Sri Guru Granth Sahib Ji — Ang 402 (hindi)
ਪੁਤ੍ਰ ਕਲਤ੍ਰ ਗ੍ਰਿਹ ਸਗਲ ਸਮਗ੍ਰੀ ਸਭ ਮਿਥਿਆ ਅਸਨਾਹਾ ॥੧॥
पुत्र स्त्री घर का सारा सामान- इनसे मोह सारा झूठा है। 1।
ਰੇ ਮਨ ਕਿਆ ਕਰਹਿ ਹੈ ਹਾ ਹਾ ॥
हे मेरे मन ! (माया का पसारा देख के क्या खुशियां मना रहा है तू) क्या आहा आहा करता फिरता है।
ਦ੍ਰਿਸਟਿ ਦੇਖੁ ਜੈਸੇ ਹਰਿਚੰਦਉਰੀ ਇਕੁ ਰਾਮ ਭਜਨੁ ਲੈ ਲਾਹਾ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ध्यान से देख ! ये सारा पसारा धूँएं के पहाड़ जैसा है।परमात्मा का भजन किया कर।सिर्फ इसी से (मनुष्य जीवन में) लाभ (कमाया जा सकता है)। 1।रहाउ।
ਜੈਸੇ ਬਸਤਰ ਦੇਹ ਓਢਾਨੇ ਦਿਨ ਦੋਇ ਚਾਰਿ ਭੋਰਾਹਾ ॥
हे मन ! (ये जगत पसारा यूँ ही है) जैसे शरीर पर पहने हुए कपड़े।दो चार दिनों में ही पुराने हो जाते हैं।
ਭੀਤਿ ਊਪਰੇ ਕੇਤਕੁ ਧਾਈਐ ਅੰਤਿ ਓਰਕੋ ਆਹਾ ॥੨॥
हे मन ! दीवार पर कहाँ तक दौड़ सकते हैं।आखिर उसका आखिरी सिरा आ ही जाता है (जिंदगी के गिने-चुने स्वाश अवश्य ही समाप्त होने हैं)। 2।
ਜੈਸੇ ਅੰਭ ਕੁੰਡ ਕਰਿ ਰਾਖਿਓ ਪਰਤ ਸਿੰਧੁ ਗਲਿ ਜਾਹਾ ॥
हे मन ! (ये उम्र ऐसे ही है) जैसे पानी का कुण्ड बना के रखा हो।और उसमें नमक पड़ते सार ही वह गल जाता है।
ਆਵਗਿ ਆਗਿਆ ਪਾਰਬ੍ਰਹਮ ਕੀ ਉਠਿ ਜਾਸੀ ਮੁਹਤ ਚਸਾਹਾ ॥੩॥
हे मन ! जब (जिसे) परमात्मा का हुकम (बुलावा) आएगा।वह उसी वक्त उठ के चल पड़ेगा। 3।
ਰੇ ਮਨ ਲੇਖੈ ਚਾਲਹਿ ਲੇਖੈ ਬੈਸਹਿ ਲੇਖੈ ਲੈਦਾ ਸਾਹਾ ॥
हे मेरे मन ! तू अपने गिने-चुने स्वासों के अंदर ही जगत में चलता फिरता है और बैठता है (गिने-चुने) लेख के मुताबिक ही तू सांस लेता है।(ये आखिर समाप्त हो जाने हैं)।
ਸਦਾ ਕੀਰਤਿ ਕਰਿ ਨਾਨਕ ਹਰਿ ਕੀ ਉਬਰੇ ਸਤਿਗੁਰ ਚਰਣ ਓਟਾਹਾ ॥੪॥੧॥੧੨੩॥
हे नानक ! सदा परमात्मा की सिफत सालाह करता रह।जो मनुष्य गुरू के चरणों का आसरा लेते हैं (और प्रभू की सिफत सालाह करते हैं) वह (माया के मोह में फंसने से) बच जाते हैं। 4। 1। 123।
ਆਸਾ ਮਹਲਾ ੫ ॥
आसा महला ५ ॥
ਅਪੁਸਟ ਬਾਤ ਤੇ ਭਈ ਸੀਧਰੀ ਦੂਤ ਦੁਸਟ ਸਜਨਈ ॥
(हे भाई ! जब गुरू से मिलाप हुआ तो मेरी हरेक) उलट बात भी सीधी हो गई (मेरे पहले) बुरे वैरी (अब) सज्जन-मित्र बन गए।
