Sri Guru Granth Sahib Ji — Ang 328 (hindi)
ਗਉੜੀ ਕਬੀਰ ਜੀ ॥
गउड़ी कबीर जी ॥
ਜਾ ਕੈ ਹਰਿ ਸਾ ਠਾਕੁਰੁ ਭਾਈ ॥
हे सज्जन ! जिस मनुष्य के हृदय रूपी घर में प्रभू मालिक खुद मौजूद है।
ਮੁਕਤਿ ਅਨੰਤ ਪੁਕਾਰਣਿ ਜਾਈ ॥੧॥
मुक्ति उसके आगे अपना आप अनेकों बार भेटा करती है। 1।
ਅਬ ਕਹੁ ਰਾਮ ਭਰੋਸਾ ਤੋਰਾ ॥
(हे कबीर ! प्रभू की हजूरी में) अब कह– हे प्रभू ! जिस मनुष्य को एक तेरा आसरा है
ਤਬ ਕਾਹੂ ਕਾ ਕਵਨੁ ਨਿਹੋਰਾ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
उसे अब किसी की खुशामद (करने की जरूरत) नहीं है। 1। रहाउ।
ਤੀਨਿ ਲੋਕ ਜਾ ਕੈ ਹਹਿ ਭਾਰ ॥
जिस प्रभू के आसरे तीनों लोक हैं।
ਸੋ ਕਾਹੇ ਨ ਕਰੈ ਪ੍ਰਤਿਪਾਰ ॥੨॥
वह (तेरी) पालना क्यूँ ना करेगा?। 2।
ਕਹੁ ਕਬੀਰ ਇਕ ਬੁਧਿ ਬੀਚਾਰੀ ॥
हे कबीर ! कह– हमने एक सोच सोची है (वह ये है कि)
ਕਿਆ ਬਸੁ ਜਉ ਬਿਖੁ ਦੇ ਮਹਤਾਰੀ ॥੩॥੨੨॥
अगर माँ ही जहर देने लगे तो (पुत्र का) कोई जोर नहीं चल सकता। 3। 22।
ਗਉੜੀ ਕਬੀਰ ਜੀ ॥
गउड़ी कबीर जी ॥
ਬਿਨੁ ਸਤ ਸਤੀ ਹੋਇ ਕੈਸੇ ਨਾਰਿ ॥
भला सॅत-धर्म के बिना कोई स्त्री सती कैसे बन सकती है?।
ਪੰਡਿਤ ਦੇਖਹੁ ਰਿਦੈ ਬੀਚਾਰਿ ॥੧॥
हे पंडित ! मन में विचार के देख।1।
ਪ੍ਰੀਤਿ ਬਿਨਾ ਕੈਸੇ ਬਧੈ ਸਨੇਹੁ ॥
(इसी तरह हृदय में) प्रीति के बिना (प्रभू पति से) प्यार कैसे बन सकता है?
ਜਬ ਲਗੁ ਰਸੁ ਤਬ ਲਗੁ ਨਹੀ ਨੇਹੁ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
जब तक (मन में) माया का चस्का है। तब तक (पति परमात्मा से) प्यार नहीं हो सकता। 1। रहाउ।
ਸਾਹਨਿ ਸਤੁ ਕਰੈ ਜੀਅ ਅਪਨੈ ॥
जो मनुष्य माया को ही अपने दिल में सॅत समझता है
ਸੋ ਰਮਯੇ ਕਉ ਮਿਲੈ ਨ ਸੁਪਨੈ ॥੨॥
वह प्रभू को सपने में भी (भाव। कभी भी) नहीं मिल सकता। 2।
ਤਨੁ ਮਨੁ ਧਨੁ ਗ੍ਰਿਹੁ ਸਉਪਿ ਸਰੀਰੁ ॥
जो अपना तन-मन-धन-घर और शरीर (अपने पति के) हवाले कर देती है।
ਸੋਈ ਸੁਹਾਗਨਿ ਕਹੈ ਕਬੀਰੁ ॥੩॥੨੩॥
कबीर कहता है– वह (जीव-) स्त्री भाग्यशाली है 3। 23।
ਗਉੜੀ ਕਬੀਰ ਜੀ ॥
गउड़ी कबीर जी ॥
ਬਿਖਿਆ ਬਿਆਪਿਆ ਸਗਲ ਸੰਸਾਰੁ ॥
सारा जहान ही माया के (प्रभाव तले) दबा हुआ है;
ਬਿਖਿਆ ਲੈ ਡੂਬੀ ਪਰਵਾਰੁ ॥੧॥
माया सारे ही कुटंब को (सारे ही जीवों को) डुबोए बैठी है। 1।
ਰੇ ਨਰ ਨਾਵ ਚਉੜਿ ਕਤ ਬੋੜੀ ॥
हे मनुष्य ! तूने (अपनी जिंदगी की) बेड़ी क्यूँ खुली जगह पर डुबो ली है?
