Sri Guru Granth Sahib Ji — Ang 244 (hindi)
ਹਰਿ ਗੁਣ ਸਾਰੀ ਤਾ ਕੰਤ ਪਿਆਰੀ ਨਾਮੇ ਧਰੀ ਪਿਆਰੋ ॥
जो जीव-स्त्री परमात्मा के नाम से प्यार डालती है परमात्मा के गुण (अपने हृदय में) संभालती है वह परमात्मा पति की प्यारी बन जाती है।
ਨਾਨਕ ਕਾਮਣਿ ਨਾਹ ਪਿਆਰੀ ਰਾਮ ਨਾਮੁ ਗਲਿ ਹਾਰੋ ॥੨॥
हे नानक ! जिस जीव-स्त्री के गले में परमात्मा का नाम रूपी हार पड़ा रहता है। वह जीव-स्त्री परमात्मा की प्यारी हो जाती है। 2।
ਧਨ ਏਕਲੜੀ ਜੀਉ ਬਿਨੁ ਨਾਹ ਪਿਆਰੇ ॥
हे जीउ ! जो जीव स्त्री प्यारे पति प्रभू के बिना अकेली (सूना जीवन व्यतीत कर रही) है।
ਦੂਜੈ ਭਾਇ ਮੁਠੀ ਜੀਉ ਬਿਨੁ ਗੁਰ ਸਬਦ ਕਰਾਰੇ ॥
वह गुरू के सहारा देने वाले शबद के बिना और ही प्यार में ठगी जा रही है।
ਬਿਨੁ ਸਬਦ ਪਿਆਰੇ ਕਉਣੁ ਦੁਤਰੁ ਤਾਰੇ ਮਾਇਆ ਮੋਹਿ ਖੁਆਈ ॥
गुरू के शबद के बिना और कोई नहीं जो उसे दुष्तर (संसार समुंद्र) से पार लंघा सकता है। वह माया के मोह में (फसी) परेशान होती रहती है।
ਕੂੜਿ ਵਿਗੁਤੀ ਤਾ ਪਿਰਿ ਮੁਤੀ ਸਾ ਧਨ ਮਹਲੁ ਨ ਪਾਈ ॥
जब जीव-स्त्री (माया के) झूठे मोह में परेशान होती है। तब (समझो कि) पति प्रभू से वह छुटॅड़ हुई पड़ी है। वह जीव-स्त्री परमात्मा पति का ठिकाना नहीं ढूँढ सकती।
ਗੁਰ ਸਬਦੇ ਰਾਤੀ ਸਹਜੇ ਮਾਤੀ ਅਨਦਿਨੁ ਰਹੈ ਸਮਾਏ ॥
(पर) जो जीव स्त्री गुरू के शबद में रंगी रहती है। वह आत्मिक अडोलता में मस्त रहती है। वह हर वक्त (प्रभू चरणों में) लीन रहती है।
ਨਾਨਕ ਕਾਮਣਿ ਸਦਾ ਰੰਗਿ ਰਾਤੀ ਹਰਿ ਜੀਉ ਆਪਿ ਮਿਲਾਏ ॥੩॥
हे नानक ! वह जीव स्त्री सदा (प्रभू पति के) प्रेम रंग में रंगी रहती है। उसे परमात्मा खुद (अपने चरणों में) मिलाए रखता है। 3।
ਤਾ ਮਿਲੀਐ ਹਰਿ ਮੇਲੇ ਜੀਉ ਹਰਿ ਬਿਨੁ ਕਵਣੁ ਮਿਲਾਏ ॥
हे जीउ ! (प्रभू चरणों में) तब ही मिल सकते हैं। अगर प्रभू खुद ही मिला ले। परमात्मा के बिना (उसके चरणों में) और कौन मिला सकता है? (क्योंकि )
ਬਿਨੁ ਗੁਰ ਪ੍ਰੀਤਮ ਆਪਣੇ ਜੀਉ ਕਉਣੁ ਭਰਮੁ ਚੁਕਾਏ ॥
हे जीउ ! अपने प्रीतम गुरू के बिना और कोई (हमारे मन की) भटकना दूर नहीं कर सकता।
ਗੁਰੁ ਭਰਮੁ ਚੁਕਾਏ ਇਉ ਮਿਲੀਐ ਮਾਏ ਤਾ ਸਾ ਧਨ ਸੁਖੁ ਪਾਏ ॥
हे माँ ! अगर गुरू (जीव स्त्री के मन की) भटकना दूर कर दे। तो इस तरह (प्रभू चरणों में) मिल सकते हैं। तभी जीव स्त्री आत्मिक आनंद पाती है।
ਗੁਰ ਸੇਵਾ ਬਿਨੁ ਘੋਰ ਅੰਧਾਰੁ ਬਿਨੁ ਗੁਰ ਮਗੁ ਨ ਪਾਏ ॥
गुरू की शरण पड़े बिना उसे (जीवन का सही) रास्ता नहीं मिल सकता।
