Sri Guru Granth Sahib Ji — Ang 355 (hindi)
ਕਹੈ ਨਾਨਕੁ ਜੀਵਾਲੇ ਜੀਆ ਜਹ ਭਾਵੈ ਤਹ ਰਾਖੁ ਤੁਹੀ ॥੫॥੧੯॥
नानक कहता है परमात्मा जिंदगी देने वाला है (उसी की हजूरी में अरदास करनी चाहिए कि) हे प्रभू ! जहाँ तेरी रजा है वहाँ हमें रख (भाव। अपनी रज़ा में रख और सिमरन की दाति बख्श)। 5। 19।
ਆਸਾ ਮਹਲਾ ੧ ॥
आसा महला १ ॥
ਕਾਇਆ ਬ੍ਰਹਮਾ ਮਨੁ ਹੈ ਧੋਤੀ ॥
(नाम की बरकति से विकारों से बचा हुआ) मानव शरीर ही (उच्च जाति का) ब्राहमण है। (पवित्र हुआ) मन (ब्राहमण की) धोती है।
ਗਿਆਨੁ ਜਨੇਊ ਧਿਆਨੁ ਕੁਸਪਾਤੀ ॥
परमात्मा के साथ गहरी जान-पहचान जनेऊ है और प्रभू चरणों में जुड़ी हुई सुरति दूब का छल्ला।
ਹਰਿ ਨਾਮਾ ਜਸੁ ਜਾਚਉ ਨਾਉ ॥
मैं तो (हे पांडे !) परमात्मा का नाम ही (दक्षिणा) मांगता हूँ। सिफत सालाह ही मांगता हूँ।
ਗੁਰ ਪਰਸਾਦੀ ਬ੍ਰਹਮਿ ਸਮਾਉ ॥੧॥
ताकि गुरू की किरपा से (नाम सिमर के) परमात्मा में लीन रहूँ। 1।
ਪਾਂਡੇ ਐਸਾ ਬ੍ਰਹਮ ਬੀਚਾਰੁ ॥
हे पांडे ! इसी तरह परमात्मा के गुणों की विचार कर -
ਨਾਮੇ ਸੁਚਿ ਨਾਮੋ ਪੜਉ ਨਾਮੇ ਚਜੁ ਆਚਾਰੁ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
परमात्मा के नाम में ही स्वच्छता है। मैं तो परमातमा का नाम-सिमरन (रूपी वेद) पढ़ता हूँ। प्रभू के नाम में ही सारी धार्मिक रस्में आ जाती हैं। 1। रहाउ।
ਬਾਹਰਿ ਜਨੇਊ ਜਿਚਰੁ ਜੋਤਿ ਹੈ ਨਾਲਿ ॥
(हे पांडे !) बाहरी जनेऊ तब तक ही है जब तक ज्योति शरीर में मौजूद है (फिर ये किस काम का। )।
ਧੋਤੀ ਟਿਕਾ ਨਾਮੁ ਸਮਾਲਿ ॥
प्रभू का नाम दिल में संभाल- यही धोती है यही है टीका (तिलक)।
ਐਥੈ ਓਥੈ ਨਿਬਹੀ ਨਾਲਿ ॥
ये नाम ही लोक-परलोक में साथ निभाता है।
ਵਿਣੁ ਨਾਵੈ ਹੋਰਿ ਕਰਮ ਨ ਭਾਲਿ ॥੨॥
(हे पांडे !) नाम बिसार के धर्म के नाम पर और ही रस्में ना तलाशता फिर। 2।
ਪੂਜਾ ਪ੍ਰੇਮ ਮਾਇਆ ਪਰਜਾਲਿ ॥
(नाम में जुड़ के) माया का मोह (अपने अंदर से) अच्छी तरह जला दे- यही है देव-पूजा।
ਏਕੋ ਵੇਖਹੁ ਅਵਰੁ ਨ ਭਾਲਿ ॥