ਅੰਧਕਾਰ ਮਹਿ ਰਤਨੁ ਪ੍ਰਗਾਸਿਓ ਮਲੀਨ ਬੁਧਿ ਹਛਨਈ ॥੧॥
(मेरे मन के) घुप अंधेरे में (गुरू का बख्शा हुआ ज्ञान-) रतन चमक पड़ा है।(विकारों से) मैली हो चुकी मेरी अकल साफ-सुथरी हो गई। 1।
ਜਉ ਕਿਰਪਾ ਗੋਬਿੰਦ ਭਈ ॥
हे भाई ! जब मेरे पर गोबिंद की कृपा हुई।
ਸੁਖ ਸੰਪਤਿ ਹਰਿ ਨਾਮ ਫਲ ਪਾਏ ਸਤਿਗੁਰ ਮਿਲਈ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
मैं सतिगुरू को मिला (और सतिगुरू के मिलाप की बरकति से) फल (के तौर पर) मुझे आत्मिक आनंद की दौलत और परमात्मा के नाम की प्राप्ति हो गई। 1।रहाउ।
ਮੋਹਿ ਕਿਰਪਨ ਕਉ ਕੋਇ ਨ ਜਾਨਤ ਸਗਲ ਭਵਨ ਪ੍ਰਗਟਈ ॥
(हे भाई ! गुरू से मिलाप के पहले) मुझ नकारे को कोई नहीं था जानता।अब मैं सारे भवनों में श्रेष्ठ हो गया हूँ।
ਸੰਗਿ ਬੈਠਨੋ ਕਹੀ ਨ ਪਾਵਤ ਹੁਣਿ ਸਗਲ ਚਰਣ ਸੇਵਈ ॥੨॥
(पहले) मैं किसी के पास बैठने के काबिल नहीं था।अब सारी लुकाई मेरे चरणों की सेवा करने लग पड़ी है। 2।
ਆਢ ਆਢ ਕਉ ਫਿਰਤ ਢੂੰਢਤੇ ਮਨ ਸਗਲ ਤ੍ਰਿਸਨ ਬੁਝਿ ਗਈ ॥
(हे भाई ! गुरू-मिलाप से पहले तृष्णा अधीन हो के) मैं आधी-आधी दमड़ी को ढूँढता-फिरता था (गुरू की बरकति से) मेरे मन की सारी तृष्णा बुझ गई है।
ਏਕੁ ਬੋਲੁ ਭੀ ਖਵਤੋ ਨਾਹੀ ਸਾਧਸੰਗਤਿ ਸੀਤਲਈ ॥੩॥
पहले मैं (किसी का) एक भी (कड़वा) बोल सह नहीं सकता था।साध-संगति के सदका अब मेरा दिल ठंडा-ठार हो गया है। 3।
ਏਕ ਜੀਹ ਗੁਣ ਕਵਨ ਵਖਾਨੈ ਅਗਮ ਅਗਮ ਅਗਮਈ ॥
(हे भाई ! गोबिंद की अपार कृपा से मुझे सतिगुरू मिला।उस गोबिंद के) कौन-कौन से गुण (उपकार) मेरी ये एक जीभ बयान करे।वह अपहुँच है अपहुँच है अपहुँच है (उसके सारे गुण-उपकार बताए नहीं जा सकते)।
ਦਾਸੁ ਦਾਸ ਦਾਸ ਕੋ ਕਰੀਅਹੁ ਜਨ ਨਾਨਕ ਹਰਿ ਸਰਣਈ ॥੪॥੨॥੧੨੪॥
हे नानक ! (सिर्फ यही कहता रह -) हे हरी ! मैं दास तेरी शरण आया हूँ।मुझे अपने दासों के दासों का दास बनाए रख। 4। 2। 124।
ਆਸਾ ਮਹਲਾ ੫ ॥
आसा महला ५ ॥
ਰੇ ਮੂੜੇ ਲਾਹੇ ਕਉ ਤੂੰ ਢੀਲਾ ਢੀਲਾ ਤੋਟੇ ਕਉ ਬੇਗਿ ਧਾਇਆ ॥
हे (मेरे) मूर्ख (मन) ! (आत्मिक जीवन के) लाभ (वाले काम) के लिए तू बहुत आलसी है पर (आत्मिक जीवन की राशि के) घाटे वास्ते तू जल्दी उठ दौड़ता है !
