Sri Guru Granth Sahib Ji — Ang 470 (hindi)
ਸਲੋਕੁ ਮਃ ੧ ॥
श्लोक महला १॥
ਨਾਨਕ ਮੇਰੁ ਸਰੀਰ ਕਾ ਇਕੁ ਰਥੁ ਇਕੁ ਰਥਵਾਹੁ ॥
हे नानक ! चौरासी लाख जूनियों में से शिरोमणी मानस शरीर का एक रथ है और एक रथवाह है (भाव।ये जिंदगी का एक लंबा सफर है।मनुष्य मुसाफिर है;इस लंबे सफर को आसान करने के लिए जीव समय के प्रभाव में अपनी मति के अनुसार किसी ना किसी की अगुवाई में चल रहे हैं।किसी ना किसी का आसरा देख रहे हैं।पर।ज्यों-ज्यों समय गुजरता जा रहा है।जीवों के स्वभाव बदल रहे हैं।इस वास्ते जीवों की अपनी जिंदगी का निशाना।जिंदगी के उद्देश्य भी बदल रहे हैं; इसलिए)
ਜੁਗੁ ਜੁਗੁ ਫੇਰਿ ਵਟਾਈਅਹਿ ਗਿਆਨੀ ਬੁਝਹਿ ਤਾਹਿ ॥
हरेक युग में ये रथ और रथवाह बार-बार बदलते रहते हैं।इस भेद को समझदार मनुष्य समझते हैं।
ਸਤਜੁਗਿ ਰਥੁ ਸੰਤੋਖ ਕਾ ਧਰਮੁ ਅਗੈ ਰਥਵਾਹੁ ॥
सतियुग में मनुष्य के शरीर का रथ ‘संतोख’ होता है और सार्थी ‘धर्म’ है (भाव।जब मनुष्यों का आम तौर पर जिंदगी का निशाना ‘धर्म’ हो।धर्म जीवन उद्देश्य होने के कारण सहज ही ‘संतोख’ उनकी सवारी होता है।‘संतोख’ वाला स्वभाव जीवों के अंदर प्रबल होता है।ये जीव।मानो।सतिजुगी हैं।सतियुग में बस रहे हैं)।
ਤ੍ਰੇਤੈ ਰਥੁ ਜਤੈ ਕਾ ਜੋਰੁ ਅਗੈ ਰਥਵਾਹੁ ॥
त्रेते युग में मनुष्य-शरीर का रथ ‘जत’ है और इस ‘जत’ रूपी रथ के आगे सारथी ‘जोर’ है (भाव।जब मनुष्य की जिंदगी का निशाना ‘शूरवीरता’ (Chivalary) हो।तब सहज ही ‘जत’ उनकी सवारी होता है।‘शूरबीरता’ के प्यारे मनुष्यों के अंदर ‘जती’ रहने का जोश सबसे प्रबल होता है।
ਦੁਆਪੁਰਿ ਰਥੁ ਤਪੈ ਕਾ ਸਤੁ ਅਗੈ ਰਥਵਾਹੁ ॥
द्वापर युग में मानस-शरीर का रथ ‘तप’ है और इस ‘तप’ रूपी रथ के आगे रथवाही ‘सत’ होता है (भाव।जब मनुष्यों की जिंदगी का निशाना ऊँचा आचरण हो।तब सहज ही ‘तप’ उनकी सवारी होता है।‘उच्च आचरण’ के आशिक अपनी शारीरिक इन्द्रियों को विकारों से बचाने के लिए कई तरह के तप।कष्ट झेलते हैं)।
ਕਲਜੁਗਿ ਰਥੁ ਅਗਨਿ ਕਾ ਕੂੜੁ ਅਗੈ ਰਥਵਾਹੁ ॥੧॥
कलियुग में मनुष्य के शरीर का रथ तृष्णा-आग है और इस ‘आग’ रूपी रथ के आगे रथवाह ‘झूठ’ है (भाव।जब जिंदगी का उद्देश्य ‘झूठ’ ठॅगी आदि हो तब सहज ही ‘तृष्णा रूपी आग उनकी सवारी होती है।झूठ-ठॅगी में लिप्त लोगों के अंदर तृष्णा की आग भड़कती रहती है)।
