Sri Guru Granth Sahib Ji — Ang 316 (hindi)
ਹਰਿ ਅੰਦਰਲਾ ਪਾਪੁ ਪੰਚਾ ਨੋ ਉਘਾ ਕਰਿ ਵੇਖਾਲਿਆ ॥
प्रभू ने तपस्वी का अंदर का (छुपा हुआ) पाप पंचों को प्रगट करके दिखा दिया।
ਧਰਮ ਰਾਇ ਜਮਕੰਕਰਾ ਨੋ ਆਖਿ ਛਡਿਆ ਏਸੁ ਤਪੇ ਨੋ ਤਿਥੈ ਖੜਿ ਪਾਇਹੁ ਜਿਥੈ ਮਹਾ ਮਹਾਂ ਹਤਿਆਰਿਆ ॥
धर्मराज ने अपने जमदूतों को कह दिया है कि इस तपस्वी को ले जा के उस जगह पर डालना जहाँ बड़े से बड़े पापी (डाले जाते हैं)।
ਫਿਰਿ ਏਸੁ ਤਪੇ ਦੈ ਮੁਹਿ ਕੋਈ ਲਗਹੁ ਨਾਹੀ ਏਹੁ ਸਤਿਗੁਰਿ ਹੈ ਫਿਟਕਾਰਿਆ ॥
फिर (वहाँ भी) इस तपस्वी के मुँह कोई ना लगना। (क्योंकि) ये तपस्वी सतिगुरू द्वारा धिक्कारा हुआ है (गुरू से विछुड़ा हुआ है)।
ਹਰਿ ਕੈ ਦਰਿ ਵਰਤਿਆ ਸੁ ਨਾਨਕਿ ਆਖਿ ਸੁਣਾਇਆ ॥
हे नानक ! जो ये कुछ प्रभू की दरगाह में घटित हुआ है वह कह के सुना दिया है।
ਸੋ ਬੂਝੈ ਜੁ ਦਯਿ ਸਵਾਰਿਆ ॥੧॥
इस बात को वह मनुष्य समझता है जिसे प्रभू पति ने सवारा हुआ है। 1।
ਮਃ ੪ ॥
महला ४॥
ਹਰਿ ਭਗਤਾਂ ਹਰਿ ਆਰਾਧਿਆ ਹਰਿ ਕੀ ਵਡਿਆਈ ॥
हरी के भगत हरी को सिमरते हैं और हरी की सिफत सालाह करते हैं।
ਹਰਿ ਕੀਰਤਨੁ ਭਗਤ ਨਿਤ ਗਾਂਵਦੇ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਸੁਖਦਾਈ ॥
भगत सदा हरी का कीर्तन गाते हैं और हरी का सुखदाई नाम (जपते हैं)।
ਹਰਿ ਭਗਤਾਂ ਨੋ ਨਿਤ ਨਾਵੈ ਦੀ ਵਡਿਆਈ ਬਖਸੀਅਨੁ ਨਿਤ ਚੜੈ ਸਵਾਈ ॥
प्रभू ने भक्तों को सदा के लिए नाम (जपने) का गुण बख्शा है जो दिनो दिन सवाया बढ़ता है।
ਹਰਿ ਭਗਤਾਂ ਨੋ ਥਿਰੁ ਘਰੀ ਬਹਾਲਿਅਨੁ ਅਪਣੀ ਪੈਜ ਰਖਾਈ ॥
प्रभू ने अपने बिरद की लाज रखी है और अपने भक्तों को हृदय में अडोल कर दिया है (भाव। माया के पीछे नहीं डोलने देता)।
ਨਿੰਦਕਾਂ ਪਾਸਹੁ ਹਰਿ ਲੇਖਾ ਮੰਗਸੀ ਬਹੁ ਦੇਇ ਸਜਾਈ ॥
निंदकों से प्रभू लेखा मांगता है और बहुत सजा देता है।
ਜੇਹਾ ਨਿੰਦਕ ਅਪਣੈ ਜੀਇ ਕਮਾਵਦੇ ਤੇਹੋ ਫਲੁ ਪਾਈ ॥
निंदक जैसा अपने मन में कमाते हैं। वैसा उन्हें फल मिलता है (क्योंकि)
ਅੰਦਰਿ ਕਮਾਣਾ ਸਰਪਰ ਉਘੜੈ ਭਾਵੈ ਕੋਈ ਬਹਿ ਧਰਤੀ ਵਿਚਿ ਕਮਾਈ ॥
अंदर बैठ के भी किया हुआ काम जरूर प्रगट हो जाता है। चाहे कोई धरती में (छुप के) करे।
