Sri Guru Granth Sahib Ji — Ang 1416 (hindi)
ਨਾਨਕ ਨਾਮ ਰਤੇ ਸੇ ਧਨਵੰਤ ਹੈਨਿ ਨਿਰਧਨੁ ਹੋਰੁ ਸੰਸਾਰੁ ॥੨੬॥
हे नानक ! जो मनुष्य परमात्मा के नाम-रंगमें रंगे रहते हैं। वे धनवान हैं। बाकी सारा संसार कंगाल है। 26।
ਜਨ ਕੀ ਟੇਕ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਹਰਿ ਬਿਨੁ ਨਾਵੈ ਠਵਰ ਨ ਠਾਉ ॥
हे भाई ! परमात्मा का नाम (ही परमात्मा के) सेवकों का सहारा है। हरी-नाम के बिना (उनको) कोई और आसरा नहीं सूझता।
ਗੁਰਮਤੀ ਨਾਉ ਮਨਿ ਵਸੈ ਸਹਜੇ ਸਹਜਿ ਸਮਾਉ ॥
गुरू की मति की बरकति से परमात्मा का नाम (उनके) मन में बसा रहता है। हर वक्त आत्मिक अडोलता में (उनकी) लीनता रहती है।
ਵਡਭਾਗੀ ਨਾਮੁ ਧਿਆਇਆ ਅਹਿਨਿਸਿ ਲਾਗਾ ਭਾਉ ॥
बड़े भाग्यों से (उन्होने दिन-रात परमात्मा का) नाम सिमरा है। दिन-रात उनका प्यार (हरी-नाम से) बना रहता है।
ਜਨ ਨਾਨਕੁ ਮੰਗੈ ਧੂੜਿ ਤਿਨ ਹਉ ਸਦ ਕੁਰਬਾਣੈ ਜਾਉ ॥੨੭॥
दास नानक उनके चरणों की धूल (सदा) माँगता है (और कहता है- हे भाई !) मैं उनसे सदा सदके जाता हूँ। 27।
ਲਖ ਚਉਰਾਸੀਹ ਮੇਦਨੀ ਤਿਸਨਾ ਜਲਤੀ ਕਰੇ ਪੁਕਾਰ ॥
हे भाई ! चौरासी लाख जूनियों वाली ये धरती तृष्णा (की आग) में जल रही है और पुकार रही है।
ਇਹੁ ਮੋਹੁ ਮਾਇਆ ਸਭੁ ਪਸਰਿਆ ਨਾਲਿ ਚਲੈ ਨ ਅੰਤੀ ਵਾਰ ॥
माया का यह मोह सारी दुनिया में प्रभाव डाल रहा है (पर ये माया) आखिरी वक्त (किसी के भी) साथ नहीं जाती।
ਬਿਨੁ ਹਰਿ ਸਾਂਤਿ ਨ ਆਵਈ ਕਿਸੁ ਆਗੈ ਕਰੀ ਪੁਕਾਰ ॥
परमात्मा के नाम के बिना (माया से किसी को) शांति भी नहीं मिलती। (गुरू के बिना) किस के आगे पुकार करूँ। (माया के मोह से और कोई नहीं छुड़ा सकता)।
ਵਡਭਾਗੀ ਸਤਿਗੁਰੁ ਪਾਇਆ ਬੂਝਿਆ ਬ੍ਰਹਮੁ ਬਿਚਾਰੁ ॥
बहुत भाग्यशाली (जिन मनुष्यों ने) गुरू पा लिया। उन्होंने परमात्मा के साथ सांझ डाल ली। उन्होंने परमात्मा के गुणों को अपने मन में बसा लिया।
ਤਿਸਨਾ ਅਗਨਿ ਸਭ ਬੁਝਿ ਗਈ ਜਨ ਨਾਨਕ ਹਰਿ ਉਰਿ ਧਾਰਿ ॥੨੮॥
हे दास नानक ! परमात्मा को दिल में बसाने के कारण (उनके अंदर से) तृष्णा की सारी आग बुझ गई। 28।
ਅਸੀ ਖਤੇ ਬਹੁਤੁ ਕਮਾਵਦੇ ਅੰਤੁ ਨ ਪਾਰਾਵਾਰੁ ॥
हे हरी ! हम जीव बहुत भूलें करते रहते हैं। (हमारी भूलों का) अंत नहीं पाया जा सकता।
ਹਰਿ ਕਿਰਪਾ ਕਰਿ ਕੈ ਬਖਸਿ ਲੈਹੁ ਹਉ ਪਾਪੀ ਵਡ ਗੁਨਹਗਾਰੁ ॥
(हमारी भूलों का) इस पार-उस पार का किनारा नहीं मिलता। तू मेहर करके खुद ही बख़्श ले। मैं पापी हूँ। गुनहगार हूँ।
