Sri Guru Granth Sahib Ji — Ang 1375 (hindi)
ਬਿਨੁ ਸੰਗਤਿ ਇਉ ਮਾਂਨਈ ਹੋਇ ਗਈ ਭਠ ਛਾਰ ॥੧੯੫॥
बल्कि खुद भी) वह। मानो। (जलती हुई) भट्ठी की राख हो गई। यही हाल संगति के बिना मनुष्य का होता है (परम पवित्र परमात्मा की अंश जीव जनम ले के अगर कुसंग में फस गया तो सृष्टि की कोई सेवा करने की बजाय खुद भी विकारों में जल मरा)। 195।
ਕਬੀਰ ਨਿਰਮਲ ਬੂੰਦ ਅਕਾਸ ਕੀ ਲੀਨੀ ਭੂਮਿ ਮਿਲਾਇ ॥
हे कबीर ! (वर्षा के वक्त) आकाश (से बरसात) की जिस साफ बूँद को (समझदार जमींदार ने हल आदि से जोत कर) सँवारी हुई अपनी ज़मीन में (हद-बन्ना ठीक करके) मिला लिया।
ਅਨਿਕ ਸਿਆਨੇ ਪਚਿ ਗਏ ਨਾ ਨਿਰਵਾਰੀ ਜਾਇ ॥੧੯੬॥
वह बूँद ज़मीन से हटाई नहीं जा सकती। चाहे अनेकों समझदार कोशिश करके थक-टूट जाएं । 196।
ਕਬੀਰ ਹਜ ਕਾਬੇ ਹਉ ਜਾਇ ਥਾ ਆਗੈ ਮਿਲਿਆ ਖੁਦਾਇ ॥
हे कबीर ! मैं काबे का हॅज करने के लिए जा रहा था। वहाँ जाते को आगे से खुदा मिल गया !
ਸਾਂਈ ਮੁਝ ਸਿਉ ਲਰਿ ਪਰਿਆ ਤੁਝੈ ਕਿਨਿੑ ਫੁਰਮਾਈ ਗਾਇ ॥੧੯੭॥
वह मेरा साई (खुदा खुश होने की बजाय कि मैंउसके घर का दीदार करने आया हूँ।बल्कि) मेरे पर गुस्से हो गया ( और कहने लगा) कि मैंने तो यह हुकम नहीं दिया जो मेरे नाम पर तू गाय (आदि) की कुर्बानी दे (और। मैं तेरे गुनाह बख्श दूँगा)। 197।
ਕਬੀਰ ਹਜ ਕਾਬੈ ਹੋਇ ਹੋਇ ਗਇਆ ਕੇਤੀ ਬਾਰ ਕਬੀਰ ॥
हे कबीर ! मैं कई बार। हे साई ! (तेरे घर-) काबे के दीदार करने के लिए गया हूँ। पर।
ਸਾਂਈ ਮੁਝ ਮਹਿ ਕਿਆ ਖਤਾ ਮੁਖਹੁ ਨ ਬੋਲੈ ਪੀਰ ॥੧੯੮॥
हे ख़ुदा ! तू मेरे साथ बात ही नहीं करता। मेरे में तू कौन-कौन सी गलतियां देख रहा है। (जो हॅज और कुर्बानी से भी बख्शे नहीं गए) । ( भाव। हज और कुर्बानी से खुदा खुश नहीं होता)। 198।
ਕਬੀਰ ਜੀਅ ਜੁ ਮਾਰਹਿ ਜੋਰੁ ਕਰਿ ਕਹਤੇ ਹਹਿ ਜੁ ਹਲਾਲੁ ॥
हे कबीर ! जो लोग जबरदस्ती करके (गाय आदि) जीवों को मारते हैं; पर कहते हैं कि (यह ज़बह किया हुआ मास) खुदा के नाम पर कुर्बानी के काबिल हो गया है।
ਦਫਤਰੁ ਦਈ ਜਬ ਕਾਢਿ ਹੈ ਹੋਇਗਾ ਕਉਨੁ ਹਵਾਲੁ ॥੧੯੯॥
जब सब जीवों से प्यार करने वाला खुदा (इन लोगों से- कर्मों का लेखा माँगेगा। तब इनका क्या हाल होगा। ) ( भाव। कुबांनी देने से गुनाह बख्शे नहीं जाते)। 199।
