Sri Guru Granth Sahib Ji — Ang 1397 (hindi)
ਸਤਗੁਰਿ ਦਯਾਲਿ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਦ੍ਰਿੜੑਾਯਾ ਤਿਸੁ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ਵਸਿ ਪੰਚ ਕਰੇ ॥
दयालु गुरू (अमरदास जी) ने (गुरू रामदास जी को) नाम दृढ़ करवाया है (भाव। जपाया है); उस नाम की बरकति से (गुरू रामदास जी ने) कामादिक पाँचों को अपने काबू किया हुआ है।
ਕਵਿ ਕਲੵ ਠਕੁਰ ਹਰਦਾਸ ਤਨੇ ਗੁਰ ਰਾਮਦਾਸ ਸਰ ਅਭਰ ਭਰੇ ॥੩॥
हे कल्सहार कवि ! ठाकुर हरदास जी के सपुत्र गुरू रामदास जी (हृदय-रूपी) खाली सरोवरों को (नाम-अमृत से) भरने वाले हैं। 3।
ਅਨਭਉ ਉਨਮਾਨਿ ਅਕਲ ਲਿਵ ਲਾਗੀ ਪਾਰਸੁ ਭੇਟਿਆ ਸਹਜ ਘਰੇ ॥
(गुरू रामदास जी को) विचार द्वारा ज्ञान प्राप्त हुआ है। (आपकी) बिरती एक-रस व्यापक हरी के साथ जुड़ी हुई है। (गुरू रामदास जी को गुरू अमरदास) पारस मिल गया है (जिसकी बरकति से गुरू रामदास) सहज अवस्था में पहुँच गया है।
ਸਤਗੁਰ ਪਰਸਾਦਿ ਪਰਮ ਪਦੁ ਪਾਯਾ ਭਗਤਿ ਭਾਇ ਭੰਡਾਰ ਭਰੇ ॥
सतिगुरू (अमरदास जी) की कृपा से (गुरू रामदास जी ने) ऊँची पदवी पाई है और भगती के प्यार से (आप के) खजाने भरे हुए हैं।
ਮੇਟਿਆ ਜਨਮਾਂਤੁ ਮਰਣ ਭਉ ਭਾਗਾ ਚਿਤੁ ਲਾਗਾ ਸੰਤੋਖ ਸਰੇ ॥
गुरू रामदास जी ने (अपना) जनम-मरण मिटा लिया हुआ है। (गुरू रामदास जी का) मौत का डर दूर हो चुका है और (उनका) चिक्त संतोख के सरोवर अकाल पुरख में जुड़ा रहता है।
ਕਵਿ ਕਲੵ ਠਕੁਰ ਹਰਦਾਸ ਤਨੇ ਗੁਰ ਰਾਮਦਾਸ ਸਰ ਅਭਰ ਭਰੇ ॥੪॥
हे कल्सहार कवि ! ठाकुर हरदास जी के सपुत्र गुरू रामदास जी (हृदय-रूपी) खाली सरोवरों को (नाम-अमृत से) भरने वाले हैं। 4।
ਅਭਰ ਭਰੇ ਪਾਯਉ ਅਪਾਰੁ ਰਿਦ ਅੰਤਰਿ ਧਾਰਿਓ ॥
(गुरू रामदास जी ने) खाली हृदयों को भरने वाला हरी पा लिया है। (आप ने बेअंत हरी को अपने) हृदय में बसा लिया है।
ਦੁਖ ਭੰਜਨੁ ਆਤਮ ਪ੍ਰਬੋਧੁ ਮਨਿ ਤਤੁ ਬੀਚਾਰਿਓ ॥
(और अपने) मन में (उस) अकाल-पुरख को सिमरा है (जो) दुखों का नाश करने वाला है और आत्मा को जगाने वाला है।
ਸਦਾ ਚਾਇ ਹਰਿ ਭਾਇ ਪ੍ਰੇਮ ਰਸੁ ਆਪੇ ਜਾਣਇ ॥
(गुरू रामदास) नित्य खुशी में (रहता है)। हरी के प्यार में (मस्त है और हरी के) प्यार के स्वाद को वह स्वयं ही जानता है।
ਸਤਗੁਰ ਕੈ ਪਰਸਾਦਿ ਸਹਜ ਸੇਤੀ ਰੰਗੁ ਮਾਣਇ ॥
(गुरू रामदास) सतगुरू (अमरदास जी) की कृपा द्वारा आत्मिक अडोलता से आनंद पा रहा है।
ਨਾਨਕ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ਅੰਗਦ ਸੁਮਤਿ ਗੁਰਿ ਅਮਰਿ ਅਮਰੁ ਵਰਤਾਇਓ ॥
