Sri Guru Granth Sahib Ji — Ang 373 (hindi)
ਦੂਖ ਰੋਗ ਭਏ ਗਤੁ ਤਨ ਤੇ ਮਨੁ ਨਿਰਮਲੁ ਹਰਿ ਹਰਿ ਗੁਣ ਗਾਇ ॥
(हे माँ !) परमात्मा के सिफत सालाह के गीत गा-गा के मेरा मन पवित्र हो गया है। मेरे शरीर के सारे दुख और रोग दूर हो गए हैं।
ਭਏ ਅਨੰਦ ਮਿਲਿ ਸਾਧੂ ਸੰਗਿ ਅਬ ਮੇਰਾ ਮਨੁ ਕਤ ਹੀ ਨ ਜਾਇ ॥੧॥
गुरू की संगति में मिल के मेरे अंदर आनंद ही आनंद बना हुआ है। अब मेरा मन किसी भी तरफ नहीं भटकता। 1।
ਤਪਤਿ ਬੁਝੀ ਗੁਰ ਸਬਦੀ ਮਾਇ ॥
हे माँ ! गुरू के शबद की बरकति से (मेरे अंदर से विकारों की) जलन मिट गई है।
ਬਿਨਸਿ ਗਇਓ ਤਾਪ ਸਭ ਸਹਸਾ ਗੁਰੁ ਸੀਤਲੁ ਮਿਲਿਓ ਸਹਜਿ ਸੁਭਾਇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
मेरे सारे दुख-कलेश व सहम नाश हो गए हैं। आत्मिक ठंड देने वाला गुरू मुझे मिल गया है। अब मैं आत्मिक अडोलता में टिका हुआ हूँ। अब मैं प्रभू प्रेम में मगन हूँ। 1। रहाउ।
ਧਾਵਤ ਰਹੇ ਏਕੁ ਇਕੁ ਬੂਝਿਆ ਆਇ ਬਸੇ ਅਬ ਨਿਹਚਲੁ ਥਾਇ ॥
एक ईश्वर का बोध होने से मेरा भटकना खत्म हो गया है और अब मैं अटल स्थान पर रहता हूँ।
ਜਗਤੁ ਉਧਾਰਨ ਸੰਤ ਤੁਮਾਰੇ ਦਰਸਨੁ ਪੇਖਤ ਰਹੇ ਅਘਾਇ ॥੨॥
(हे प्रभू !) सारे संसार को विकारों से बचाने वाले तेरे संत-जनों का दर्शन करके मेरी सारी तृष्णा समाप्त हो गई है। 2।
ਜਨਮ ਦੋਖ ਪਰੇ ਮੇਰੇ ਪਾਛੈ ਅਬ ਪਕਰੇ ਨਿਹਚਲੁ ਸਾਧੂ ਪਾਇ ॥
(हे माँ !) अब मैंने अडोल चित्त हो के गुरू के पैर पकड़ लिए हैं। मेरे अनेकों जन्मों के पाप मेरी खलासी कर गए है।
ਸਹਜ ਧੁਨਿ ਗਾਵੈ ਮੰਗਲ ਮਨੂਆ
मेरा मन आत्मिक अडोलता की सुर में सिफत सालाह के गीत गाता रहता है।
ਅਬ ਤਾ ਕਉ ਫੁਨਿ ਕਾਲੁ ਨ ਖਾਇ ॥੩॥
अब इस मन को कभी आत्मिक मौत हड़प नहीं करती। 3।
ਕਰਨ ਕਾਰਨ ਸਮਰਥ ਹਮਾਰੇ ਸੁਖਦਾਈ ਮੇਰੇ ਹਰਿ ਹਰਿ ਰਾਇ ॥
हे मेरे प्रभू पातशाह ! हे सुखों के बख्शने वाले ! हे सब कुछ करने-कराने की शक्ति रखने वाले !