ਕਬੀਰ ਜੋਰੁ ਕੀਆ ਸੋ ਜੁਲਮੁ ਹੈ ਲੇਇ ਜਬਾਬੁ ਖੁਦਾਇ ॥
हे कबीर ! जो भी मनुष्य किसी पर जबरदस्ती करता है और जुल्म करता है; (और जुल्म का) लेखा खुदा माँगता है।
ਦਫਤਰਿ ਲੇਖਾ ਨੀਕਸੈ ਮਾਰ ਮੁਹੈ ਮੁਹਿ ਖਾਇ ॥੨੦੦॥
जिस किसी की भी लेखे की बाकी निकलती है वह बड़ी सजा भुगतता है। 200।
ਕਬੀਰ ਲੇਖਾ ਦੇਨਾ ਸੁਹੇਲਾ ਜਉ ਦਿਲ ਸੂਚੀ ਹੋਇ ॥
हे कबीर ! (वह रॅब मनुष्य से सिर्फ दिल की पाकीज़गी की कुर्बानी माँगता है) अगर मनुष्य के दिल की पवित्रता कायम हो तो अपने किए अमलों का लेखा देना आसान हो जाता है;
ਉਸੁ ਸਾਚੇ ਦੀਬਾਨ ਮਹਿ ਪਲਾ ਨ ਪਕਰੈ ਕੋਇ ॥੨੦੧॥
(इस पवित्रता की बरकति से) उस सच्ची कचहरी में कोई रोक-टोक नहीं करता। 201।
ਕਬੀਰ ਧਰਤੀ ਅਰੁ ਆਕਾਸ ਮਹਿ ਦੁਇ ਤੂੰ ਬਰੀ ਅਬਧ ॥
हे कबीर ! (कह-) है द्वैत ! सारी सृष्टि में ही (तू बहुत बली है) तुझे बहुत मुश्किल से मारा जा सकता है।
ਖਟ ਦਰਸਨ ਸੰਸੇ ਪਰੇ ਅਰੁ ਚਉਰਾਸੀਹ ਸਿਧ ॥੨੦੨॥
(हॅज करने और कुर्बानी देने वाले मुल्ला। या ठाकुर-पूजा करने वाले ब्राहमण तो कहीं रहे) छे भेषों के त्यागी और (योग साधना में सिद्धहस्त हुए) चौरासी सिद्ध भी। हे द्वैत ! तुझसे सहमे हुए हैं।
ਕਬੀਰ ਮੇਰਾ ਮੁਝ ਮਹਿ ਕਿਛੁ ਨਹੀ ਜੋ ਕਿਛੁ ਹੈ ਸੋ ਤੇਰਾ ॥
हे कबीर ! (इस 'दुइ' को मिटाने के लिए ना हॅज। कुर्बानियां। ना ठाकुर-पूजा ना ब्राहमण की सेवा। ना त्याग और ना ही योग साधना- ये कोई भी सहायता नहीं करते। सिर्फ एक ही तरीका है वह यह कि अपना आप प्रभू के हवाले किया जाए। इसी का नाम 'दिल-साबति' है। सो। प्रभू के दर पे अरदास कर और कह-) हे प्रभू जो कुछ मेरे पास है (यह तन मन धन)। इसमें कोई चीज़ ऐसी नहीं जिसको मैं अपनी कह सकूँ; जो कुछ मेरे पास है सब तेरा ही दिया हुआ है।
ਤੇਰਾ ਤੁਝ ਕਉ ਸਉਪਤੇ ਕਿਆ ਲਾਗੈ ਮੇਰਾ ॥੨੦੩॥
(यदि तेरी मेहर हो तो) तेरा बख्शा हुआ (यह तन मन धन) मैं तेरी भेट करता हूँ। इसमें मेरे पल्ले से कुछ भी खर्च नहीं होता।
ਕਬੀਰ ਤੂੰ ਤੂੰ ਕਰਤਾ ਤੂ ਹੂਆ ਮੁਝ ਮਹਿ ਰਹਾ ਨ ਹੂੰ ॥