ਹਰਿ ਜੀਉ ਲੇਖੈ ਵਾਰ ਨ ਆਵਈ ਤੂੰ ਬਖਸਿ ਮਿਲਾਵਣਹਾਰੁ ॥
हे प्रभू जी ! (मेरे किए कर्मों के) लेखों के आसरे तो (बख्शिश हासिल करने की मेरी) बारी नहीं आ सकती। तू (ही मेरी भूलें) बख्श के (मुझे अपने चरणों में) मिलाने की समर्था वाला है।
ਗੁਰ ਤੁਠੈ ਹਰਿ ਪ੍ਰਭੁ ਮੇਲਿਆ ਸਭ ਕਿਲਵਿਖ ਕਟਿ ਵਿਕਾਰ ॥
हे भाई ! (जिसके ऊपर प्रभू की मेहर हुई। उसके अंदर से) सारे पाप-विकार काट के दयावान हुए गुरू ने उसको हरी-प्रभू से मिला दिया।
ਜਿਨਾ ਹਰਿ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਧਿਆਇਆ ਜਨ ਨਾਨਕ ਤਿਨੑ ਜੈਕਾਰੁ ॥੨੯॥
हे दास नाक ! (कह-) जिन लोगों ने परमात्मा का नाम सिमरा है। उनको (लोक-परलोक में) आदर-सत्कार मिलता आया है। 29।
ਵਿਛੁੜਿ ਵਿਛੁੜਿ ਜੋ ਮਿਲੇ ਸਤਿਗੁਰ ਕੇ ਭੈ ਭਾਇ ॥
हे भाई ! (अनेकों जन्मों में परमात्मा से) बार-बार विछुड़ के जो मनुष्य (आखिर) गुरू के डर-अदब में गुरू के प्रेम में टिक गए।
ਜਨਮ ਮਰਣ ਨਿਹਚਲੁ ਭਏ ਗੁਰਮੁਖਿ ਨਾਮੁ ਧਿਆਇ ॥
वे गुरू के माध्यम से परमात्मा का नाम सिमर-सिमर के जनम-मरण के चक्करों से अडोल हो गए।
ਗੁਰ ਸਾਧੂ ਸੰਗਤਿ ਮਿਲੈ ਹੀਰੇ ਰਤਨ ਲਭੰਨਿੑ ॥
हे नानक ! जिन मनुष्यों को साधू गुरू की संगति हासिल हो जाती है। वे (उस संगतिमें से) परमात्मा के कीमती आत्मिक गुण ढूँढ लेते हैं।
ਨਾਨਕ ਲਾਲੁ ਅਮੋਲਕਾ ਗੁਰਮੁਖਿ ਖੋਜਿ ਲਹੰਨਿੑ ॥੩੦॥
परमात्मा का अत्यंत कीमती नाम-हीरा गुरू के सन्मुख रहने वाले मनुष्य (संगति में से) खोज के हासिल कर लेते हैं। 30।
ਮਨਮੁਖ ਨਾਮੁ ਨ ਚੇਤਿਓ ਧਿਗੁ ਜੀਵਣੁ ਧਿਗੁ ਵਾਸੁ ॥
हे भाई ! अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्यों ने परमात्मा का नाम नहीं सिमरा। उनका जीना धिक्कार-योग्य। उनका जगत-बसेरा तिरस्कार-योग्य ही रहता है।
ਜਿਸ ਦਾ ਦਿਤਾ ਖਾਣਾ ਪੈਨਣਾ ਸੋ ਮਨਿ ਨ ਵਸਿਓ ਗੁਣਤਾਸੁ ॥
उनके मन में गुणों का खजाना वह प्रभू नहीं टिका। जिसका दिया हुआ अन्न और वस्त्र वे बरतते रहते हैं।
ਇਹੁ ਮਨੁ ਸਬਦਿ ਨ ਭੇਦਿਓ ਕਿਉ ਹੋਵੈ ਘਰ ਵਾਸੁ ॥
उनका ये मन (कभी) गुरू के शबद में नहीं जुड़ता। फिर उन्हें प्रभू-चरनों का निवास कैसे हासिल हो।
ਮਨਮੁਖੀਆ ਦੋਹਾਗਣੀ ਆਵਣ ਜਾਣਿ ਮੁਈਆਸੁ ॥
हे भाई ! अपने मन के पीछे चलने वाली जीव-सि्त्रयांबद्-नसीब ही रहती हैं। वे जनम-मरण के चक्कर में पड़ी रहती हैं। वे सदा आत्मिक मौत मरती रहती हैं।
ਗੁਰਮੁਖਿ ਨਾਮੁ ਸੁਹਾਗੁ ਹੈ ਮਸਤਕਿ ਮਣੀ ਲਿਖਿਆਸੁ ॥
