Sri Guru Granth Sahib Ji — Ang 458 (hindi)
ਅਪਰਾਧੀ ਮਤਿਹੀਨੁ ਨਿਰਗੁਨੁ ਅਨਾਥੁ ਨੀਚੁ ॥
हे प्रभू ! मैं गुनहगार हूँ।बुद्धिहीन हूँ।गुणहीन हूँ।निआसरा हूँ।बुरे स्वभाव वाला हूँ।
ਸਠ ਕਠੋਰੁ ਕੁਲਹੀਨੁ ਬਿਆਪਤ ਮੋਹ ਕੀਚੁ ॥
हे प्रभू ! मैं विकारी हूँ।कठोर हूँ।नीच कुल वाला हूँ।मोह का कीचड़ मेरे पर हावी है।
ਮਲ ਭਰਮ ਕਰਮ ਅਹੰ ਮਮਤਾ ਮਰਣੁ ਚੀਤਿ ਨ ਆਵਏ ॥
हे प्रभू ! भटकना में पड़ने वाले कर्मों की मैल मुझे लगी हुई है।मेरे अंदर अहंकार है।ममता है (इस वास्ते) मौत मुझे याद नहीं आती।
ਬਨਿਤਾ ਬਿਨੋਦ ਅਨੰਦ ਮਾਇਆ ਅਗਿਆਨਤਾ ਲਪਟਾਵਏ ॥
मैं स्त्री के रंग-तमाशों में माया के मौज-मेलों में (ग़र्क हूँ)।मुझे अज्ञानता चिपकी हुई है।
ਖਿਸੈ ਜੋਬਨੁ ਬਧੈ ਜਰੂਆ ਦਿਨ ਨਿਹਾਰੇ ਸੰਗਿ ਮੀਚੁ ॥
हे प्रभू ! मेरी जवानी ढल रही है।बुढ़ापा बढ़ रहा है।मौत (मेरे) साथ (मेरी जिंदगी के) दिन देख रही है।
ਬਿਨਵੰਤਿ ਨਾਨਕ ਆਸ ਤੇਰੀ ਸਰਣਿ ਸਾਧੂ ਰਾਖੁ ਨੀਚੁ ॥੨॥
तेरा दास नानक (तेरे दर पर) विनती करता है।मुझे तेरी ही आस है।मुझ नीच को गुरू की शरण रख। 2।
ਭਰਮੇ ਜਨਮ ਅਨੇਕ ਸੰਕਟ ਮਹਾ ਜੋਨ ॥
हे प्रभू ! हे मुरारी ! मैं अनेकों जन्मों में भटका हूँ।मैंने कई जूनियों के बड़े दुख सहे हैं।
ਲਪਟਿ ਰਹਿਓ ਤਿਹ ਸੰਗਿ ਮੀਠੇ ਭੋਗ ਸੋਨ ॥
धन और पदार्थों के भोग मुझे मीठे लग रहे हैं।मैं इनके साथ ही चिपका रहता हूँ।
ਭ੍ਰਮਤ ਭਾਰ ਅਗਨਤ ਆਇਓ ਬਹੁ ਪ੍ਰਦੇਸਹ ਧਾਇਓ ॥
अनेकों पापों का भार उठा के मैं भटकता आ रहा हूँ।अनेको परदेसों में (जूनियों में) दौड़ चुका हूँ (दुख ही दुख देखे हैं)।
ਅਬ ਓਟ ਧਾਰੀ ਪ੍ਰਭ ਮੁਰਾਰੀ ਸਰਬ ਸੁਖ ਹਰਿ ਨਾਇਓ ॥
अब मैंने तेरा पल्लू पकड़ा है।और।हे हरी ! तेरे नाम में मुझे सारे सुख मिल गए हैं।
ਰਾਖਨਹਾਰੇ ਪ੍ਰਭ ਪਿਆਰੇ ਮੁਝ ਤੇ ਕਛੂ ਨ ਹੋਆ ਹੋਨ ॥
हे रक्षा करने के समर्थ प्यारे प्रभू ! (संसार समुंद्र से पार लांघने के लिए) मुझसे अब तक कुछ नहीं हो सका।आगे भी कुछ नहीं हो सकेगा।
ਸੂਖ ਸਹਜ ਆਨੰਦ ਨਾਨਕ ਕ੍ਰਿਪਾ ਤੇਰੀ ਤਰੈ ਭਉਨ ॥੩॥
हे नानक ! (कह– हे प्रभू !) जिस मनुष्य पर तेरी कृपा हो जाती है।उसे आत्मिक अडोलता और सुख आनंद प्राप्त हो जाते हैं।वह संसार समुंद्र से पार लांघ जाता है। 3।
ਨਾਮ ਧਾਰੀਕ ਉਧਾਰੇ ਭਗਤਹ ਸੰਸਾ ਕਉਨ ॥
हे भाई ! परमात्मा ने तो वह लोग भी (विकारों से) बचा लिए जिन्होंने सिर्फ अपना नाम ही भगत रखाया हुआ था।(सच्चे) भक्तों को (तो संसार-समुंद्र का) कोई सहम रह ही नहीं सकता।
