Sri Guru Granth Sahib Ji — Ang 154 (hindi)
ਗਉੜੀ ਮਹਲਾ ੧ ॥
गउड़ी महला १ ॥
ਕਿਰਤੁ ਪਇਆ ਨਹ ਮੇਟੈ ਕੋਇ ॥
जन्मों-जन्मांतरों के किए संस्कारों के समूह जो मन में इकट्ठे हुए पड़े हैं (कर्मों के द्वारा) कोई मनुष्य मिटा नहीं सकता।
ਕਿਆ ਜਾਣਾ ਕਿਆ ਆਗੈ ਹੋਇ ॥
(इसी तरह आगे के लिए भी कर्म-धर्म के अच्छे नतीजों की आस व्यर्थ है) कोई समझ नहीं सकता कि आने वाले जीवनकाल में क्या घटित होगा।
ਜੋ ਤਿਸੁ ਭਾਣਾ ਸੋਈ ਹੂਆ ॥
(कर्मों का आसरा छोड़ो~ प्रभू की रजा में चलना सीखो) जगत में जो कुछ हो रहा है परमात्मा की रजा में हो रहा है।
ਅਵਰੁ ਨ ਕਰਣੈ ਵਾਲਾ ਦੂਆ ॥੧॥
प्रभू के बिना और कोई कुछ करने वाला नहीं है (उसी की भक्ति करो)। 1।
ਨਾ ਜਾਣਾ ਕਰਮ ਕੇਵਡ ਤੇਰੀ ਦਾਤਿ ॥
मैं अपने किए कर्मों की ठीक कीमत नहीं जानता (मैं इन्हें बहुत महत्व देता हूँ)~ (दूसरी तरफ~ हे प्रभू !) तेरी बेअंत दातें मुझे मिल रहीं हैं~ उन्हें भी मैं नहीं समझ सकता (ये ख्याल मेरी भारी भूल है कि मेरे किए कर्मों के अनुसार मुझे मिल रहा है– ये तो पूरी तरह से तेरी मेहर है मेहर)।
ਕਰਮੁ ਧਰਮੁ ਤੇਰੇ ਨਾਮ ਕੀ ਜਾਤਿ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
तेरा नाम ही मेरी जात है~ तेरा नाम ही मेरा कर्म-धर्म है (मुझे तेरे नाम की ही ओट है। ना मान है किसी किए कर्म-धर्म का~ ना किसी ऊँची जाति का)। 1। रहाउ।
ਤੂ ਏਵਡੁ ਦਾਤਾ ਦੇਵਣਹਾਰੁ ॥
हे प्रभू ! तू दातें देने वाला इतना बड़ा दाता है (भक्ति की दात भी तू स्वयं ही देता है)
ਤੋਟਿ ਨਾਹੀ ਤੁਧੁ ਭਗਤਿ ਭੰਡਾਰ ॥
तेरे खजानों में भक्ति (की दात) की कोई कमी नहीं है~
ਕੀਆ ਗਰਬੁ ਨ ਆਵੈ ਰਾਸਿ ॥
(अपने किसी अच्छे आचरण के बारे में मनुष्य का) किया हुआ अहंकार कुछ सवार नहीं सकता।
ਜੀਉ ਪਿੰਡੁ ਸਭੁ ਤੇਰੈ ਪਾਸਿ ॥੨॥
मनुष्य की जीवात्मा और शरीर सब कुछ तेरे आसरे ही है। (जैसे तू शरीर की परवरिश के लिए रोजी देता है~ वैसे ही जीवात्मा को भी भक्ति की खुराक देने वाला तू ही है)। 2।
ਤੂ ਮਾਰਿ ਜੀਵਾਲਹਿ ਬਖਸਿ ਮਿਲਾਇ ॥
(हे प्रभू !) तू खुद ही मुझे गुरू की मति दे के~ मेरे पर मेहर करके मुझे अपने चरणों में जोड़ के~ मेरा स्वैभाव मार के~
