Sri Guru Granth Sahib Ji — Ang 1359 (hindi)
ਜੇਨ ਕਲਾ ਮਾਤ ਗਰਭ ਪ੍ਰਤਿਪਾਲੰ ਨਹ ਛੇਦੰਤ ਜਠਰ ਰੋਗਣਹ ॥
जिस अकाल-पुरख ने अपनी सक्ता से माँ के पेट में जीवों की रक्षा (का प्रबंध किया हुआ है)। माँ के पेट की आग-रूप रोग जीव का नाश नहीं कर सकता।
ਤੇਨ ਕਲਾ ਅਸਥੰਭੰ ਸਰੋਵਰੰ ਨਾਨਕ ਨਹ ਛਿਜੰਤਿ ਤਰੰਗ ਤੋਯਣਹ ॥੫੩॥
हे नानक ! उस प्रभू ने इस (संसार-) सरोवर को अपनी ताकत का आसरा दिया हुआ है। इस सरोवर के पानी की लहरें (जीवों का) नाश नहीं कर सकतीं। 53।
ਗੁਸਾਂਈ ਗਰਿਸ੍ਟ ਰੂਪੇਣ ਸਿਮਰਣੰ ਸਰਬਤ੍ਰ ਜੀਵਣਹ ॥
जगत का मालिक परमात्मा सबसे बड़ी हस्ती है। उसका सिमरन सब जीवों का जीवन (सहारा) है।
ਲਬਧੵੰ ਸੰਤ ਸੰਗੇਣ ਨਾਨਕ ਸ੍ਵਛ ਮਾਰਗ ਹਰਿ ਭਗਤਣਹ ॥੫੪॥
हे नानक ! परमात्मा की भगती हर (इनसानी जिंदगी के सफर का) निर्मल रास्ता है। जो साध-संगति में मिलता है।
ਮਸਕੰ ਭਗਨੰਤ ਸੈਲੰ ਕਰਦਮੰ ਤਰੰਤ ਪਪੀਲਕਹ ॥
हे नानक ! जो मनुष्य साध-संगति के माध्यम से परमात्मा की ओट ले के गोबिंद का सिमरन करता है। वह (पहले) मच्छर (की तरह निताणा होते हुए भी अब) पहाड़ (अहंकार) को तोड़ लेता है।
ਸਾਗਰੰ ਲੰਘੰਤਿ ਪਿੰਗੰ ਤਮ ਪਰਗਾਸ ਅੰਧਕਹ ॥
वह (पहले) कीड़ी (की तरह कमजोर होते हुए भी) कीचड़ (मोह) पर से तैर जाता है।
ਸਾਧ ਸੰਗੇਣਿ ਸਿਮਰੰਤਿ ਗੋਬਿੰਦ ਸਰਣਿ ਨਾਨਕ ਹਰਿ ਹਰਿ ਹਰੇ ॥੫੫॥
वह (पहले) पिंगले जैसा (निआसरा होते हुए भी अब संसार-) समुंद्र से पार लांघ जाता है। वह (पहले अज्ञानी) अंधे का अंधकार (अब) रौशनी बन जाता है। 55।
ਤਿਲਕ ਹੀਣੰ ਜਥਾ ਬਿਪ੍ਰਾ ਅਮਰ ਹੀਣੰ ਜਥਾ ਰਾਜਨਹ ॥
जैसे तिलक के बिना ब्राहमण। जैसे हुकम (की समर्थता) के बगैर राजा।
ਆਵਧ ਹੀਣੰ ਜਥਾ ਸੂਰਾ ਨਾਨਕ ਧਰਮ ਹੀਣੰ ਤਥਾ ਬੈਸ੍ਨਵਹ ॥੫੬॥
जैसे शस्त्र के बिना शूरवीर (शोभा नहीं पाता)। वैसे। हे नानक ! धर्म से टूटा हुआ विष्णु-भगत (समझो)। 56।
ਨ ਸੰਖੰ ਨ ਚਕ੍ਰੰ ਨ ਗਦਾ ਨ ਸਿਆਮੰ ॥
उसके हाथ में ना शंख है ना चक्र है ना गदा है। ना ही वह काले रंग वाला है। (
ਅਸ੍ਚਰਜ ਰੂਪੰ ਰਹੰਤ ਜਨਮੰ ॥
उसका रूप आश्चर्य है (जो बयान नहीं हो सकता)। वह जनम से रहित है।
ਨੇਤ ਨੇਤ ਕਥੰਤਿ ਬੇਦਾ ॥
वेद कहते हैं कि उस जैसा और कोई नहीं है।
ਊਚ ਮੂਚ ਅਪਾਰ ਗੋਬਿੰਦਹ ॥
गोबिंद बेअंत है। (बहुत) ऊँचा है। (बहुत) बड़ा है।