ਕਾਮਣਿ ਰੰਗਿ ਰਾਤੀ ਸਹਜੇ ਮਾਤੀ ਗੁਰ ਕੈ ਸਬਦਿ ਵੀਚਾਰੇ ॥
हे नानक ! जो जीव-स्त्री गुरू के शबद की बरकति से (प्रभू पति के गुणों को) अपने सोच-मण्डल में टिकाती है। वह प्रभू के प्रेम रंग में रंगी रहती है। और आत्मिक अडोलता में मस्त रहती है।
ਨਾਨਕ ਕਾਮਣਿ ਹਰਿ ਵਰੁ ਪਾਇਆ ਗੁਰ ਕੈ ਭਾਇ ਪਿਆਰੇ ॥੪॥੧॥
गुरू के प्रेम में गुरू के प्यार में टिकने के कारण उस जीव-स्त्री का प्रभू पति से मिलाप हो जाता है। 4। 1।
ਗਉੜੀ ਮਹਲਾ ੩ ॥
गउड़ी महला ३ ॥
ਪਿਰ ਬਿਨੁ ਖਰੀ ਨਿਮਾਣੀ ਜੀਉ ਬਿਨੁ ਪਿਰ ਕਿਉ ਜੀਵਾ ਮੇਰੀ ਮਾਈ ॥
हे मेरी माँ ! पति प्रभू के मिलाप के बिना मेरी जीवात्मा बहुत कंगाल सी रहती है। प्रभू पति से मेल के बिना मेरे अंदर आत्मिक जीवन नहीं आ सकता।
ਪਿਰ ਬਿਨੁ ਨੀਦ ਨ ਆਵੈ ਜੀਉ ਕਾਪੜੁ ਤਨਿ ਨ ਸੁਹਾਈ ॥
(हे माँ !) प्रभू पति के बिना मेरे अंदर शांति नहीं आती। मुझे अपने शरीर पर कोई कपड़ा नहीं सुहाता।
ਕਾਪਰੁ ਤਨਿ ਸੁਹਾਵੈ ਜਾ ਪਿਰ ਭਾਵੈ ਗੁਰਮਤੀ ਚਿਤੁ ਲਾਈਐ ॥
(हे माँ !) कपड़ा शरीर पर तभी सुहाता है जब मैं प्रभू पति को भा जाऊँ। (पर। हे माँ !) गुरू की मति पर चलने से ही प्रभू में चिक्त जुड़ सकता है।
ਸਦਾ ਸੁਹਾਗਣਿ ਜਾ ਸਤਿਗੁਰੁ ਸੇਵੇ ਗੁਰ ਕੈ ਅੰਕਿ ਸਮਾਈਐ ॥
जब जीव-स्त्री गुरू की शरण पड़ती है। तब वह सदा वास्ते भाग्यशाली बन जाती है। (इस वास्ते। हे माँ !) गुरू की गोद में टिके रहना चाहिए।
ਗੁਰ ਸਬਦੈ ਮੇਲਾ ਤਾ ਪਿਰੁ ਰਾਵੀ ਲਾਹਾ ਨਾਮੁ ਸੰਸਾਰੇ ॥
(हे माँ !) जब गुरू के शबद में (मेरा चिक्त) जुड़ता है। तब मैं प्रभू पति को मिल पड़ती हूँ। (हे माँ !) प्रभू का नाम ही जगत में (असल) कमाई है।
ਨਾਨਕ ਕਾਮਣਿ ਨਾਹ ਪਿਆਰੀ ਜਾ ਹਰਿ ਕੇ ਗੁਣ ਸਾਰੇ ॥੧॥
हे नानक ! जीव स्त्री जब परमात्मा के गुण अपने हृदय में बसाती है। तब वह प्रभू पति को प्यारी लगने लग पड़ती है। 1।
ਸਾ ਧਨ ਰੰਗੁ ਮਾਣੇ ਜੀਉ ਆਪਣੇ ਨਾਲਿ ਪਿਆਰੇ ॥
वह जीव स्त्री अपने प्रभू पति के मिलाप में आत्मिक आनंद भोगती है (क्योंकि)
ਅਹਿਨਿਸਿ ਰੰਗਿ ਰਾਤੀ ਜੀਉ ਗੁਰ ਸਬਦੁ ਵੀਚਾਰੇ ॥
(हे मेरी माँ !) जो जीव-स्त्री गुरू के शबद को अपने सोच मण्डल में टिकाती है। वह दिन रात प्रभू पति के प्रेम रंग में रंगी रहती है।
ਗੁਰ ਸਬਦੁ ਵੀਚਾਰੇ ਹਉਮੈ ਮਾਰੇ ਇਨ ਬਿਧਿ ਮਿਲਹੁ ਪਿਆਰੇ ॥
गुरू के शबद को विचार मण्डल में संभालती है वह अपने अंदर से अहंकार दूर कर लेती है। (हे सत्संगी सहेलियो ! तुम भी) इस प्रकार प्रभू प्यारे को मिलो।
ਸਾ ਧਨ ਸੋਹਾਗਣਿ ਸਦਾ ਰੰਗਿ ਰਾਤੀ ਸਾਚੈ ਨਾਮਿ ਪਿਆਰੇ ॥