ਜਿਉ ਭਾਵੀ ਤਿਉ ਨਾਮੁ ਜਪਾਇ ॥
और जैसे तूझे ठीक लगता है मुझे अपना नाम जपा के मुझे आत्मिक जीवन देता है।
ਤੂੰ ਦਾਨਾ ਬੀਨਾ ਸਾਚਾ ਸਿਰਿ ਮੇਰੈ ॥
तू मेरे दिल की जानता है~ तू (मेरी हालत) देखता है~ तू मेरे सिर पर (रक्षक) है।
ਗੁਰਮਤਿ ਦੇਇ ਭਰੋਸੈ ਤੇਰੈ ॥੩॥
मैं सदा तेरे ही आसरे हूँ (मुझे अपने किसी कर्म का आसरा नहीं है)। 3।
ਤਨ ਮਹਿ ਮੈਲੁ ਨਾਹੀ ਮਨੁ ਰਾਤਾ ॥
(हे प्रभू !) जिनका मन (तेरे प्यार में) रंगा हुआ है~ उनके शरीर में विकारों की मैल नहीं।
ਗੁਰ ਬਚਨੀ ਸਚੁ ਸਬਦਿ ਪਛਾਤਾ ॥
गुरू के बचनों पर चल के गुरू के शबद में जुड़ के उन्होंने तूझे सदा कायम रहने वाले को पहचान लिया है (तेरे साथ सांझ डाल ली है)~
ਤੇਰਾ ਤਾਣੁ ਨਾਮ ਕੀ ਵਡਿਆਈ ॥
(कर्मों का आसरा लेने की जगह) उन्हें तेरे नाम का ही आसरा है~ वे सदा तेरे नाम की ही उपमा करते हैं।
ਨਾਨਕ ਰਹਣਾ ਭਗਤਿ ਸਰਣਾਈ ॥੪॥੧੦॥
हे नानक ! (कह–) वे मनुष्य प्रभू की भक्ति में रते रहते हैं~ वे प्रभू की शरण में रहते हैं। 4। 10।
ਗਉੜੀ ਮਹਲਾ ੧ ॥
गउड़ी महला १ ॥
ਜਿਨਿ ਅਕਥੁ ਕਹਾਇਆ ਅਪਿਓ ਪੀਆਇਆ ॥
(गुरू के शबद में जुड़ के) जिस मनुष्य ने अकॅथ प्रभू को (खुद सिमरा है और) औरों को सिमरन के लिए प्रेरित किया है। उसने खुद नाम-अमृत पीया है तथा औरों को भी पिलाया है।
ਅਨ ਭੈ ਵਿਸਰੇ ਨਾਮਿ ਸਮਾਇਆ ॥੧॥
उसे (दुनिया वाले) और सारे सहम भूल जाते हैं क्योंकि वह (सदैव प्रभू के) नाम में लीन रहता है। 1।
ਕਿਆ ਡਰੀਐ ਡਰੁ ਡਰਹਿ ਸਮਾਨਾ ॥
उसका (दुनिया वाला) सहम (परमात्मा वास्ते उसके हृदय में टिके हुए) डर अदब में समाप्त हो जाता है।
ਪੂਰੇ ਗੁਰ ਕੈ ਸਬਦਿ ਪਛਾਨਾ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
जिस मनुष्य ने पूरे गुरू के शबद में जुड़ के परमात्मा के साथ जान पहिचान बना ली~ वह (दुनिया के झमेलों में) सहमता नहीं।1। रहाउ।
ਜਿਸੁ ਨਰ ਰਾਮੁ ਰਿਦੈ ਹਰਿ ਰਾਸਿ ॥ ਸਹਜਿ ਸੁਭਾਇ ਮਿਲੇ ਸਾਬਾਸਿ ॥੨॥
जिस मनुष्य के हृदय में हरी परमात्मा की नाम-रस पूँजी है~ वह (माया की खातिर नहीं डोलता~ वह) अडोल अवस्था में टिका रहता है। वह प्रभू के प्यार में जुड़ा रहता है। उसे (प्रभू के दर से) आदर मिलता है। 2।
ਜਾਹਿ ਸਵਾਰੈ ਸਾਝ ਬਿਆਲ ॥
