Sri Guru Granth Sahib Ji — Ang 1311 (hindi)
ਪੰਕਜ ਮੋਹ ਨਿਘਰਤੁ ਹੈ ਪ੍ਰਾਨੀ ਗੁਰੁ ਨਿਘਰਤ ਕਾਢਿ ਕਢਾਵੈਗੋ ॥
(गुरू ने) सत-संतोख-धर्म (ये गुण) साध-संगति-नगरी में ला के रखे हुए हैं (लोभ-कुत्ते से बचने के लिए मनुष्य) साध-संगति में परमात्मा के गुण गाता रहता है। 3।
ਤ੍ਰਾਹਿ ਤ੍ਰਾਹਿ ਸਰਨਿ ਜਨ ਆਏ ਗੁਰੁ ਹਾਥੀ ਦੇ ਨਿਕਲਾਵੈਗੋ ॥੪॥
हे भाई ! मनुष्य (माया के) मोह के दल-दल में धंसता जाता है। गुरू (इस गारे में) धंस रहे मनुष्य को (दल-दल में से) निकाल के किनारे लगा देता है।
ਸੁਪਨੰਤਰੁ ਸੰਸਾਰੁ ਸਭੁ ਬਾਜੀ ਸਭੁ ਬਾਜੀ ਖੇਲੁ ਖਿਲਾਵੈਗੋ ॥
बचा ले। बचा ले'-ये कहते हुए (जो) मनुष्य (गुरू की) शरण आते हैं। गुरू अपना हाथ पकड़ा के उनको (माया के मोह के कीचड़ में से) बाहर निकाल लेता है। 4।
ਲਾਹਾ ਨਾਮੁ ਗੁਰਮਤਿ ਲੈ ਚਾਲਹੁ ਹਰਿ ਦਰਗਹ ਪੈਧਾ ਜਾਵੈਗੋ ॥੫॥
हे भाई ! यह संसार (मनुष्य के) मन की भटकना (का मूल) है। (जीवों को परचाने के लिए) सारा जगत (एक) खेल (सी ही) है। यह खेल (जीवों को परमात्मा स्वयं) खेला रहा है।
ਹਉਮੈ ਕਰੈ ਕਰਾਵੈ ਹਉਮੈ ਪਾਪ ਕੋਇਲੇ ਆਨਿ ਜਮਾਵੈਗੋ ॥
(इस खेल में परमात्मा का) नाम (ही) लाभ है। हे भाई ! गुरू की मति से ये लाभ कमा के जाओ। (जो मनुष्य ये लाभ कमा के यहाँ से जाता है। वह) परमात्मा की हजूरी में इज्जत से जाता है। 5।
ਆਇਆ ਕਾਲੁ ਦੁਖਦਾਈ ਹੋਏ ਜੋ ਬੀਜੇ ਸੋ ਖਵਲਾਵੈਗੋ ॥੬॥
हे भाई ! जो मनुष्य सारी उम्र 'हउ हउ' ही करता रहता है। वह मनुष्य (अपनी मानसिक खेती में) खुद ला-ला के पाप बोता (बीजता) रहता है।
ਸੰਤਹੁ ਰਾਮ ਨਾਮੁ ਧਨੁ ਸੰਚਹੁ ਲੈ ਖਰਚੁ ਚਲੇ ਪਤਿ ਪਾਵੈਗੋ ॥
जब मौत आती है; (वे बीजे हुए कमाए हुए पाप) दुखदाई बन जाते हैं (पर उस वक्त क्या हो सकता है। ) जो कोयले-पाप बीजे हुए होते हैं (सारी उम्र किए होते हैं) उनका फल खाना पड़ता है। 6।
ਖਾਇ ਖਰਚਿ ਦੇਵਹਿ ਬਹੁਤੇਰਾ ਹਰਿ ਦੇਦੇ ਤੋਟਿ ਨ ਆਵੈਗੋ ॥੭॥
हे संत जनो ! परमात्मा का नाम-धन इकट्ठा करते रहो। (जो मनुष्य जीवन-यात्रा में उपयोग के लिए नाम-) खर्च ले के चलते हैं (नाम की राशि ले कर चलते हैं) (परमात्मा उनको) आदर-सत्कार देता है।
ਰਾਮ ਨਾਮ ਧਨੁ ਹੈ ਰਿਦ ਅੰਤਰਿ ਧਨੁ ਗੁਰ ਸਰਣਾਈ ਪਾਵੈਗੋ ॥
वे मनुष्य (ये नाम-धन खुद) खुला बरत के (औरों को भी) बहुत बाँटते हैं। इस हरी-नाम-धन के बाँटने से इसमें कमी नहीं होती। 7।