ਜੇਨ ਕੇਨ ਪਰਕਾਰੇ ਹਰਿ ਹਰਿ ਜਸੁ ਸੁਨਹੁ ਸ੍ਰਵਨ ॥
(सो।हे भाई !) जिस तरह भी हो सके अपने कानों से परमात्मा की सिफत सालाह सुनते रहा करो।
ਸੁਨਿ ਸ੍ਰਵਨ ਬਾਨੀ ਪੁਰਖ ਗਿਆਨੀ ਮਨਿ ਨਿਧਾਨਾ ਪਾਵਹੇ ॥
हे ज्ञानवान बंदे ! अपने कानों से तू प्रभू की सिफत सालाह की बाणी सुन (इस तरह तू) मन में नाम-खजाना ढूँढलेगा।
ਹਰਿ ਰੰਗਿ ਰਾਤੇ ਪ੍ਰਭ ਬਿਧਾਤੇ ਰਾਮ ਕੇ ਗੁਣ ਗਾਵਹੇ ॥
(हे भाई ! भाग्यशाली हैं वह मनुष्य जो) सृजनहार हरी प्रभू के प्रेम रंग में मस्त हो के उस के गुण गाते हैं।
ਬਸੁਧ ਕਾਗਦ ਬਨਰਾਜ ਕਲਮਾ ਲਿਖਣ ਕਉ ਜੇ ਹੋਇ ਪਵਨ ॥
(हे भाई !) अगर सारी धरती कागज बन जाए।और सारी बनस्पति कलम बन जाए।और हवा लिखने के लिए (लिखारी) बन जाए।
ਬੇਅੰਤ ਅੰਤੁ ਨ ਜਾਇ ਪਾਇਆ ਗਹੀ ਨਾਨਕ ਚਰਣ ਸਰਨ ॥੪॥੫॥੮॥
तो भी बेअंत परमात्मा के गुणों का अंत नहीं पाया जा सकता।हे नानक ! (कह– मैंने उस परमात्मा के) चरणों का आसरा लिया है। 4। 5। 8।
ਆਸਾ ਮਹਲਾ ੫ ॥
आसा महला ५ ॥
ਪੁਰਖ ਪਤੇ ਭਗਵਾਨ ਤਾ ਕੀ ਸਰਣਿ ਗਹੀ ॥
(हे भाई !) जो भगवान सब जीवों का पति है मालिक है जिन संत जनों ने उसका आसरा लिया हुआ है
ਨਿਰਭਉ ਭਏ ਪਰਾਨ ਚਿੰਤਾ ਸਗਲ ਲਹੀ ॥
(उस आसरे की बरकति से) उनकी जीवात्मा (दुनिया के) डरों से रहित हो गई है। उनकी हरेक किस्म की चिंता दूर हो गई है।
ਮਾਤ ਪਿਤਾ ਸੁਤ ਮੀਤ ਸੁਰਿਜਨ ਇਸਟ ਬੰਧਪ ਜਾਣਿਆ ॥
उन्होंने भगवान को अपना माता-पिता-पुत्र-मित्र-सज्जन-रिश्तेदार समझ रखा है।
ਗਹਿ ਕੰਠਿ ਲਾਇਆ ਗੁਰਿ ਮਿਲਾਇਆ ਜਸੁ ਬਿਮਲ ਸੰਤ ਵਖਾਣਿਆ ॥
गुरू ने उन्हें भगवान के चरणों में जोड़ दिया है।(भगवान ने उनकी बाँह) पकड़ के उनको अपने गले से लगा लिया है।वह संत-जन परमात्मा की सिफत उचारते रहते हैं।
ਬੇਅੰਤ ਗੁਣ ਅਨੇਕ ਮਹਿਮਾ ਕੀਮਤਿ ਕਛੂ ਨ ਜਾਇ ਕਹੀ ॥
हे भाई ! उस परमात्मा के बेअंत गुण हैं।अनेकों वडिआईआं हैं।उस (की बुर्जुगियत) का रत्ती भर भी मूल्य नहीं आँका जा सकता।
ਪ੍ਰਭ ਏਕ ਅਨਿਕ ਅਲਖ ਠਾਕੁਰ ਓਟ ਨਾਨਕ ਤਿਸੁ ਗਹੀ ॥੧॥
वह प्रभू अपने एक स्वरूप से अनेक रूप बना हुआ है।उसके सही स्वरूप का बयान नहीं किया जा सकता।वह सबका मालिक है।हे नानक ! (कह– संत-जनों ने) उस परमातमा का आसरा लिया हुआ है। 1।
ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਬਨੁ ਸੰਸਾਰੁ ਸਹਾਈ ਆਪਿ ਭਏ ॥
