Sri Guru Granth Sahib Ji — Ang 152 (hindi)
ਸਰਮ ਸੁਰਤਿ ਦੁਇ ਸਸੁਰ ਭਏ ॥
उद्यम और ऊँची सुरति~ ये दोनों उस जीव स्त्री के सास-ससुर बनें।
ਕਰਣੀ ਕਾਮਣਿ ਕਰਿ ਮਨ ਲਏ ॥੨॥
और हे मन ! अगर जीव उक्तम जिंदगी को स्त्री बना ले। 2।
ਸਾਹਾ ਸੰਜੋਗੁ ਵੀਆਹੁ ਵਿਜੋਗੁ ॥
अगर सत्संग (में जाना) प्रभू के साथ विवाह का साहा निहित हो (जैसे विवाह के लिए निहित हुआ साहा टाला नहीं जा सकता~ वैसे सत्संग से कभी ना टूटे)।
ਸਚੁ ਸੰਤਤਿ ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਜੋਗੁ ॥੩॥੩॥
अगर (सत्संग में रह के दुनिया से) निर्मोह रूप (प्रभू से) विवाह हो जाए; तो (इस विवाह में से) सत्य (भाव~ प्रभू का सदा हृदय में टिके रहना~ उस जीव स्त्री की) संतान है। हे नानक ! कह–ये है (सच्चा) प्रभू मिलाप। 3। 3।
ਗਉੜੀ ਮਹਲਾ ੧ ॥
गउड़ी महला १ ॥
ਪਉਣੈ ਪਾਣੀ ਅਗਨੀ ਕਾ ਮੇਲੁ ॥
हवा~ पानी और आग (आदि तत्वो का) मिलाप होता है (तब ये शरीर बनता है~ और इसमें)
ਚੰਚਲ ਚਪਲ ਬੁਧਿ ਕਾ ਖੇਲੁ ॥
चंचल और चपल बुद्धि की दौड़-भाग (शुरू हो जाती है)।
ਨਉ ਦਰਵਾਜੇ ਦਸਵਾ ਦੁਆਰੁ ॥
(शरीर के) नौ द्वार (इस दौड़ भाग में शामिल रहते हैं~ सिर्फ) दिमाग़ (ही है जिससे आत्मिक जीवन की सूझ पड़ सकती है)
ਬੁਝੁ ਰੇ ਗਿਆਨੀ ਏਹੁ ਬੀਚਾਰੁ ॥੧॥
हे आत्मिक जीवन की सूझ वाले मनुष्य ! (गुरू की शरण पड़ के) ये बात समझ लो । 1।
ਕਥਤਾ ਬਕਤਾ ਸੁਨਤਾ ਸੋਈ ॥
(उसे ये समझ आ जाती है कि) वह परमात्मा ही (हरेक जीव में व्यापक हो के) बोलने वाला~ सुनने वाला है
ਆਪੁ ਬੀਚਾਰੇ ਸੁ ਗਿਆਨੀ ਹੋਈ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
हे भाई ! जो मनुष्य (गुरू की शरण पड़ के) अपने आत्मिक जीवन का विष्लेशण करता रहता है वह मनुष्य आत्मिक जीवन की सूझ वाला हो जाता है।। 1। रहाउ।
ਦੇਹੀ ਮਾਟੀ ਬੋਲੈ ਪਉਣੁ ॥
मिट्टी आदि तत्वों से बने इस शरीर में श्वास चलता ही रहता है।
ਬੁਝੁ ਰੇ ਗਿਆਨੀ ਮੂਆ ਹੈ ਕਉਣੁ ॥
हे ज्ञानवान मनुष्य ! इस बात को समझ (कि जब मनुष्य को गुरू मिल जाता है तो मनुष्य के अंदर सिर्फ स्वैभाव की मौत होती है~ वैसे) और कुछ नहीं मरता।
ਮੂਈ ਸੁਰਤਿ ਬਾਦੁ ਅਹੰਕਾਰੁ ॥
