Sri Guru Granth Sahib Ji — Ang 410 (hindi)
ਅਲਖ ਅਭੇਵੀਐ ਹਾਂ ॥
जिसका सही स्वरूप बताया नहीं जा सकता।जिसका भेद पाया नहीं जा सकता।
ਤਾਂ ਸਿਉ ਪ੍ਰੀਤਿ ਕਰਿ ਹਾਂ ॥
हे मेरे मन ! उस परमात्मा से प्यार डाल।
ਬਿਨਸਿ ਨ ਜਾਇ ਮਰਿ ਹਾਂ ॥
जो कभी नाश नहीं होता जो ना पैदा होता है ना मरता है।
ਗੁਰ ਤੇ ਜਾਨਿਆ ਹਾਂ ॥
हे नानक ! (कह–) हे मेरे मन ! जिस मनुष्य ने गुरू के जरिएउस परमात्मा के साथ गहरी सांझ डाल ली।
ਨਾਨਕ ਮਨੁ ਮਾਨਿਆ ਮੇਰੇ ਮਨਾ ॥੨॥੩॥੧੫੯॥
उसका मन सदा (उसकी याद में) रमा रहता है। 2। 3। 159।
ਆਸਾਵਰੀ ਮਹਲਾ ੫ ॥
आसावरी महला ५ ॥
ਏਕਾ ਓਟ ਗਹੁ ਹਾਂ ॥
हे मेरे मन ! एक परमात्मा का ही पल्ला पकड़।
ਗੁਰ ਕਾ ਸਬਦੁ ਕਹੁ ਹਾਂ ॥
सदा गुरू की बाणी उचारता रह।
ਆਗਿਆ ਸਤਿ ਸਹੁ ਹਾਂ ॥
हे मेरे मन ! परमात्मा की रजा को मीठी करके मान।
ਮਨਹਿ ਨਿਧਾਨੁ ਲਹੁ ਹਾਂ ॥
(हे भाई !) अपने मन में बसते सारे गुणों के खजाने प्रभू को पा ले।
ਸੁਖਹਿ ਸਮਾਈਐ ਮੇਰੇ ਮਨਾ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
हे मेरे मन ! (इस तरह सदा) आत्मिक आनंद में लीन रहना है। 1।रहाउ।
ਜੀਵਤ ਜੋ ਮਰੈ ਹਾਂ ॥
हे मेरे मन ! जो मनुष्य काम-काज करता हुआ माया के मोह से अछोह रहता है।
ਦੁਤਰੁ ਸੋ ਤਰੈ ਹਾਂ ॥
वह मनुष्य इस संसार-समुंद्र से पार लांघ जाता है।जिसमें से पार लांघना बहुत मुश्किल है।
ਸਭ ਕੀ ਰੇਨੁ ਹੋਇ ਹਾਂ ॥
वह मनुष्य सभी के चरणों की धूल हुआ रहता है।
ਨਿਰਭਉ ਕਹਉ ਸੋਇ ਹਾਂ ॥
(हे मेरे मन ! अगर गुरू की कृपा हो तो) मैं भी उस निरभय परमात्मा की सिफत सालाह करता रहूँ।
ਮਿਟੇ ਅੰਦੇਸਿਆ ਹਾਂ ॥
उसके सारे चिंता-फिक्र मिट जाते हैं-
ਸੰਤ ਉਪਦੇਸਿਆ ਮੇਰੇ ਮਨਾ ॥੧॥
हे मेरे मन ! जिस मनुष्य को सतिगुरू की शिक्षा प्राप्त हो जाती है 1।
ਜਿਸੁ ਜਨ ਨਾਮ ਸੁਖੁ ਹਾਂ ॥
हे मेरे मन ! जिस मनुष्य को परमात्मा के नाम का अनंद प्राप्त हो जाता है।
ਤਿਸੁ ਨਿਕਟਿ ਨ ਕਦੇ ਦੁਖੁ ਹਾਂ ॥
