Sri Guru Granth Sahib Ji — Ang 1288 (hindi)
ਲਿਖਿਆ ਪਲੈ ਪਾਇ ਸੋ ਸਚੁ ਜਾਣੀਐ ॥
इसलिए उस सच्चे प्रभू के साथ सांझ बनाएं। तब ही (नाम-सिमरन-रूप) लिखा हुआ (लेख) मिलता है
ਹੁਕਮੀ ਹੋਇ ਨਿਬੇੜੁ ਗਇਆ ਜਾਣੀਐ ॥
यह सारा निर्णय प्रभू के हुकम में ही होता है। और इस की समझ (यहाँ जगत से) चलते वक्त ही पड़ती है। (सो।
ਭਉਜਲ ਤਾਰਣਹਾਰੁ ਸਬਦਿ ਪਛਾਣੀਐ ॥
) गुरू के शबद के द्वारा उस प्रभू के साथ गहरी सांझ डालनी चाहिए जो संसार-समुंद्र से पार लंघाने से समर्थ है।
ਚੋਰ ਜਾਰ ਜੂਆਰ ਪੀੜੇ ਘਾਣੀਐ ॥
चोरों व्यभचारियों और जूए-बाज़ (आदि विकारियों का हाल इस प्रकार होता है जैसे) कोल्हू में पीढ़े जा रहे हों।
ਨਿੰਦਕ ਲਾਇਤਬਾਰ ਮਿਲੇ ਹੜੑਵਾਣੀਐ ॥
निंदकों और चुग़लख़ोरों को (मानो। निंदा और चुग़ली की) हथकड़ी लगी हुई है (भाव। इस बुरी वादी में से वे अपने आप को निकाल नहीं सकते)।
ਗੁਰਮੁਖਿ ਸਚਿ ਸਮਾਇ ਸੁ ਦਰਗਹ ਜਾਣੀਐ ॥੨੧॥
पर जो मनुष्य गुरू के सन्मुख हैं वे प्रभू में लीन हो के प्रभू की हजूरी में आदर पाएं। 21।
ਸਲੋਕ ਮਃ ੨ ॥
श्लोक महला २॥
ਨਾਉ ਫਕੀਰੈ ਪਾਤਿਸਾਹੁ ਮੂਰਖ ਪੰਡਿਤੁ ਨਾਉ ॥
कंगाल का नाम बादशाह (रखा जाता है)। मूख का नाम पण्डित (रखा जाता है)।
ਅੰਧੇ ਕਾ ਨਾਉ ਪਾਰਖੂ ਏਵੈ ਕਰੇ ਗੁਆਉ ॥
अंधे को पारखू (कहा जाता है) - (बस ! जगत) इस तरह की (उल्टी) बातें करता है।
ਇਲਤਿ ਕਾ ਨਾਉ ਚਉਧਰੀ ਕੂੜੀ ਪੂਰੇ ਥਾਉ ॥
शरारत (करने वाले) का नाम चौधरी (पड़ जाता है) और झूठी औरत सबसे आगे जगह घेरती है (भाव। हर जगह प्रधान बनती है)।
ਨਾਨਕ ਗੁਰਮੁਖਿ ਜਾਣੀਐ ਕਲਿ ਕਾ ਏਹੁ ਨਿਆਉ ॥੧॥
हे नानक ! यह है न्याय कलियुग का (भाव। जहाँ यह रवईया बरता जाता है वहाँ कलियुग का पहरा जानो)। पर। गुरू के सन्मुख होने से ही ये समझ आती है (कि यह तरीका व्यवहार गलत है। मन के पीछे चलने वाले लोग इस रवईए के आदी हुए रहते हैं)। 1।
ਮਃ ੧ ॥
महला १॥