ਨਾਮੁ ਤੇਰਾ ਜਪਿ ਜੀਵੈ ਨਾਨਕੁ ਓਤਿ ਪੋਤਿ ਮੇਰੈ ਸੰਗਿ ਸਹਾਇ ॥੪॥੯॥
(तेरा दास) नानक। तेरा नाम याद कर कर के आत्मिक जीवन हासिल कर रहा है। तू मेरे साथ (ऐसे हर समय का) साथी है। (जैसे) ताने-पेटे में (धागा मिला हुआ होता है)। 4। 9।
ਆਸਾ ਮਹਲਾ ੫ ॥
आसा महला ५ ॥
ਅਰੜਾਵੈ ਬਿਲਲਾਵੈ ਨਿੰਦਕੁ ॥
(हे भाई ! भगत जनों की) निंदा करने वाला (अपने अंदर) बहुत दुखी रहता है। बड़ा विलकता है।
ਪਾਰਬ੍ਰਹਮੁ ਪਰਮੇਸਰੁ ਬਿਸਰਿਆ ਅਪਣਾ ਕੀਤਾ ਪਾਵੈ ਨਿੰਦਕੁ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
(निंदा में फंसे हुए उसको) पारब्रहम परमात्मा भूला रहता है। (इस करके) निंदा करने वाला मनुष्य (गुरमुखों की) की हुई निंदा का (दुख-रूपी) फल भोगता रहता है। 1। रहाउ।
ਜੇ ਕੋਈ ਉਸ ਕਾ ਸੰਗੀ ਹੋਵੈ ਨਾਲੇ ਲਏ ਸਿਧਾਵੈ ॥
(हे भाई !) अगर कोई मनुष्य उस निंदक का साथी बने (निंदक के साथ मेल-जोल रखना शुरू करे। तो निंदक) उसको भी अपने साथ ले चलता है (निंदा करने का स्वभाव डाल देता है)।
ਅਣਹੋਦਾ ਅਜਗਰੁ ਭਾਰੁ ਉਠਾਏ ਨਿੰਦਕੁ ਅਗਨੀ ਮਾਹਿ ਜਲਾਵੈ ॥੧॥
निंदक (निंदा का) मनो-कल्पित ही बेअंत भार (अपने सिर पर) उठाए फिरता है। और अपने आप को निंदा की आग में जलाता रहता है। 1।
ਪਰਮੇਸਰ ਕੈ ਦੁਆਰੈ ਜਿ ਹੋਇ ਬਿਤੀਤੈ ਸੁ ਨਾਨਕੁ ਆਖਿ ਸੁਣਾਵੈ ॥
(हे भाई ! आत्मिक जीवन के बारे में) जो नियम परमात्मा के दर पे सदा चलता है नानक वह नियम (तुमको) खेल के सुनाता है
ਭਗਤ ਜਨਾ ਕਉ ਸਦਾ ਅਨੰਦੁ ਹੈ ਹਰਿ ਕੀਰਤਨੁ ਗਾਇ ਬਿਗਸਾਵੈ ॥੨॥੧੦॥
(कि भक्त) जनों का निंदक तो निंदा की आग में जलता रहता है। (पर) भगत जनों को (भक्ति के सदका) सदा आनंद प्राप्त होता रहता है। परमात्मा का भगत परमात्मा के सिफत सालाह के गीत गा-गा के खुश रहता है। 2। 10।
ਆਸਾ ਮਹਲਾ ੫ ॥
आसा महला ५ ॥
ਜਉ ਮੈ ਕੀਓ ਸਗਲ ਸੀਗਾਰਾ ॥
यदि मैंने हरेक किस्म का सीगार किया
ਤਉ ਭੀ ਮੇਰਾ ਮਨੁ ਨ ਪਤੀਆਰਾ ॥
तो भी मेरा मन संतुष्ट ना हुआ।
ਅਨਿਕ ਸੁਗੰਧਤ ਤਨ ਮਹਿ ਲਾਵਉ ॥
अगर मैं अपने शरीर पर अनेकों सुंगधियां इस्तेमाल करती हूँ
ਓਹੁ ਸੁਖੁ ਤਿਲੁ ਸਮਾਨਿ ਨਹੀ ਪਾਵਉ ॥
तो भी मैं तिल जितना भी वह सुख नहीं हासिल कर सकती (जो सुख प्यारे पति के दर्शनोंसे मिलता है)।
ਮਨ ਮਹਿ ਚਿਤਵਉ ਐਸੀ ਆਸਾਈ ॥
हे मेरी माँ ! अब मैं ऐसी आशाएं ही बनाती रहती हूँ (कि कैसे प्रभू पति मिले)।
ਪ੍ਰਿਅ ਦੇਖਤ ਜੀਵਉ ਮੇਰੀ ਮਾਈ ॥੧॥
