Sri Guru Granth Sahib Ji — Ang 192 (hindi)
ਗਉੜੀ ਮਹਲਾ ੫ ॥
गउड़ी महला ५ ॥
ਗੁਰ ਕਾ ਸਬਦੁ ਰਾਖੁ ਮਨ ਮਾਹਿ ॥
(हे भाई ! अगर उस भगवान का आसरा मन में दृढ़ करना है~ तो) गुरू का शबद (अपने) मन में टिकाए रख।
ਨਾਮੁ ਸਿਮਰਿ ਚਿੰਤਾ ਸਭ ਜਾਹਿ ॥੧॥
(गुरू-शबद की सहायता से भगवान का) नाम सिमर~ तेरे सारे चिंता-फिक्र दूर हो जाएंगे। 1।
ਬਿਨੁ ਭਗਵੰਤ ਨਾਹੀ ਅਨ ਕੋਇ ॥
हे भाई !) भगवान के बिना (जीवों का) और कोई आसरा नहीं है।
ਮਾਰੈ ਰਾਖੈ ਏਕੋ ਸੋਇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
वह भगवान ही (जीवों को) मारता है। वह भगवान ही (जीवों को) पालता है। 1। रहाउ।
ਗੁਰ ਕੇ ਚਰਣ ਰਿਦੈ ਉਰਿ ਧਾਰਿ ॥
(हे भाई ! अगर भगवान का आसरा लेना है तो) अपने हृदय में दिल में गुरू के चरण बसा (भाव~ निम्रता से गुरू की शरण पड़)।
ਅਗਨਿ ਸਾਗਰੁ ਜਪਿ ਉਤਰਹਿ ਪਾਰਿ ॥੨॥
(गुरू के बताए हुए राह पर चल के परमात्मा का नाम) जप के तू (तृष्णा की) आग के समुंद्र से पार लांघ जाएगा। 2।
ਗੁਰ ਮੂਰਤਿ ਸਿਉ ਲਾਇ ਧਿਆਨੁ ॥
(हे भाई ! गुरू का शबद ही गुरू की मूरति है~ गुरू का स्वरूप है) गुरू के शबद से अपनी सुरति जोड़~
ਈਹਾ ਊਹਾ ਪਾਵਹਿ ਮਾਨੁ ॥੩॥
तू इस लोक में और परलोक में आदर हासिल करेगा। 3।
ਸਗਲ ਤਿਆਗਿ ਗੁਰ ਸਰਣੀ ਆਇਆ ॥
हे नानक ! जो मनुष्य अन्य सारे आसरे छोड़ के गुरू की शरण आता है~
ਮਿਟੇ ਅੰਦੇਸੇ ਨਾਨਕ ਸੁਖੁ ਪਾਇਆ ॥੪॥੬੧॥੧੩੦॥
उसके सारे चिंता-फिक्र समाप्त हो जाते हैं~ वह आत्मिक आनंद भोगता है। 4। 61। 130।
ਗਉੜੀ ਮਹਲਾ ੫ ॥
गउड़ी महला ५ ॥
ਜਿਸੁ ਸਿਮਰਤ ਦੂਖੁ ਸਭੁ ਜਾਇ ॥
(हे भाई ! उस गोबिंद की बाणी जप) जिसका सिमरन करने से हरेक किस्म के दुख दूर हो जाते हैं (और~
ਨਾਮੁ ਰਤਨੁ ਵਸੈ ਮਨਿ ਆਇ ॥੧॥
बाणी की बरकति से) परमात्मा का अमोलक नाम मन में आ बसता है। 1।
ਜਪਿ ਮਨ ਮੇਰੇ ਗੋਵਿੰਦ ਕੀ ਬਾਣੀ ॥
हे मेरे मन ! परमात्मा की सिफत सालाह की बाणी का उच्चारण कर।
ਸਾਧੂ ਜਨ ਰਾਮੁ ਰਸਨ ਵਖਾਣੀ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
(इस बाणी से ही) संत जन अपनी जीभ से परमात्मा के गुण गाते हैं। 1। रहाउ।
ਇਕਸੁ ਬਿਨੁ ਨਾਹੀ ਦੂਜਾ ਕੋਇ ॥
(हे भाई ! उस गोबिंद की सिफत सालाह करता रह) जिसके बराबर का कोई नहीं है
ਜਾ ਕੀ ਦ੍ਰਿਸਟਿ ਸਦਾ ਸੁਖੁ ਹੋਇ ॥੨॥
और~ जिसकी मेहर की निगाह से सदा आत्मिक आनंद मिलता है~ । 2।
ਸਾਜਨੁ ਮੀਤੁ ਸਖਾ ਕਰਿ ਏਕੁ ॥
(हे भाई ! उस) एक गोबिंद को अपना सज्जन-मित्र साथी बना~
ਹਰਿ ਹਰਿ ਅਖਰ ਮਨ ਮਹਿ ਲੇਖੁ ॥੩॥
और उस हरी की सिफत सालाह के अक्षर (संस्कार) अपने मन में उकर ले (लिख)। 3।
ਰਵਿ ਰਹਿਆ ਸਰਬਤ ਸੁਆਮੀ ॥
(हे भाई ! सारे जगत का वह) मालिक हर जगह व्यापक है और हरेक के दिल की जानता है~
ਗੁਣ ਗਾਵੈ ਨਾਨਕੁ ਅੰਤਰਜਾਮੀ ॥੪॥੬੨॥੧੩੧॥
नानक (भी) उस अंतरजामी स्वामी के गुण गाता है। 4। 62। 131।