ਸਸਤ ਵਖਰੁ ਤੂੰ ਘਿੰਨਹਿ ਨਾਹੀ ਪਾਪੀ ਬਾਧਾ ਰੇਨਾਇਆ ॥੧॥
हे पापी ! तू सस्ता सौदा लेता नहीं।(विकारों के) करजे के बोझमें बंधा हुआ है। 1।
ਸਤਿਗੁਰ ਤੇਰੀ ਆਸਾਇਆ ॥
हे गुरू ! मुझे तेरी (सहायता) की उम्मीद है।
ਪਤਿਤ ਪਾਵਨੁ ਤੇਰੋ ਨਾਮੁ ਪਾਰਬ੍ਰਹਮ ਮੈ ਏਹਾ ਓਟਾਇਆ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
हे परमात्मा ! (मैं विकारी तो बहुत हूँ।पर) मुझे यही सहारा है कि तेरा नाम विकारों में गिरे हुए को पवित्र करने वाला है। 1।रहाउ।
ਗੰਧਣ ਵੈਣ ਸੁਣਹਿ ਉਰਝਾਵਹਿ ਨਾਮੁ ਲੈਤ ਅਲਕਾਇਆ ॥
हे मूर्ख ! तू गंदे गीत सुनता है और (सुन के) मस्त होता है।परमात्मा का नाम लेते हुए तू आलस करता है
ਨਿੰਦ ਚਿੰਦ ਕਉ ਬਹੁਤੁ ਉਮਾਹਿਓ ਬੂਝੀ ਉਲਟਾਇਆ ॥੨॥
किसी की निंदा की सोच से भी तुझे बहुत चाव चढ़ता है।हे मूर्ख ! तूने हरेक बात उलटी ही समझी हुई है। 2।
ਪਰ ਧਨ ਪਰ ਤਨ ਪਰ ਤੀ ਨਿੰਦਾ ਅਖਾਧਿ ਖਾਹਿ ਹਰਕਾਇਆ ॥
हे मूर्ख ! तू पराया धन (चुराता है)।पराया रूप (बुरी निगाह से ताकता है)।पराई निंदा (करता है।तू लोभ से) हलकाया हुआ है।वही चीजें खाता है जो तुझे नहीं खानी चाहिए।
ਸਾਚ ਧਰਮ ਸਿਉ ਰੁਚਿ ਨਹੀ ਆਵੈ ਸਤਿ ਸੁਨਤ ਛੋਹਾਇਆ ॥੩॥
हे मूर्ख ! सदा साथ निभने वाले धर्म के साथ तेरा प्यार नहीं पड़ता।सच-उपदेश सुनने में तुझे खिझ लगती है। 3।
ਦੀਨ ਦਇਆਲ ਕ੍ਰਿਪਾਲ ਪ੍ਰਭ ਠਾਕੁਰ ਭਗਤ ਟੇਕ ਹਰਿ ਨਾਇਆ ॥
हे नानक ! (कह–) रे दीनों पर दया करने वाले ठाकुर ! हे कृपा के घर प्रभू ! तेरे भक्तों को तेरे नाम का सहारा है।
ਨਾਨਕ ਆਹਿ ਸਰਣ ਪ੍ਰਭ ਆਇਓ ਰਾਖੁ ਲਾਜ ਅਪਨਾਇਆ ॥੪॥੩॥੧੨੫॥
हे प्रभू ! मैं चाहत करके तेरी शरण आया हूँ।मुझे अपना दास बना के मेरी लाज रख (मुझे मंद-कर्मों से बचाए रख)। 4। 3। 125।
ਆਸਾ ਮਹਲਾ ੫ ॥
आसा महला ५ ॥
ਮਿਥਿਆ ਸੰਗਿ ਸੰਗਿ ਲਪਟਾਏ ਮੋਹ ਮਾਇਆ ਕਰਿ ਬਾਧੇ ॥
(दुर्भाग्यशाली मनुष्य) झूठे साथियों की संगति में मस्त रहता है माया के मोह में बंधा रहता है।
ਜਹ ਜਾਨੋ ਸੋ ਚੀਤਿ ਨ ਆਵੈ ਅਹੰਬੁਧਿ ਭਏ ਆਂਧੇ ॥੧॥
(ये जगत छोड़ के) जहाँ (आखिर) े जाना है वह जगह (इसके) ख्याल में कभी नहीं आती।अहंम् में अंधा हुआ रहता है। 1।
ਮਨ ਬੈਰਾਗੀ ਕਿਉ ਨ ਅਰਾਧੇ ॥
हे मेरे मन ! तू माया के मोह से उपराम हो के परमात्मा की आराधना क्यूँ नहीं करता।
ਕਾਚ ਕੋਠਰੀ ਮਾਹਿ ਤੂੰ ਬਸਤਾ ਸੰਗਿ ਸਗਲ ਬਿਖੈ ਕੀ ਬਿਆਧੇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
(तेरा ये शरीर) कच्ची कोठड़ी (है जिसमें तू बस रहा है। ) तेरे साथ सारे विषौ-विकारों के रोग चिपके हुए हैं। 1।रहाउ।
ਮੇਰੀ ਮੇਰੀ ਕਰਤ ਦਿਨੁ ਰੈਨਿ ਬਿਹਾਵੈ ਪਲੁ ਖਿਨੁ ਛੀਜੈ ਅਰਜਾਧੇ ॥
‘ये मेरी मल्कियत है ये मेरी जयदाद है’ -ये कहते हुए ही (दुर्भाग्यशाली मनुष्य का) दिन गुजर जाता है (इसी तरह फिर) रात गुजर जाती है।पल-पल छिन-छिन कर कर के इसकी उम्र घटती जाती है।