ਮਃ ੧ ॥
महला १॥
ਸਾਮ ਕਹੈ ਸੇਤੰਬਰੁ ਸੁਆਮੀ ਸਚ ਮਹਿ ਆਛੈ ਸਾਚਿ ਰਹੇ ॥ ਸਭੁ ਕੋ ਸਚਿ ਸਮਾਵੈ ॥
सामवेद कहता है कि (भाव।सतियुग में) जगत के मालिक (स्वामी) का नाम ‘सेतंबर’ प्रसिद्ध है (भाव।जब ईश्वर को ‘सेतंबर’ मान के पूजा हो रही थी)। जा सदा ‘सच’ में टिका रहता है; तब हरेक जीव सच में लीन होता है (‘सतजुगि रथु संतोख का धरमु अगै रथवाहु);(जब आम तौर पर हरेक जीव ‘सच’ में।‘धर्म’ में दृढ़ था।तब सतियुग ही था)।
ਰਿਗੁ ਕਹੈ ਰਹਿਆ ਭਰਪੂਰਿ ॥
ऋगवेद (रिगवेद) कहता है कि (भाव।त्रेते युग में) (श्री) राम (जी) का नाम ही सारे देवताओं में सूर्य के समान चमकता है;
ਰਾਮ ਨਾਮੁ ਦੇਵਾ ਮਹਿ ਸੂਰੁ ॥
वही हर जगह व्यापक है।
ਨਾਇ ਲਇਐ ਪਰਾਛਤ ਜਾਹਿ ॥
हे नानक ! (ऋगवेद कहता है कि) (श्री) राम (जी) का नाम लेने से (ही) पाप दूर हो जाते हैं और
ਨਾਨਕ ਤਉ ਮੋਖੰਤਰੁ ਪਾਹਿ ॥
(जीव) तब मुक्ति प्राप्त कर लेते हैं।
ਜੁਜ ਮਹਿ ਜੋਰਿ ਛਲੀ ਚੰਦ੍ਰਾਵਲਿ ਕਾਨੑ ਕ੍ਰਿਸਨੁ ਜਾਦਮੁ ਭਇਆ ॥
यजुर्वेद (में भाव।द्वापर में) जगत के मालिक का नाम साँवल ‘जादमु’ कृष्ण प्रसिद्ध हो गया।जो जबरन चंद्रावलि को छल के ले आया।
ਪਾਰਜਾਤੁ ਗੋਪੀ ਲੈ ਆਇਆ ਬਿੰਦ੍ਰਾਬਨ ਮਹਿ ਰੰਗੁ ਕੀਆ ॥
जो अपनी गोपी (सत्यभामा) के लिए पारजात वृक्ष (इन्द्र के बाग में से) ले आया और जिसने वृंदावन में लीला की।
ਕਲਿ ਮਹਿ ਬੇਦੁ ਅਥਰਬਣੁ ਹੂਆ ਨਾਉ ਖੁਦਾਈ ਅਲਹੁ ਭਇਆ ॥
कलियुग में अथर्वेद प्रधान हो गया है।जगत के मालिक का नाम ‘खुदाय’ और ‘अलहु’ कहा जाने लगा है।
ਨੀਲ ਬਸਤ੍ਰ ਲੇ ਕਪੜੇ ਪਹਿਰੇ ਤੁਰਕ ਪਠਾਣੀ ਅਮਲੁ ਕੀਆ ॥
तुर्कों और पठानों का राज हो गया है जिन्होंने नीले रंग के वस्त्र ले के उनके कपड़े पहने हुए हैं।
ਚਾਰੇ ਵੇਦ ਹੋਏ ਸਚਿਆਰ ॥
चारों वेद सच्चे हो गए हैं (भाव।चारों युगों में जगत के मालिक का नाम अलग-अलग पुकारा जाता रहा है।हरेक समय यही ख्याल बना रहा है कि जो जो मनुष्य ‘सेतंबर’।‘राम’।‘कृष्ण’ और ‘अल्लाह’ कह–कह के जपेगा।वही मुक्ति पाएगा);
ਪੜਹਿ ਗੁਣਹਿ ਤਿਨੑ ਚਾਰ ਵੀਚਾਰ ॥