ਹਰਣਾਂ ਬਾਜਾਂ ਤੈ ਸਿਕਦਾਰਾਂ ਏਨੑਾ ਪੜਿੑਆ ਨਾਉ ॥
हिरन। बाज़ और अहलकार- इनका नाम लोग 'पढ़े हुए' रखते हैं (पर ये कैसी विद्या है।
ਫਾਂਧੀ ਲਗੀ ਜਾਤਿ ਫਹਾਇਨਿ ਅਗੈ ਨਾਹੀ ਥਾਉ ॥
यह तो) फंदा लिए हुए है जिस में अपनी ही जाति-भाईयों को फसाते हैं; प्रभू ही हजूरी में ऐसे पढ़े हुए मंजूर नहीं हैं।
ਸੋ ਪੜਿਆ ਸੋ ਪੰਡਿਤੁ ਬੀਨਾ ਜਿਨੑੀ ਕਮਾਣਾ ਨਾਉ ॥
जिस-जिस ने 'नाम' की कमाई की है वही विद्वान है पंडित है और समझदार है
ਪਹਿਲੋ ਦੇ ਜੜ ਅੰਦਰਿ ਜੰਮੈ ਤਾ ਉਪਰਿ ਹੋਵੈ ਛਾਂਉ ॥
(क्यों वृक्ष की) जड़ सबसे पहले (जमीन के) अंदर पैदा होती है तब ही (वृक्ष उग के) बाहर छाया बनती है (सो। सुखदाती विद्या वही है अगर पहले मनुष्य अपने मन में 'नाम' बीजे)। ('नाम' से वंचित विद्या का हाल देखो)।
ਰਾਜੇ ਸੀਹ ਮੁਕਦਮ ਕੁਤੇ ॥
राजे (मानो) शेर हैं (उनके। पढ़े हुए) अहलकार (मानो) कुत्ते हैं।
ਜਾਇ ਜਗਾਇਨਿੑ ਬੈਠੇ ਸੁਤੇ ॥
बैठे-सोए हुओं को (भाव। वक्त-बेवक्त जनता को) जा जगाते हैं (भाव। तंग करते हैं)।
ਚਾਕਰ ਨਹਦਾ ਪਾਇਨਿੑ ਘਾਉ ॥
ये अहलकार (जैसे। शेरों के) नाखूनी पँजे नहुंद्रां हैं। जो (लोगों का) घात करते हैं।
ਰਤੁ ਪਿਤੁ ਕੁਤਿਹੋ ਚਟਿ ਜਾਹੁ ॥
(राजे-शेर इन अहिलकार) कुक्तों से (लोगों का) लहू पीते हैं।
ਜਿਥੈ ਜੀਆਂ ਹੋਸੀ ਸਾਰ ॥
पर जहाँ जीवों की (करणी की) परख होती है।
ਨਕਂੀ ਵਢਂੀ ਲਾਇਤਬਾਰ ॥੨॥
वहाँ ऐसे (पढ़े हुए लोग) बे-ऐतबारों के नाक-कटे (समझे जाते हैं)। 2।
ਪਉੜੀ ॥
पउड़ी॥
ਆਪਿ ਉਪਾਏ ਮੇਦਨੀ ਆਪੇ ਕਰਦਾ ਸਾਰ ॥
(जो प्रभू) खुद जगत पैदा करता है और खुद ही इसकी संभाल करता है।
ਭੈ ਬਿਨੁ ਭਰਮੁ ਨ ਕਟੀਐ ਨਾਮਿ ਨ ਲਗੈ ਪਿਆਰੁ ॥
(उसका) डर रखे बिना (माया के पीछे) भटकना (-रूपी बँधन) काटा नहीं जाता। ना ही उसके नाम में प्यार बनता है।
ਸਤਿਗੁਰ ਤੇ ਭਉ ਊਪਜੈ ਪਾਈਐ ਮੋਖ ਦੁਆਰ ॥
प्रभू का डर गुरू की शरण पड़ने से होता है और ('रबाणी बंद' में से) खलासी का रास्ता मिलता है