ਬਸੰਤਿ ਸਾਧ ਰਿਦਯੰ ਅਚੁਤ ਬੁਝੰਤਿ ਨਾਨਕ ਬਡਭਾਗੀਅਹ ॥੫੭॥
हे नानक ! बड़े भाग्यों वाले लोग ही (ये बात) समझते हैं। 57।
ਉਦਿਆਨ ਬਸਨੰ ਸੰਸਾਰੰ ਸਨਬੰਧੀ ਸ੍ਵਾਨ ਸਿਆਲ ਖਰਹ ॥
जीव का वासा एक ऐसे संसार जंगल में है जहाँ कुत्ते। गीदड़। गधे इसके सम्बन्धी हैं ( भाव। जीव का स्वभाव कुत्ते। गीदड़। गधे जैसा है)।
ਬਿਖਮ ਸਥਾਨ ਮਨ ਮੋਹ ਮਦਿਰੰ ਮਹਾਂ ਅਸਾਧ ਪੰਚ ਤਸਕਰਹ ॥
जीव का मन बड़ी कठिन जगह (फसा हुआ) है। मोह की शराब (में मस्त है)। बड़े ही अजेय पाँच (कामादिक) चोर (इस के पीछे पड़े हैं)।
ਹੀਤ ਮੋਹ ਭੈ ਭਰਮ ਭ੍ਰਮਣੰ ਅਹੰ ਫਾਂਸ ਤੀਖੵਣ ਕਠਿਨਹ ॥
हित। मोह। (अनेकों) सहम। भटकना (में जीव काबू आया हुआ है)। अहंकार का कठिन तेज़ फंदा (इसके गले में पड़ा हुआ है)।
ਪਾਵਕ ਤੋਅ ਅਸਾਧ ਘੋਰੰ ਅਗਮ ਤੀਰ ਨਹ ਲੰਘਨਹ ॥
(जीव एक ऐेसे समुंद्र में गोते खा रहा है जहाँ) तृष्णा की आग लगी हुई है। भयानक असाध्य विषियों का पानी (लबालब भरा पड़ा है)। (उस समुंद्र का) किनारा अपहुँच है अगम्य है। पार नहीं लांघा जा सकता।
ਭਜੁ ਸਾਧਸੰਗਿ ਗੋੁਪਾਲ ਨਾਨਕ ਹਰਿ ਚਰਣ ਸਰਣ ਉਧਰਣ ਕ੍ਰਿਪਾ ॥੫੮॥
हे नानक ! साध-संगति में जाकर गोपाल का भजन कर। प्रभू के चरणों की ओट लेने से ही उसकी मेहर से (इस भयानक संसार-समुंद में से) बचाव हो सकता है। 58।
ਕ੍ਰਿਪਾ ਕਰੰਤ ਗੋਬਿੰਦ ਗੋਪਾਲਹ ਸਗਲੵੰ ਰੋਗ ਖੰਡਣਹ ॥
जब गोबिंद गोपाल (जीव पर) कृपा करता है तब (उसके) सारे रोग नाश कर देता है।
ਸਾਧ ਸੰਗੇਣਿ ਗੁਣ ਰਮਤ ਨਾਨਕ ਸਰਣਿ ਪੂਰਨ ਪਰਮੇਸੁਰਹ ॥੫੯॥
हे नानक ! साध-संगति द्वारा ही परमात्मा की सिफत-सालाह की जा सकती है। और पूरन परमेश्वर का आसरा लिया जा सकता है। 59।
ਸਿਆਮਲੰ ਮਧੁਰ ਮਾਨੁਖੵੰ ਰਿਦਯੰ ਭੂਮਿ ਵੈਰਣਹ ॥
मनुष्य (देखने में) सुंदर हो। और बोल (उसके) मीठे हों। पर अगर उसके हृदय-धरती में वैर (-विरोध) (का बीज) हो।
ਨਿਵੰਤਿ ਹੋਵੰਤਿ ਮਿਥਿਆ ਚੇਤਨੰ ਸੰਤ ਸ੍ਵਜਨਹ ॥੬੦॥
तो उसका (दूसरों के आगे) झुकना (सिर्फ) ठॅगी है। भले मनुष्य संत जन (इस कमी से) सावधान रहते हैं। 60।
ਅਚੇਤ ਮੂੜਾ ਨ ਜਾਣੰਤ ਘਟੰਤ ਸਾਸਾ ਨਿਤ ਪ੍ਰਤੇ ॥
बेसमझ मूर्ख मनुष्य यह नहीं जानता कि साँसें घटती जा रही हैं।
ਛਿਜੰਤ ਮਹਾ ਸੁੰਦਰੀ ਕਾਂਇਆ ਕਾਲ ਕੰਨਿਆ ਗ੍ਰਾਸਤੇ ॥