प्यारे प्रभू-पति का दर्शन करके मेरे अंदर आत्मिक जीवन पैदा हो जाता है। 1।
ਮਾਈ ਕਹਾ ਕਰਉ ਇਹੁ ਮਨੁ ਨ ਧੀਰੈ ॥
हे माँ ! मैं क्या करूँ। (प्यारे के बिना) मेरा मन ठहरता नहीं।
ਪ੍ਰਿਅ ਪ੍ਰੀਤਮ ਬੈਰਾਗੁ ਹਿਰੈ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
प्यारे प्रीतम का प्रेम खींच डाल रहा है। 1। रहाउ।
ਬਸਤ੍ਰ ਬਿਭੂਖਨ ਸੁਖ ਬਹੁਤ ਬਿਸੇਖੈ ॥
(सुंदर) कपड़े गहने खास तरह के अनेकों सुख- मैं समझती हूँ कि
ਓਇ ਭੀ ਜਾਨਉ ਕਿਤੈ ਨ ਲੇਖੈ ॥
वह सारे भी (प्रभू पति के बिना) किसी काम के नहीं।
ਪਤਿ ਸੋਭਾ ਅਰੁ ਮਾਨੁ ਮਹਤੁ ॥
इज्जत शोभा आदर सत्कार महिमा (भी मिल जाए)।
ਆਗਿਆਕਾਰੀ ਸਗਲ ਜਗਤੁ ॥
सारा जगत मेरी आज्ञा में चलने लगे।
ਗ੍ਰਿਹੁ ਐਸਾ ਹੈ ਸੁੰਦਰ ਲਾਲ ॥
बड़ा सुंदर व कीमती घर (रहने के वास्ते मिला हो।
ਪ੍ਰਭ ਭਾਵਾ ਤਾ ਸਦਾ ਨਿਹਾਲ ॥੨॥
तो भी) तभी मैं सदा के लिए खुश रह सकती हूँ अगर प्रभू पति को प्यारी लगूँ। 2।
ਬਿੰਜਨ ਭੋਜਨ ਅਨਿਕ ਪਰਕਾਰ ॥
(हे माँ !) अगर अनेकों किस्म के स्वादिष्ट खाने मिल जाएं।
ਰੰਗ ਤਮਾਸੇ ਬਹੁਤੁ ਬਿਸਥਾਰ ॥
अगर बहुत तरह के रंग तमाशे (देखने को हों)।
ਰਾਜ ਮਿਲਖ ਅਰੁ ਬਹੁਤੁ ਫੁਰਮਾਇਸਿ ॥
अगर राज मिल जाए। जमीन की मल्कियत हो जाय और बहुत हकूमत मिल जाए।
ਮਨੁ ਨਹੀ ਧ੍ਰਾਪੈ ਤ੍ਰਿਸਨਾ ਨ ਜਾਇਸਿ ॥
तो भी ये मन कभी भरता नहीं। इसकी तृष्णा खत्म नहीं होती।
ਬਿਨੁ ਮਿਲਬੇ ਇਹੁ ਦਿਨੁ ਨ ਬਿਹਾਵੈ ॥
(ये सब कुछ होते हुए भी। हे माँ ! प्रभू-पति को) मिले बिना मेरा ये दिन (सुख से) नहीं गुजरता।
ਮਿਲੈ ਪ੍ਰਭੂ ਤਾ ਸਭ ਸੁਖ ਪਾਵੈ ॥੩॥
जब (जीव-स्त्री को) प्रभू-पति मिल जाए तो वह (मानो) सारे सुख हासिल कर लेती है। 3।
ਖੋਜਤ ਖੋਜਤ ਸੁਨੀ ਇਹ ਸੋਇ ॥
तलाश करते-करते (हे माँ !) मैंने ये ख़बर सुन ली कि
ਸਾਧਸੰਗਤਿ ਬਿਨੁ ਤਰਿਓ ਨ ਕੋਇ ॥
साध-संगति के बिना (तृष्णा की बाढ़ से) कोई जीव कभी पार नहीं लांघ सका।
ਜਿਸੁ ਮਸਤਕਿ ਭਾਗੁ ਤਿਨਿ ਸਤਿਗੁਰੁ ਪਾਇਆ ॥
जिसके माथे पर अच्छे भाग्य जागे उसने गुरू पा लिया।
ਪੂਰੀ ਆਸਾ ਮਨੁ ਤ੍ਰਿਪਤਾਇਆ ॥
उसकी हरेक आस पूरी हो गई। उसका मन तृप्त हो गया।
ਪ੍ਰਭ ਮਿਲਿਆ ਤਾ ਚੂਕੀ ਡੰਝਾ ॥
जब जीव (गुरू की शरण पड़ कर) प्रभू को मिल पड़ा उसकी (अंदरूनी तृष्णा की) भड़की खत्म हो गई।
ਨਾਨਕ ਲਧਾ ਮਨ ਤਨ ਮੰਝਾ ॥੪॥੧੧॥
हे नानक ! उसने अपने मन में अपने हृदय में (बसता) प्रभू पा लिया। 4। 11।
ਆਸਾ ਮਹਲਾ ੫ ਪੰਚਪਦੇ ॥
आसा महला ५ पंचपदे ॥