउ।
ਮੋਹਿ ਸਰਨਿ ਦੀਨ ਦੁਖ ਭੰਜਨ ਤੂੰ ਦੇਹਿ ਸੋਈ ਪ੍ਰਭ ਪਾਈਐ ॥
हे नानक ! (कह–) हे दीनों के दुख नाश करने वाले प्रभू ! मैं तेरी शरण आया हूँ।जो कुछ तू खुद देता है जीवों को वही कुछ मिल सकता है।
ਚਰਣ ਕਮਲ ਨਾਨਕ ਰੰਗਿ ਰਾਤੇ ਹਰਿ ਦਾਸਹ ਪੈਜ ਰਖਾਈਐ ॥੨॥੧੩॥੨੨॥
तेरे दास तेरे सुंदर कोमल चरणों के प्रेम-रंग में रंगे रहते हैं।तू अपने दासों की इज्जत स्वयं रखता है। 2। 13। 22।
ਗੂਜਰੀ ਮਹਲਾ ੫ ॥
गूजरी महला ५ ॥
ਬਿਸ੍ਵੰਭਰ ਜੀਅਨ ਕੋ ਦਾਤਾ ਭਗਤਿ ਭਰੇ ਭੰਡਾਰ ॥
हे मन ! वह परमात्मा सारे जगत को पालने वाला है।वह सारे जीवों को दातें देने वाला है।उसके खजाने भगती (के धन) से भरे पड़े हैं।
ਜਾ ਕੀ ਸੇਵਾ ਨਿਫਲ ਨ ਹੋਵਤ ਖਿਨ ਮਹਿ ਕਰੇ ਉਧਾਰ ॥੧॥
उस परमात्मा की की हुई सेवा भक्ति व्यर्थ नहीं जाती।(सेवा-भक्ति करने वाले का) वह एक छिन में (संसार-समुंद्र से) पार-उतारा कर देता है।
ਮਨ ਮੇਰੇ ਚਰਨ ਕਮਲ ਸੰਗਿ ਰਾਚੁ ॥
हे मेरे मन !तू उस सुंदर कोमल चरणों से प्यार किया कर
ਸਗਲ ਜੀਅ ਜਾ ਕਉ ਆਰਾਧਹਿ ਤਾਹੂ ਕਉ ਤੂੰ ਜਾਚੁ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
जिस को (संसार के) सारे जीव आराधते हैं।तू उसके ही दर से मांगा कर। 1।रहाउ।
ਨਾਨਕ ਸਰਣਿ ਤੁਮੑਾਰੀ ਕਰਤੇ ਤੂੰ ਪ੍ਰਭ ਪ੍ਰਾਨ ਅਧਾਰ ॥
हे नानक ! (कह–) हे करतार ! हे प्रभू ! मैं तेरी शरण आया हूँ।तू ही मेरी जिंद का आसरा है।
ਹੋਇ ਸਹਾਈ ਜਿਸੁ ਤੂੰ ਰਾਖਹਿ ਤਿਸੁ ਕਹਾ ਕਰੇ ਸੰਸਾਰੁ ॥੨॥੧੪॥੨੩॥
मददगार बन के जिस मनुष्य की तू रक्षा करता है।सारा जगत (भी अगर उसका वैरी बन जाए तो) उसका कुछ भी बिगाड़ नहीं सकता। 2। 14। 23।
ਗੂਜਰੀ ਮਹਲਾ ੫ ॥
गूजरी महला ५ ॥
ਜਨ ਕੀ ਪੈਜ ਸਵਾਰੀ ਆਪ ॥
हे भाई ! परमात्मा अपने सेवक की इज्जत स्वयं बढ़ाता है।
ਹਰਿ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਦੀਓ ਗੁਰਿ ਅਵਖਧੁ ਉਤਰਿ ਗਇਓ ਸਭੁ ਤਾਪ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
(परमात्मा का नाम दवा है) गुरू ने जिस मनुष्य को हरि-नाम की दवाई दे दी।उसका हरेक किस्म का ताप (दुख-कलेश) दूर हो गया। 1।रहाउ।
ਹਰਿਗੋਬਿੰਦੁ ਰਖਿਓ ਪਰਮੇਸਰਿ ਅਪੁਨੀ ਕਿਰਪਾ ਧਾਰਿ ॥
(कमजोर-दिल लोग देवी की पूजा को चल पड़ते हैं) पर देखो ! (परमात्मा ने) मेहर करके हरि गोबिंद (जी) को स्वयं (चेचक के ताप से) बचा लिया।
ਮਿਟੀ ਬਿਆਧਿ ਸਰਬ ਸੁਖ ਹੋਏ ਹਰਿ ਗੁਣ ਸਦਾ ਬੀਚਾਰਿ ॥੧॥
परमात्मा के गुणों को मन में टिका के हरेक रोग दूर हो जाता है।सारे सुख ही सुख प्राप्त हो जाते हैं। 1।
ਅੰਗੀਕਾਰੁ ਕੀਓ ਮੇਰੈ ਕਰਤੈ ਗੁਰ ਪੂਰੇ ਕੀ ਵਡਿਆਈ ॥
हे नानक ! (कह–) मेरे करतार ने (डोलने से बचा के मुझे) अपने चरणों में जोड़े रखा- यह सारी पूरे गुरू की महानता (के सदका) था।
ਅਬਿਚਲ ਨੀਵ ਧਰੀ ਗੁਰ ਨਾਨਕ ਨਿਤ ਨਿਤ ਚੜੈ ਸਵਾਈ ॥੨॥੧੫॥੨੪॥
गुरू की रखी हुई हरि-नाम सिमरन की नींव कभी डोलने वाली नहीं है।(ये नींव जिस हृदय-धरा पर रखी जाती है।वहाँ) सदा ही बढ़ती जाती है। 2। 15। 24।
ਗੂਜਰੀ ਮਹਲਾ ੫ ॥
गूजरी महला ५ ॥
ਕਬਹੂ ਹਰਿ ਸਿਉ ਚੀਤੁ ਨ ਲਾਇਓ ॥
(हे भाई ! माया के मोह में फंसा जीव) कभी अपना मन परमात्मा (के चरनों) से नहीं जोड़ता।