Sri Guru Granth Sahib Ji — Ang 323 (hindi)
ਨਾਨਕ ਲੜਿ ਲਾਇ ਉਧਾਰਿਅਨੁ ਦਯੁ ਸੇਵਿ ਅਮਿਤਾ ॥੧੯॥
हे नानक ! ऐसे बेअंत प्रभू को सिमर। जिसने अपने साथ लगा के (अनेकों जीव) बचाए हैं। 19।
ਸਲੋਕ ਮਃ ੫ ॥
श्लोक महला ५॥
ਧੰਧੜੇ ਕੁਲਾਹ ਚਿਤਿ ਨ ਆਵੈ ਹੇਕੜੋ ॥
वे कोझे धंधे घाटे वाले हैं जिनके कारण एक परमात्मा चिक्त में ना आए।
ਨਾਨਕ ਸੇਈ ਤੰਨ ਫੁਟੰਨਿ ਜਿਨਾ ਸਾਂਈ ਵਿਸਰੈ ॥੧॥
(क्योंकि) हे नानक ! वे शरीर विकारों से गंदे हो जाते हैं जिन्हें मालिक प्रभू भूल जाता है। 1।
ਮਃ ੫ ॥
महला ५॥
ਪਰੇਤਹੁ ਕੀਤੋਨੁ ਦੇਵਤਾ ਤਿਨਿ ਕਰਣੈਹਾਰੇ ॥
उस सृजनहार ने (नाम की दाति दे के जीव को) प्रेत से देवते बना दिया है।
ਸਭੇ ਸਿਖ ਉਬਾਰਿਅਨੁ ਪ੍ਰਭਿ ਕਾਜ ਸਵਾਰੇ ॥
प्रभू ने स्वयं काज सँवारे हैं और सारे सिख (विकारों से) बचा लिए हैं।
ਨਿੰਦਕ ਪਕੜਿ ਪਛਾੜਿਅਨੁ ਝੂਠੇ ਦਰਬਾਰੇ ॥
झूठे और निंदकों को पकड़ के अपनी हजूरी में उसने (जैसे) पटका के धरती पे दे मारा है।
ਨਾਨਕ ਕਾ ਪ੍ਰਭੁ ਵਡਾ ਹੈ ਆਪਿ ਸਾਜਿ ਸਵਾਰੇ ॥੨॥
नानक का प्रभू सबसे बड़ा है। उसने जीव पैदा करके खुद ही (‘नाम’ में जोड़ के) सँवार दिए हैं। 2।
ਪਉੜੀ ॥
पउड़ी ॥
ਪ੍ਰਭੁ ਬੇਅੰਤੁ ਕਿਛੁ ਅੰਤੁ ਨਾਹਿ ਸਭੁ ਤਿਸੈ ਕਰਣਾ ॥
परमात्मा बेअंत है। उसका कोई अंत नहीं पा सकता। सारा जगत उसी ने बनाया है।
ਅਗਮ ਅਗੋਚਰੁ ਸਾਹਿਬੋ ਜੀਆਂ ਕਾ ਪਰਣਾ ॥
वह मालिक अपहुँच है। जीवों की इंद्रियों की पहुँच से परे है। सब जीवों का आसरा है।
ਹਸਤ ਦੇਇ ਪ੍ਰਤਿਪਾਲਦਾ ਭਰਣ ਪੋਖਣੁ ਕਰਣਾ ॥
हाथ दे के सब की रक्षा करता है। सब को पालता है।
ਮਿਹਰਵਾਨੁ ਬਖਸਿੰਦੁ ਆਪਿ ਜਪਿ ਸਚੇ ਤਰਣਾ ॥
वह प्रभू मेहर करने वाला है। बख्शिश करने वाला है। जीव उसको सिमर के पार हो जाता है।
ਜੋ ਤੁਧੁ ਭਾਵੈ ਸੋ ਭਲਾ ਨਾਨਕ ਦਾਸ ਸਰਣਾ ॥੨੦॥
हे दास नानक ! (कह) ‘जो कुछ तेरी रजा में हो रहा है। वह ठीक है। हम जीव तेरी शरण में हैं’। 20।
ਸਲੋਕ ਮਃ ੫ ॥
श्लोक महला ५॥
ਤਿੰਨਾ ਭੁਖ ਨ ਕਾ ਰਹੀ ਜਿਸ ਦਾ ਪ੍ਰਭੁ ਹੈ ਸੋਇ ॥
जिस-जिस मनुष्य के सिर पर रक्षक वह प्रभू है उन्हें (माया की) कोई भूख नहीं रह जाती।
