Sri Guru Granth Sahib Ji — Ang 1360 (hindi)
ਬ੍ਰਹਮਣਹ ਸੰਗਿ ਉਧਰਣੰ ਬ੍ਰਹਮ ਕਰਮ ਜਿ ਪੂਰਣਹ ॥
जो मनुष्य हरी-सिमरन के काम में पूरा है वह है असल ब्राहमण। उसकी संगति में (औरों का भी) उद्धार हो सकता है।
ਆਤਮ ਰਤੰ ਸੰਸਾਰ ਗਹੰ ਤੇ ਨਰ ਨਾਨਕ ਨਿਹਫਲਹ ॥੬੫॥
(पर) हे नानक ! जिन मनुष्यों का मन संसार में रति होया हुआ है वह (जगत से) निष्फल ही जाते हैं। 65।
ਪਰ ਦਰਬ ਹਿਰਣੰ ਬਹੁ ਵਿਘਨ ਕਰਣੰ ਉਚਰਣੰ ਸਰਬ ਜੀਅ ਕਹ ॥
जो मनुष्य अपनी उपजीविका के लिए पराया धन चुराते हैं। औरों के कामों में रोड़ा अटकाते हैं। कई किस्मों के बोल बोलते हैं।
ਲਉ ਲਈ ਤ੍ਰਿਸਨਾ ਅਤਿਪਤਿ ਮਨ ਮਾਏ ਕਰਮ ਕਰਤ ਸਿ ਸੂਕਰਹ ॥੬੬॥
जिनके मन में (सदा) माया की भूख है। तृष्णा के अधीन हो के (और माया) ले लूँ ले लूँ (ही सोचते रहते हैं)। वे लोग सूअरों वाले काम करते हैं (सूअर सदा गंदगी ही खाते हैं)। 66।
ਮਤੇ ਸਮੇਵ ਚਰਣੰ ਉਧਰਣੰ ਭੈ ਦੁਤਰਹ ॥
जो मनुष्य (प्रभू की याद में) मस्त हो के (प्रभू-चरणों में) लीन रहते हें। वे भयानक और दुस्तर (संसार) से पार लांघ जाते हें।
ਅਨੇਕ ਪਾਤਿਕ ਹਰਣੰ ਨਾਨਕ ਸਾਧ ਸੰਗਮ ਨ ਸੰਸਯਹ ॥੬੭॥੪॥
हे नानक ! इसमें (रक्ती भर भी) शक नहीं कि ऐसे गुरमुखों की संगति अनेकों पाप दूर करने में समर्थ है। 67। 4।
ਮਹਲਾ ੫ ਗਾਥਾ
गाथा महला ५ का
ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
वह परमात्मा केवल एक (ऑकार-स्वरूप) है, सतगुरु की कृपा से प्राप्ति होती है।
ਕਰਪੂਰ ਪੁਹਪ ਸੁਗੰਧਾ ਪਰਸ ਮਾਨੁਖੵ ਦੇਹੰ ਮਲੀਣੰ ॥
मुश्क कपूर। फूल व अन्य सुगंधियां मनुष्य के शरीर को छू के मैलियां हो जाती हैं।
ਮਜਾ ਰੁਧਿਰ ਦ੍ਰੁਗੰਧਾ ਨਾਨਕ ਅਥਿ ਗਰਬੇਣ ਅਗੵਾਨਣੋ ॥੧॥
(मनुष्य के शरीर में) मज्जा लहू और और दुर्गंन्धियां हैं; फिर भी। हे नानक ! अज्ञानी मनुष्य (इस शरीर का) माण करता है। 1।
ਪਰਮਾਣੋ ਪਰਜੰਤ ਆਕਾਸਹ ਦੀਪ ਲੋਅ ਸਿਖੰਡਣਹ ॥ ਗਛੇਣ ਨੈਣ ਭਾਰੇਣ ਨਾਨਕ ਬਿਨਾ ਸਾਧੂ ਨ ਸਿਧੵਤੇ ॥੨॥