हे कबीर ! (प्रभू के दर पर यूँ कह- हे प्रभू ! तेरी मेहर से) हर वक्त तेरा सिमरन करते हुए मैं तेरे में लीन हो गया हूं। मेरे अंदर 'मैं मैं' का विचार रह ही नहीं गया है।
ਜਬ ਆਪਾ ਪਰ ਕਾ ਮਿਟਿ ਗਇਆ ਜਤ ਦੇਖਉ ਤਤ ਤੂ ॥੨੦੪॥
(तेरा सिमरन करते हुए अब) जब (मेरे अंदर से) अपने-पराए वाला भेदभाव मिट गया है ('दुइ' मिट गई है)। मैं जिधर देखता हूँ मुझे (हर जगह) तू ही दिख रहा है। 204।
ਕਬੀਰ ਬਿਕਾਰਹ ਚਿਤਵਤੇ ਝੂਠੇ ਕਰਤੇ ਆਸ ॥
हे कबीर ! (जो मनुष्य 'दुइ' में फसे रह के प्रभू का सिमरन नहीं करते) जो सदा बुरे काम करने की सोचे सोचते रहते हैं। जो सदा इन नाशवंत पदार्थों की ही तमन्नाएं पालते रहते हैं।
ਮਨੋਰਥੁ ਕੋਇ ਨ ਪੂਰਿਓ ਚਾਲੇ ਊਠਿ ਨਿਰਾਸ ॥੨੦੫॥
वे मनुष्य दिल की आशाएं साथ ले के ही (यहाँ से) चल पड़ते हैं। उनके मन की कोई दौड़-भाग पूरी नहीं होती ( भाव। किसी भी पदार्थ के मिलने से उनके मन की दौड़-भाग खत्म नहीं होतीं। आशाएं और-और बढ़ती जाती हैं)। 205।
ਕਬੀਰ ਹਰਿ ਕਾ ਸਿਮਰਨੁ ਜੋ ਕਰੈ ਸੋ ਸੁਖੀਆ ਸੰਸਾਰਿ ॥
हे कबीर ! जो मनुष्य परमात्मा की याद हृदय में बसाता है। वह इस जगत में सुखी जीवन व्यतीत करता है;
ਇਤ ਉਤ ਕਤਹਿ ਨ ਡੋਲਈ ਜਿਸ ਰਾਖੈ ਸਿਰਜਨਹਾਰ ॥੨੦੬॥
वह मनुष्य इस लोक में परलोक में कहीं भी (इन आशाओं ओर विकारों के कारण) भटकता नहीं है। क्योंकि परमातमा सवयं उसको इनसे बचाता है। 206।
ਕਬੀਰ ਘਾਣੀ ਪੀੜਤੇ ਸਤਿਗੁਰ ਲੀਏ ਛਡਾਇ ॥
हे कबीर ! (दुनिया के जीव विकारों और दुनियावी आशाओं की) घाणी में (इस तरह) पीढ़े जा रहे हैं। (जैसे कोल्हू में तिल पीढ़े जाते हैं;
ਪਰਾ ਪੂਰਬਲੀ ਭਾਵਨੀ ਪਰਗਟੁ ਹੋਈ ਆਇ ॥੨੦੭॥
) (पर जो जो 'हरि का सिमरन करै') उनको सतिगुरू (इस घाणी में से) बचा लेता है। (प्रभू-चरनों से उनका) प्यार जो धुर से चला आ रहा था (पर जो इन विकारों और आशाओं के तले दब गया था। वह सिमरन की बरकति और सतिगुरू की मेहर से) दोबारा हृदय में चमक उठता है। 207।
ਕਬੀਰ ਟਾਲੈ ਟੋਲੈ ਦਿਨੁ ਗਇਆ ਬਿਆਜੁ ਬਢੰਤਉ ਜਾਇ ॥
हे कबीर ! (जो मनुष्य गुरू की शरण नहीं आते। उनके किए विकारों और बनाई हुई आशाओं के कारण सिमरन की ओर से) आजकल उनकी उम्र का वक्त गुज़रता जाता है। (विकारों और आशाओं का) ब्याज बढ़ता जाता है।