हे भाई ! परमात्मा स्वयं जिस मनुष्य का मददगार बनता है।उसके वास्ते संसार-समुंद्र आत्मिक जीवन देने वाला जल बन जाता है।
ਰਾਮ ਨਾਮੁ ਉਰ ਹਾਰੁ ਬਿਖੁ ਕੇ ਦਿਵਸ ਗਏ ॥
जो मनुष्य परमात्मा के नाम को अपने हृदय का हार बना लेता है।उसके वास्ते (आत्मिक मौत लाने वाली माया के मोह के) जहर खाने वाले दिन बीत जाते हैं।
ਗਤੁ ਭਰਮ ਮੋਹ ਬਿਕਾਰ ਬਿਨਸੇ ਜੋਨਿ ਆਵਣ ਸਭ ਰਹੇ ॥
उसकी भटकना समाप्त हो जाती है।उसके अंदर मोह और विकार नाश हो जाते हैं।उसके जन्मों के चक्कर समाप्त हो जाते हैं।
ਅਗਨਿ ਸਾਗਰ ਭਏ ਸੀਤਲ ਸਾਧ ਅੰਚਲ ਗਹਿ ਰਹੇ ॥
जो मनुष्य गुरू का पल्ला पकड़े रखता है।विकारों की आग से भरा हुआ संसार-समुंद्र उसके वास्ते ठंडा-ठार हो जाता है।
ਗੋਵਿੰਦ ਗੁਪਾਲ ਦਇਆਲ ਸੰਮ੍ਰਿਥ ਬੋਲਿ ਸਾਧੂ ਹਰਿ ਜੈ ਜਏ ॥
हे नानक ! गुरू की शरण पड़ कर गोविंद गोपाल दयालु समर्थ परमात्मा की जै-जैकार करता रहा कर।
ਨਾਨਕ ਨਾਮੁ ਧਿਆਇ ਪੂਰਨ ਸਾਧਸੰਗਿ ਪਾਈ ਪਰਮ ਗਤੇ ॥੨॥
गुरू की संगति में रहके पूर्ण परमात्मा का नाम सिमर के सबसे ऊँची आत्मिक अवस्था प्राप्त कर ली जाती है। 2।
ਜਹ ਦੇਖਉ ਤਹ ਸੰਗਿ ਏਕੋ ਰਵਿ ਰਹਿਆ ॥
हे भाई ! मैं जिधर देखता हूँ।उधर ही मेरे साथ मुझे एक परमात्मा ही मौजूद दिखता है।
ਘਟ ਘਟ ਵਾਸੀ ਆਪਿ ਵਿਰਲੈ ਕਿਨੈ ਲਹਿਆ ॥
वह स्वयं ही एक शरीर में निवास रखता है।पर किसी विरले ने ये बात समझी है।
ਜਲਿ ਥਲਿ ਮਹੀਅਲਿ ਪੂਰਿ ਪੂਰਨ ਕੀਟ ਹਸਤਿ ਸਮਾਨਿਆ ॥
वह व्यापक प्रभू पानी में धरती में अंतरिक्ष में हर जगह बस रहा है।कीड़ी में हाथी में एक सा ही।
ਆਦਿ ਅੰਤੇ ਮਧਿ ਸੋਈ ਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦੀ ਜਾਨਿਆ ॥
जगत-रचना के आरम्भ में वह स्वयं ही था।रचना के अंत में भी वह स्वयं ही होगा।अब भी वह स्वयं ही स्वयं है।गुरू की किरपा से ही इस बात की समझ आती है।
ਬ੍ਰਹਮੁ ਪਸਰਿਆ ਬ੍ਰਹਮ ਲੀਲਾ ਗੋਵਿੰਦ ਗੁਣ ਨਿਧਿ ਜਨਿ ਕਹਿਆ ॥
हे भाई ! हर तरफ परमात्मा का ही पसारा है।परमात्मा की ही रची हुई खेल चल रही है।वह परमात्मा सारे गुणों का खजाना है।किसी विरले सेवक ने उसको जपा है।
ਸਿਮਰਿ ਸੁਆਮੀ ਅੰਤਰਜਾਮੀ ਹਰਿ ਏਕੁ ਨਾਨਕ ਰਵਿ ਰਹਿਆ ॥੩॥
हे नानक ! हरेक के दिल की जानने वाले उस मालिक को सिमरता रह।वह हरी खुद ही हर जगह मौजूद है। 3।
ਦਿਨੁ ਰੈਣਿ ਸੁਹਾਵੜੀ ਆਈ ਸਿਮਰਤ ਨਾਮੁ ਹਰੇ ॥
हे भाई ! मनुष्य के लिए वह दिन सोहाना आता है वह रात सुहावनी आती है जब वह परमात्मा का नाम सिमरता है।