कवि कलसहार कहता है- (गुरू) नानक जी की कृपा से (और गुरू) अंगद जी की बख्शी सुंदर बुद्धि से। गुरू अमरदास जी ने अकाल-पुरख का हुकम प्रयोग में लाया है।
ਗੁਰ ਰਾਮਦਾਸ ਕਲੵੁਚਰੈ ਤੈਂ ਅਟਲ ਅਮਰ ਪਦੁ ਪਾਇਓ ॥੫॥
(कि) हे गुरू रामदास जी ! तू सदा-स्थिर रहने वाले अविनाशी हरी की पदवी प्राप्त कर ली है। 5।
ਸੰਤੋਖ ਸਰੋਵਰਿ ਬਸੈ ਅਮਿਅ ਰਸੁ ਰਸਨ ਪ੍ਰਕਾਸੈ ॥
(गुरू रामदास) संतोख के सरोवर में बसता है। (और अपनी) जीभ से नाम-अमृत के स्वाद को प्रकट करता है।
ਮਿਲਤ ਸਾਂਤਿ ਉਪਜੈ ਦੁਰਤੁ ਦੂਰੰਤਰਿ ਨਾਸੈ ॥
(गुरू रामदास जी के) दर्शन करने से (हृदय में) ठंढ पैदा होती है और पाप दूर से ही (देख के) नाश हो जाते हैं।
ਸੁਖ ਸਾਗਰੁ ਪਾਇਅਉ ਦਿੰਤੁ ਹਰਿ ਮਗਿ ਨ ਹੁਟੈ ॥
(गुरू रामदास जी ने गुरू अमरदास जी का) दिया हुआ सुखों का सागर (प्रभू-मिलाप) प्राप्त किया है। (तभी गुरू रामदास) हरी के राह में (चलते हुए) थकते नहीं हैं।
ਸੰਜਮੁ ਸਤੁ ਸੰਤੋਖੁ ਸੀਲ ਸੰਨਾਹੁ ਮਫੁਟੈ ॥
(गुरू रामदास जी का) संजम सत संतोख और मीठा स्वभाव-रूपी संजोअ (ऐसा है कि वह) टूटता नहीं है; (भाव। आप इतने गुण समपन्न हैं)।
ਸਤਿਗੁਰੁ ਪ੍ਰਮਾਣੁ ਬਿਧ ਨੈ ਸਿਰਿਉ ਜਗਿ ਜਸ ਤੂਰੁ ਬਜਾਇਅਉ ॥
(गुरू रामदास जी को) करतार ने गुरू (अमरदास जी) के तुल्य बनाया है। जगत ने (आप की) शोभा का बाजा बजाया है।
ਗੁਰ ਰਾਮਦਾਸ ਕਲੵੁਚਰੈ ਤੈ ਅਭੈ ਅਮਰ ਪਦੁ ਪਾਇਅਉ ॥੬॥
कवि कलसहार कहता है- 'हे गुरू रामदास ! तूने निरभउ और अविनाशी हरी की पदवी पा ली है'। 6।
ਜਗੁ ਜਿਤਉ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਮਾਣਿ ਮਨਿ ਏਕੁ ਧਿਆਯਉ ॥
(गुरू रामदास जी ने) गुरू (अमरदास जी) की तरह जगत को जीता है और (अपने) मन में एक (अकाल-पुरख) को सिमरा है।
ਧਨਿ ਧਨਿ ਸਤਿਗੁਰ ਅਮਰਦਾਸੁ ਜਿਨਿ ਨਾਮੁ ਦ੍ਰਿੜਾਯਉ ॥
सतिगुरू अमरदास धन्य है। जिसने (गुरू रामदास जी को) नाम दृढ़ कराया है।
ਨਵ ਨਿਧਿ ਨਾਮੁ ਨਿਧਾਨੁ ਰਿਧਿ ਸਿਧਿ ਤਾ ਕੀ ਦਾਸੀ ॥
(गुरू रामदास जी को) नाम-खजाना मिल गया है। (मानो) नौ निधियां प्राप्त हो गई हैं। सभ रिद्धियां और सिद्धियां उसकी दासियां हैं।
ਸਹਜ ਸਰੋਵਰੁ ਮਿਲਿਓ ਪੁਰਖੁ ਭੇਟਿਓ ਅਬਿਨਾਸੀ ॥
(गुरू रामदास जी को) शांति का सरोवर हरी मिल गया है। अविनाशी सर्व-व्यापक प्रभू मिल गया है।
ਆਦਿ ਲੇ ਭਗਤ ਜਿਤੁ ਲਗਿ ਤਰੇ ਸੋ ਗੁਰਿ ਨਾਮੁ ਦ੍ਰਿੜਾਇਅਉ ॥
जिस (नाम) में लग के आदि से ही भगतों का उद्धार होता आया है। वह नाम गुरू (अमरदास जी) को दृढ़ करवाया है।
ਗੁਰ ਰਾਮਦਾਸ ਕਲੵੁਚਰੈ ਤੈ ਹਰਿ ਪ੍ਰੇਮ ਪਦਾਰਥੁ ਪਾਇਅਉ ॥੭॥
कवि कल्सहार कहता है- 'हे गुरू रामदास जी ! तूने अकाल-पुरख के प्यार का (उक्तम) पदार्थ पा लिया है'। 7।
ਪ੍ਰੇਮ ਭਗਤਿ ਪਰਵਾਹ ਪ੍ਰੀਤਿ ਪੁਬਲੀ ਨ ਹੁਟਇ ॥
