Sri Guru Granth Sahib Ji — Ang 132 (hindi)
ਅੰਧ ਕੂਪ ਤੇ ਕੰਢੈ ਚਾੜੇ ॥
माया के मोह के अंधे कूएं में से निकाल के बाहर किनारे पर चढ़ा देता हैं
ਕਰਿ ਕਿਰਪਾ ਦਾਸ ਨਦਰਿ ਨਿਹਾਲੇ ॥
(हे भाई !) परमात्मा अपने सेवकों पर मेहर करता है। उनको मेहर की नजर के साथ देखता है~
ਗੁਣ ਗਾਵਹਿ ਪੂਰਨ ਅਬਿਨਾਸੀ ਕਹਿ ਸੁਣਿ ਤੋਟਿ ਨ ਆਵਣਿਆ ॥੪॥
वह सेवक अविनाशी प्रभू के गुण गाते रहते हैं। (हे भाई ! प्रभू के गुण बेअंत हैं) कहने से~ सुनने से (उसके गुणों का) खात्मा नहीं हो सकता है। 4।
ਐਥੈ ਓਥੈ ਤੂੰਹੈ ਰਖਵਾਲਾ ॥
हे प्रभू ! इस लोक में परलोक में तू ही (सब जीवों का) रक्षक है।
ਮਾਤ ਗਰਭ ਮਹਿ ਤੁਮ ਹੀ ਪਾਲਾ ॥
माँ के पेट में ही (जीवों की) पालना करता है।
ਮਾਇਆ ਅਗਨਿ ਨ ਪੋਹੈ ਤਿਨ ਕਉ ਰੰਗਿ ਰਤੇ ਗੁਣ ਗਾਵਣਿਆ ॥੫॥
उन लोगों को माया (की तृष्णा) की आग छू नहीं सकती~ जो तेरे प्रेम रंग में रंगे हुए तेरे गुण गाते रहते हैं। 5।
ਕਿਆ ਗੁਣ ਤੇਰੇ ਆਖਿ ਸਮਾਲੀ ॥
हे प्रभू ! मैं तेरे कौन कौन से गुण कह के याद करूँ?
ਮਨ ਤਨ ਅੰਤਰਿ ਤੁਧੁ ਨਦਰਿ ਨਿਹਾਲੀ ॥
मैं अपने मन में तन में तूझे ही बसता देख रहा हूँ।
ਤੂੰ ਮੇਰਾ ਮੀਤੁ ਸਾਜਨੁ ਮੇਰਾ ਸੁਆਮੀ ਤੁਧੁ ਬਿਨੁ ਅਵਰੁ ਨ ਜਾਨਣਿਆ ॥੬॥
हे प्रभू ! तू ही मेरा मालिक है। तेरे बिना मैं किसी और को (तेरे जैसा मित्र) नहीं समझता। 6।
ਜਿਸ ਕਉ ਤੂੰ ਪ੍ਰਭ ਭਇਆ ਸਹਾਈ ॥
हे प्रभू ! जिस मनुष्य वास्ते तू रक्षक बन जाता है~
ਤਿਸੁ ਤਤੀ ਵਾਉ ਨ ਲਗੈ ਕਾਈ ॥
उसे कोई दुख कलेष छू नहीं सकता।
ਤੂ ਸਾਹਿਬੁ ਸਰਣਿ ਸੁਖਦਾਤਾ ਸਤਸੰਗਤਿ ਜਪਿ ਪ੍ਰਗਟਾਵਣਿਆ ॥੭॥
तू ही उसका मालिक है~ तू ही उसका रक्षक है~ तू ही उसे सुख देने वाला है। साध-संगति में तेरा नाम जप के वह तुझे अपने हृदय में प्रत्यक्ष देखता है। 7।
ਤੂੰ ਊਚ ਅਥਾਹੁ ਅਪਾਰੁ ਅਮੋਲਾ ॥
हे प्रभू ! (आत्मिक जीवन में) तू (सब जीवों से) ऊँचा है~ तू (मानो~ गुणों का समुंद्र) है~ जिसकी गहराई नहीं मापी जा सकती। तेरी हस्ती का परला छोर नहीं ढूँढा जा सकता। तेरा मुल्य नहीं पड़ सकता (किसी भी पदार्थ के बदले तेरी प्राप्ति नहीं हो सकती)।
ਤੂੰ ਸਾਚਾ ਸਾਹਿਬੁ ਦਾਸੁ ਤੇਰਾ ਗੋਲਾ ॥
तू सदा कायम रहने वाला मालिक है। मैं तेरा दास हूँ~ गुलाम हूँ।