ਨਾਨਕ ਦਇਆ ਦਇਆ ਕਰਿ ਦੀਨੀ ਦੁਖੁ ਦਾਲਦੁ ਭੰਜਿ ਸਮਾਵੈਗੋ ॥੮॥੫॥
हे नानक ! (कह- हे भाई !) ये नाम-धन गुरू की शरण पड़ने से मिलता है। जिस मनुष्य के हृदय में ये नाम-धन बसता है।
ਕਾਨੜਾ ਮਹਲਾ ੪ ॥
जिस मनुष्य को परमात्मा नाम-धन की दाति मेहर कर के देता है। वह अपना हरेक दुख दूर कर के (आत्मिक) गरीबी को खत्म कर के नाम में लीन रहता है। 8। 5।
ਮਨੁ ਸਤਿਗੁਰ ਸਰਨਿ ਧਿਆਵੈਗੋ ॥
कानड़ा महला ४ ॥
ਲੋਹਾ ਹਿਰਨੁ ਹੋਵੈ ਸੰਗਿ ਪਾਰਸ ਗੁਨੁ ਪਾਰਸ ਕੋ ਹੋਇ ਆਵੈਗੋ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
हे भाई ! (जिस मनुष्य का) मन गुरू की शरण पड़ कर परमात्मा का नाम सिमरता रहता है (वह प्रभू-चरणों की छोह से ऊँचे जीवन वाला हो जाता है।
ਸਤਿਗੁਰੁ ਮਹਾ ਪੁਰਖੁ ਹੈ ਪਾਰਸੁ ਜੋ ਲਾਗੈ ਸੋ ਫਲੁ ਪਾਵੈਗੋ ॥
जैसे) पारस से (छू के) लोहा सोना बन जाता है। पारस की छूह का गुण उसमें आ जाता है। 1। रहाउ।
ਜਿਉ ਗੁਰ ਉਪਦੇਸਿ ਤਰੇ ਪ੍ਰਹਿਲਾਦਾ ਗੁਰੁ ਸੇਵਕ ਪੈਜ ਰਖਾਵੈਗੋ ॥੧॥
हे भाई ! गुरू (भी) बहुत बड़ा पुरख है। (गुरू भी) पारस है। जो मनुष्य (गुरू के चरणों में) लगता है वह (श्रेष्ठ) फल प्राप्त करता है।
ਸਤਿਗੁਰ ਬਚਨੁ ਬਚਨੁ ਹੈ ਨੀਕੋ ਗੁਰ ਬਚਨੀ ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਪਾਵੈਗੋ ॥
जैसे गुरू के उपदेश की बरकति से प्रहलाद (आदि कई) पार लांघ गए। हे भाई ! गुरू अपने (सेवक) की इज्जत (अवश्य) रखता है। 1।
ਜਿਉ ਅੰਬਰੀਕਿ ਅਮਰਾ ਪਦ ਪਾਏ ਸਤਿਗੁਰ ਮੁਖ ਬਚਨ ਧਿਆਵੈਗੋ ॥੨॥
हे भाई ! यकीन जान कि गुरू का वचन (बहुत) श्रेष्ठ है। गुरू के बचनों की बरकति से (मनुष्य) आत्मिक जीवन देने वाला नाम हासिल कर लेता है।
ਸਤਿਗੁਰ ਸਰਨਿ ਸਰਨਿ ਮਨਿ ਭਾਈ ਸੁਧਾ ਸੁਧਾ ਕਰਿ ਧਿਆਵੈਗੋ ॥
(जो भी मनुष्य) गुरू का उचारा हुआ शबद हृदय में बसाता है (वह ऊँचा आत्मिक जीवन प्राप्त करता है) जैसे अंबरीक ने वह आत्मिक दर्जा हासिल कर लिया जहाँ आत्मिक मौत छू नहीं सकती। 2।
ਦਇਆਲ ਦੀਨ ਭਏ ਹੈ ਸਤਿਗੁਰ ਹਰਿ ਮਾਰਗੁ ਪੰਥੁ ਦਿਖਾਵੈਗੋ ॥੩॥
हे भाई ! जिस मनुष्य को गुरू की शरण पड़े रहना (अपने) मन में पसंद आ जाता है। वह (गुरू के बचन को) आत्मिक-जीवन-दाता निश्चय करके (उसको) अपने अंदर बसाए रखता है।
ਸਤਿਗੁਰ ਸਰਨਿ ਪਏ ਸੇ ਥਾਪੇ ਤਿਨ ਰਾਖਨ ਕਉ ਪ੍ਰਭੁ ਆਵੈਗੋ ॥
हे भाई ! गुरू दीनों पर दया करने वाला है। गुरू परमात्मा के मिलाप का रास्ता दिखा देता है। 3।
