Sri Guru Granth Sahib Ji — Ang 1315 (hindi)
ਸਭ ਆਸਾ ਮਨਸਾ ਵਿਸਰੀ ਮਨਿ ਚੂਕਾ ਆਲ ਜੰਜਾਲੁ ॥
सारी आशा और तृष्णा बिसर गई। मन में (टिका हुआ) घर का मोह (भी) खत्म हो गया।
ਗੁਰਿ ਤੁਠੈ ਨਾਮੁ ਦ੍ਰਿੜਾਇਆ ਹਮ ਕੀਏ ਸਬਦਿ ਨਿਹਾਲੁ ॥
हे भाई ! प्रसन्न हुए गुरू ने परमात्मा का नाम (हमारे मन में) पक्का कर दिया। अपने शबद से हमें (उसने) निहाल कर दिया।
ਜਨ ਨਾਨਕਿ ਅਤੁਟੁ ਧਨੁ ਪਾਇਆ ਹਰਿ ਨਾਮਾ ਹਰਿ ਧਨੁ ਮਾਲੁ ॥੨॥
(गुरू की कृपा से) दास नानक ने परमात्मा का नाम-धन हासिल कर लिया है जो कभी खत्म होने वाला नहीं। 2।
ਪਉੜੀ ॥
पउड़ी॥
ਹਰਿ ਤੁਮੑ ਵਡ ਵਡੇ ਵਡੇ ਵਡ ਊਚੇ ਸਭ ਊਪਰਿ ਵਡੇ ਵਡੌਨਾ ॥
हे हरी ! तू बड़ों से (भी) बड़ा है बहुत ऊँचा है सबसे ऊपर बड़ा है। ( हे भाई ! ) हरी परमात्मा बेअंत है।
ਜੋ ਧਿਆਵਹਿ ਹਰਿ ਅਪਰੰਪਰੁ ਹਰਿ ਹਰਿ ਹਰਿ ਧਿਆਇ ਹਰੇ ਤੇ ਹੋਨਾ ॥
जो मनुष्य उसका ध्यान धरते हैं। वे लोग उस हरी को सदा सिमर के उसका रूप ही हो जाते हैं।
ਜੋ ਗਾਵਹਿ ਸੁਣਹਿ ਤੇਰਾ ਜਸੁ ਸੁਆਮੀ ਤਿਨ ਕਾਟੇ ਪਾਪ ਕਟੋਨਾ ॥
हे स्वामी ! जो मनुष्य तेरी सिफत-सालाह का गीत गाते हैं सुनते हैं। वे (अपने) करोड़ों पाप नाश कर लेते हैं।
ਤੁਮ ਜੈਸੇ ਹਰਿ ਪੁਰਖ ਜਾਨੇ ਮਤਿ ਗੁਰਮਤਿ ਮੁਖਿ ਵਡ ਵਡ ਭਾਗ ਵਡੋਨਾ ॥
हे सर्व-व्यापक हरी ! वे मनुष्य बहुत भाग्यशाली गिने जाते हैं (सब मनुष्यों में) मुखी माने जाते हैं। सतिगुरू की मति पर चल के वे मनुष्य तेरे जैसे ही जाने जाते हैं।
ਸਭਿ ਧਿਆਵਹੁ ਆਦਿ ਸਤੇ ਜੁਗਾਦਿ ਸਤੇ ਪਰਤਖਿ ਸਤੇ ਸਦਾ ਸਦਾ ਸਤੇ ਜਨੁ ਨਾਨਕੁ ਦਾਸੁ ਦਸੋਨਾ ॥੫॥
हे भाई ! जो परमात्मा आदि से जुगादि (जुगों के आदि) से अस्तित्व वाला है; जो (अब भी) प्रत्यक्ष कायम है और सदा ही कायम रहने वाला है। तुम सारे उसका सिमरन करते रहो। दास नानक उस (हरी के) दासों का दास है। 5।
ਸਲੋਕ ਮਃ ੪ ॥
श्लोक महला ४॥
ਹਮਰੇ ਹਰਿ ਜਗਜੀਵਨਾ ਹਰਿ ਜਪਿਓ ਹਰਿ ਗੁਰ ਮੰਤ ॥
हे भाई ! (जो) हरी (सारे) जगत की जिंदगी का आसरा (है वह) हमारे हृदय में भी बसता है; हमने गुरू के उपदेश पर चल के उसे जपा है।
ਹਰਿ ਅਗਮੁ ਅਗੋਚਰੁ ਅਗਮੁ ਹਰਿ ਹਰਿ ਮਿਲਿਆ ਆਇ ਅਚਿੰਤ ॥
वह है तो अपहुँच और ज्ञानेन्द्रियों की पहुँच से परे (पर। गुरू की शिक्षा के अनुसार सिमरन की बरकति से) वह हरी हमें अपने आप आ मिला है।
ਹਰਿ ਆਪੇ ਘਟਿ ਘਟਿ ਵਰਤਦਾ ਹਰਿ ਆਪੇ ਆਪਿ ਬਿਅੰਤ ॥