कभी कोई दुख उसके नजदीक नहीं फटकता।
ਜੋ ਹਰਿ ਹਰਿ ਜਸੁ ਸੁਨੇ ਹਾਂ ॥
हे मेरे मन ! जो मनुष्य परमात्मा की सिफत सालाह सदा सुनता रहता है
ਸਭੁ ਕੋ ਤਿਸੁ ਮੰਨੇ ਹਾਂ ॥
(दुनिया में) हरेक मनुष्य उसका आदर-सत्कार करता है।
ਸਫਲੁ ਸੁ ਆਇਆ ਹਾਂ ॥
हे नानक ! (कह–) हे मेरे मन ! जगत में पैदा हुआ वही मनुष्य कामयाब जीवन वाला है
ਨਾਨਕ ਪ੍ਰਭ ਭਾਇਆ ਮੇਰੇ ਮਨਾ ॥੨॥੪॥੧੬੦॥
जो परमात्मा को प्यारा लग गया है। 2। 4। 160।
ਆਸਾਵਰੀ ਮਹਲਾ ੫ ॥
आसावरी महला ५ ॥
ਮਿਲਿ ਹਰਿ ਜਸੁ ਗਾਈਐ ਹਾਂ ॥
हे भाई ! (साध-संगति में) मिल के परमात्मा के सिफत सालाह के गीत गाने चाहिए।
ਪਰਮ ਪਦੁ ਪਾਈਐ ਹਾਂ ॥
(इस तरह) आत्मिक जीवन का सबसे ऊँचा दर्जा हासिल हो जाता है।
ਉਆ ਰਸ ਜੋ ਬਿਧੇ ਹਾਂ ॥
जो मनुष्य (सिफत सालाह के) उस स्वाद में रम जाता है।
ਤਾ ਕਉ ਸਗਲ ਸਿਧੇ ਹਾਂ ॥
उसे (मानो) सारी ही सिद्धियां प्राप्त हो जाती हैं।
ਅਨਦਿਨੁ ਜਾਗਿਆ ਹਾਂ ॥
वह हर समय (विकारों के हमलों से) सुचेत रहता है।
ਨਾਨਕ ਬਡਭਾਗਿਆ ਮੇਰੇ ਮਨਾ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
हे नानक ! (कह) हे मेरे मन ! (जो मनुष्य प्रभू की सिफत सालाह करता है।वह मनुष्य) बहुत बड़ा भाग्यशाली हो जाता है। 1।रहाउ।
ਸੰਤ ਪਗ ਧੋਈਐ ਹਾਂ ॥
हे भाई ! संत जनों के चरण धोने चाहिए (स्वैभाव त्याग के संतों के चरण पड़ना चाहिए।
ਦੁਰਮਤਿ ਖੋਈਐ ਹਾਂ ॥
इस तरह मन की) खोटी मति दूर हो जाती है।
ਦਾਸਹ ਰੇਨੁ ਹੋਇ ਹਾਂ ॥
हे भाई ! प्रभू के सेवकों की चरण धूड़ बना रह
ਬਿਆਪੈ ਦੁਖੁ ਨ ਕੋਇ ਹਾਂ ॥
(इस तरह) कोई दुख अपना जोर नहीं डाल सकता।
ਭਗਤਾਂ ਸਰਨਿ ਪਰੁ ਹਾਂ ॥
हे भाई ! संत जनों की शरण पड़ा रह।
ਜਨਮਿ ਨ ਕਦੇ ਮਰੁ ਹਾਂ ॥
जनम-मरण का चक्कर नहीं रहेगा।
ਅਸਥਿਰੁ ਸੇ ਭਏ ਹਾਂ ॥
वे अडोल आत्मिक जीवन वाले बन जाते हैं।
ਹਰਿ ਹਰਿ ਜਿਨੑ ਜਪਿ ਲਏ ਮੇਰੇ ਮਨਾ ॥੧॥
हे मेरे मन ! जो मनुष्य सदा परमात्मा का नाम जपते हैं। 1।