बड़ा सुंदर शरीर (दिन-ब-दिन) कमजोर होता जाता है। वृद्ध-अवस्था अपना जोर डालती जा रही है।
ਰਚੰਤਿ ਪੁਰਖਹ ਕੁਟੰਬ ਲੀਲਾ ਅਨਿਤ ਆਸਾ ਬਿਖਿਆ ਬਿਨੋਦ ॥
(ऐसी हालत में भी) व्यक्ति अपने परिवार के कलोलों में मस्त रहता है। और नित्य ना रहने वाली माया की खुशियों की आशाएं (बनाए रखता है)।
ਭ੍ਰਮੰਤਿ ਭ੍ਰਮੰਤਿ ਬਹੁ ਜਨਮ ਹਾਰਿਓ ਸਰਣਿ ਨਾਨਕ ਕਰੁਣਾ ਮਯਹ ॥੬੧॥
(नतीजा ये निकलता है कि) अनेकों जूनियों में भटकता जीव थक जाता है। हे नानक ! (इस कलेष से बचने के लिए) दया-स्वरूप प्रभू का आसरा ले। 61।
ਹੇ ਜਿਹਬੇ ਹੇ ਰਸਗੇ ਮਧੁਰ ਪ੍ਰਿਅ ਤੁਯੰ ॥
हे जीभ ! हे (सब) रसों को जानने वाली ! (हे चस्कों से सांझ डाल के रखने वाली ! हे चस्कों में फसी हुई !) मीठे पदार्थ तुझे प्यारे लगते हैं।
ਸਤ ਹਤੰ ਪਰਮ ਬਾਦੰ ਅਵਰਤ ਏਥਹ ਸੁਧ ਅਛਰਣਹ ॥
परमात्मा के नाम (-सिमरन) के प्रति तू मरी हुई है। और बड़े-बड़े झगड़े सहेड़ती है।
ਗੋਬਿੰਦ ਦਾਮੋਦਰ ਮਾਧਵੇ ॥੬੨॥
हे जीभ ! गोबिंद दामोदर माधो ! -ये पवित्र शबद तू बार-बार उच्चरण कर (तब ही तू जीभ कहलवाने के योग्य होगी)। 62।
ਗਰਬੰਤਿ ਨਾਰੀ ਮਦੋਨ ਮਤੰ ॥
(जो) मनुष्य स्त्री के मद में मस्ताया हुआ अपने आप को बलवान जान के अहंकार करता है।
ਬਲਵੰਤ ਬਲਾਤ ਕਾਰਣਹ ॥
और (औरों पर) ज्यादती करता है।
ਚਰਨ ਕਮਲ ਨਹ ਭਜੰਤ ਤ੍ਰਿਣ ਸਮਾਨਿ ਧ੍ਰਿਗੁ ਜਨਮਨਹ ॥
वह परमात्मा के सुंदर चरणों का ध्यान नहीं धरता। (इसके कारण उसकी हस्ती) तीले के बराबर है। उसका जीवन धिक्कारयोग्य है।
ਹੇ ਪਪੀਲਕਾ ਗ੍ਰਸਟੇ ਗੋਬਿੰਦ ਸਿਮਰਣ ਤੁਯੰ ਧਨੇ ॥
हे कीड़ी ! (अगर) गोबिंद का सिमरन तेरा धन है। (तो तू छोटी सी होते हुए भी) भारी है (तेरे मुकाबले में वह बलवान मनुष्य हल्का तीले के समान है)।
ਨਾਨਕ ਅਨਿਕ ਬਾਰ ਨਮੋ ਨਮਹ ॥੬੩॥
हे नानक ! अनेकों बार परमत्मा के आगे नमस्कार कर। 63।
ਤ੍ਰਿਣੰ ਤ ਮੇਰੰ ਸਹਕੰ ਤ ਹਰੀਅੰ ॥
वह तीले से सुमेर पर्वत बन जाता है। सूखे से हरा हो जाता है।
ਬੂਡੰ ਤ ਤਰੀਅੰ ਊਣੰ ਤ ਭਰੀਅੰ ॥
(विचारों में) डूबता तैर जाता है। (गुणों से) वंचित (गुणों से) भर जाता है।
ਅੰਧਕਾਰ ਕੋਟਿ ਸੂਰ ਉਜਾਰੰ ॥
(उसके लिए) अंधेरे से करोड़ों सूर्यों की रोशनी हो जाती है।
ਬਿਨਵੰਤਿ ਨਾਨਕ ਹਰਿ ਗੁਰ ਦਯਾਰੰ ॥੬੪॥
नानक विनती करता है (जिस पर) गुरू परमात्मा दयाल हो जाए। 64।