हे भाई ! जो जीव-सि्त्रयां गुरू के सन्मुख हैं (उनके हृदय में बसता हरी-) नाम उनके सिर पर सोहाग है। उनके माथे पर टीका लगा हुआ है।
ਹਰਿ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਉਰਿ ਧਾਰਿਆ ਹਰਿ ਹਿਰਦੈ ਕਮਲ ਪ੍ਰਗਾਸੁ ॥
गुरू के सन्मुख रहने वालियों ने परमात्मा का नाम सदा अपने हृदय में बसाया होता है उनके दिल का कमल-फूल खिला हुआ रहता है।
ਸਤਿਗੁਰੁ ਸੇਵਨਿ ਆਪਣਾ ਹਉ ਸਦ ਬਲਿਹਾਰੀ ਤਾਸੁ ॥
वे जीव-सि्त्रयां हमेशा अपने गुरू की शरण पड़ी रहती हैं। मैं उनसे सदा सदके हूँ।
ਨਾਨਕ ਤਿਨ ਮੁਖ ਉਜਲੇ ਜਿਨ ਅੰਤਰਿ ਨਾਮੁ ਪ੍ਰਗਾਸੁ ॥੩੧॥
हे नानक ! (कह-) जिनके दिल में (परमात्मा का) नाम (आत्मिक जीवन का) प्रकाश (किए रखता) है उनके मुँह (लोक-परलोक में) रौशन रहते हैं। 31।
ਸਬਦਿ ਮਰੈ ਸੋਈ ਜਨੁ ਸਿਝੈ ਬਿਨੁ ਸਬਦੈ ਮੁਕਤਿ ਨ ਹੋਈ ॥
हे भाई ! (जो मनुष्य गुरू के) शबद से (विकारों से) मर जाता है वही मनुष्य (जिंदगी में) कामयाब होता है। (गुरू के) शबद के बिना विकारों से मुक्ति नहीं मिलती।
ਭੇਖ ਕਰਹਿ ਬਹੁ ਕਰਮ ਵਿਗੁਤੇ ਭਾਇ ਦੂਜੈ ਪਰਜ ਵਿਗੋਈ ॥
जो मनुष्य सिर्फ दिखावे के धार्मिक पहरावे पहनते हैं और दिखावे के ही धार्मिक कर्म करते हैं। वह दुखी होते रहते हैं। हे भाई ! माया के मोह में फसे रह के दुनिया दुखी होती है।
ਨਾਨਕ ਬਿਨੁ ਸਤਿਗੁਰ ਨਾਉ ਨ ਪਾਈਐ ਜੇ ਸਉ ਲੋਚੈ ਕੋਈ ॥੩੨॥
हे नानक ! (कह- हे भाई !) गुरू की शरण पड़े बिना परमात्मा का नाम नहीं मिलता। चाहे कोई मनुष्य सौ बार तमन्ना करता रहे। 32।
ਹਰਿ ਕਾ ਨਾਉ ਅਤਿ ਵਡ ਊਚਾ ਊਚੀ ਹੂ ਊਚਾ ਹੋਈ ॥
हे भाई ! परमात्मा की महानता ऊची से ऊँची है। बहुत ऊँची है।
ਅਪੜਿ ਕੋਇ ਨ ਸਕਈ ਜੇ ਸਉ ਲੋਚੈ ਕੋਈ ॥
चाहे कोई मनुष्य सौ बार तमन्ना करता रहे। उसकी महानता तक कोई नहीं पहुँच सकता।
ਮੁਖਿ ਸੰਜਮ ਹਛਾ ਨ ਹੋਵਈ ਕਰਿ ਭੇਖ ਭਵੈ ਸਭ ਕੋਈ ॥
हरेक साधू धार्मिक पहरावा पहन के फिरता है (और समझता होगा कि इस तरह उच्च जीवन में मैं परमात्मा की महानता तक पहुँच गया हूँ। पर) इन्द्रियों को वश में कर लेने की निरी ज़बानी बातें कर लेने से कोई मनुष्य पवित्र जीवन वाला नहीं हो जाता।
ਗੁਰ ਕੀ ਪਉੜੀ ਜਾਇ ਚੜੈ ਕਰਮਿ ਪਰਾਪਤਿ ਹੋਈ ॥
(गुरू का शबद ही है) गुरू की (बताई हुई) सीढ़ी (जिसकी सहायता से मनुष्य प्रभू के चरणों तक) जा पहुँचता है।
ਅੰਤਰਿ ਆਇ ਵਸੈ ਗੁਰ ਸਬਦੁ ਵੀਚਾਰੈ ਕੋਇ ॥
हे भाई ! जो कोई मनुष्य गुरू के शबद को अपने मन में बसाता है उसके अंदर परमात्मा आ बसता है।