ਤੂੰ ਮੀਰਾ ਸਾਚੀ ਠਕੁਰਾਈ ਨਾਨਕ ਬਲਿ ਬਲਿ ਜਾਵਣਿਆ ॥੮॥੩॥੩੭॥
हे नानक ! (कह– हे प्रभू !) तू (मेरा) मालिक है; तेरी मल्कियत सदा कायम रहने वाली है। मैं तुझसे सदा सदके हूँ~ कुर्बान हूँ। 8। 3। 37।
ਮਾਝ ਮਹਲਾ ੫ ਘਰੁ ੨ ॥
माझ महला ५ घरु २ ॥
ਨਿਤ ਨਿਤ ਦਯੁ ਸਮਾਲੀਐ ॥
(हे भाई !) सदा ही उस परमात्मा को हृदय में बसाना चाहिए जो सब जीवों पे तरस करता है~
ਮੂਲਿ ਨ ਮਨਹੁ ਵਿਸਾਰੀਐ ॥ ਰਹਾਉ ॥
उसे अपने मन से भुलाना नहीं चाहिए। रहाउ।
ਸੰਤਾ ਸੰਗਤਿ ਪਾਈਐ ॥
(हे भाई !) संत जनों की संगति में रहने से परमात्मा का नाम मिलता है।
ਜਿਤੁ ਜਮ ਕੈ ਪੰਥਿ ਨ ਜਾਈਐ ॥
साध-संगति की बरकति से आत्मिक मौत की ओर ले जाने वाले रास्ते पर नहीं पड़ते।
ਤੋਸਾ ਹਰਿ ਕਾ ਨਾਮੁ ਲੈ ਤੇਰੇ ਕੁਲਹਿ ਨ ਲਾਗੈ ਗਾਲਿ ਜੀਉ ॥੧॥
(हे भाई ! जीवन सफर वास्ते) परमात्मा का नाम खर्च (अपने पल्ले बांध) ले~ (इस तरह) तेरी कुल को (भी) कोई बदनामी नहीं आएगी। 1।
ਜੋ ਸਿਮਰੰਦੇ ਸਾਂਈਐ ॥
जो मनुष्य खसम परमात्मा का सिमरन करते हैं
ਨਰਕਿ ਨ ਸੇਈ ਪਾਈਐ ॥
उन्हें नर्क में नहीं डाला जाता।
ਤਤੀ ਵਾਉ ਨ ਲਗਈ ਜਿਨ ਮਨਿ ਵੁਠਾ ਆਇ ਜੀਉ ॥੨॥
(हे भाई !) जिनके मन में परमात्मा आ बसता है~ उन्हें कोई दुख कलेष छू नहीं सकता। 2।
ਸੇਈ ਸੁੰਦਰ ਸੋਹਣੇ ॥
वही मनुष्य सोहने सुंदर (जीवन वाले) हैं~
ਸਾਧਸੰਗਿ ਜਿਨ ਬੈਹਣੇ ॥
जिनका उठना बैठना साधसंगति में है।
ਹਰਿ ਧਨੁ ਜਿਨੀ ਸੰਜਿਆ ਸੇਈ ਗੰਭੀਰ ਅਪਾਰ ਜੀਉ ॥੩॥
जिन लोगों ने परमात्मा का नाम धन इकट्ठा कर लिया~ वे बेअंत गहरे जिगरे वाले बन जाते हैं। 3।
ਹਰਿ ਅਮਿਉ ਰਸਾਇਣੁ ਪੀਵੀਐ ॥
(हे भाई !) परमात्मा का नाम अमृत पीना चाहिए। (ये नाम अमृत) सारे रसों का श्रोत है।
ਮੁਹਿ ਡਿਠੈ ਜਨ ਕੈ ਜੀਵੀਐ ॥
(हे भाई !) परमात्मा के सेवक का दर्शन करने से आत्मिक जीवन मिलता है~
ਕਾਰਜ ਸਭਿ ਸਵਾਰਿ ਲੈ ਨਿਤ ਪੂਜਹੁ ਗੁਰ ਕੇ ਪਾਵ ਜੀਉ ॥੪॥
(इस वास्ते तू भी) सदा गुरू के पैर पूज (गुरू की शरण पड़ा रह~ और इस तरह) अपने सारे काम सर कर ले। 4।
ਜੋ ਹਰਿ ਕੀਤਾ ਆਪਣਾ ॥ ਤਿਨਹਿ ਗੁਸਾਈ ਜਾਪਣਾ ॥
जिस मनुष्य को परमात्मा ने अपना (सेवक) बना लिया है~ उसने ही पति प्रभू का सिमरन करते रहना है।
ਸੋ ਸੂਰਾ ਪਰਧਾਨੁ ਸੋ ਮਸਤਕਿ ਜਿਸ ਦੈ ਭਾਗੁ ਜੀਉ ॥੫॥