और जो जो मनुष्य इन वेदों को पढ़ते-विचारते हैं।(भाव।अपने-अपने समय में जो जो मनुष्य इस उपरोक्त विश्वास से अपनी धर्म-पुस्तक पढ़ते व विचारते रहे हैं) वह हुए भी अच्छी युक्तियों (चार-सुंदर; वीचार-दलील।युक्ति) वाले हैं।
ਭਾਉ ਭਗਤਿ ਕਰਿ ਨੀਚੁ ਸਦਾਏ ॥ ਤਉ ਨਾਨਕ ਮੋਖੰਤਰੁ ਪਾਏ ॥੨॥
(पर) हे नानक ! जब मनुष्य प्रेमा भक्ति करके अपने आप को नीच कहलवाता है (विनम्र रहता है) (भाव।आडंबर अहंकार से बचा रहता है) तभी वह मुक्ति प्राप्त करता है। 2।
ਪਉੜੀ ॥
पउड़ी ॥
ਸਤਿਗੁਰ ਵਿਟਹੁ ਵਾਰਿਆ ਜਿਤੁ ਮਿਲਿਐ ਖਸਮੁ ਸਮਾਲਿਆ ॥
मैं अपने सतिगुरू से सदके हूँ।जिसको मिलने के कारण मैं मालिक को याद करता हूँ।
ਜਿਨਿ ਕਰਿ ਉਪਦੇਸੁ ਗਿਆਨ ਅੰਜਨੁ ਦੀਆ ਇਨੑੀ ਨੇਤ੍ਰੀ ਜਗਤੁ ਨਿਹਾਲਿਆ ॥
और जिसने अपनी शिक्षा दे के (मानो) ज्ञान का अंजन दे दिया है (जिसकी बरकति से) मैंने इन आँखों से जगत (की अस्लियत) को देख लिया है कि
ਖਸਮੁ ਛੋਡਿ ਦੂਜੈ ਲਗੇ ਡੁਬੇ ਸੇ ਵਣਜਾਰਿਆ ॥
जो मनुष्य मालिक को बिसार के किसी और में चित्त जोड़ रहे हैं। वह इस संसार (सागर) में डूब गए हैं।
ਸਤਿਗੁਰੂ ਹੈ ਬੋਹਿਥਾ ਵਿਰਲੈ ਕਿਨੈ ਵੀਚਾਰਿਆ ॥
सतगुरु नाविक है किसी विरले ने ही बात जनि है
ਕਰਿ ਕਿਰਪਾ ਪਾਰਿ ਉਤਾਰਿਆ ॥੧੩॥
(मेरे सतिगुरू ने) मेहर करके मुझे (इस संसार समुंद्र से) पार कर दिया है। 13।
ਸਲੋਕੁ ਮਃ ੧ ॥
श्लोक महला १॥
ਸਿੰਮਲ ਰੁਖੁ ਸਰਾਇਰਾ ਅਤਿ ਦੀਰਘ ਅਤਿ ਮੁਚੁ ॥
सिमंल का वृक्ष कितना सीधा।लंबा और मोटा होता है।
ਓਇ ਜਿ ਆਵਹਿ ਆਸ ਕਰਿ ਜਾਹਿ ਨਿਰਾਸੇ ਕਿਤੁ ॥
(पर) वह पंछी जो (फल खाने की) उम्मीद रख के (इस पर) आ के बैठते हैं।वे निराश हो के क्यों जाते हैं।
ਫਲ ਫਿਕੇ ਫੁਲ ਬਕਬਕੇ ਕੰਮਿ ਨ ਆਵਹਿ ਪਤ ॥
इसके पीछे कारण ये है कि पेड़ चाहे इतना लंबा।ऊँचा और मोटा है।पर (इसके) फल फीके होते हैं।और फूल बेस्वादे हैं।पत्ते भी किसी काम नहीं आते।
ਮਿਠਤੁ ਨੀਵੀ ਨਾਨਕਾ ਗੁਣ ਚੰਗਿਆਈਆ ਤਤੁ ॥
हे नानक ! नीचे रहने (विनम्रता) में मिठास है। गुण हैं।विनम्रता सारे गुणों का सार है।भाव।सब से अच्छा गुण है।
ਸਭੁ ਕੋ ਨਿਵੈ ਆਪ ਕਉ ਪਰ ਕਉ ਨਿਵੈ ਨ ਕੋਇ ॥
(चाहे आम तौर पर जगत में) हरेक जीव अपने स्वार्थ के लिए झुकता है।किसी दूसरे की खातिर नहीं।
ਧਰਿ ਤਾਰਾਜੂ ਤੋਲੀਐ ਨਿਵੈ ਸੁ ਗਉਰਾ ਹੋਇ ॥
