Sri Guru Granth Sahib Ji — Ang 191 (hindi)
ਕਲਿ ਕਲੇਸ ਗੁਰ ਸਬਦਿ ਨਿਵਾਰੇ ॥
(साध-संगति में पहुँचे हुए जिन मनुष्यों के) मानसिक झगड़े और कलेश गुरू के शबद ने दूर कर दिए~
ਆਵਣ ਜਾਣ ਰਹੇ ਸੁਖ ਸਾਰੇ ॥੧॥
उनके जनम मरण के चक्कर खत्म हो गए~ उन्हें सारे सुख प्राप्त हो गए। 1।
ਭੈ ਬਿਨਸੇ ਨਿਰਭਉ ਹਰਿ ਧਿਆਇਆ ॥
हे भाई ! उनके (दुनिया के सारे) डर दूर हो गए हैं जिन्होंने निर्भय हरी का ध्यान (अपने हृदय में) धारण किया है और
ਸਾਧਸੰਗਿ ਹਰਿ ਕੇ ਗੁਣ ਗਾਇਆ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
साध-संगति में (जा के) परमात्मा की सिफत सालाह के गीत गाए हैं। 1। रहाउ।
ਚਰਨ ਕਵਲ ਰਿਦ ਅੰਤਰਿ ਧਾਰੇ ॥
(साध-संगति की बरकति से जिन मनुष्यों ने) परमात्मा के सुंदर चरण अपने दिल में बसा लिए~
ਅਗਨਿ ਸਾਗਰ ਗੁਰਿ ਪਾਰਿ ਉਤਾਰੇ ॥੨॥
गुरू ने उन्हें तृष्णा की आग के समुंद्र में से पार लंघा दिया। 2।
ਬੂਡਤ ਜਾਤ ਪੂਰੈ ਗੁਰਿ ਕਾਢੇ ॥
(विकारों के समुंद्र में) डूब रहे मनुष्य को पूरे गुरू ने (बाँह से पकड़ के बाहर) निकाल लिया (और जब वे साध-संगति में पहुँच गए)~
ਜਨਮ ਜਨਮ ਕੇ ਟੂਟੇ ਗਾਢੇ ॥੩॥
उनको (परमात्मा से) अनेकों जन्मों से बिछुड़ों हुओं को (गुरू ने दुबारा परमात्मा के साथ) मिला दिया। 3।
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਤਿਸੁ ਗੁਰ ਬਲਿਹਾਰੀ ॥
हे नानक ! कह– मैं उस गुरू से सदके जाता हूँ~
ਜਿਸੁ ਭੇਟਤ ਗਤਿ ਭਈ ਹਮਾਰੀ ॥੪॥੫੬॥੧੨੫॥
जिसको मिल के हमारी (जीवों की) उच्च आत्मिक अवस्था बन जाती है। 4। 56। 125।
ਗਉੜੀ ਮਹਲਾ ੫ ॥
गउड़ी महला ५ ॥
ਸਾਧਸੰਗਿ ਤਾ ਕੀ ਸਰਨੀ ਪਰਹੁ ॥
(हे मेरे भाई !) साध-संगति में जा के उस परमात्मा का आसरा ले।
ਮਨੁ ਤਨੁ ਅਪਨਾ ਆਗੈ ਧਰਹੁ ॥੧॥
अपना मन अपना तन (अर्थात अपने हरेक ज्ञानेंद्रियों को) उस परमात्मा के हवाले कर दे। 1।
ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਨਾਮੁ ਪੀਵਹੁ ਮੇਰੇ ਭਾਈ ॥
हे मेरे वीर ! परमात्मा का आत्मिक जीवन देने वाला नाम-जल पी (श्वास-श्वास परमात्मा का नाम सिमर।
ਸਿਮਰਿ ਸਿਮਰਿ ਸਭ ਤਪਤਿ ਬੁਝਾਈ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
जिसने नाम सिमरा है) उसने सिमर सिमर के (अपने अंदर से विकारों की) सारी सड़न बुझा ली है। 1। रहाउ।
ਤਜਿ ਅਭਿਮਾਨੁ ਜਨਮ ਮਰਣੁ ਨਿਵਾਰਹੁ ॥
(हे मेरे वीर !)अहंकार दूर करके जनम मरण के चक्कर समाप्त कर दे
ਹਰਿ ਕੇ ਦਾਸ ਕੇ ਚਰਣ ਨਮਸਕਾਰਹੁ ॥੨॥