हर जगह एक परमात्मा को देख। (हे पांडे !) उसके बिना किसी और देवते को ना ढूँढता रह।
ਚੀਨੑੈ ਤਤੁ ਗਗਨ ਦਸ ਦੁਆਰ ॥
जो मनुष्य हर जगह व्यापक परमात्मा को पहचान लेता है उसने मानों दसवें-द्वार में समाधि लगाई हुई है।
ਹਰਿ ਮੁਖਿ ਪਾਠ ਪੜੈ ਬੀਚਾਰ ॥੩॥
जो मनुष्य प्रभू के नाम को सदा अपने मुँह में रखता है (उचारता है)। वह (वेद आदि पुस्तकों के) विचार पढ़ रहा है। 3।
ਭੋਜਨੁ ਭਾਉ ਭਰਮੁ ਭਉ ਭਾਗੈ ॥
(हे पांडे ! प्रभू चरणों से) प्रीत (जोड़। ये) है (मूर्ति को) भोग। (इसकी बरकति से) मन की भटकना दूर हो जाती है। डर उतर जाता है।
ਪਾਹਰੂਅਰਾ ਛਬਿ ਚੋਰੁ ਨ ਲਾਗੈ ॥
प्रभू-रक्षक के तेज से (अपने अंदर प्रकाश कर) कोई कामादिक चोर नजदीक नहीं फटकता।
ਤਿਲਕੁ ਲਿਲਾਟਿ ਜਾਣੈ ਪ੍ਰਭੁ ਏਕੁ ॥
जो मनुष्य एक परमात्मा के साथ गहरी सांझ डालता है। उसने मानो। माथे पर तिलक लगाया हुआ है।
ਬੂਝੈ ਬ੍ਰਹਮੁ ਅੰਤਰਿ ਬਿਬੇਕੁ ॥੪॥
जो अपने अंदर बसते प्रभू को पहचानता है वह अच्छे-बुरे कर्म की परख सीख लेता है (यही है असल बिबेक)। 4।
ਆਚਾਰੀ ਨਹੀ ਜੀਤਿਆ ਜਾਇ ॥
(हे पांडे !) परमात्मा निरी धार्मिक रस्मों से वश में नहीं किया जा सकता।
ਪਾਠ ਪੜੈ ਨਹੀ ਕੀਮਤਿ ਪਾਇ ॥
वेद आदि पुस्तकों आदि के पाठ पढ़ने से भी उसकी समझ नहीं पड़ सकती।
ਅਸਟ ਦਸੀ ਚਹੁ ਭੇਦੁ ਨ ਪਾਇਆ ॥
जिस परमात्मा का भेद अठारह पुराणों और चारों वेदों को नही मिला।
ਨਾਨਕ ਸਤਿਗੁਰਿ ਬ੍ਰਹਮੁ ਦਿਖਾਇਆ ॥੫॥੨੦॥
हे नानक ! सतिगुरू ने (हमें) वह (अंदर-बाहर हर जगह) दिखा दिया है। 5। 20।
ਆਸਾ ਮਹਲਾ ੧ ॥
आसा महला १ ॥
ਸੇਵਕੁ ਦਾਸੁ ਭਗਤੁ ਜਨੁ ਸੋਈ ॥
वही मनुष्य (असल) सेवक है दास है भगत है।
ਠਾਕੁਰ ਕਾ ਦਾਸੁ ਗੁਰਮੁਖਿ ਹੋਈ ॥
गुरू के सन्मुख रहने वाला मनुष्य ही परमात्मा का दास बनता है।
ਜਿਨਿ ਸਿਰਿ ਸਾਜੀ ਤਿਨਿ ਫੁਨਿ ਗੋਈ ॥
(उसे सदा ये यकीन रहता है कि) जिस प्रभू ने ये सृष्टि रची है वही इसे दुबारा नाश करता है।
ਤਿਸੁ ਬਿਨੁ ਦੂਜਾ ਅਵਰੁ ਨ ਕੋਈ ॥੧॥
उस जैसा और कोई दूसरा नहीं है। 1।