(पर) जिन मनुष्यों को प्रभू हर वक्त (सवेरे शाम) माया की नींद में ही सुलाए रखता है~
ਇਤ ਉਤ ਮਨਮੁਖ ਬਾਧੇ ਕਾਲ ॥੩॥
वे सदा अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्य लोक परलोक में ही मौत के सहम के साथ बंधे रहते हैं (जितना समय वे यहां हैं मौत का सहम उनके सिर पे सवार रहता है। इसके बाद भी जनम मरण के चक्र में धक्के खाते हैं)। 3।
ਅਹਿਨਿਸਿ ਰਾਮੁ ਰਿਦੈ ਸੇ ਪੂਰੇ ॥
हे नानक ! जिनके हृदय में दिन रात (हर वक्त) परमात्मा बसता है~ वह पूर्ण मनुष्य हैं (वे डावाँडोल नहीं होते)।
ਨਾਨਕ ਰਾਮ ਮਿਲੇ ਭ੍ਰਮ ਦੂਰੇ ॥੪॥੧੧॥
जिन्हें परमात्मा मिल गया उनकी सब भटकनें खत्म हो जाती हैं। 4। 11।
ਗਉੜੀ ਮਹਲਾ ੧ ॥
गउड़ी महला १ ॥
ਜਨਮਿ ਮਰੈ ਤ੍ਰੈ ਗੁਣ ਹਿਤਕਾਰੁ ॥
(जो मनुष्य प्रभू भक्ति से वंचित है और) उसी त्रैगुणी संसार के साथ ही हित करता है वह पैदा होता मरता रहता है।
ਚਾਰੇ ਬੇਦ ਕਥਹਿ ਆਕਾਰੁ ॥
चारों वेद जिस त्रैगुणी संसार का जिक्र करते हैं (वह जनम मरण के चक्रव्यूह में पड़ा रहता है)।
ਤੀਨਿ ਅਵਸਥਾ ਕਹਹਿ ਵਖਿਆਨੁ ॥
(ऐसे मनुष्य) जो भी व्याख्या करते हैं मन की तीन अवस्थाओं का ही जिक्र करते हैं (जिस अवस्था में जीवात्मा परमात्मा के साथ एक रूप हो जाती है वह बयान नहीं की जा सकती)।
ਤੁਰੀਆਵਸਥਾ ਸਤਿਗੁਰ ਤੇ ਹਰਿ ਜਾਨੁ ॥੧॥
गुरू की शरण पड़ कर परमात्मा के साथ गहरी जान पहिचान बना लो- यह है तुरीया अवस्था। 1।
ਰਾਮ ਭਗਤਿ ਗੁਰ ਸੇਵਾ ਤਰਣਾ ॥
(जनम मरन का चक्र~ जैसे एक चक्रव्यूह है~ इस में से) परमात्मा की भक्ति और गुरू की बताई हुई कार करके पार लांघ जाते हैं
ਬਾਹੁੜਿ ਜਨਮੁ ਨ ਹੋਇ ਹੈ ਮਰਣਾ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
(जो पार लांघ जाता है उसे) फिर ना जनम होता है ना मौत। (उस अवस्था को तुरीया अवस्था कह लो)। 1। रहाउ।
ਚਾਰਿ ਪਦਾਰਥ ਕਹੈ ਸਭੁ ਕੋਈ ॥
हरेक जीव धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष (मुक्ति) इन चार पदार्थों का जिक्र तो करता है~
ਸਿੰਮ੍ਰਿਤਿ ਸਾਸਤ ਪੰਡਿਤ ਮੁਖਿ ਸੋਈ ॥
सिम्रितियों-शास्त्रों के पण्डितों के मुंह से भी यही सुनते हैं।
ਬਿਨੁ ਗੁਰ ਅਰਥੁ ਬੀਚਾਰੁ ਨ ਪਾਇਆ ॥
पर~ गुरू की शरण पड़े बिना इसका अनुभव नहीं हो सकता।