ਜਨ ਨਾਨਕੁ ਦੇਖਿ ਵਿਗਸਿਆ ਹਰਿ ਕੀ ਵਡਿਆਈ ॥੨॥
(प्रभू का) दास नानक प्रभू की महिमा देख के प्रसन्न हो रहा है। 2।
ਪਉੜੀ ਮਃ ੫ ॥
पउड़ी महला ५॥
ਭਗਤ ਜਨਾਂ ਕਾ ਰਾਖਾ ਹਰਿ ਆਪਿ ਹੈ ਕਿਆ ਪਾਪੀ ਕਰੀਐ ॥
प्रभू (अपने) भक्तों का आप रखवाला है। पाप चितवने वाला (उनका) क्या बिगाड़ सकता है? (भाव। कुछ बिगाड़ नहीं सकता)।
ਗੁਮਾਨੁ ਕਰਹਿ ਮੂੜ ਗੁਮਾਨੀਆ ਵਿਸੁ ਖਾਧੀ ਮਰੀਐ ॥
मूर्ख अहंकारी मनुष्य अहंकार करते हैं और (अहंकार-रूपी) जहर खा के मरते हैं
ਆਇ ਲਗੇ ਨੀ ਦਿਹ ਥੋੜੜੇ ਜਿਉ ਪਕਾ ਖੇਤੁ ਲੁਣੀਐ ॥
(क्योंकि जिस जिंदगी पर मान करते हैं उसकी गिनती के) थोड़े दिन आखिर खत्म हो जाते हैं। जैसे पक्की फसल काटी जाती है और वह जैसे (अहंकार के) काम करते हैं।
ਜੇਹੇ ਕਰਮ ਕਮਾਵਦੇ ਤੇਵੇਹੋ ਭਣੀਐ ॥
(दरगाह में भी) वही कहलवाते हैं (भाव। वैसे ही फल पाते हैं)।
ਜਨ ਨਾਨਕ ਕਾ ਖਸਮੁ ਵਡਾ ਹੈ ਸਭਨਾ ਦਾ ਧਣੀਐ ॥੩੦॥
(पर) जो प्रभू सब का मालिक है। और बड़ा है वह (अपने) दास नानक का रखवाला है। 30।
ਸਲੋਕ ਮਃ ੪ ॥
श्लोक महला ४॥
ਮਨਮੁਖ ਮੂਲਹੁ ਭੁਲਿਆ ਵਿਚਿ ਲਬੁ ਲੋਭੁ ਅਹੰਕਾਰੁ ॥
सतिगुरू से भूले हुए मनुष्य मूल से ही भूले हुए हैं। क्योंकि उनके अंदर लब-लोभ और अहंकार है।
ਝਗੜਾ ਕਰਦਿਆ ਅਨਦਿਨੁ ਗੁਦਰੈ ਸਬਦਿ ਨ ਕਰਹਿ ਵੀਚਾਰੁ ॥
उनका हरेक दिन (भाव। सारी उम्र) लालच-लोभ-अहंकार (संबंधी) झगड़े करते गुजरती है। वह सतिगुरू के शबद में विचार नहीं करते।
ਸੁਧਿ ਮਤਿ ਕਰਤੈ ਸਭ ਹਿਰਿ ਲਈ ਬੋਲਨਿ ਸਭੁ ਵਿਕਾਰੁ ॥
करतार ने (मनमुखों) की होश और अक्ल (सुध-बुध) छीन ली है। निरे विकार ही बोलते हैं (भाव। निरे विकार भरे बचन ही करते हैं);
ਦਿਤੈ ਕਿਤੈ ਨ ਸੰਤੋਖੀਅਹਿ ਅੰਤਰਿ ਤਿਸਨਾ ਬਹੁ ਅਗਿਆਨੁ ਅੰਧੵਾਰੁ ॥
वे किसी भी दात (के मिलने) पर संतुष्ट नहीं होते। क्योंकि उनके मन में बड़ी तृष्णा। अज्ञान व अंधेरा है।
ਨਾਨਕ ਮਨਮੁਖਾ ਨਾਲੋ ਤੁਟੀ ਭਲੀ ਜਿਨ ਮਾਇਆ ਮੋਹ ਪਿਆਰੁ ॥੧॥
हे नानक ! (ऐसे) मनमुखों से संबंध टूटे हुए ही बेहतर हैं। क्योंकि उनका तो मोह-प्यार ही माया के साथ है। 1।
ਮਃ ੪ ॥
महला ४॥
ਜਿਨਾ ਅੰਦਰਿ ਦੂਜਾ ਭਾਉ ਹੈ ਤਿਨੑਾ ਗੁਰਮੁਖਿ ਪ੍ਰੀਤਿ ਨ ਹੋਇ ॥