ਹਰਿ ਸਿਉ ਤੋੜਿ ਬਿਖਿਆ ਸੰਗਿ ਜੋੜੀ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
तूने प्रभू से प्रीति तोड़ के माया के साथ गाँठी हुई है। 1। रहाउ।
ਸੁਰਿ ਨਰ ਦਾਧੇ ਲਾਗੀ ਆਗਿ ॥
(सारे जगत में माया की तृष्णा की) आग लगी हुई है (जिस में) देवते और मनुष्य जल रहे हैं।
ਨਿਕਟਿ ਨੀਰੁ ਪਸੁ ਪੀਵਸਿ ਨ ਝਾਗਿ ॥੨॥
(इस आग को शांत करने के लिए नाम-रूपी) पानी भी नजदीक ही है पर (यह) पशु (जीव) कोशिश करके पीता नहीं है। 2।
ਚੇਤਤ ਚੇਤਤ ਨਿਕਸਿਓ ਨੀਰੁ ॥
कबीर कहता है– (वह नाम-रूपी) पानी सिमरन करते करते ही (मनुष्य के दिल में) प्रगट होता है।
ਸੋ ਜਲੁ ਨਿਰਮਲੁ ਕਥਤ ਕਬੀਰੁ ॥੩॥੨੪॥
और वह (अमृत) जल पवित्र होता है। (तृष्णा की आग उसी जल से बुझ सकती है)। 3। 24।
ਗਉੜੀ ਕਬੀਰ ਜੀ ॥
गउड़ी कबीर जी ॥
ਜਿਹ ਕੁਲਿ ਪੂਤੁ ਨ ਗਿਆਨ ਬੀਚਾਰੀ ॥
जिस कुल में ज्ञान की विचार करने वाला (कोई) पुत्र नहीं (पैदा हुआ)
ਬਿਧਵਾ ਕਸ ਨ ਭਈ ਮਹਤਾਰੀ ॥੧॥
वह माँ बाँझ क्यों ना हो गई?।1।
ਜਿਹ ਨਰ ਰਾਮ ਭਗਤਿ ਨਹਿ ਸਾਧੀ ॥
जिस मनुष्य ने प्रभू की बँदगी नहीं की।
ਜਨਮਤ ਕਸ ਨ ਮੁਓ ਅਪਰਾਧੀ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
वह अपराधी पैदा होते ही मर क्यों नहीं गया ?। 1। रहाउ।
ਮੁਚੁ ਮੁਚੁ ਗਰਭ ਗਏ ਕੀਨ ਬਚਿਆ ॥
(संसार में) कई गर्भ छन गए हैं।
ਬੁਡਭੁਜ ਰੂਪ ਜੀਵੇ ਜਗ ਮਝਿਆ ॥੨॥
ये (बंदगी-हीन चंदरा) क्यूँ बच रहा? (बंदगी से वंचित यह) जगत में एक कोढ़ी जी रहा है। 2।
ਕਹੁ ਕਬੀਰ ਜੈਸੇ ਸੁੰਦਰ ਸਰੂਪ ॥ ਨਾਮ ਬਿਨਾ ਜੈਸੇ ਕੁਬਜ ਕੁਰੂਪ ॥੩॥੨੫॥
वे (चाहे देखने में) सुंदर रूप वाले हैं (पर असल में) हे कबीर ! (बेशक) कह– जो मनुष्य नाम से वंचित हैं वह कुब्बे और बद्शकल हैं। 3। 24।
ਗਉੜੀ ਕਬੀਰ ਜੀ ॥
गउड़ी कबीर जी ॥
ਜੋ ਜਨ ਲੇਹਿ ਖਸਮ ਕਾ ਨਾਉ ॥ ਤਿਨ ਕੈ ਸਦ ਬਲਿਹਾਰੈ ਜਾਉ ॥੧॥
जो मनुष्य मालिक प्रभू का नाम सिमरते हैं। मैं सदा उनके सदके जाता हूँ। 1।
ਸੋ ਨਿਰਮਲੁ ਨਿਰਮਲ ਹਰਿ ਗੁਨ ਗਾਵੈ ॥
जो भाई प्रभू के सुंदर गुण गाता है। वह पवित्र है।
ਸੋ ਭਾਈ ਮੇਰੈ ਮਨਿ ਭਾਵੈ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
और वह मेरे मन को प्यारा लगता है। 1। रहाउ।
ਜਿਹ ਘਟ ਰਾਮੁ ਰਹਿਆ ਭਰਪੂਰਿ ॥ ਤਿਨ ਕੀ ਪਗ ਪੰਕਜ ਹਮ ਧੂਰਿ ॥੨॥