(ये भी देख लो कि) अगर तराजू पर धर के तौला जाए (भाव।अगर अच्छी तरह परख की जाय फिर भी) नीचे वाला पलड़ा ही भारा होता है।(भाव।जो झुकता है वही बड़ा गिना जाता है)।
ਅਪਰਾਧੀ ਦੂਣਾ ਨਿਵੈ ਜੋ ਹੰਤਾ ਮਿਰਗਾਹਿ ॥
(पर झुकने का भाव।मन से झुकना है।सिर्फ शरीर का झुकाना नहीं है; यदि शरीर के झुकने से कोई विनम्र व नीचा बन जाता होता तो) शिकारी जो मृग मारता है।झुक के दुहरा हो जाता है।
ਸੀਸਿ ਨਿਵਾਇਐ ਕਿਆ ਥੀਐ ਜਾ ਰਿਦੈ ਕੁਸੁਧੇ ਜਾਹਿ ॥੧॥
पर अगर सिर ही निवा दिया जाए।और अंदर से जीव खोटे ही रहें।तो इस झुकने का कोई लाभ नहीं हो सकता। 1।
ਮਃ ੧ ॥
महला १॥
ਪੜਿ ਪੁਸਤਕ ਸੰਧਿਆ ਬਾਦੰ ॥
(पंडित।वेद आदि धार्मिक) पुस्तकें पढ़ के संध्या करता है और (औरों के साथ) चर्चा छेड़ता है।
ਸਿਲ ਪੂਜਸਿ ਬਗੁਲ ਸਮਾਧੰ ॥
मूर्ति पूजता है और बगुले की तरह समाधि लगाता है;
ਮੁਖਿ ਝੂਠ ਬਿਭੂਖਣ ਸਾਰੰ ॥
मुंह से झूठ बोलता है; (पर उस झूठ को) बड़े सुंदर गहनों की तरह चमका-चमका के दिखाता है;
ਤ੍ਰੈਪਾਲ ਤਿਹਾਲ ਬਿਚਾਰੰ ॥
(हर रोज) तीनों वक्त गायत्री मंत्र को विचारता है।
ਗਲਿ ਮਾਲਾ ਤਿਲਕੁ ਲਿਲਾਟੰ ॥
गले में माला रखता है।और माथे पर तिलक लगाता है;
ਦੁਇ ਧੋਤੀ ਬਸਤ੍ਰ ਕਪਾਟੰ ॥
(सदा) दो धोतियां पास रखता है और (संध्या करने के वक्त) सिर पर एक वस्त्र रख लेता है। पर।
ਜੇ ਜਾਣਸਿ ਬ੍ਰਹਮੰ ਕਰਮੰ ॥
अगर ये पंडित ईश्वर (की सिफत सालाह) का काम जानता हो।
ਸਭਿ ਫੋਕਟ ਨਿਸਚਉ ਕਰਮੰ ॥
तो निश्चित तौर पर जान लो कि ये सब काम फोके हैं।
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਨਿਹਚਉ ਧਿਆਵੈ ॥
कह। हे नानक ! (मनुष्य) श्रद्धा धार के रॅब को सिमरे- केवल यही रास्ता गुणकारी है।
ਵਿਣੁ ਸਤਿਗੁਰ ਵਾਟ ਨ ਪਾਵੈ ॥੨॥
(पर) ये रास्ता सतिगुरू के बिना नहीं मिलता। 2।
ਪਉੜੀ ॥
पउड़ी॥
ਕਪੜੁ ਰੂਪੁ ਸੁਹਾਵਣਾ ਛਡਿ ਦੁਨੀਆ ਅੰਦਰਿ ਜਾਵਣਾ ॥
ये सुंदर शरीर और सुंदर रूप (इसी जगत में) (जीवों को) छोड़ के चले जाना है।
ਮੰਦਾ ਚੰਗਾ ਆਪਣਾ ਆਪੇ ਹੀ ਕੀਤਾ ਪਾਵਣਾ ॥
(हरेक जीव ने) अपने-अपने किए हुए अच्छे और बुरे कर्मों का फल खुद भोगना है।
ਹੁਕਮ ਕੀਏ ਮਨਿ ਭਾਵਦੇ ਰਾਹਿ ਭੀੜੈ ਅਗੈ ਜਾਵਣਾ ॥
जिस मनुष्य ने मन-मानी हकूमतें की हैं।उसको आगे मुश्किल घाटियों में से गुजरना पड़ेगा (भाव।अपने किए हुए अत्याचारों के बदले में कष्ट सहने पड़ेंगे)।