Sri Guru Granth Sahib Ji — Ang 301 (hindi)
ਸਭਿ ਕਾਰਜ ਤਿਨ ਕੇ ਸਿਧਿ ਹਹਿ ਜਿਨ ਗੁਰਮੁਖਿ ਕਿਰਪਾ ਧਾਰਿ ॥
जिन गुरमुखों पर वह कृपा करता है। उनके सारे काम सफल हो जाते हैं। (उन्हें मानस जनम के असल व्यापार में घाटा नहीं पड़ता)।
ਨਾਨਕ ਜੋ ਧੁਰਿ ਮਿਲੇ ਸੇ ਮਿਲਿ ਰਹੇ ਹਰਿ ਮੇਲੇ ਸਿਰਜਣਹਾਰਿ ॥੨॥
(पर) हे नानक ! प्रभू को वही मिले हैं। जो दरगाह से मिले हैं। और जिन्हें सृजनहार हरी ने स्वयं मिलाया है। 2।
ਪਉੜੀ ॥
पउड़ी ॥
ਤੂ ਸਚਾ ਸਾਹਿਬੁ ਸਚੁ ਹੈ ਸਚੁ ਸਚਾ ਗੋਸਾਈ ॥
हे प्रभू ! तू सदा स्थिर रहने वाला मालिक है और पृथ्वी का सच्चा साई है।
ਤੁਧੁਨੋ ਸਭ ਧਿਆਇਦੀ ਸਭ ਲਗੈ ਤੇਰੀ ਪਾਈ ॥
सारी सृष्टि तेरा ध्यान है और सब जीव-जंतु तेरे आगे सिर निवाते हैं।
ਤੇਰੀ ਸਿਫਤਿ ਸੁਆਲਿਉ ਸਰੂਪ ਹੈ ਜਿਨਿ ਕੀਤੀ ਤਿਸੁ ਪਾਰਿ ਲਘਾਈ ॥
तेरी सिफत-सालाह करना एक सोहाना सुंदर कार्य है। जिसने किया है। उसको (संसार-सागर से) पार उतारता है।
ਗੁਰਮੁਖਾ ਨੋ ਫਲੁ ਪਾਇਦਾ ਸਚਿ ਨਾਮਿ ਸਮਾਈ ॥
हे प्रभू ! जो जीव सतिगुरू के सन्मुख रहते हैं; तू उनकी मेहनत (सिफत-सलाह करने की मेहनत) सफल करता है। तेरे सच्चे नाम में वह लीन हो जाते हैं।
ਵਡੇ ਮੇਰੇ ਸਾਹਿਬਾ ਵਡੀ ਤੇਰੀ ਵਡਿਆਈ ॥੧॥
हे मेरे मालिक ! (प्रभू ! जैसा) तू खुद है (वैसी ही) तेरी वडिआई (भी) बड़ी (भाव। बड़े गुण पैदा करने वाली) है। 1।
ਸਲੋਕ ਮਃ ੪ ॥
श्लोक महला ४॥
ਵਿਣੁ ਨਾਵੈ ਹੋਰੁ ਸਲਾਹਣਾ ਸਭੁ ਬੋਲਣੁ ਫਿਕਾ ਸਾਦੁ ॥
हरी के नाम के बिना किसी और की महिमा करनी - ये बोलने का सारा (उद्यम) बे-स्वादा काम है (भाव। इसमें असली आनंद नहीं है)।
ਮਨਮੁਖ ਅਹੰਕਾਰੁ ਸਲਾਹਦੇ ਹਉਮੈ ਮਮਤਾ ਵਾਦੁ ॥
मनमुख जीव अहंकार। अहंम और अपनत्व की बातों को पसंद करते हैं।
ਜਿਨ ਸਾਲਾਹਨਿ ਸੇ ਮਰਹਿ ਖਪਿ ਜਾਵੈ ਸਭੁ ਅਪਵਾਦੁ ॥
इनके आधार पर किसी मनुष्य की निंदा करते हैं और इनका सारा झगड़ा (भाव। उस्तति-निंदा की बातों का सिलसिला) व्यर्थ जाता है।
ਜਨ ਨਾਨਕ ਗੁਰਮੁਖਿ ਉਬਰੇ ਜਪਿ ਹਰਿ ਹਰਿ ਪਰਮਾਨਾਦੁ ॥੧॥
हे नानक ! सतिगुरू के सन्मुख रहने वाले मनुष्य पूर्ण आनंद स्वरूप प्रभू का सिमरन करके (दूसरे मनुष्यों की उस्तति निंदा के चस्के से) बच निकलते हैं। 1।
ਮਃ ੪ ॥