जिन मनुष्यों के हृदय में माया का प्यार है उनके (हृदय में) सतिगुरू के सन्मुख रहने वाला स्नेह नहीं होता।
ਓਹੁ ਆਵੈ ਜਾਇ ਭਵਾਈਐ ਸੁਪਨੈ ਸੁਖੁ ਨ ਕੋਇ ॥
उसे सपने में भी सुख नहीं मिलता और वह पैदा होने मरने के चक्र-व्यूह में भटकता फिरता है।
ਕੂੜੁ ਕਮਾਵੈ ਕੂੜੁ ਉਚਰੈ ਕੂੜਿ ਲਗਿਆ ਕੂੜੁ ਹੋਇ ॥
जो मनुष्य (माया मोह-रूप) झूठा काम करता है। और (जीभ से भी) झूठ बोलता है और झूठ में लग के झूठ (का ही रूप) हो जाता है।
ਮਾਇਆ ਮੋਹੁ ਸਭੁ ਦੁਖੁ ਹੈ ਦੁਖਿ ਬਿਨਸੈ ਦੁਖੁ ਰੋਇ ॥
(क्योंकि) माया का मोह (-रूप झूठ) निरोल दुख (का कारण) है (इस लिए वह) दुख में ही समाप्त हो जाता है और दुख (का रोना ही) रोता रहता है।
ਨਾਨਕ ਧਾਤੁ ਲਿਵੈ ਜੋੜੁ ਨ ਆਵਈ ਜੇ ਲੋਚੈ ਸਭੁ ਕੋਇ ॥
चाहे हरेक मनुष्य चाहता रहे (पर) हे नानक ! माया और लिव का मेल नहीं फॅब सकता।
ਜਿਨ ਕਉ ਪੋਤੈ ਪੁੰਨੁ ਪਇਆ ਤਿਨਾ ਗੁਰ ਸਬਦੀ ਸੁਖੁ ਹੋਇ ॥੨॥
(पिछले किए हुए भले कर्मों के अनुसार) जिन्होंने (मन-रूपी) पलड़े में (भले संस्कारों का एकत्र-रूप) पुन्य (उकरा) हुआ है। उन्हें सतिगुरू के शबद के द्वारा सुख मिलता है। 2।
ਪਉੜੀ ਮਃ ੫ ॥
पउड़ी महला ५ ॥
ਨਾਨਕ ਵੀਚਾਰਹਿ ਸੰਤ ਮੁਨਿ ਜਨਾਂ ਚਾਰਿ ਵੇਦ ਕਹੰਦੇ ॥
हे नानक ! संत और मुनि जन (अपने) विचार देते हैं और चारों वेद (भाव। पुरातन धर्म पुस्तकें) भी (यही बात) कहते हैं।
ਭਗਤ ਮੁਖੈ ਤੇ ਬੋਲਦੇ ਸੇ ਵਚਨ ਹੋਵੰਦੇ ॥
(कि) भगत जन जो बचन मुँह से बोलते हैं वह (सही) होते हैं।
ਪਰਗਟ ਪਾਹਾਰੈ ਜਾਪਦੇ ਸਭਿ ਲੋਕ ਸੁਣੰਦੇ ॥
(भगत) सारे संसार में प्रसिद्ध होते हैं और (उनकी शोभा) सारे लोक सुनते हैं।
ਸੁਖੁ ਨ ਪਾਇਨਿ ਮੁਗਧ ਨਰ ਸੰਤ ਨਾਲਿ ਖਹੰਦੇ ॥
जो मूर्ख मनुष्य (ऐसे) संतों से वैर करते हैं। वह सुख नहीं पाते।
ਓਇ ਲੋਚਨਿ ਓਨਾ ਗੁਣਾ ਨੋ ਓਇ ਅਹੰਕਾਰਿ ਸੜੰਦੇ ॥
(वह दोखी) जलते तो अहंकार में हैं। (पर) भगत जनों के गुणों को तरसते हैं।
ਓਇ ਵੇਚਾਰੇ ਕਿਆ ਕਰਹਿ ਜਾਂ ਭਾਗ ਧੁਰਿ ਮੰਦੇ ॥
इन दोखी मनुष्यों के वश में भी क्या है? क्योंकि शुरू से ही (बुरे कर्म करने के कारण) बुरे (संस्कार ही) उनका हिस्सा हैं।