ਸਾਜਨੁ ਮੀਤੁ ਤੂੰ ਹਾਂ ॥
(हे मेरे प्रभू !) तू ही (मेरा) सज्जन है।तू ही (मेरा) मित्र है।
ਨਾਮੁ ਦ੍ਰਿੜਾਇ ਮੂੰ ਹਾਂ ॥
मुझे (मेरे दिल में अपना) नाम पक्का करके टिका दे।
ਤਿਸੁ ਬਿਨੁ ਨਾਹਿ ਕੋਇ ਹਾਂ ॥
(हे भाई !) उस परमात्मा के बिना और कोई (असल सज्जन-मित्र) नहीं है।
ਮਨਹਿ ਅਰਾਧਿ ਸੋਇ ਹਾਂ ॥
सदा उस (प्रभू) को ही सिमरता रह।
ਨਿਮਖ ਨ ਵੀਸਰੈ ਹਾਂ ॥
(वह परमात्मा) आँख झपकने जितने समय के लिए भी भूलना नहीं चाहिए
ਤਿਸੁ ਬਿਨੁ ਕਿਉ ਸਰੈ ਹਾਂ ॥
(क्योंकि) उस (की याद) के बिना जीवन सुखी नहीं गुजरता।
ਗੁਰ ਕਉ ਕੁਰਬਾਨੁ ਜਾਉ ਹਾਂ ॥
हे मेरे मन ! मैं (नानक) गुरू से सदके जाता हूँ (क्योंकि गुरू की कृपा से ही)
ਨਾਨਕੁ ਜਪੇ ਨਾਉ ਮੇਰੇ ਮਨਾ ॥੨॥੫॥੧੬੧॥
नानक (परमात्मा का) नाम जपता है। 2। 5। 161।
ਆਸਾਵਰੀ ਮਹਲਾ ੫ ॥
आसावरी महला ५ ॥
ਕਾਰਨ ਕਰਨ ਤੂੰ ਹਾਂ ॥
हे मेरे मन ! (प्रभू दर पर ऐसे अरदास कर- हे प्रभू !) तू सारे जगत का रचनहार है
ਅਵਰੁ ਨਾ ਸੁਝੈ ਮੂੰ ਹਾਂ ॥
(तेरे बिना) मुझे कोई और नहीं सूझता (जो ये ताकत रखता हो)।
ਕਰਹਿ ਸੁ ਹੋਈਐ ਹਾਂ ॥
हे प्रभू ! जो कुछ तू करता है वही (जगत में) वरतता है।
ਸਹਜਿ ਸੁਖਿ ਸੋਈਐ ਹਾਂ ॥
आत्मिक अडोलता में, आनंद में लीन रह सकते हैं।
ਧੀਰਜ ਮਨਿ ਭਏ ਹਾਂ ॥
मन में हौसला बंध जाता है-
ਪ੍ਰਭ ਕੈ ਦਰਿ ਪਏ ਮੇਰੇ ਮਨਾ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
हे मेरे मन ! (अगर अपनी चतुराईआं छोड़ के) परमात्मा के दर पर गिर पड़ें तो 1।
ਸਾਧੂ ਸੰਗਮੇ ਹਾਂ ॥
हे मेरे मन ! गुरू की संगति में रहने से
ਪੂਰਨ ਸੰਜਮੇ ਹਾਂ ॥
वह जुगति पूरी तरह से आ जाती है जिससे ज्ञानेन्द्रियां वश में आ जाती हैं।
ਜਬ ਤੇ ਛੁਟੇ ਆਪ ਹਾਂ ॥
हे मन ! जिस वक्त (मनुष्य के अंदर से) अहंकार समाप्त हो जाता है (और गुरू की ओट ठीक लगने लगती है)
ਤਬ ਤੇ ਮਿਟੇ ਤਾਪ ਹਾਂ ॥
उस वक्त से (मन के) सारे दुख कलेश दूर हो जाते हैं।