महला ४॥
ਸਤਿਗੁਰ ਹਰਿ ਪ੍ਰਭੁ ਦਸਿ ਨਾਮੁ ਧਿਆਈ ਮਨਿ ਹਰੀ ॥
हे सतिगुरू ! मुझे प्रभू की बातें सुना (जिससे) मैं हृदय में प्रभू का नाम सिमर सकूँ।
ਨਾਨਕ ਨਾਮੁ ਪਵਿਤੁ ਹਰਿ ਮੁਖਿ ਬੋਲੀ ਸਭਿ ਦੁਖ ਪਰਹਰੀ ॥੨॥
हे नानक ! प्रभू का नाम पवित्र है (इसलिए मन चाहता है कि मैं भी) मुँह से उच्चारण करके (अपने) सारे दुख दूर कर लूँ। 2।
ਪਉੜੀ ॥
पउड़ी॥
ਤੂ ਆਪੇ ਆਪਿ ਨਿਰੰਕਾਰੁ ਹੈ ਨਿਰੰਜਨ ਹਰਿ ਰਾਇਆ ॥
हे रौशनी देने वाले माया से रहित प्रभू ! तू स्वयं ही स्वयं निरंकार है।
ਜਿਨੀ ਤੂ ਇਕ ਮਨਿ ਸਚੁ ਧਿਆਇਆ ਤਿਨ ਕਾ ਸਭੁ ਦੁਖੁ ਗਵਾਇਆ ॥
हे सच्चे साई ! जिन्होंने एकाग्र हो के तेरा सिमरन किया है। उनका तूने सब दुख दूर कर दिया है।
ਤੇਰਾ ਸਰੀਕੁ ਕੋ ਨਾਹੀ ਜਿਸ ਨੋ ਲਵੈ ਲਾਇ ਸੁਣਾਇਆ ॥
(संसार में) तेरा शरीक कोई नहीं जिसे बराबरी दे के (तेरे जैसा) कहें।
ਤੁਧੁ ਜੇਵਡੁ ਦਾਤਾ ਤੂਹੈ ਨਿਰੰਜਨਾ ਤੂਹੈ ਸਚੁ ਮੇਰੈ ਮਨਿ ਭਾਇਆ ॥
हे माया से रहित सच्चे हरी ! तेरे जितना तू स्वयं ही दाता है। तू ही मेरे मन को प्यारा लगता है।
ਸਚੇ ਮੇਰੇ ਸਾਹਿਬਾ ਸਚੇ ਸਚੁ ਨਾਇਆ ॥੨॥
हे मेरे सच्चे साहिब ! तेरी बडिआई (महिमा) सदा कायम रहने वाली है। 2।
ਸਲੋਕ ਮਃ ੪ ॥
श्लोक महला ४॥
ਮਨ ਅੰਤਰਿ ਹਉਮੈ ਰੋਗੁ ਹੈ ਭ੍ਰਮਿ ਭੂਲੇ ਮਨਮੁਖ ਦੁਰਜਨਾ ॥
जिनके मन में अहंकार का रोग है। वे मन के मुरीद विकारी लोग भ्रम में भूले हुए हैं।
ਨਾਨਕ ਰੋਗੁ ਗਵਾਇ ਮਿਲਿ ਸਤਿਗੁਰ ਸਾਧੂ ਸਜਨਾ ॥੧॥
हे नानक ! ये अहंम् का रोग सतिगुरू को मिल के और सत्संग में रह कर दूर कर। 1।
ਮਃ ੪ ॥
महला ४॥
ਮਨੁ ਤਨੁ ਰਤਾ ਰੰਗ ਸਿਉ ਗੁਰਮੁਖਿ ਹਰਿ ਗੁਣਤਾਸੁ ॥
सतिगुरू के सन्मुख रहने वाले मनुष्य का मन और शरीर गुण-निधान हरी के प्रेम से रंगा रहता है।
ਜਨ ਨਾਨਕ ਹਰਿ ਸਰਣਾਗਤੀ ਹਰਿ ਮੇਲੇ ਗੁਰ ਸਾਬਾਸਿ ॥੨॥
हे नानक ! जिस जन को सतिगुरू की शाबशी मिलती है। प्रभू की शरण पड़े उस मनुष्य को प्रभू (अपने साथ) मेल लेता है। 2।
ਪਉੜੀ ॥
पउड़ी ॥
ਤੂ ਕਰਤਾ ਪੁਰਖੁ ਅਗੰਮੁ ਹੈ ਕਿਸੁ ਨਾਲਿ ਤੂ ਵੜੀਐ ॥
हे प्रभू ! तू (सारी सृष्टि को) रचने वाला है। (सृष्टि में) व्यापक है (और फिर भी) पहुँच से परे है। किसी के साथ तेरी तुलना नहीं की जा सकती।
ਤੁਧੁ ਜੇਵਡੁ ਹੋਇ ਸੁ ਆਖੀਐ ਤੁਧੁ ਜੇਹਾ ਤੂਹੈ ਪੜੀਐ ॥