हे नानक ! अगर मनुष्य अति-छोटा अणु बन के आकाशों तक सारे द्वीपों लोकों और पहाड़ों पर आँख की एक झपक में ही हो आए। (इतनी सिद्धि होते हुए भी) गुरू के बिना उसका जीवन सफल नहीं होता। 2।
ਜਾਣੋ ਸਤਿ ਹੋਵੰਤੋ ਮਰਣੋ ਦ੍ਰਿਸਟੇਣ ਮਿਥਿਆ ॥
मौत का आना ही अटल समझो। ये दिखता जगत (अवश्य) नाश होने वाला है (इसमें से किसी ने साथ नहीं निभना)।
ਕੀਰਤਿ ਸਾਥਿ ਚਲੰਥੋ ਭਣੰਤਿ ਨਾਨਕ ਸਾਧ ਸੰਗੇਣ ॥੩॥
नानक कहता है-साध-संगति के आसरे की हुई परमात्मा की सिफतसालाह ही (मनुष्य) के साथ जाती है। 3।
ਮਾਯਾ ਚਿਤ ਭਰਮੇਣ ਇਸਟ ਮਿਤ੍ਰੇਖੁ ਬਾਂਧਵਹ ॥
माया (मनुष्य के) मन को प्यारे मित्रों-संबन्धियों (के मोह) में भटकाती रहती है (और भटकना के कारण इसको सुख नहीं मिलता)।
ਲਬਧੵੰ ਸਾਧ ਸੰਗੇਣ ਨਾਨਕ ਸੁਖ ਅਸਥਾਨੰ ਗੋਪਾਲ ਭਜਣੰ ॥੪॥
हे नानक ! सुख मिलने की जगह (केवल) परमात्मा का भजन ही है। जो साध-संगति के द्वारा मिल सकता है।
ਮੈਲਾਗਰ ਸੰਗੇਣ ਨਿੰਮੁ ਬਿਰਖ ਸਿ ਚੰਦਨਹ ॥
चँदन की संगति से नीम का वृक्ष चंदन ही हो जाता है। पर।
ਨਿਕਟਿ ਬਸੰਤੋ ਬਾਂਸੋ ਨਾਨਕ ਅਹੰ ਬੁਧਿ ਨ ਬੋਹਤੇ ॥੫॥
हे नानक ! चँदन के नजदीक बसता बाँस अपनी अकड़ के कारण सुगन्धि वाला नहीं बनता। 5।
ਗਾਥਾ ਗੁੰਫ ਗੋਪਾਲ ਕਥੰ ਮਥੰ ਮਾਨ ਮਰਦਨਹ ॥
परमात्मा की सिफतसालाह की कहानियों का गुंदन मनुष्य के अहंकार को कुचल देता है।
ਹਤੰ ਪੰਚ ਸਤ੍ਰੇਣ ਨਾਨਕ ਹਰਿ ਬਾਣੇ ਪ੍ਰਹਾਰਣਹ ॥੬॥
हे नानक ! परमात्मा (की सिफतसालाह) का तीर चलाने से (कामादिक) पाँचों वैरी नाश हो जाते हैं। 6।
ਬਚਨ ਸਾਧ ਸੁਖ ਪੰਥਾ ਲਹੰਥਾ ਬਡ ਕਰਮਣਹ ॥
गुरू के (परमात्मा की सिफतसालाह के) बचन सुख का रास्ता हैं। पर ये वचन सौभाग्य से मिलते हैं।
ਰਹੰਤਾ ਜਨਮ ਮਰਣੇਨ ਰਮਣੰ ਨਾਨਕ ਹਰਿ ਕੀਰਤਨਹ ॥੭॥
हे नानक ! परमात्मा की सिफतसालाह करने से जनम-मरण का चक्कर समाप्त हो जाता है। 7।
ਪਤ੍ਰ ਭੁਰਿਜੇਣ ਝੜੀਯੰ ਨਹ ਜੜੀਅੰ ਪੇਡ ਸੰਪਤਾ ॥
(जैसे वृक्ष के) पत्ते भुर-भुर के (वृक्ष से) झड़ जाते हैं। (और दोबारा) वृक्ष की शाखाओं के साथ जुड़ नहीं सकते।
ਨਾਮ ਬਿਹੂਣ ਬਿਖਮਤਾ ਨਾਨਕ ਬਹੰਤਿ ਜੋਨਿ ਬਾਸਰੋ ਰੈਣੀ ॥੮॥