परमात्मा के सेवक के चरणों पे अपना सिर रख दे । 2।
ਸਾਸਿ ਸਾਸਿ ਪ੍ਰਭੁ ਮਨਹਿ ਸਮਾਲੇ ॥
(हे मेरे भाई !) हरेक श्वास के साथ परमात्मा को अपने मन में संभाल के रख।
ਸੋ ਧਨੁ ਸੰਚਹੁ ਜੋ ਚਾਲੈ ਨਾਲੇ ॥੩॥
वह (नाम-) धन इकट्ठा कर~ जो तेरे साथ निभे। 3।
ਤਿਸਹਿ ਪਰਾਪਤਿ ਜਿਸੁ ਮਸਤਕਿ ਭਾਗੁ ॥
(पर ये नाम-धन इकट्ठा करना जीवों के वश की बात नहीं। ये नाम-धन) उस मनुष्य को ही मिलता है~ जिसके माथे पे भाग्य जागे।
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਤਾ ਕੀ ਚਰਣੀ ਲਾਗੁ ॥੪॥੫੭॥੧੨੬॥
हे नानक ! कह– (हे मेरे भाई !) तू उस मनुष्य के चरणों में लग (जिसे नाम धन मिला हुआ है)। 4। 57। 126।
ਗਉੜੀ ਮਹਲਾ ੫ ॥
गउड़ी महला ५ ॥
ਸੂਕੇ ਹਰੇ ਕੀਏ ਖਿਨ ਮਾਹੇ ॥
आत्मिक जीवन देने वाली निगाह करके गुरू नाम-जल से सींच के जिन्हें आत्मिक जीवन देता है~
ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਦ੍ਰਿਸਟਿ ਸੰਚਿ ਜੀਵਾਏ ॥੧॥
उन आत्मिक जीवन के रस से वंचित हो चुके मनुष्यों को गुरू एक छिन में हरे (भाव~ आत्मिक जीवन वाले) बना देता है। 1।
ਕਾਟੇ ਕਸਟ ਪੂਰੇ ਗੁਰਦੇਵ ॥
पूरे गुरू ने उसके सारे कष्ट काट दिए
ਸੇਵਕ ਕਉ ਦੀਨੀ ਅਪੁਨੀ ਸੇਵ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
जिस सेवक को (परमात्मा ने) अपनी सेवा-भक्ति (की दाति) दी।। 1। रहाउ।
ਮਿਟਿ ਗਈ ਚਿੰਤ ਪੁਨੀ ਮਨ ਆਸਾ ॥
उसकी (हरेक किस्म की) चिंता मिट गई~ उसके मन की (हरेक) आस पूरी हो गई
ਕਰੀ ਦਇਆ ਸਤਿਗੁਰਿ ਗੁਣਤਾਸਾ ॥੨॥
गुणों के खजाने सतिगुरू ने जिस मनुष्य पर मेहर की। 2।
ਦੁਖ ਨਾਠੇ ਸੁਖ ਆਇ ਸਮਾਏ ॥
उसके सारे दुख दूर हो गए~ उसके अंदर (सारे) सुख आ के टिक गए
ਢੀਲ ਨ ਪਰੀ ਜਾ ਗੁਰਿ ਫੁਰਮਾਏ ॥੩॥
जब गुरू ने जिस मनुष्य पर बख्शिश होने का हुकम किया~ थोड़ी सी भी ढील ना हुई ।3 ।
ਇਛ ਪੁਨੀ ਪੂਰੇ ਗੁਰ ਮਿਲੇ ॥
हे नानक ! जो मनुष्य पूरे गुरू से मिल गए~ उनकी (हरेक किस्म की) इच्छा पूरी हो गई~
ਨਾਨਕ ਤੇ ਜਨ ਸੁਫਲ ਫਲੇ ॥੪॥੫੮॥੧੨੭॥
उन्हें उच्च आत्मिक गुणों के सुंदर फल लग गए। 4। 58। 127।
ਗਉੜੀ ਮਹਲਾ ੫ ॥
गउड़ी महला ५ ॥
ਤਾਪ ਗਏ ਪਾਈ ਪ੍ਰਭਿ ਸਾਂਤਿ ॥
परमात्मा ने उनके अंदर ऐसी ठण्ड समा दी होती है कि उनके सारे ताप-कलेश दूर हो जाते हैं
ਸੀਤਲ ਭਏ ਕੀਨੀ ਪ੍ਰਭ ਦਾਤਿ ॥੧॥
जिन्हें परमात्मा अपने नाम की दाति देता है वे ठंडे जिगरे वाले बन जाते हैं।। 1।
ਪ੍ਰਭ ਕਿਰਪਾ ਤੇ ਭਏ ਸੁਹੇਲੇ ॥