हे भाई ! वह हरी स्वयं ही हरेक शरीर में बसता है। (हर जगह) वह स्वयं ही स्वयं है और उसकी हस्ती का अंत नहीं पाया जा सकता।
ਹਰਿ ਆਪੇ ਸਭ ਰਸ ਭੋਗਦਾ ਹਰਿ ਆਪੇ ਕਵਲਾ ਕੰਤ ॥
वह हरी स्वयं ही (सब जीवों में व्यापक हो के ) सारे रस भोग रहा है। वह स्वयं ही माया का मालिक है।
ਹਰਿ ਆਪੇ ਭਿਖਿਆ ਪਾਇਦਾ ਸਭ ਸਿਸਟਿ ਉਪਾਈ ਜੀਅ ਜੰਤ ॥
हे भाई ! यह सारी दुनिया उसने स्वयं पैदा की है। ये सारे जीव-जंतु उसने खुद ही पैदा किए हुए हैं। और। (सब जीवों को रिजक का) ख़ैर भी वह खुद ही डालता है।
ਹਰਿ ਦੇਵਹੁ ਦਾਨੁ ਦਇਆਲ ਪ੍ਰਭ ਹਰਿ ਮਾਂਗਹਿ ਹਰਿ ਜਨ ਸੰਤ ॥
हे दया के श्रोत हरी-प्रभू (हमें भी वह नाम-) दान दे। जो (तेरे) संत जन (सदा तुझसे) माँगते (रहते) हैं।
ਜਨ ਨਾਨਕ ਕੇ ਪ੍ਰਭ ਆਇ ਮਿਲੁ ਹਮ ਗਾਵਹ ਹਰਿ ਗੁਣ ਛੰਤ ॥੧॥
हे दास नानक के (मालिक) प्रभू ! (हमें) आ के मिल। (मेहर कर) हम तेरी सिफत-सालाह के गीत गाते रहें। 1।
ਮਃ ੪ ॥
महला ४॥
ਹਰਿ ਪ੍ਰਭੁ ਸਜਣੁ ਨਾਮੁ ਹਰਿ ਮੈ ਮਨਿ ਤਨਿ ਨਾਮੁ ਸਰੀਰਿ ॥
हे भाई ! हरी प्रभू (ही असल) मित्र है। हरी का नाम ही (साथ निभने वाला) मित्र है; मेरे मन में मेरे तन में मेरे दिल में (हरी का) नाम बस रहा है।
ਸਭਿ ਆਸਾ ਗੁਰਮੁਖਿ ਪੂਰੀਆ ਜਨ ਨਾਨਕ ਸੁਣਿ ਹਰਿ ਧੀਰ ॥੨॥
हे दास नानक ! (कह- हे भाई !) गुरू की शरण पड़ के (हरी-नाम सिमरते हुए) सारी आशाऐ पूरी हो जाती है। हरी का नाम सुन के (मन में) शांति पैदा होती है। 2।
ਪਉੜੀ ॥
पउड़ी॥
ਹਰਿ ਊਤਮੁ ਹਰਿਆ ਨਾਮੁ ਹੈ ਹਰਿ ਪੁਰਖੁ ਨਿਰੰਜਨੁ ਮਉਲਾ ॥
हे भाई ! परमात्मा सबमें व्यापकि है सबमें मिला हुआ है और निर्लिप (भी) है। उसका नाम श्रेष्ठ है (ऊँचा जीवन बनाने वाला है) और आत्मिक जीवन देने वाला है।
ਜੋ ਜਪਦੇ ਹਰਿ ਹਰਿ ਦਿਨਸੁ ਰਾਤਿ ਤਿਨ ਸੇਵੇ ਚਰਨ ਨਿਤ ਕਉਲਾ ॥
जो मनुष्य दिन-रात हर वक्त परमात्मा (का नाम) जपते हैं। लक्ष्मी (भी) हर वक्त उसके चरणों की सेवा करती है (उन पर अपना प्रभाव नहीं डाल सकती)।
ਨਿਤ ਸਾਰਿ ਸਮੑਾਲੇ ਸਭ ਜੀਅ ਜੰਤ ਹਰਿ ਵਸੈ ਨਿਕਟਿ ਸਭ ਜਉਲਾ ॥
हे भाई ! परमात्मा सब जीवों की अच्छी तरह संभाल करता है। वह (सब जीवों के) नजदीक बसता है। (फिर सबसे) अलग भी है।
ਸੋ ਬੂਝੈ ਜਿਸੁ ਆਪਿ ਬੁਝਾਇਸੀ ਜਿਸੁ ਸਤਿਗੁਰੁ ਪੁਰਖੁ ਪ੍ਰਭੁ ਸਉਲਾ ॥