(हे माँ !) वह जीव स्त्री हमेशा भाग्यशाली है। सदा प्रभू पति के प्रेम रंग में रंगी रहती है। जो सदा स्थिर प्रभू के नाम में प्रेम करती है।
ਅਪੁਨੇ ਗੁਰ ਮਿਲਿ ਰਹੀਐ ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਗਹੀਐ ਦੁਬਿਧਾ ਮਾਰਿ ਨਿਵਾਰੇ ॥
हे सहेलियो ! अपने गुरू को मिल के रहना चाहिए (गुरू से ही) आत्मिक जीवन देने वाला नाम-जल ले सकते हैं। (जिसे ये नाम-जल मिल जाता है वह अपने अंदर से) मेर-तेर को समाप्त कर देती है।
ਨਾਨਕ ਕਾਮਣਿ ਹਰਿ ਵਰੁ ਪਾਇਆ ਸਗਲੇ ਦੂਖ ਵਿਸਾਰੇ ॥੨॥
हे नानक ! उस जीव-स्त्री ने पति प्रभू का मिलाप हासिल कर लिया। उसने सारे दुख भुला लिए। 2।
ਕਾਮਣਿ ਪਿਰਹੁ ਭੁਲੀ ਜੀਉ ਮਾਇਆ ਮੋਹਿ ਪਿਆਰੇ ॥
(हे माँ !) जो जीव-स्त्री प्रभू पति (की याद) से टूट जाती है। वह माया के मोह में (फंस के और पदार्थों को) प्यार करने लग पड़ती है।
ਝੂਠੀ ਝੂਠਿ ਲਗੀ ਜੀਉ ਕੂੜਿ ਮੁਠੀ ਕੂੜਿਆਰੇ ॥
वह झूठे और कूड़ पदार्थों की वणजारन झूठे मोह में लगी रहती है। झूठे मोह में ठॅगी जाती है।
ਕੂੜੁ ਨਿਵਾਰੇ ਗੁਰਮਤਿ ਸਾਰੇ ਜੂਐ ਜਨਮੁ ਨ ਹਾਰੇ ॥
पर जो जीव-स्त्री गुरू की मति को (अपने हृदय में) संभालती है। वह झूठे मोह को (अपने अंदर से) दूर कर लेती है। (और इस तरह) अपना जन्म व्यर्थ नहीं गवाती।
ਗੁਰ ਸਬਦੁ ਸੇਵੇ ਸਚਿ ਸਮਾਵੈ ਵਿਚਹੁ ਹਉਮੈ ਮਾਰੇ ॥
वह जीव स्त्री गुरू के शबद को संभालती है। सदा स्थिर प्रभू में लीन हो जाती है और अपने अंदर से अहंकार को खत्म कर देती है।
ਹਰਿ ਕਾ ਨਾਮੁ ਰਿਦੈ ਵਸਾਏ ਐਸਾ ਕਰੇ ਸੀਗਾਰੋ ॥
वह परमात्मा का नाम अपने हृदय में बसा लेती है - वह ऐसा आत्मिक श्रृंगार करती है।
ਨਾਨਕ ਕਾਮਣਿ ਸਹਜਿ ਸਮਾਣੀ ਜਿਸੁ ਸਾਚਾ ਨਾਮੁ ਅਧਾਰੋ ॥੩॥
हे नानक ! सदा स्थिर रहने वाले परमात्मा का नाम जिस जीव-स्त्री का जीवन आसरा है। वह जीव-स्त्री आत्मिक अडोलता में टिकी रहती है। 3।
ਮਿਲੁ ਮੇਰੇ ਪ੍ਰੀਤਮਾ ਜੀਉ ਤੁਧੁ ਬਿਨੁ ਖਰੀ ਨਿਮਾਣੀ ॥
हे मेरे प्रीतम प्रभू जी ! मुझे मिल। तेरे बिना मैं बहुत आजिज हूँ।
ਮੈ ਨੈਣੀ ਨੀਦ ਨ ਆਵੈ ਜੀਉ ਭਾਵੈ ਅੰਨੁ ਨ ਪਾਣੀ ॥
(हे प्रीतम जी !) तेरे बिना मेरे आँखों में नींद नहीं आती। मुझे ना अन्न अच्छा लगता है ना पानी।
ਪਾਣੀ ਅੰਨੁ ਨ ਭਾਵੈ ਮਰੀਐ ਹਾਵੈ ਬਿਨੁ ਪਿਰ ਕਿਉ ਸੁਖੁ ਪਾਈਐ ॥
(हे माँ ! प्रीतम प्रभू के विछोड़े में) अन्न-पानी अच्छा नहीं लगता। सिसकियों में जिंद दुखी रहती है। पति प्रभू के बिना आत्मिक आनंद प्राप्त नहीं होता।