(जिन मनुष्यों को परमात्मा अपने नाम की दाति देता है वह मनुष्य) परमात्मा की कृपा से आसान (जीवन वाले) हो जाते हैं~
ਜਨਮ ਜਨਮ ਕੇ ਬਿਛੁਰੇ ਮੇਲੇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
उनको अनेक जन्मों के विछुड़ों को परमात्मा (अपने साथ) मिला लेता है। 1। रहाउ।
ਸਿਮਰਤ ਸਿਮਰਤ ਪ੍ਰਭ ਕਾ ਨਾਉ ॥
(जिन्हें परमात्मा अपने नाम की दाति देता है) परमात्मा का नाम सिमर सिमर के
ਸਗਲ ਰੋਗ ਕਾ ਬਿਨਸਿਆ ਥਾਉ ॥੨॥
(उनके अंदर से) सारे रोगों के निशान ही मिट जाते हैं। 2।
ਸਹਜਿ ਸੁਭਾਇ ਬੋਲੈ ਹਰਿ ਬਾਣੀ ॥
(जिस मनुष्य को परमात्मा नाम की दाति देता है वह) आत्मिक अडोलता में टिक के प्रेम-प्यार में लीन हो के परमात्मा की सिफत सालाह की बाणी उचारता रहता है।
ਆਠ ਪਹਰ ਪ੍ਰਭ ਸਿਮਰਹੁ ਪ੍ਰਾਣੀ ॥੩॥
हे प्राणी ! (तू भी उसके दर से नाम की दाति माँग~ और) आठों पहर प्रभू का नाम सिमरता रह। 3।
ਦੂਖੁ ਦਰਦੁ ਜਮੁ ਨੇੜਿ ਨ ਆਵੈ ॥
कोई दुख दर्द उसके नजदीक नहीं आता~ उसे मौत का डर नहीं छूता (आत्मिक मौत का उसे खतरा नहीं रह जाता
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਜੋ ਹਰਿ ਗੁਨ ਗਾਵੈ ॥੪॥੫੯॥੧੨੮॥
हे नानक ! कह– (परमात्मा की मेहर से) जो मनुष्य परमात्मा के गुण गाता रहता है। )। 4। 59। 128।
ਗਉੜੀ ਮਹਲਾ ੫ ॥
गउड़ी महला ५ ॥
ਭਲੇ ਦਿਨਸ ਭਲੇ ਸੰਜੋਗ ॥
(हे भाई !) वे दिन सुहावने होते हैं~ वे मिलाप के अवसर सुखदायक होते हैं
ਜਿਤੁ ਭੇਟੇ ਪਾਰਬ੍ਰਹਮ ਨਿਰਜੋਗ ॥੧॥
जब (माया से) निर्लिप प्रभू जी मिल जाते हैं। 1।
ਓਹ ਬੇਲਾ ਕਉ ਹਉ ਬਲਿ ਜਾਉ ॥
अर्थ: (हे भाई !) मैं उस समय से कुर्बान जाता हूँ
ਜਿਤੁ ਮੇਰਾ ਮਨੁ ਜਪੈ ਹਰਿ ਨਾਉ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
जिस समय मेरा मन परमात्मा का नाम जपता है। 1। रहाउ।
ਸਫਲ ਮੂਰਤੁ ਸਫਲ ਓਹ ਘਰੀ ॥
(हे भाई !) मनुष्य के लिए वह महूरत भाग्यशाली होता है~
ਜਿਤੁ ਰਸਨਾ ਉਚਰੈ ਹਰਿ ਹਰੀ ॥੨॥
वह घड़ी अनमोल होती है जब उसकी जीभ परमात्मा का नाम उचारती है। 2।
ਸਫਲੁ ਓਹੁ ਮਾਥਾ ਸੰਤ ਨਮਸਕਾਰਸਿ ॥
(हे भाई !) वह माथा भी भाग्यशाली है~ जो गुरू-संत के चरणों में झुकता है।
ਚਰਣ ਪੁਨੀਤ ਚਲਹਿ ਹਰਿ ਮਾਰਗਿ ॥੩॥
वह पैर पवित्र हो जाते हैं जो परमात्मा (के मिलाप) के रास्ते पर चलते हैं। 3।
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਭਲਾ ਮੇਰਾ ਕਰਮ ॥
हे नानक ! कह–मेरे बड़े भाग्य (जाग पड़ते हैं)
ਜਿਤੁ ਭੇਟੇ ਸਾਧੂ ਕੇ ਚਰਨ ॥੪॥੬੦॥੧੨੯॥
जब मैं गुरू के चरण परसता हूँ। 4। 60। 128।