(मनुष्य के अंदर से माया का) अहंकार मर जाता है।
ਓਹੁ ਨ ਮੂਆ ਜੋ ਦੇਖਣਹਾਰੁ ॥੨॥
पर~ वह (आत्मा) नहीं मरती जो सबकी संभाल करने वाले परमात्मा का अंश है। 2।
ਜੈ ਕਾਰਣਿ ਤਟਿ ਤੀਰਥ ਜਾਹੀ ॥
हे भाई ! जिस (नाम-रत्न) की खातिर लोग तीर्थों के तट पर जाते हैं~
ਰਤਨ ਪਦਾਰਥ ਘਟ ਹੀ ਮਾਹੀ ॥
वह कीमती रत्न (मनुष्य के) हृदय में ही बसता है।
ਪੜਿ ਪੜਿ ਪੰਡਿਤੁ ਬਾਦੁ ਵਖਾਣੈ ॥
(वेद आदि पुस्तकों का विद्वान) पण्डित (वेद आदि धर्म-पुस्तकों को) पढ़ पढ़ के (भी) चर्चा करता रहता है।
ਭੀਤਰਿ ਹੋਦੀ ਵਸਤੁ ਨ ਜਾਣੈ ॥੩॥
वह पण्डित (अपने) अंदर बसे हुए नाम-पदार्थ से सांझ नहीं पाता। 3।
ਹਉ ਨ ਮੂਆ ਮੇਰੀ ਮੁਈ ਬਲਾਇ ॥
(मनुष्य के अंदर से) माया की ममता रूपी चुड़ैल ही मरती है।
ਓਹੁ ਨ ਮੂਆ ਜੋ ਰਹਿਆ ਸਮਾਇ ॥
सब जीवों में व्यापक परमात्मा कभी नहीं मरता
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਗੁਰਿ ਬ੍ਰਹਮੁ ਦਿਖਾਇਆ ॥
हे नानक ! कह– (जिस मनुष्य को) गुरू ने परमात्मा के दर्शन करा दिए~ उसे दिखाई देने लगता है कि प्रभू पैदा होता मरता नहीं।
ਮਰਤਾ ਜਾਤਾ ਨਦਰਿ ਨ ਆਇਆ ॥੪॥੪॥
(उसे) ये दिखाई देने लगता है कि जीवात्मा मरती नहीं।। 4। 4।
ਗਉੜੀ ਮਹਲਾ ੧ ਦਖਣੀ ॥
गउड़ी महला १ दखणी ॥
ਸੁਣਿ ਸੁਣਿ ਬੂਝੈ ਮਾਨੈ ਨਾਉ ॥ ਤਾ ਕੈ ਸਦ ਬਲਿਹਾਰੈ ਜਾਉ ॥
जो मनुष्य (“साचे गुर की साची सीख”) सुन सुन के उसको विचारता समझता है और ये यकीन बना लेता है कि परमात्मा का नाम ही असल वणज-व्यापार है~ मैं उससे सदा सदके जाता हूँ।
ਆਪਿ ਭੁਲਾਏ ਠਉਰ ਨ ਠਾਉ ॥
जिस मनुष्य को प्रभू (इस ओर से) तोड़ देता है~ उसे कोई और (आत्मिक) सहारा नहीं मिल सकता।
ਤੂੰ ਸਮਝਾਵਹਿ ਮੇਲਿ ਮਿਲਾਉ ॥੧॥
हे प्रभू ! जिसे तू स्वयं बख्शे~ उसे तू (गुरू की शिक्षा में) मेल के (अपने चरनों का) मिलाप (बख्शता है)। 1।
ਨਾਮੁ ਮਿਲੈ ਚਲੈ ਮੈ ਨਾਲਿ ॥
हे प्रभू ! मेरी यही अरदास है (कि मुझे तेरा) नाम मिल जाए~ (तेरा नाम ही जगत से जाते समय) मेरे साथ जा सकता है।
ਬਿਨੁ ਨਾਵੈ ਬਾਧੀ ਸਭ ਕਾਲਿ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
तेरा नाम सिमरन के बिना सारी लुकाई मौत के सहम में जकड़ी हुई है। 1। रहाउ।
ਖੇਤੀ ਵਣਜੁ ਨਾਵੈ ਕੀ ਓਟ ॥