ਗਉੜੀ ਮਹਲਾ ੫ ॥
गउड़ी महला ५ ॥
ਭੈ ਮਹਿ ਰਚਿਓ ਸਭੁ ਸੰਸਾਰਾ ॥
(हे भाई !) सारा संसार (किसी न किसी) डर-सहम के नीचे दबा रहता है~
ਤਿਸੁ ਭਉ ਨਾਹੀ ਜਿਸੁ ਨਾਮੁ ਅਧਾਰਾ ॥੧॥
सिर्फ उस मनुष्य पर (कोई) डर अपना जोर नहीं डाल सकता जिसे (परमात्मा का) नाम (जीवन के वास्ते) सहारा मिला हुआ है। 1।
ਭਉ ਨ ਵਿਆਪੈ ਤੇਰੀ ਸਰਣਾ ॥
हे प्रभू ! तेरी शरण पड़ने से (तेरा पल्ला पकड़ने से) कोई डर अपना जोर नहीं डाल सकता (क्योंकि~
ਜੋ ਤੁਧੁ ਭਾਵੈ ਸੋਈ ਕਰਣਾ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
फिर ये निष्चय बन जाता है कि) वही काम किया जा सकता है जो (हे प्रभू !) तुझे ठीक लगता है। 1। रहाउ।
ਸੋਗ ਹਰਖ ਮਹਿ ਆਵਣ ਜਾਣਾ ॥
दुख मानने में या खुशी मनाने में (संसारी जीव के वास्ते डर-सहम का) आना जाना बना रहता है।
ਤਿਨਿ ਸੁਖੁ ਪਾਇਆ ਜੋ ਪ੍ਰਭ ਭਾਣਾ ॥੨॥
सिर्फ उस मनुष्य ने (स्थाई) आत्मिक आनंद प्राप्त किया है जो प्रभू को प्यारा लगता है (जो प्रभू की रजा में चलता है)। 2।
ਅਗਨਿ ਸਾਗਰੁ ਮਹਾ ਵਿਆਪੈ ਮਾਇਆ ॥
(हे भाई ! ये संसार तृष्णा की) आग का समुंद्र है (इस में जीवों पे) माया अपना जोर डाले रखती है।
ਸੇ ਸੀਤਲ ਜਿਨ ਸਤਿਗੁਰੁ ਪਾਇਆ ॥੩॥
जिन (भाग्यशालियों) को सत्गुरू मिल जाता है~ वह (इस अग्नि सागर में विचरते हुए भी उनकी अंतरात्मा) शीतलता से (ठहराव) सहज में टिकी रहती है। 3।
ਰਾਖਿ ਲੇਇ ਪ੍ਰਭੁ ਰਾਖਨਹਾਰਾ ॥
(पर) हे नानक ! (डर सहम से बचने के लिए) बचाने की ताकत रखने वाला परमात्मा स्वयं ही बचाता है
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਕਿਆ ਜੰਤ ਵਿਚਾਰਾ ॥੪॥੬੩॥੧੩੨॥
(अग्नि सागर के विकारों के सेक से बचने के लिए) जीवों बिचारों की क्या बिसात है? (इस वास्ते हे नानक ! उस परमात्मा का पल्ला पकड़े रख)। 4। 63। 132।
ਗਉੜੀ ਮਹਲਾ ੫ ॥
गउड़ी महला ५ ॥
ਤੁਮਰੀ ਕ੍ਰਿਪਾ ਤੇ ਜਪੀਐ ਨਾਉ ॥
(हे पारब्रह्म प्रभू !) तेरी मेहर से ही (तेरा) नाम जपा जा सकता है।
ਤੁਮਰੀ ਕ੍ਰਿਪਾ ਤੇ ਦਰਗਹ ਥਾਉ ॥੧॥
तेरी कृपा से ही तेरी दरगाह में (जीव को) आदर मिल सकता है। 1।
ਤੁਝ ਬਿਨੁ ਪਾਰਬ੍ਰਹਮ ਨਹੀ ਕੋਇ ॥
हे पारब्रह्म प्रभू ! तरे बगैर (जीवों का और) कोई (आसरा) नहीं है।
ਤੁਮਰੀ ਕ੍ਰਿਪਾ ਤੇ ਸਦਾ ਸੁਖੁ ਹੋਇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
तेरी कृपा से ही (जीव को) सदा के लिए आत्मिक आनंद मिल सकता है। 1। रहाउ।
ਤੁਮ ਮਨਿ ਵਸੇ ਤਉ ਦੂਖੁ ਨ ਲਾਗੈ ॥
(हे पारब्रह्म प्रभू !) अगर तू (जीव के) मन में आ बसे तो (जीवों को कोई) दुख छू नहीं सकता।
ਤੁਮਰੀ ਕ੍ਰਿਪਾ ਤੇ ਭ੍ਰਮੁ ਭਉ ਭਾਗੈ ॥੨॥
तेरी मेहर से जीव की भटकना दूर हो जाती है~ जीव का डर सहम भाग जाता है। 2।
ਪਾਰਬ੍ਰਹਮ ਅਪਰੰਪਰ ਸੁਆਮੀ ॥
हे पारब्रह्म प्रभू ! हे बेअंत प्रभू ! हे जगत के मालिक प्रभू !