जिन मनुष्यों के हृदय में प्रभू प्रगट हो गया है। उनके कमल फूल जैसे (सुंदर) चरणों की हम धूड़ हैं (भाव। चरणों से सदके हैं)। 2।
ਜਾਤਿ ਜੁਲਾਹਾ ਮਤਿ ਕਾ ਧੀਰੁ ॥
कबीर चाहे जाति का जुलाहा है।पर मति का धैर्यवान है (क्योंकि)
ਸਹਜਿ ਸਹਜਿ ਗੁਣ ਰਮੈ ਕਬੀਰੁ ॥੩॥੨੬॥
अडोलता में रह के (प्रभू के) गुण गाता है। 3। 26।
ਗਉੜੀ ਕਬੀਰ ਜੀ ॥
गउड़ी कबीर जी ॥
ਗਗਨਿ ਰਸਾਲ ਚੁਐ ਮੇਰੀ ਭਾਠੀ ॥
मेरी गगन-रूपी भट्ठी में से स्वादिष्ट अमृत चू रहा है (भाव। ज्यों ज्यों मेरा मन प्रभू की याद में जुड़ता है। उस याद में जुड़े रहने की एक-तार लगन। जैसे अमृत की धार निकलनी शुरू हो जाती है)।
ਸੰਚਿ ਮਹਾ ਰਸੁ ਤਨੁ ਭਇਆ ਕਾਠੀ ॥੧॥
उस उच्च नाम-रस को एकत्र करने के कारण शरीर (की ममता) लकड़ियों का काम कर रही है (भाव। शरीर की ममता जल गई है)। 1।
ਉਆ ਕਉ ਕਹੀਐ ਸਹਜ ਮਤਵਾਰਾ ॥
उसे कुदरती तौर पे (भाव। स्वभाविक ही) मस्त हुआ हुआ कहते हैं।
ਪੀਵਤ ਰਾਮ ਰਸੁ ਗਿਆਨ ਬੀਚਾਰਾ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
जिस मनुष्य ने ज्ञान के विचार के द्वारा (भाव। सुरति माया से ऊूंची करके) राम-रस पीया है।1। रहाउ।
ਸਹਜ ਕਲਾਲਨਿ ਜਉ ਮਿਲਿ ਆਈ ॥
जब सहज अवस्था-रूप शराब पिलाने वाली आ मिलती है तब आनंद में मस्त हो के (उम्र का) हरेक दिन बीतता है (भाव। नाम सिमरते हुए मन में एक ऐसी हालत पैदा होती है जहाँ मन माया के झोकों में डोलता नहीं। इस हालत को सहज अवस्था कहते हैं; ये सहज अवस्था जैसे। एक कलालिन है।
ਆਨੰਦਿ ਮਾਤੇ ਅਨਦਿਨੁ ਜਾਈ ॥੨॥
जो नाम का नशा दिए जाती है; इस नशे से विछुड़ने को चित्त नहीं करता। और बार-बार नाम की लिव में ही टिका रहता है)। 2।
ਚੀਨਤ ਚੀਤੁ ਨਿਰੰਜਨ ਲਾਇਆ ॥
आनंद ले ले के जब मैंने अपना मन निरंकार के साथ जोड़ा।
ਕਹੁ ਕਬੀਰ ਤੌ ਅਨਭਉ ਪਾਇਆ ॥੩॥੨੭॥
हे कबीर ! कह– (इस तरह) तब मुझे अंदरूनी रौशनी मिल गई। 3। 27।
ਗਉੜੀ ਕਬੀਰ ਜੀ ॥
गउड़ी कबीर जी ॥
ਮਨ ਕਾ ਸੁਭਾਉ ਮਨਹਿ ਬਿਆਪੀ ॥
(हरेक मनुष्य के) मन की अंदरूनी लगन (जो भी हो। वह उस मनुष्य के) सारे मन (भाव। मन की सारी दौड़-भाग। सारे मानस जीवन) पर प्रभाव डाले रखती है।