ਨਾਨਕ ਚਰਣੀ ਲਗਿਆ ਉਧਰੈ ਸਭੋ ਕੋਇ ॥੧॥
हे नानक ! परमात्मा के चरणों में लग के हरेक जीव माया की भूख से बच जाता है। 1।
ਮਃ ੫ ॥
महला ५ ॥
ਜਾਚਿਕੁ ਮੰਗੈ ਨਿਤ ਨਾਮੁ ਸਾਹਿਬੁ ਕਰੇ ਕਬੂਲੁ ॥
(जो मनुष्य) मंगता (बन के मालिक प्रभू से) सदा नाम मांगता है (उसकी अर्ज) मालिक कबूल करता है।
ਨਾਨਕ ਪਰਮੇਸਰੁ ਜਜਮਾਨੁ ਤਿਸਹਿ ਭੁਖ ਨ ਮੂਲਿ ॥੨॥
हे नानक ! जिस मनुष्य का जजमान (खुद) परमेश्वर है उसे रक्ती भी (माया की) भूख नहीं रहती। 2।
ਪਉੜੀ ॥
पउड़ी।
ਮਨੁ ਰਤਾ ਗੋਵਿੰਦ ਸੰਗਿ ਸਚੁ ਭੋਜਨੁ ਜੋੜੇ ॥
(जो मनुष्य प्रभू की सिफत सालाह करता है उसका) मन परमात्मा के साथ रंगा जाता है उस के लिए प्रभू का नाम ही बढ़िया भोजन व पोशाक है।
ਪ੍ਰੀਤਿ ਲਗੀ ਹਰਿ ਨਾਮ ਸਿਉ ਏ ਹਸਤੀ ਘੋੜੇ ॥
परमात्मा के नाम के साथ उसका प्यार बन जाता है। यही उसके लिए हाथी घोड़े है।
ਰਾਜ ਮਿਲਖ ਖੁਸੀਆ ਘਣੀ ਧਿਆਇ ਮੁਖੁ ਨ ਮੋੜੇ ॥
प्रभू के सिमरन से वह कभी अकता नहीं। यही उसके लिए राज-माल। जमीनें और बेअंत खुशियां हैं।
ਢਾਢੀ ਦਰਿ ਪ੍ਰਭ ਮੰਗਣਾ ਦਰੁ ਕਦੇ ਨ ਛੋੜੇ ॥
वह ढाढी प्रभू के दर से ही सदा मांगता है। प्रभू का दर कभी नहीं छोड़ता।
ਨਾਨਕ ਮਨਿ ਤਨਿ ਚਾਉ ਏਹੁ ਨਿਤ ਪ੍ਰਭ ਕਉ ਲੋੜੇ ॥੨੧॥੧॥ ਸੁਧੁ ਕੀਚੇ
हे नानक ! सिफत सालाह करने वाले के मन में। तन में सदा ये चाव बना रहता है। वह सदा प्रभू को मिलने की तमन्ना रखता है। 21। 1।
ਰਾਗੁ ਗਉੜੀ ਭਗਤਾਂ ਕੀ ਬਾਣੀ
रागु गउड़ी भगतां की बाणी
ੴ ਸਤਿਨਾਮੁ ਕਰਤਾ ਪੁਰਖੁ ਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ੴ सतिनामु करता पुरखु गुर प्रसादि ॥
ਗਉੜੀ ਗੁਆਰੇਰੀ ਸ੍ਰੀ ਕਬੀਰ ਜੀਉ ਕੇ ਚਉਪਦੇ ੧੪ ॥
गउड़ी गुआरेरी श्री कबीर जीउ के चउपदे १४ ॥
ਅਬ ਮੋਹਿ ਜਲਤ ਰਾਮ ਜਲੁ ਪਾਇਆ ॥
(ढूँढते-ढूँढते) अब मैंने प्रभू के नाम का अमृत ढूँढ लिया है।
ਰਾਮ ਉਦਕਿ ਤਨੁ ਜਲਤ ਬੁਝਾਇਆ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
उस नाम-अमृत ने मेरे तपते शरीर को ठंडा कर दिया है। 1। रहाउ।
ਮਨੁ ਮਾਰਣ ਕਾਰਣਿ ਬਨ ਜਾਈਐ ॥