ਸਗਲ ਘਟਾ ਕੇ ਅੰਤਰਜਾਮੀ ॥੩॥
हे सारे जीवों के दिल की जानने वाले प्रभू !। 3।
ਕਰਉ ਅਰਦਾਸਿ ਅਪਨੇ ਸਤਿਗੁਰ ਪਾਸਿ ॥
(अगर तेरी मेहर हो तो ही) मैं अपने गुरू के आगे (ये) अरदास कर सकता हूँ कि
ਨਾਨਕ ਨਾਮੁ ਮਿਲੈ ਸਚੁ ਰਾਸਿ ॥੪॥੬੪॥੧੩੩॥
मुझे नानक को प्रभू का नाम मिले (नानक वास्ते नाम ही) सदा कायम रहने वाला सरमाया है। 4। 64। 133।
ਗਉੜੀ ਮਹਲਾ ੫ ॥
गउड़ी महला ५ ॥
ਕਣ ਬਿਨਾ ਜੈਸੇ ਥੋਥਰ ਤੁਖਾ ॥
(हे भाई !) जैसे दानों के बगैर खाली तोह (किसी काम नहीं आते~ इसी तरह)
ਨਾਮ ਬਿਹੂਨ ਸੂਨੇ ਸੇ ਮੁਖਾ ॥੧॥
वो मुँह सूने हैं जो परमात्मा का नाम जपने के बिना हैं। 1।
ਹਰਿ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਜਪਹੁ ਨਿਤ ਪ੍ਰਾਣੀ ॥
अर्थ: हे प्राणी ! सदा परमात्मा का नाम सिमरते रहो।
ਨਾਮ ਬਿਹੂਨ ਧ੍ਰਿਗੁ ਦੇਹ ਬਿਗਾਨੀ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
परमात्मा के नाम के बिना ये शरीर जो आखिर पराया हो जाता है (जो मौत आने पर छोड़ना पड़ता है) धिक्कार-योग (कहा जाता) है। 1। रहाउ।
ਨਾਮ ਬਿਨਾ ਨਾਹੀ ਮੁਖਿ ਭਾਗੁ ॥
(हे भाई !) परमात्मा का नाम जपे बिना किसी के माथे के भाग्य नहीं खुलते।
ਭਰਤ ਬਿਹੂਨ ਕਹਾ ਸੋਹਾਗੁ ॥੨॥
पति के बिना (स्त्री का) सुहाग नहीं हो सकता। 2।
ਨਾਮੁ ਬਿਸਾਰਿ ਲਗੈ ਅਨ ਸੁਆਇ ॥
(हे भाई !) जो मनुष्य परमात्मा का नाम भुला के और ही स्वादों में उलझा रहता है~
ਤਾ ਕੀ ਆਸ ਨ ਪੂਜੈ ਕਾਇ ॥੩॥
उसकी कोई उम्मीद सिरे नहीं चढ़ती। 3।
ਕਰਿ ਕਿਰਪਾ ਪ੍ਰਭ ਅਪਨੀ ਦਾਤਿ ॥
हे नानक ! (कह–) हे प्रभू ! मेहर करके तू जिस मनुष्य को अपने नाम की दाति बख्शता है
ਨਾਨਕ ਨਾਮੁ ਜਪੈ ਦਿਨ ਰਾਤਿ ॥੪॥੬੫॥੧੩੪॥
वही दिन रात तेरा नाम जपता है। 4। 65। 134।