ਮੁਕਤਿ ਪਦਾਰਥੁ ਭਗਤਿ ਹਰਿ ਪਾਇਆ ॥੨॥
मुक्ति पदार्थ क्या है (वह अवस्था कैसी है जहाँ जीव तीन गुणों के प्रभाव से निर्लिप हो जाता है) ये पदार्थ परमात्मा की भक्ति करने से मिलते हैं। 2।
ਜਾ ਕੈ ਹਿਰਦੈ ਵਸਿਆ ਹਰਿ ਸੋਈ ॥
जिस मनुष्य के हृदय में परमात्मा आ बसता है
ਗੁਰਮੁਖਿ ਭਗਤਿ ਪਰਾਪਤਿ ਹੋਈ ॥
उसे भक्ति की प्राप्ति हो गई। और ये भक्ति गुरू के द्वारा ही मिलती है।
ਹਰਿ ਕੀ ਭਗਤਿ ਮੁਕਤਿ ਆਨੰਦੁ ॥
परमात्मा की भगती के द्वारा मुक्ति पदार्थ का आनंद लेते हैं।
ਗੁਰਮਤਿ ਪਾਏ ਪਰਮਾਨੰਦੁ ॥੩॥
ये सर्वोच्च आनन्द गुरू की शिक्षा पर चलने से ही मिलता है। 3।
ਜਿਨਿ ਪਾਇਆ ਗੁਰਿ ਦੇਖਿ ਦਿਖਾਇਆ ॥
जिस मनुष्य ने मुक्ति का आनंद हासिल कर लिया~
ਆਸਾ ਮਾਹਿ ਨਿਰਾਸੁ ਬੁਝਾਇਆ ॥
उसे दुनिया की आशाओं के अंदर रहते हुए भी आसों उम्मीदों से उपराम रहने की जाच गुरू सिखा देता है।
ਦੀਨਾ ਨਾਥੁ ਸਰਬ ਸੁਖਦਾਤਾ ॥
गुरू ने सर्व सुखदाता दीनानाथ प्रभू खुद देख के जिस मनुष्य को दिखा दिया~
ਨਾਨਕ ਹਰਿ ਚਰਣੀ ਮਨੁ ਰਾਤਾ ॥੪॥੧੨॥
हे नानक ! उस मनुष्य का मन प्रभू चरणों (के प्यार) में रंगा रहता है। ४। १२।
ਗਉੜੀ ਚੇਤੀ ਮਹਲਾ ੧ ॥
गउड़ी चेती महला १ ॥
ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਕਾਇਆ ਰਹੈ ਸੁਖਾਲੀ ਬਾਜੀ ਇਹੁ ਸੰਸਾਰੋ ॥
ये शरीर अपने आप को अमर जान के सुख भोगने में ही लगा रहता है (ये नहीं समझता कि) ये जगत (एक) खेल (ही) है।
ਲਬੁ ਲੋਭੁ ਮੁਚੁ ਕੂੜੁ ਕਮਾਵਹਿ ਬਹੁਤੁ ਉਠਾਵਹਿ ਭਾਰੋ ॥
हे मेरे शरीर ! तू लब-लोभ कर रहा है। तू बहुत झूठ कमा रहा है (व्यर्थ की दौड़-भाग ही कर रहा है)~ तू (अपने ऊपर लब-लोभ-झूठ आदि के असर में गलत कामों का) भार उठाता जा रहा है।
ਤੂੰ ਕਾਇਆ ਮੈ ਰੁਲਦੀ ਦੇਖੀ ਜਿਉ ਧਰ ਉਪਰਿ ਛਾਰੋ ॥੧॥
हे मेरे शरीर ! मैंने तेरे जैसे ऐसे भटकते देखें हैं जैसे धरती पर राख। 1।
ਸੁਣਿ ਸੁਣਿ ਸਿਖ ਹਮਾਰੀ ॥
हे मेरी जीवात्मा ! मेरी शिक्षा ध्यान से सुन।
ਸੁਕ੍ਰਿਤੁ ਕੀਤਾ ਰਹਸੀ ਮੇਰੇ ਜੀਅੜੇ ਬਹੁੜਿ ਨ ਆਵੈ ਵਾਰੀ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
की हुई नेक कमाई ही तेरे साथ निभेगी। (अगर ये मानस जनम गवा लिया)~ तो दुबारा (जल्दी) वारी नहीं मिलेगी। 1। रहाउ।