(गुरू रामदास जी के हृदय में) अकाल पुरख की प्यार भरी भगती के चश्मे चल रहे हैं। (गुरू रामदास जी की अकाल-पुरख के साथ जो) पहले की प्रीति (है। वह) खत्म नहीं होती;
ਸਤਿਗੁਰ ਸਬਦੁ ਅਥਾਹੁ ਅਮਿਅ ਧਾਰਾ ਰਸੁ ਗੁਟਇ ॥
गुरू (अमरदास जी) का (जो) अथाह शबद (है। उस द्वारा गुरू रामदास) नाम-अमृत की धाराओं का स्वाद गट-गट करके ले रहा है।
ਮਤਿ ਮਾਤਾ ਸੰਤੋਖੁ ਪਿਤਾ ਸਰਿ ਸਹਜ ਸਮਾਯਉ ॥
(ऊँची) मति (गुरू रामदास जी की) माता है और संतोख (आप का) पिता है (भाव। आप इन गुणों में जन्में-पले हैं। आप ऊँची बुद्धि वाले और पूर्ण संतोखी हैं)।
ਆਜੋਨੀ ਸੰਭਵਿਅਉ ਜਗਤੁ ਗੁਰ ਬਚਨਿ ਤਰਾਯਉ ॥
(गुरू रामदास) सदा शान्ति के सरोवर में डुबकी लगाए रखता है। (गुरू रामदास) जूनियों से रहित और स्वै-प्रकाश हरी का रूप है। संसार को (आप ने) सतिगुरू के वचनों से तैरा दिया है।
ਅਬਿਗਤ ਅਗੋਚਰੁ ਅਪਰਪਰੁ ਮਨਿ ਗੁਰ ਸਬਦੁ ਵਸਾਇਅਉ ॥
(गुरू रामदास) अदृष्य अगोचर और बेअंत हरी का रूप है। (आप ने अपने) मन में सतिगुरू का शबद बसाया है।
ਗੁਰ ਰਾਮਦਾਸ ਕਲੵੁਚਰੈ ਤੈ ਜਗਤ ਉਧਾਰਣੁ ਪਾਇਅਉ ॥੮॥
कवि कलसहार कहता है- 'हे गुरू रामदास ! तूने जगत का उद्धार करने वाला अकाल-पुरख पा लिया है'। 8।
ਜਗਤ ਉਧਾਰਣੁ ਨਵ ਨਿਧਾਨੁ ਭਗਤਹ ਭਵ ਤਾਰਣੁ ॥
(सतिगुरू रामदास जी के पास) हरी का नाम। (मानो)। अमृत की बूँद है। जो संसार को तारने-योग्य है। जो नौ निधियों का भंडार है।
ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਬੂੰਦ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਬਿਸੁ ਕੀ ਬਿਖੈ ਨਿਵਾਰਣੁ ॥
जो भगत-जनों को संसार-सागर से पार करने के समर्थ है और जो सारे संसार के विष को दूर करने योग्य है।
ਸਹਜ ਤਰੋਵਰ ਫਲਿਓ ਗਿਆਨ ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਫਲ ਲਾਗੇ ॥
गुरू रामदास आत्मिक अडोलता का श्रेष्ठ वृक्ष है जो फला-फुला हुआ है। (इस वृक्ष को) ज्ञान देने वाले अमृत फल लगे हुए हैं।
ਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ਪਾਈਅਹਿ ਧੰਨਿ ਤੇ ਜਨ ਬਡਭਾਗੇ ॥
(यह फल) गुरू की कृपा से मिलते हैं। और वह मनुष्य धन्य और अति भाग्याशाली हैं।
ਤੇ ਮੁਕਤੇ ਭਏ ਸਤਿਗੁਰ ਸਬਦਿ ਮਨਿ ਗੁਰ ਪਰਚਾ ਪਾਇਅਉ ॥
(जिनको यह फल प्राप्त हुए हैं)। वह मनुष्य सतिगुरू के शबद की बरकति से मुक्त हो गए हैं।
ਗੁਰ ਰਾਮਦਾਸ ਕਲੵੁਚਰੈ ਤੈ ਸਬਦ ਨੀਸਾਨੁ ਬਜਾਇਅਉ ॥੯॥
जिन्होंने अपने मन में गुरू (रामदास जी) के साथ प्यार डाला है। कवि कलसहार कहता है- 'हे गुरू रामदास ! तूने शबद का नगारा बजाया है'। 9।