किस का नाम लें? तेरे जितना और कोई नहीं। तुझे ही तेरे जितना कह सकते हैं।
ਤੂ ਘਟਿ ਘਟਿ ਇਕੁ ਵਰਤਦਾ ਗੁਰਮੁਖਿ ਪਰਗੜੀਐ ॥
(हे हरी !) तू हरेक शरीर में व्यापक है। (पर ये बात) उनपे प्रगट (होती है) जो सतिगुरू के सन्मुख (होते हैं)।
ਤੂ ਸਚਾ ਸਭਸ ਦਾ ਖਸਮੁ ਹੈ ਸਭ ਦੂ ਤੂ ਚੜੀਐ ॥
(हे प्रभू !) तू सदा स्थिर रहने वाला सब का मालिक है और सबसे सुंदर (श्रेष्ठ) है।
ਤੂ ਕਰਹਿ ਸੁ ਸਚੇ ਹੋਇਸੀ ਤਾ ਕਾਇਤੁ ਕੜੀਐ ॥੩॥
हे सच्चे (हरी !) (अगर हमें ये निश्चय हो जाए कि) जो तू करता है वही होता है। तो हम चिंता क्यों करें?। 3।
ਸਲੋਕ ਮਃ ੪ ॥
श्लोक महला ४ ॥
ਮੈ ਮਨਿ ਤਨਿ ਪ੍ਰੇਮੁ ਪਿਰੰਮ ਕਾ ਅਠੇ ਪਹਰ ਲਗੰਨਿ ॥
(मन चाहता है कि) आठों पहर लग जाएं (भाव। गुजर जाएं) (पर) मेरे हृदय और शरीर में प्यारे का प्यार (लगा रहे। भाव - ना खत्म हो) (क्योंकि)
ਜਨ ਨਾਨਕ ਕਿਰਪਾ ਧਾਰਿ ਪ੍ਰਭ ਸਤਿਗੁਰ ਸੁਖਿ ਵਸੰਨਿ ॥੧॥
हे नानक ! (जिन) मनुष्यों पर हरी (ऐसी) कृपा करता है वह सतिगुरू के (बख्शे हुए) सुख में (सदा) बसते हैं। 1।
ਮਃ ੪ ॥
महला ४॥
ਜਿਨ ਅੰਦਰਿ ਪ੍ਰੀਤਿ ਪਿਰੰਮ ਕੀ ਜਿਉ ਬੋਲਨਿ ਤਿਵੈ ਸੋਹੰਨਿ ॥
जिन के हृदय में प्रभू का प्यार है। वह जैसे बोलते हैं। वैसे ही शोभा देते हैं (भाव। उनका बोला हुआ मीठा लगता है) (ये एक आश्चर्यजनक चमत्कार है)।
ਨਾਨਕ ਹਰਿ ਆਪੇ ਜਾਣਦਾ ਜਿਨਿ ਲਾਈ ਪ੍ਰੀਤਿ ਪਿਰੰਨਿ ॥੨॥
हे नानक ! (इस भेद की जीव को समझ नहीं आ सकती) जिस पर (प्रभू) ने ये प्यार लगाया है वह खुद ही जानता है। 2।
ਪਉੜੀ ॥
पउड़ी ॥
ਤੂ ਕਰਤਾ ਆਪਿ ਅਭੁਲੁ ਹੈ ਭੁਲਣ ਵਿਚਿ ਨਾਹੀ ॥
हे (सृष्टि के) रचनहार ! तू खुद अभॅुल है। भूलता नहीं (गलती नहीं करता)।
ਤੂ ਕਰਹਿ ਸੁ ਸਚੇ ਭਲਾ ਹੈ ਗੁਰ ਸਬਦਿ ਬੁਝਾਹੀ ॥
हे सच्चे ! सतिगुरू के शबद के द्वारा तू ये समझाता है कि जो तू करता है सो ठीक करता है।
ਤੂ ਕਰਣ ਕਾਰਣ ਸਮਰਥੁ ਹੈ ਦੂਜਾ ਕੋ ਨਾਹੀ ॥
हे हरी ! तेरा कोई शरीक नहीं और सृष्टि के इस सारे परपंच का मूल तू खुद ही है और समर्था वाला है।
ਤੂ ਸਾਹਿਬੁ ਅਗਮੁ ਦਇਆਲੁ ਹੈ ਸਭਿ ਤੁਧੁ ਧਿਆਹੀ ॥
तू दया करने वाला मालिक है (पर) तेरे तक पहुँच नहीं हो सकती; सब जीव-जंतु तुझे सिमरते हैं।