(वैसे ही) हे नानक ! नाम से टूटे हुए मनुष्य दुख सहते हैं और। दिन-रात (और-और) जूनियों में पड़े भटकते हैं। 8।
ਭਾਵਨੀ ਸਾਧ ਸੰਗੇਣ ਲਭੰਤੰ ਬਡ ਭਾਗਣਹ ॥
साध-संगति से (परमात्मा के नाम में) श्रद्धा बहुत भाग्यों से मिलती है।
ਹਰਿ ਨਾਮ ਗੁਣ ਰਮਣੰ ਨਾਨਕ ਸੰਸਾਰ ਸਾਗਰ ਨਹ ਬਿਆਪਣਹ ॥੯॥
हे नानक ! परमात्मा के नाम और गुणों की याद से संसार-समुंद्र (जीव पर) अपना जोर नहीं डाल सकता। 9।
ਗਾਥਾ ਗੂੜ ਅਪਾਰੰ ਸਮਝਣੰ ਬਿਰਲਾ ਜਨਹ ॥
बेअंत परमात्मा की सिफतसालाह करनी एक गहरी (रम्ज़ वाला) काम है। इसको कोई विरला मनुष्य समझता है।
ਸੰਸਾਰ ਕਾਮ ਤਜਣੰ ਨਾਨਕ ਗੋਬਿੰਦ ਰਮਣੰ ਸਾਧ ਸੰਗਮਹ ॥੧੦॥
हे नानक ! सत्संग में रह के परमात्मा का सिमरन करने से दुनिया की वासनाएं त्यागी जा सकती हैं। 10।
ਸੁਮੰਤ੍ਰ ਸਾਧ ਬਚਨਾ ਕੋਟਿ ਦੋਖ ਬਿਨਾਸਨਹ ॥
गुरू के वचन (ऐसे) श्रेष्ठ मंत्र हैं (जो) करोड़ों पापों का नाश कर देते हैं।
ਹਰਿ ਚਰਣ ਕਮਲ ਧੵਾਨੰ ਨਾਨਕ ਕੁਲ ਸਮੂਹ ਉਧਾਰਣਹ ॥੧੧॥
हे नानक ! (उन वचनों से) प्रभू के कमल फूलों जैसे सुंदर चरणों का ध्यान सारी कुलों का उद्धार कर देता है। 11।
ਸੁੰਦਰ ਮੰਦਰ ਸੈਣਹ ਜੇਣ ਮਧੵ ਹਰਿ ਕੀਰਤਨਹ ॥
उन घरों में ही बसना सुहावना है जिनमें परमात्मा की सिफतसालाह होती हो।
ਮੁਕਤੇ ਰਮਣ ਗੋਬਿੰਦਹ ਨਾਨਕ ਲਬਧੵੰ ਬਡ ਭਾਗਣਹ ॥੧੨॥
जो मनुष्य परमात्मा का सिमरन करते हैं वे (दुनिया के बँधनों से) मुक्त हो जाते हैं। पर। हे नानक ! (यह सिमरन) बड़े भाग्यों से मिलता है।
ਹਰਿ ਲਬਧੋ ਮਿਤ੍ਰ ਸੁਮਿਤੋ ॥
मैंने वह श्रेष्ठ मित्र परमात्मा पा लिया है।
ਬਿਦਾਰਣ ਕਦੇ ਨ ਚਿਤੋ ॥
जो कभी (मेरा) दिल नहीं तोड़ता।
ਜਾ ਕਾ ਅਸਥਲੁ ਤੋਲੁ ਅਮਿਤੋ ॥
और जिसका ठिकाना असीम तोल वाला है।
ਸੋੁਈ ਨਾਨਕ ਸਖਾ ਜੀਅ ਸੰਗਿ ਕਿਤੋ ॥੧੩॥
हे नानक ! मैंने उस परमात्मा को अपनी जिंद (के साथ रहने वाला) साथी बनाया है 13।
ਅਪਜਸੰ ਮਿਟੰਤ ਸਤ ਪੁਤ੍ਰਹ ॥
(जैसे) सपुत्र के पैदा होने पर सारी कुल की (पिछली कोई) बदनामी धुल जाती है।
ਸਿਮਰਤਬੵ ਰਿਦੈ ਗੁਰ ਮੰਤ੍ਰਣਹ ॥
गुरू का उपदेश हृदय में बसा के रखना चाहिए (और परमात्मा का सिमरन करना चाहिए)