ਭੈ ਤੇ ਸਹਜੁ ਪਾਈਐ ਮਿਲਿ ਜੋਤੀ ਜੋਤਿ ਅਪਾਰ ॥
(क्योंकि प्रभू का) डर रखने से बेअंत प्रभू की जोति में जोति मिलाने से मन की अडोलता प्राप्त होती है।
ਭੈ ਤੇ ਭੈਜਲੁ ਲੰਘੀਐ ਗੁਰਮਤੀ ਵੀਚਾਰੁ ॥
इस डर के कारण गुरमति द्वारा (उच्च) विचार बनती है। और। संसार-समुंद्र से पार लांघा जाता है।
ਭੈ ਤੇ ਨਿਰਭਉ ਪਾਈਐ ਜਿਸ ਦਾ ਅੰਤੁ ਨ ਪਾਰਾਵਾਰੁ ॥
इस डर से ही डर-रहित प्रभू मिलता है जिसका अंत नहीं पाया जा सकता जिसका इस पार उस पार का किनारा नहीं मिलता।
ਮਨਮੁਖ ਭੈ ਕੀ ਸਾਰ ਨ ਜਾਣਨੀ ਤ੍ਰਿਸਨਾ ਜਲਤੇ ਕਰਹਿ ਪੁਕਾਰ ॥
अपने मन के पीछे चलने वाले लोगों को प्रभू के डर (में रहने की) सार नहीं पड़ती (नतीजा यह निकलता है कि वह माया की) तृष्णा (आग) में जलते-विलकते हैं।
ਨਾਨਕ ਨਾਵੈ ਹੀ ਤੇ ਸੁਖੁ ਪਾਇਆ ਗੁਰਮਤੀ ਉਰਿ ਧਾਰ ॥੨੨॥
हे नानक ! प्रभू के 'नाम' से ही सुख मिलता है और (यह 'नाम') गुरू की मति पर चलने से ही हृदय में टिकता है। 22।
ਸਲੋਕ ਮਃ ੧ ॥
श्लोक महला १॥
ਰੂਪੈ ਕਾਮੈ ਦੋਸਤੀ ਭੁਖੈ ਸਾਦੈ ਗੰਢੁ ॥
रूप की काम (-वासना) से मित्रता है। भूख का संबंध स्वाद से है।
ਲਬੈ ਮਾਲੈ ਘੁਲਿ ਮਿਲਿ ਮਿਚਲਿ ਊਂਘੈ ਸਉੜਿ ਪਲੰਘੁ ॥
लोभ की धन के साथ अच्छी मिली हुई एकमेकता है (नींद से) ऊँघ रहे को सिकुड़ी हुई जगह ही पलंघ है।
ਭੰਉਕੈ ਕੋਪੁ ਖੁਆਰੁ ਹੋਇ ਫਕੜੁ ਪਿਟੇ ਅੰਧੁ ॥
क्रोध बहुत बोलता है। (क्रोध में) अंधा (हुआ व्यक्ति) ख्वार हो के बद्-ज़बानी ही करता है।
ਚੁਪੈ ਚੰਗਾ ਨਾਨਕਾ ਵਿਣੁ ਨਾਵੈ ਮੁਹਿ ਗੰਧੁ ॥੧॥
हे नानक ! प्रभू के नाम के बिना (मनुष्य के) मुँह में (बद्-कलामी की) बद्बू ही होती है (बोलने से ज्यादा) इसका चुप रहना ठीक है। 1।
ਮਃ ੧ ॥
महला १॥
ਰਾਜੁ ਮਾਲੁ ਰੂਪੁ ਜਾਤਿ ਜੋਬਨੁ ਪੰਜੇ ਠਗ ॥
राज। धन। सुंदरता। (ऊँची) जाति। और जवानी -यह पाँचों ही (मानो) ठॅग हैं।
ਏਨੀ ਠਗੀਂ ਜਗੁ ਠਗਿਆ ਕਿਨੈ ਨ ਰਖੀ ਲਜ ॥
इन ठगों ने जगत को ठॅग लिया है (जो भी इनके अड्डे चढ़ा) किसी ने (इनसे) अपनी इज्जत नहीं बचाई।