ਜੇ ਕੋ ਸਰੁ ਸੰਧੈ ਜਨ ਊਪਰਿ ਫਿਰਿ ਉਲਟੋ ਤਿਸੈ ਲਗਾਵੈਗੋ ॥੪॥
हे भाई ! जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ते हैं। उनको आदर मिलता है। परमात्मा उनकी रक्षा करने के लिए स्वयं पहुँचता है।
ਹਰਿ ਹਰਿ ਹਰਿ ਹਰਿ ਹਰਿ ਸਰੁ ਸੇਵਹਿ ਤਿਨ ਦਰਗਹ ਮਾਨੁ ਦਿਵਾਵੈਗੋ ॥
अगर कोई मनुष्य उन सेवकों पर तीर चलाता है। वह तीर पलट के उसी को ही आ लगता है। 4।
ਗੁਰਮਤਿ ਗੁਰਮਤਿ ਗੁਰਮਤਿ ਧਿਆਵਹਿ ਹਰਿ ਗਲਿ ਮਿਲਿ ਮੇਲਿ ਮਿਲਾਵੈਗੋ ॥੫॥
हे भाई ! जो मनुष्य सदा ही साध-संगति का आसरा लिए रखते हैं। परमात्मा उनको अपनी हजूरी में आदर दिलवाता है।
ਗੁਰਮੁਖਿ ਨਾਦੁ ਬੇਦੁ ਹੈ ਗੁਰਮੁਖਿ ਗੁਰ ਪਰਚੈ ਨਾਮੁ ਧਿਆਵੈਗੋ ॥
जो मनुष्य सदा ही गुरू की शिक्षा पर चल के परमात्मा का नाम सिमरते हैं। परमात्मा उनके गले से मिल के उनको अपने साथ एक-मेक कर लेता है। 5।
ਹਰਿ ਹਰਿ ਰੂਪੁ ਹਰਿ ਰੂਪੋ ਹੋਵੈ ਹਰਿ ਜਨ ਕਉ ਪੂਜ ਕਰਾਵੈਗੋ ॥੬॥
हे भाई ! गुरू के सन्मुख रहने वाले मनुष्य के लिए गुरू की शरण ही नाद है गुरू की शरण ही वेद है। गुरू की शरण पड़े रहने वाला मनुष्य गुरू की प्रसन्नता प्राप्त करके हरी-नाम सिमरता है।
ਸਾਕਤ ਨਰ ਸਤਿਗੁਰੁ ਨਹੀ ਕੀਆ ਤੇ ਬੇਮੁਖ ਹਰਿ ਭਰਮਾਵੈਗੋ ॥
वह मनुष्य परमात्मा का ही रूप हो जाता है। परमात्मा (भी हर जगह) उसकी इज्जत कराता है। 6।
ਲੋਭ ਲਹਰਿ ਸੁਆਨ ਕੀ ਸੰਗਤਿ ਬਿਖੁ ਮਾਇਆ ਕਰੰਗਿ ਲਗਾਵੈਗੋ ॥੭॥
हे भाई ! परमात्मा से टूटे हुए मनुष्य गुरू को (अपना आसरा) नहीं बनाते। वे गुरू से मुँह घुमाए रखते हैं। प्रभू उनको भटकना में डाले रखता है।
ਰਾਮ ਨਾਮੁ ਸਭ ਜਗ ਕਾ ਤਾਰਕੁ ਲਗਿ ਸੰਗਤਿ ਨਾਮੁ ਧਿਆਵੈਗੋ ॥
(उनके अंदर) लोभ की लहर चलती रहती है। (यह लहर) कुत्ते के स्वभाव जैसी है। (जैसे कुक्ता) मुर्दे पर जाता है (मुर्दे को खुश हो के खाता है। वैसे ही लोभ-लहर का प्रेरा हुआ मनुष्य) आत्मिक मौत लाने वाली माया-जहर को चिपका रहता है। 7।
ਨਾਨਕ ਰਾਖੁ ਰਾਖੁ ਪ੍ਰਭ ਮੇਰੇ ਸਤਸੰਗਤਿ ਰਾਖਿ ਸਮਾਵੈਗੋ ॥੮॥੬॥
हे भाई ! परमात्मा का नाम सारे जगत का पार लंघाने वाला है। (जो मनुष्य) साध-संगति में टिक के हरी-नाम सिमरता है (वह संसार-समुंद्र से पार लांघ जाता है)।
ਛਕਾ ੧ ॥
हे नानक ! (अरदास कर और कह-) हे मेरे प्रभू ! (मुझे भी साध-संगति में) रखे रख। हे भाई ! (परमात्मा प्राणी को) साध-संगति में रख के (अपने में) लीन करे रखता है। 8। 6। छका1।