ਸਾਚੁ ਨਾਮੁ ਗੁਰ ਸਬਦਿ ਵੀਚਾਰਿ ॥ ਗੁਰਮੁਖਿ ਸਾਚੇ ਸਾਚੈ ਦਰਬਾਰਿ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
गुरू के शबद के द्वारा परमात्मा का सदा स्थिर रहने वाला नाम विचार के गुरू के सन्मुख रहने वाले लोग सदा अटल प्रभू के दरबार में सुर्खरू होते हैं। 1। रहाउ।
ਸਚਾ ਅਰਜੁ ਸਚੀ ਅਰਦਾਸਿ ॥
गुरू के सन्मुख रहके की हुई विनती और अरदास ही असल (प्रार्थना) है।
ਮਹਲੀ ਖਸਮੁ ਸੁਣੇ ਸਾਬਾਸਿ ॥
महल का मालिक पति-प्रभू उस अरदास को सुनता है और आदर देता है (शाबाश कहता है)।
ਸਚੈ ਤਖਤਿ ਬੁਲਾਵੈ ਸੋਇ ॥
अपने सदा अटॅल तख़्त पर (बैठा हुआ प्रभू) उस सेवक को बुलाता है।
ਦੇ ਵਡਿਆਈ ਕਰੇ ਸੁ ਹੋਇ ॥੨॥
और वह सब कुछ करने में समर्थ प्रभू उसे आदर-मान देता है। 2।
ਤੇਰਾ ਤਾਣੁ ਤੂਹੈ ਦੀਬਾਣੁ ॥
(हे प्रभू !) गुरमुख को तेरा ही ताण है (सहारा है) तेरा ही आसरा है।
ਗੁਰ ਕਾ ਸਬਦੁ ਸਚੁ ਨੀਸਾਣੁ ॥
गुरू का शबद ही उसके पास रहने वाला सदा चिर परवाना है।
ਮੰਨੇ ਹੁਕਮੁ ਸੁ ਪਰਗਟੁ ਜਾਇ ॥
गुरमुखि परमात्मा की रज़ा को (सिर माथे। पूरी तरह से) मानता है। जगत में शोभा कमा के जाता है।
ਸਚੁ ਨੀਸਾਣੈ ਠਾਕ ਨ ਪਾਇ ॥੩॥
गुरू-शबद की सच्ची राहदारी के कारण उसकी जिंदगी के रास्ते में कोई विकार रुकावट नहीं डाल सकता। 3।
ਪੰਡਿਤ ਪੜਹਿ ਵਖਾਣਹਿ ਵੇਦੁ ॥
पण्डित लोग वेद पढ़ते हैं और औरों को व्याख्या करके सुनाते हैं।
ਅੰਤਰਿ ਵਸਤੁ ਨ ਜਾਣਹਿ ਭੇਦੁ ॥
पर (निरे विद्या के मान में रहके) ये भेद नहीं जानते कि परमात्मा का नाम-पदार्थ अंदर ही मौजूद है।
ਗੁਰ ਬਿਨੁ ਸੋਝੀ ਬੂਝ ਨ ਹੋਇ ॥
पर ये समझ गुरू की शरण पड़े बिना नहीं आती की
ਸਾਚਾ ਰਵਿ ਰਹਿਆ ਪ੍ਰਭੁ ਸੋਇ ॥੪॥
सदा-स्थिर प्रभू हरेक के अंदर व्यापक हे। । 4।
ਕਿਆ ਹਉ ਆਖਾ ਆਖਿ ਵਖਾਣੀ ॥
हे चोजी प्रभू ! गुरू के सन्मुख रहने का मैं क्या ज़िक्र करूँ। क्या कह के सुनाऊँ।
ਤੂੰ ਆਪੇ ਜਾਣਹਿ ਸਰਬ ਵਿਡਾਣੀ ॥
तू (इस भेद) को खुद ही जानता है।
ਨਾਨਕ ਏਕੋ ਦਰੁ ਦੀਬਾਣੁ ॥