(हे भाई !) परमात्मा के नाम का आसरा (इस तरह लो जैसे) खेती को~ व्यापार को अपने शारीरिक निर्वाह का सहारा बनाते हो।
ਪਾਪੁ ਪੁੰਨੁ ਬੀਜ ਕੀ ਪੋਟ ॥
(कोई भी किया हुआ) पाप या पुन्न कर्म (हरेक जीव के लिए भविष्य के लिए) बीज की पोटली बन जाता है। (वह अच्छा-बुरा किया कर्म मन के अंदर संस्कार रूप में टिक के वैसे कर्म करने के लिए प्रेरणा करता रहता है)।
ਕਾਮੁ ਕ੍ਰੋਧੁ ਜੀਅ ਮਹਿ ਚੋਟ ॥
जिन लोगों के हृदय में (प्रभू के नाम की जगह) काम-क्रोध (आदि विकार) चोट मारते रहते हैं (प्रेरित करते रहते हैं)
ਨਾਮੁ ਵਿਸਾਰਿ ਚਲੇ ਮਨਿ ਖੋਟ ॥੨॥
वे लोग प्रभू का नाम विसार के (यहां) मन में (विकारों की) खोट लेकर ही चले जाते हैं। 2।
ਸਾਚੇ ਗੁਰ ਕੀ ਸਾਚੀ ਸੀਖ ॥
जिन लोगों को सच्चे सतिगुरू की सच्ची शिक्षा प्राप्त होती है~
ਤਨੁ ਮਨੁ ਸੀਤਲੁ ਸਾਚੁ ਪਰੀਖ ॥
उनका मन शांत रहता है (भाव~ उनकी ज्ञाने्रद्रियां विकारों से बची रहती हैं)। वह सदा कायम रहने वाले परमात्मा को पहिचान लेते हैं (सांझ पा लेते हैं)।
ਜਲ ਪੁਰਾਇਨਿ ਰਸ ਕਮਲ ਪਰੀਖ ॥
जैसे पानी की चौपक्ति~ पानी का कमल फूल (पानी के बिना जीवित नहीं रह सकते~ वैसे ही उनकी जिंद प्रभू नाम का विछोड़ा बर्दाश्त नहीं कर सकती)।
ਸਬਦਿ ਰਤੇ ਮੀਠੇ ਰਸ ਈਖ ॥੩॥
वे गुरू के शबद में रंगे रहते हैं~ वे मीठे स्वाभाव वाले होते हैं~ जैसे गन्ने का रस मीठा है। 3।
ਹੁਕਮਿ ਸੰਜੋਗੀ ਗੜਿ ਦਸ ਦੁਆਰ ॥
प्रभू के हुकम में पूर्बले किए कर्मों के संस्कारों के अनुसार संत जन अपार प्रभू की ज्योति से मिल के इस दस-द्वारी शरीर-किले में बसते हैं
ਪੰਚ ਵਸਹਿ ਮਿਲਿ ਜੋਤਿ ਅਪਾਰ ॥
(काम क्रोध आदि कोई विकार इस किले में उनपे चोट नहीं करता। उनके अंदर)
ਆਪਿ ਤੁਲੈ ਆਪੇ ਵਣਜਾਰ ॥
प्रभू खुद (नाम-वस्तु) बन के वणजित हो रहा है~ और~
ਨਾਨਕ ਨਾਮਿ ਸਵਾਰਣਹਾਰ ॥੪॥੫॥
हे नानक ! (उन संत जनों को) अपने नाम में जोड़ के (खुद ही) उनका जीवन उक्तम बनाता है। 4। 5।
ਗਉੜੀ ਮਹਲਾ ੧ ॥
गउड़ी महला १ ॥
ਜਾਤੋ ਜਾਇ ਕਹਾ ਤੇ ਆਵੈ ॥
(पर) ये कैसे समझ आए कि (यह वासना) कहां से आती है~
ਕਹ ਉਪਜੈ ਕਹ ਜਾਇ ਸਮਾਵੈ ॥
(वासना) कहां से पैदा होती है~ कहां जा के समाप्त हो जाती है?