ਏਨਾ ਠਗਨਿੑ ਠਗ ਸੇ ਜਿ ਗੁਰ ਕੀ ਪੈਰੀ ਪਾਹਿ ॥
इन (ठगों) को भी वह ठॅग (भाव। समझदार लोग) दाँव लगा जाते हैं (भाव। वह बंदे इनकी चाल में नहीं आते) जो सतिगुरू की शरण में आते है।
ਨਾਨਕ ਕਰਮਾ ਬਾਹਰੇ ਹੋਰਿ ਕੇਤੇ ਮੁਠੇ ਜਾਹਿ ॥੨॥
(पर) हे नानक ! और बड़े भाग्यहीन (इनके हाथों में खेल के) लूटे जा रहे हैं। 2।
ਪਉੜੀ ॥
पउड़ी॥
ਪੜਿਆ ਲੇਖੇਦਾਰੁ ਲੇਖਾ ਮੰਗੀਐ ॥
जो मनुष्य विद्वान भी हो और चतुराई की बातें भी करना जानता हो ('तृष्णा' के बारे में) उससे भी लेखा लिया जाता है (भाव। 'तृष्णा' उससे भी लेखा लेती है। निरी विद्या और चतुराई 'तृष्णा' से बचा नहीं सकती)।
ਵਿਣੁ ਨਾਵੈ ਕੂੜਿਆਰੁ ਅਉਖਾ ਤੰਗੀਐ ॥
(क्योंकि) प्रभू के नाम के बिना (पढ़ा हुआ भी) झूठ का ही व्यापारी है। दुखी होता हैं कठिनाईयाँ ही उठाता है।
ਅਉਘਟ ਰੁਧੇ ਰਾਹ ਗਲੀਆਂ ਰੋਕੀਆਂ ॥
उसकी (जिंदगी के) गलियां और रास्ते (तृष्णा की आग से) रुके हुए हैं (उनके बीच में से पार लांघना) मुश्किल है।
ਸਚਾ ਵੇਪਰਵਾਹੁ ਸਬਦਿ ਸੰਤੋਖੀਆਂ ॥
गुरू-शबद के द्वारा संतोषी बंदों को सदा कायम रहने वाला बे-मुहताज परमात्मा मिलता है।
ਗਹਿਰ ਗਭੀਰ ਅਥਾਹੁ ਹਾਥ ਨ ਲਭਈ ॥
प्रभू (मानो) बड़ा गहरा (समुंद्र) है। (विद्या और चुराई के आसरे) उसकी थाह नहीं लगाई जा सकती। (बल्कि।
ਮੁਹੇ ਮੁਹਿ ਚੋਟਾ ਖਾਹੁ ਵਿਣੁ ਗੁਰ ਕੋਇ ਨ ਛੁਟਸੀ ॥
पढ़ा कूड़ियार' विद्या के गुमान में रह के तृष्णा की) भरपूर चोटें खाता है; (भले ही पढ़ा हुआ हो) कोई मनुष्य गुरू (की शरण) के बिना (तृष्णा से) बच नहीं सकता।
ਪਤਿ ਸੇਤੀ ਘਰਿ ਜਾਹੁ ਨਾਮੁ ਵਖਾਣੀਐ ॥
(परमात्मा का) नाम सिमरना चाहिए (अगर नाम सिमरें) तो बेशक इज्जत से प्रभू के दर पर पहुँचो।
ਹੁਕਮੀ ਸਾਹ ਗਿਰਾਹ ਦੇਂਦਾ ਜਾਣੀਐ ॥੨੩॥
(सिमरन की बरकति से) यह निश्चय बनता है कि प्रभू अपने हुकम में जीवों को जीवन और रोज़ी देता है। 23।