ਨਾ ਹਰਿ ਭਜਿਓ ਨ ਖਤੁ ਫਟਿਓ ਕਾਲੁ ਪਹੂੰਚੋ ਆਇ ॥੨੦੮॥
ना ही वे परमात्मा का सिमरन करते हें। ना ही उनका (विकारों और आशाओं का यह) लेखा खत्म होता है। (बस ! इन विकारों और आशाओं में फसे हुओं के सिर पर) मौत आ पहुँचती है। 208।
ਮਹਲਾ ੫ ॥
महला ५ ॥
ਕਬੀਰ ਕੂਕਰੁ ਭਉਕਨਾ ਕਰੰਗ ਪਿਛੈ ਉਠਿ ਧਾਇ ॥
हे कबीर ! भौंकने वाला (भाव लालच का मारा हुआ) कुक्ता सदा मुरदे की तरफ ही दौड़ता है (इसी तरह विकारों और आशाओं में फसा मनुष्य सदा विकारों और आशाओं की ओर ही दौड़ता है। तभी ये सिमरन से टाल-मटोले करता है)।
ਕਰਮੀ ਸਤਿਗੁਰੁ ਪਾਇਆ ਜਿਨਿ ਹਉ ਲੀਆ ਛਡਾਇ ॥੨੦੯॥
मुझे परमातमा की मेहर से सतिगुरू मिल गया है। उसने मुझे (इन विकारों और आशाओं के पँजे से) छुड़ा लिया है। 209।
ਮਹਲਾ ੫ ॥
महला ५॥
ਕਬੀਰ ਧਰਤੀ ਸਾਧ ਕੀ ਤਸਕਰ ਬੈਸਹਿ ਗਾਹਿ ॥
हे कबीर ! अगर विकारी मनुष्य (सौभाग्यों से) और आशाएं छोड़ के (और दरवाजे छोड़ के) सतिगुरू की संगति में आ बैठें।
ਧਰਤੀ ਭਾਰਿ ਨ ਬਿਆਪਈ ਉਨ ਕਉ ਲਾਹੂ ਲਾਹਿ ॥੨੧੦॥
तो विकारियों का असर उस संगति पर नहीं पड़ता। हाँ। विकारी लोगों को अवश्य लाभ पहुँचता है। वह विकारी लोग जरूर फायदा उठाते हैं। 210।
ਮਹਲਾ ੫ ॥
महला ५॥
ਕਬੀਰ ਚਾਵਲ ਕਾਰਨੇ ਤੁਖ ਕਉ ਮੁਹਲੀ ਲਾਇ ॥
हे कबीर ! (छिल्कों से) चावल (अलग करने) की खातिर (छड़ने के वक्त) तोहों को मुसली (की चोट) लगती है।
ਸੰਗਿ ਕੁਸੰਗੀ ਬੈਸਤੇ ਤਬ ਪੂਛੈ ਧਰਮ ਰਾਇ ॥੨੧੧॥
इसी तरह जो मनुष्य विकारियों की सोहबति में बैठता है (वह भी विकारों की चोट खाता है। विकार करने लग जाता है) उससे धर्मराज लेखा माँगता है। 211।
ਨਾਮਾ ਮਾਇਆ ਮੋਹਿਆ ਕਹੈ ਤਿਲੋਚਨੁ ਮੀਤ ॥
त्रिलोचन कहता है- हे मित्र नामदेव ! तू तो माया में फसा हुआ लगता है। ये अंबरे क्यों ठेक रहा है।
ਕਾਹੇ ਛੀਪਹੁ ਛਾਇਲੈ ਰਾਮ ਨ ਲਾਵਹੁ ਚੀਤੁ ॥੨੧੨॥
(रजाईयां चादरें धो-धो के बिछाए जा रहा है। धोबी वाले काम कर रहा है) परमात्मा के (चरनों) से चिक्त क्यों नहीं जोड़ता। 212।
ਨਾਮਾ ਕਹੈ ਤਿਲੋਚਨਾ ਮੁਖ ਤੇ ਰਾਮੁ ਸੰਮੑਾਲਿ ॥
नामदेव (आगे से) उक्तर देता है- हे त्रिलोचन ! मुँह से परमात्मा का नाम ले;