ਕਿਉ ਬਾਧਿਓ ਕਿਉ ਮੁਕਤੀ ਪਾਵੈ ॥
मनुष्य कैसे इस वासना में बंध जाता है? कैसे इससे मुक्ति हासिल करता है?
ਕਿਉ ਅਬਿਨਾਸੀ ਸਹਜਿ ਸਮਾਵੈ ॥੧॥
(मुक्ति पा के) कैसे अटल अडोल अवस्था में टिक जाता हैं?। 1।
ਨਾਮੁ ਰਿਦੈ ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਮੁਖਿ ਨਾਮੁ ॥
जिस मनुष्य के हृदय में परमात्मा का नाम-अमृत बसता है~ जो मनुष्य मुंह से प्रभू का नाम उचारता है~
ਨਰਹਰ ਨਾਮੁ ਨਰਹਰ ਨਿਹਕਾਮੁ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
वह प्रभू का नाम ले के प्रभू की तरह कामना रहित (वासना रहित) हो जाता है। 1। रहाउ।
ਸਹਜੇ ਆਵੈ ਸਹਜੇ ਜਾਇ ॥
(गुरू के सन्मुख होने से ये समझ आती है कि) वासना कुदरती नियम अनुसार पैदा हो जाती है। कुदरती नियम अनुसार ही समाप्त हो जाती है।
ਮਨ ਤੇ ਉਪਜੈ ਮਨ ਮਾਹਿ ਸਮਾਇ ॥
(मनमुखता की हालत में) मन से पैदा होती है (गुरू के सन्मुख होने से) मन में ही खत्म हो जाती है।
ਗੁਰਮੁਖਿ ਮੁਕਤੋ ਬੰਧੁ ਨ ਪਾਇ ॥
जो मनुष्य गुरू के सन्मुख रहता है~ वह वासना से बचा रहता है। वासना (उसके राह में) रुकावट नहीं डाल सकती।
ਸਬਦੁ ਬੀਚਾਰਿ ਛੁਟੈ ਹਰਿ ਨਾਇ ॥੨॥
गुरू के शबद को विचार के वह मनुष्य प्रभू के नाम के द्वारा वासना (के जाल) में से बच जाता है। 2।
ਤਰਵਰ ਪੰਖੀ ਬਹੁ ਨਿਸਿ ਬਾਸੁ ॥
(जैसे) रात को अनेकों पक्षी पेड़ों पर बसेरा कर लेते हैं (वैसे ही जीव जगत में रैन-बसेरे के लिए आते हैं)~
ਸੁਖ ਦੁਖੀਆ ਮਨਿ ਮੋਹ ਵਿਣਾਸੁ ॥
कोई सुखी है कोई दुखी है। कईयों के मन में माया का मोह बन जाता है और वे आत्मिक मौत गले लगा लेते हैं।
ਸਾਝ ਬਿਹਾਗ ਤਕਹਿ ਆਗਾਸੁ ॥
पक्षी शाम को पेड़ों पर आ टिकते हैं~ सवेरे आकाश को ताकते हैं
ਦਹ ਦਿਸਿ ਧਾਵਹਿ ਕਰਮਿ ਲਿਖਿਆਸੁ ॥੩॥
(उजाला देख के) दसों दिशाओं में उड़ जाते हैं~ वैसे ही जीव किए कर्मों के सेंस्कारों के अनुसार दसों दिशाओं में भटकते फिरते हैं। 3।