पर ये बात वह मनुष्य समझता है जिसको परमात्मा स्वयं समझ देता है जिस पर गुरू मेहर करता है जिस पर सर्व-व्यापक प्रभू किरपा करता है।
ਸਭਿ ਗਾਵਹੁ ਗੁਣ ਗੋਵਿੰਦ ਹਰੇ ਗੋਵਿੰਦ ਹਰੇ ਗੋਵਿੰਦ ਹਰੇ ਗੁਣ ਗਾਵਤ ਗੁਣੀ ਸਮਉਲਾ ॥੬॥
हे भाई ! तुम सारे। धरती की सार लेने वाले उस हरी के गुण सदा गाते रहो। गुण गाते-गाते उस गुणों के मालिक प्रभू में लीन हुआ जाता है। 6।
ਸਲੋਕ ਮਃ ੪ ॥
श्लोक महला ४॥
ਸੁਤਿਆ ਹਰਿ ਪ੍ਰਭੁ ਚੇਤਿ ਮਨਿ ਹਰਿ ਸਹਜਿ ਸਮਾਧਿ ਸਮਾਇ ॥
(हे भाई ! जागते हुए किरत-कार करते हुए सिमरन की ऐसी आदत बना कि) सोए हुए भी (अपने) मन में परमात्मा को याद कर (याद करता रहे)। (इस तरह) सदा आत्मिक अडोलता में (आत्मिक अडोलता की) समाधि में टिका रहे।
ਜਨ ਨਾਨਕ ਹਰਿ ਹਰਿ ਚਾਉ ਮਨਿ ਗੁਰੁ ਤੁਠਾ ਮੇਲੇ ਮਾਇ ॥੧॥
हे माँ ! दास नानक के मन में भी परमात्मा को मिलने की तमन्ना है। गुरू (ही) प्रसन्न हो के मेल कराता है। 1।
ਮਃ ੪ ॥
महला ४॥
ਹਰਿ ਇਕਸੁ ਸੇਤੀ ਪਿਰਹੜੀ ਹਰਿ ਇਕੋ ਮੇਰੈ ਚਿਤਿ ॥
हे दास नानक ! (कह- हे भाई !) सिर्फ एक परमात्मा के साथ ही मेरा सुंदर प्यार है। एक परमात्मा ही (सदा) मेरे चिक्त में बसता है।
ਜਨ ਨਾਨਕ ਇਕੁ ਅਧਾਰੁ ਹਰਿ ਪ੍ਰਭ ਇਕਸ ਤੇ ਗਤਿ ਪਤਿ ॥੨॥
एक प्रभू ही (मेरी जिंदगी का) आसरा है। एक प्रभू से ही ऊँची आत्मिक अवस्था मिलती है (और लोक-परलोक की) इज्जत हासिल होती है। 2।
ਪਉੜੀ ॥
पउड़ी॥
ਪੰਚੇ ਸਬਦ ਵਜੇ ਮਤਿ ਗੁਰਮਤਿ ਵਡਭਾਗੀ ਅਨਹਦੁ ਵਜਿਆ ॥
हे भाई ! जिस बड़े भाग्यशाली मनुष्य की मति में गुरू का उपदेश बस जाता है उसके अंदर (आत्मिक आनंद का) एक-रस बाजा बज जाता है (उसके अंदर। मानो) पाँचों ही किस्मों के साज़ बज उठते हैं।
ਆਨਦ ਮੂਲੁ ਰਾਮੁ ਸਭੁ ਦੇਖਿਆ ਗੁਰ ਸਬਦੀ ਗੋਵਿਦੁ ਗਜਿਆ ॥
गुरू के शबद की बरकति से (उसके अंदर) परमात्मा गरज उठता है और वह हर जगह आनंद के श्रोत परमात्मा को (बसता) देखता है।
ਆਦਿ ਜੁਗਾਦਿ ਵੇਸੁ ਹਰਿ ਏਕੋ ਮਤਿ ਗੁਰਮਤਿ ਹਰਿ ਪ੍ਰਭੁ ਭਜਿਆ ॥
(हे भाई ! जो मनुष्य) गुरू की मति ले के परमात्मा का भजन करता है (उसको यह निश्चय आ जाता है कि सृष्टि के) आदि से जुगादि से परमात्मा की एक ही अटल हस्ती है।
ਹਰਿ ਦੇਵਹੁ ਦਾਨੁ ਦਇਆਲ ਪ੍ਰਭ ਜਨ ਰਾਖਹੁ ਹਰਿ ਪ੍ਰਭ ਲਜਿਆ ॥
हे हरी ! हे दया के श्रोत प्रभू ! तू अपने दासों को (अपने नाम का) दान देता है। (और। इस तरह विकारों के मुकाबले में उनकी) लाज रखता है।