ਕਿਰਪਾ ਧਾਰੀਆ ਹਾਂ ॥
सो हे मेरे मन ! (गुरू की संगति में रहके प्रभू-दर पर अरदास कर।कह–) हे जगत के मालिक प्रभू ! मेरे पर मेहर कर।
ਪਤਿ ਰਖੁ ਬਨਵਾਰੀਆ ਮੇਰੇ ਮਨਾ ॥੧॥
मेरी (शरण पड़े की) इज्जत रख। 1।
ਇਹੁ ਸੁਖੁ ਜਾਨੀਐ ਹਾਂ ॥
इसे ही सुख (का मूल) समझना चाहिए।
ਹਰਿ ਕਰੇ ਸੁ ਮਾਨੀਐ ਹਾਂ ॥
हे मेरे मन ! जो कुछ परमात्मा करता है उसे (मीठा करके) मानना चाहिए।
ਮੰਦਾ ਨਾਹਿ ਕੋਇ ਹਾਂ ॥
उसको (जगत में) कोई बुरा नहीं दिखता-
ਸੰਤ ਕੀ ਰੇਨ ਹੋਇ ਹਾਂ ॥
हे मन ! जो मनुष्य संत जनों की चरण-धूड़ बनता है
ਆਪੇ ਜਿਸੁ ਰਖੈ ਹਾਂ ॥
हे मेरे मन ! परमात्मा स्वयं ही जिस मनुष्य को (विकारों से) बचाता है
ਹਰਿ ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਸੋ ਚਖੈ ਮੇਰੇ ਮਨਾ ॥੨॥
वह मनुष्य आत्मिक जीवन देने वाला हरि-नाम-जल पीता है। 2।
ਜਿਸ ਕਾ ਨਾਹਿ ਕੋਇ ਹਾਂ ॥
हे मेरे मन ! जिस मनुष्य का कोई भी सहाई नहीं बनता
ਤਿਸ ਕਾ ਪ੍ਰਭੂ ਸੋਇ ਹਾਂ ॥
(अगर वह प्रभू की शरण में आ पड़े तो) वह प्रभू उसका रखवाला बन जाता है।
ਅੰਤਰਗਤਿ ਬੁਝੈ ਹਾਂ ॥
वह परमात्मा हरेक के दिल की बात जान लेता है।
ਸਭੁ ਕਿਛੁ ਤਿਸੁ ਸੁਝੈ ਹਾਂ ॥
उसको हरेक जीव की हरेक मनोकामना की समझ आ जाती है।
ਪਤਿਤ ਉਧਾਰਿ ਲੇਹੁ ਹਾਂ ॥
(इस वास्ते) हे मेरे मन ! परमात्मा के दर पर यूँ अरजोई कर- हे प्रभू ! (हमें विकारों में) गिरे हुए जीवों को (विकारों से) बचा ले।
ਨਾਨਕ ਅਰਦਾਸਿ ਏਹੁ ਮੇਰੇ ਮਨਾ ॥੩॥੬॥੧੬੨॥
(तेरे दर पर।मेरी) नानक की यही अरदास है। 3। 6। 162।
ਆਸਾਵਰੀ ਮਹਲਾ ੫ ਇਕਤੁਕਾ ॥
आसावरी महला ५ इकतुका ॥
ਓਇ ਪਰਦੇਸੀਆ ਹਾਂ ॥
जगत में चार दिनों के लिए आए हे जीव !
ਸੁਨਤ ਸੰਦੇਸਿਆ ਹਾਂ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ये संदेश ध्यान से सुन। 1।रहाउ।
ਜਾ ਸਿਉ ਰਚਿ ਰਹੇ ਹਾਂ ॥
(हे भाई ! तुझसे पहले यहाँ पर आए हुए जीव) जिस माया के मोह में फंसे रहे।