जिस मनुष्य के माथे पे (प्रभू की इस दाति के) भाग्य जाग जाएं~ वह (विकारों से टक्कर ले सकने के स्मर्थ) शूरवीर बन जाते हैं। वह (मनुष्यों में) श्रेष्ठ मनुष्य माने जाते हैं। 5।
ਮਨ ਮੰਧੇ ਪ੍ਰਭੁ ਅਵਗਾਹੀਆ ॥
हे भाई ! अपने मन में ही डुबकी लगाओ और प्रभू के दर्शन करो-
ਏਹਿ ਰਸ ਭੋਗਣ ਪਾਤਿਸਾਹੀਆ ॥
यही है दुनिया के सारे रसों का भोग। यही है दुनिया की बादशाहियां।
ਮੰਦਾ ਮੂਲਿ ਨ ਉਪਜਿਓ ਤਰੇ ਸਚੀ ਕਾਰੈ ਲਾਗਿ ਜੀਉ ॥੬॥
(जिन मनुष्यों ने परमात्मा को अपने अंदर ही देख लिया~ उनके मन में) कभी कोई विकार पैदा नहीं होता। वह सिमरन की सच्ची कार में लग के (संसार समुंद्र से) पार लांघ जाते हैं। 6।
ਕਰਤਾ ਮੰਨਿ ਵਸਾਇਆ ॥
जिस मनुष्य ने करतार को अपने मन में बसा लिया~
ਜਨਮੈ ਕਾ ਫਲੁ ਪਾਇਆ ॥
उसने मानस जनम का फल प्राप्त कर लिया।
ਮਨਿ ਭਾਵੰਦਾ ਕੰਤੁ ਹਰਿ ਤੇਰਾ ਥਿਰੁ ਹੋਆ ਸੋਹਾਗੁ ਜੀਉ ॥੭॥
(हे जीव स्त्री !) अगर तुझे कंत हरी अपने मन में प्यारा लगने लग जाए~ तो तेरा ये सुहाग सदा के लिए (तेरे सिर पर) कायम रहेगा। 7।
ਅਟਲ ਪਦਾਰਥੁ ਪਾਇਆ ॥
(परमात्मा का नाम सदा कायम रहने वाला धन है~ जिन्होंने) यह सदा कायम रहने वाला धन ढूँढ लिया~
ਭੈ ਭੰਜਨ ਕੀ ਸਰਣਾਇਆ ॥
जो लोग सदा डर नाश करने वाले परमात्मा की शरण में आ गए~ उन्हें~
ਲਾਇ ਅੰਚਲਿ ਨਾਨਕ ਤਾਰਿਅਨੁ ਜਿਤਾ ਜਨਮੁ ਅਪਾਰ ਜੀਉ ॥੮॥੪॥੩੮॥
हे नानक ! परमात्मा ने अपने साथ लगा के (संसार समुंद्र से) पार लंघा लिया। उन्होंने मानस जन्म की बाजी जीत ली। 8। 4। 38।
ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है।
ਮਾਝ ਮਹਲਾ ੫ ਘਰੁ ੩ ॥
माझ महला ५ घरु ३ ॥
ਹਰਿ ਜਪਿ ਜਪੇ ਮਨੁ ਧੀਰੇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
परमात्मा का नाम जप जप के (मनुष्य का) मन धैर्यवान हो जाता है (दुनियां के सुखों दुखों में डोलता नहीं)। रहाउ।
ਸਿਮਰਿ ਸਿਮਰਿ ਗੁਰਦੇਉ ਮਿਟਿ ਗਏ ਭੈ ਦੂਰੇ ॥੧॥
सबसे बड़े अकाल-पुरख को सिमर सिमर के सारे डर सहम मिट जाते हैं; दूर हो जाते हैं। 1।
ਸਰਨਿ ਆਵੈ ਪਾਰਬ੍ਰਹਮ ਕੀ ਤਾ ਫਿਰਿ ਕਾਹੇ ਝੂਰੇ ॥੨॥
जब मनुष्य परमात्मा का आसरा ले लेता है~ उसे कोई चिंता~ फिक्र छू नहीं सकती। 2।