हे नानक ! गुरमुखि के लिए प्रभू का ही एक दरवाजा है आसरा है
ਗੁਰਮੁਖਿ ਸਾਚੁ ਤਹਾ ਗੁਦਰਾਣੁ ॥੫॥੨੧॥
जहाँ गुरू के सन्मुख रहके सिमरन करना उसकी जिंदगी का सहारा बना रहता है। 5। 21।
ਆਸਾ ਮਹਲਾ ੧ ॥
आसा महला १ ॥
ਕਾਚੀ ਗਾਗਰਿ ਦੇਹ ਦੁਹੇਲੀ ਉਪਜੈ ਬਿਨਸੈ ਦੁਖੁ ਪਾਈ ॥
(नित्य विकारों में खचित रहने के कारण) ये शरीर दुखों का घर बन गया है (विकारों के असर से ये नहीं निकलता) और कच्चे घड़े के समान है (जो तुरंत पानी में गल जाता है)। पैदा होता है। (सारी उम्र) दुख पाता है और फिर नाश हो जाता है (एक तरफ़ तो कच्चे घड़े जैसा ये शरीर है।
ਇਹੁ ਜਗੁ ਸਾਗਰੁ ਦੁਤਰੁ ਕਿਉ ਤਰੀਐ ਬਿਨੁ ਹਰਿ ਗੁਰ ਪਾਰਿ ਨ ਪਾਈ ॥੧॥
दूसरी तरफ़) ये जगत एक ऐसा समुंद्र है जिससे पार लांघना बहुत मुश्किल है। (इस विकार भरे शरीर का आसरा ले के) इसमें से तैरा नहीं जा सकता। गुरू परमात्मा का आसरा लिए बिना पार नहीं किया जा सकता। 1।
ਤੁਝ ਬਿਨੁ ਅਵਰੁ ਨ ਕੋਈ ਮੇਰੇ ਪਿਆਰੇ ਤੁਝ ਬਿਨੁ ਅਵਰੁ ਨ ਕੋਇ ਹਰੇ ॥
हे मेरे प्यारे हरी ! मेरा तेरे बिना और कोई (आसरा) नहीं। तेरे बिना मेरा कोई नहीं।
ਸਰਬੀ ਰੰਗੀ ਰੂਪੀ ਤੂੰਹੈ ਤਿਸੁ ਬਖਸੇ ਜਿਸੁ ਨਦਰਿ ਕਰੇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
तू सारे रंगों में। सारे रूपों में मौजूद है। (हे भाई !) जिस जीव पर (वह) मेहर की नजर करता है उसको बख्श लेता है। 1। रहाउ।
ਸਾਸੁ ਬੁਰੀ ਘਰਿ ਵਾਸੁ ਨ ਦੇਵੈ ਪਿਰ ਸਿਉ ਮਿਲਣ ਨ ਦੇਇ ਬੁਰੀ ॥
(मेरा प्रभू-पति मेरे हृदय-घर में ही बसता है। पर) ये बुरी सास (माया) मुझे हृदय-घर में टिकने ही नहीं देती (मेरे मन को सदा बाहर मायावी पदार्थों के पीछे भगाए फिरती है) ये चंद्री मुझे पति से मिलने नहीं देती।
ਸਖੀ ਸਾਜਨੀ ਕੇ ਹਉ ਚਰਨ ਸਰੇਵਉ ਹਰਿ ਗੁਰ ਕਿਰਪਾ ਤੇ ਨਦਰਿ ਧਰੀ ॥੨॥
(इस बुरी औरत से बचने के लिए) मैं सत्संगी सहेलियों की सेवा करती हूँ (सत्संग में गुरू मिलता है)। गुरू की किरपा से पति-प्रभू मेरे पर मेहर की नजर करता है। 2।