जंगलों की ओर (तीर्थों आदि पर) मन को मारने के लिए (शांत करने के लिए) जाते हैं।
ਸੋ ਜਲੁ ਬਿਨੁ ਭਗਵੰਤ ਨ ਪਾਈਐ ॥੧॥
पर वह (नाम-रूपी) अमृत (जो मन को शांत कर सके) प्रभू के बिना (प्रभू के सिमरन के बिना) नहीं मिल सकता। 1।
ਜਿਹ ਪਾਵਕ ਸੁਰਿ ਨਰ ਹੈ ਜਾਰੇ ॥
(तृष्णा की) जिस आग ने देवते और मनुष्य जला डाले हैं।
ਰਾਮ ਉਦਕਿ ਜਨ ਜਲਤ ਉਬਾਰੇ ॥੨॥
प्रभू के (नाम-) अमृत ने भगत जनों को जलने से बचा लिया है। 2।
ਭਵ ਸਾਗਰ ਸੁਖ ਸਾਗਰ ਮਾਹੀ ॥
(वह भगत-जन जिनको ‘राम-उदक’ ने जलने से बचाया है) इस संसार समुंद्र में (जो अब उनके लिए) सुखों का समुंद्र (बन गया है)
ਪੀਵਿ ਰਹੇ ਜਲ ਨਿਖੁਟਤ ਨਾਹੀ ॥੩॥
नाम-अमृत लगातार पी रहे हैं और वह अमृत कभी खत्म नहीं होता। 3।
ਕਹਿ ਕਬੀਰ ਭਜੁ ਸਾਰਿੰਗਪਾਨੀ ॥
कबीर कहता है– (हे मन !) परमात्मा का सिमरन कर।
ਰਾਮ ਉਦਕਿ ਮੇਰੀ ਤਿਖਾ ਬੁਝਾਨੀ ॥੪॥੧॥
परमात्मा के नाम-अमृत ने मेरी (माया की) तृष्णा मिटा दी है। 4। 1।
ਗਉੜੀ ਕਬੀਰ ਜੀ ॥
गउड़ी कबीर जी ॥
ਮਾਧਉ ਜਲ ਕੀ ਪਿਆਸ ਨ ਜਾਇ ॥
हे माया के पति प्रभू ! तेरे नाम-अमृत की प्यास मिटती नहीं (भाव। तेरा नाम जप-जप के मैं तृप्त नहीं होता)।
ਜਲ ਮਹਿ ਅਗਨਿ ਉਠੀ ਅਧਿਕਾਇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
तेरा नाम अमृत पीते पीते और अधिक चाहत पैदा हो रही है। 1। रहाउ।
ਤੂੰ ਜਲਨਿਧਿ ਹਉ ਜਲ ਕਾ ਮੀਨੁ ॥
हे प्रभू ! तू जल का खजाना (समुंद्र) है। मैं उस जल की मछली हूँ।
ਜਲ ਮਹਿ ਰਹਉ ਜਲਹਿ ਬਿਨੁ ਖੀਨੁ ॥੧॥
जल में ही मैं जीवित रह सकती हूँ। जल के बिना मैं मर जाती हूँ। 1।
ਤੂੰ ਪਿੰਜਰੁ ਹਉ ਸੂਅਟਾ ਤੋਰ ॥
तू मेरा पिंजरा है। मैं तेरा कमजोर सा तोता हूँ।
ਜਮੁ ਮੰਜਾਰੁ ਕਹਾ ਕਰੈ ਮੋਰ ॥੨॥
(तेरे आसरे रहने पर) जम-रूपी बिल्ला मेरा क्या बिगाड़ लेगा?। 2।
ਤੂੰ ਤਰਵਰੁ ਹਉ ਪੰਖੀ ਆਹਿ ॥
हे प्रभू ! तू सुंदर वृक्ष है और मैं (उस वृक्ष पर आसरा लेने वाला) पंछी हूँ।
ਮੰਦਭਾਗੀ ਤੇਰੋ ਦਰਸਨੁ ਨਾਹਿ ॥੩॥
(मुझ) अभागे को (अभी तक) तेरे दर्शन नसीब नहीं हुए। 3।