Sri Guru Granth Sahib Ji — Ang 1284 (hindi)
ਮਃ ੩ ॥
महला ३॥
ਬਾਬੀਹਾ ਬੇਨਤੀ ਕਰੇ ਕਰਿ ਕਿਰਪਾ ਦੇਹੁ ਜੀਅ ਦਾਨ ॥
(जब) (जीव-) पपीहा (प्रभू के आगे) विनती करता है कि - (हे प्रभू !) मेहर करके मुझे जीवन-दाति बख्श;
ਜਲ ਬਿਨੁ ਪਿਆਸ ਨ ਊਤਰੈ ਛੁਟਕਿ ਜਾਂਹਿ ਮੇਰੇ ਪ੍ਰਾਨ ॥
तेरे नाम-अमृत के बिना (मेरी) तृष्णा खत्म नहीं होती। (तेरे नाम के बिना) मेरी जिंद व्याकुल हो जाती है।
ਤੂ ਸੁਖਦਾਤਾ ਬੇਅੰਤੁ ਹੈ ਗੁਣਦਾਤਾ ਨੇਧਾਨੁ ॥
तू सुख देने वाला है। तू बेअंत है। तू गुण बख्शने वाला है। और तू सारे गुणों का खजाना है।
ਨਾਨਕ ਗੁਰਮੁਖਿ ਬਖਸਿ ਲਏ ਅੰਤਿ ਬੇਲੀ ਹੋਇ ਭਗਵਾਨੁ ॥੨॥
हे नानक ! (यह बिनती सुन के) भगवान गुरू के सन्मुख हुए मनुष्य पर मेहर करता है और अंत के समय उसका सहायक बनता है। 2।
ਪਉੜੀ ॥
पउड़ी॥
ਆਪੇ ਜਗਤੁ ਉਪਾਇ ਕੈ ਗੁਣ ਅਉਗਣ ਕਰੇ ਬੀਚਾਰੁ ॥
(प्रभू) स्वयं ही जगत बना के (जीवों के) गुणों और अवगुणों का लेखा करता है।
ਤ੍ਰੈ ਗੁਣ ਸਰਬ ਜੰਜਾਲੁ ਹੈ ਨਾਮਿ ਨ ਧਰੇ ਪਿਆਰੁ ॥
(माया के) तीनों गुण (भी जो) निरे जंजाल (भाव। विकारों में फसाने वाले) ही हैं (ये भी प्रभू ने खुद ही रचे हैं। इसमें फस के जगत) प्रभू के नाम में प्यार नहीं डालता;
ਗੁਣ ਛੋਡਿ ਅਉਗਣ ਕਮਾਵਦੇ ਦਰਗਹ ਹੋਹਿ ਖੁਆਰੁ ॥
(इस वास्ते जीव) गुण छोड़ के अवगुण कमाते हैं और (आखिर) प्रभू की हजूरी में शर्मिंदे होते हैं।
ਜੂਐ ਜਨਮੁ ਤਿਨੀ ਹਾਰਿਆ ਕਿਤੁ ਆਏ ਸੰਸਾਰਿ ॥
ऐसे जीव (जैसे) जूए में मनुष्य-जन्म हार जाते हैं। उनका जगत में आना किसी अर्थ का नहीं होता।
ਸਚੈ ਸਬਦਿ ਮਨੁ ਮਾਰਿਆ ਅਹਿਨਿਸਿ ਨਾਮਿ ਪਿਆਰਿ ॥
(पर) जिन मनुष्यों ने (गुरू के) सच्चे-शबद के द्वारा अपना मन वश में कर लिया है। जो दिन-रात प्रभू के नाम में प्यार डालते हैं।
ਜਿਨੀ ਪੁਰਖੀ ਉਰਿ ਧਾਰਿਆ ਸਚਾ ਅਲਖ ਅਪਾਰੁ ॥
जिन्होंने अपने हृदय में सदा कायम रहने वाला अदृश्य और बेअंत प्रभू बसाया है (वे इस तरह विनती करते हैं) -
ਤੂ ਗੁਣਦਾਤਾ ਨਿਧਾਨੁ ਹਹਿ ਅਸੀ ਅਵਗਣਿਆਰ ॥
हे प्रभू ! तू गुणों का दाता है। तू गुणों का खजाना है। हम जीव गुणहीन हैं"।
ਜਿਸੁ ਬਖਸੇ ਸੋ ਪਾਇਸੀ ਗੁਰ ਸਬਦੀ ਵੀਚਾਰੁ ॥੧੩॥
गुरू के शबद से (ऐसी स्वच्छ) विचार वह मनुष्य प्राप्त करता है जिस पर (परमात्मा खुद) मेहर करता है। 13।
ਸਲੋਕ ਮਃ ੫ ॥
श्लोक महला ५॥
ਰਾਤਿ ਨ ਵਿਹਾਵੀ ਸਾਕਤਾਂ ਜਿਨੑਾ ਵਿਸਰੈ ਨਾਉ ॥
जो लोग परमात्मा के चरणों से विछड़े हुए हैं। जिनको करतार का नाम भूला हुआ है उनकी रात बीतने में नहीं आती (भाव। उनकी जिंदगी रूपी रात दुखों में ही बीतती है;
ਰਾਤੀ ਦਿਨਸ ਸੁਹੇਲੀਆ ਨਾਨਕ ਹਰਿ ਗੁਣ ਗਾਂਉ ॥੧॥
वे इतने दुखी होते हैं कि उनको उम्र भारी प्रतीत होती है)। पर। हे नानक ! जो जीव-सि्त्रयाँ प्रभू के गुण गाती हैं उनके दिन-रात (भाव। सारी उम्र) सुख में गुजरते हैं। 1।
ਮਃ ੫ ॥
महला ५॥
ਰਤਨ ਜਵੇਹਰ ਮਾਣਕਾ ਹਭੇ ਮਣੀ ਮਥੰਨਿ ॥
उनके माथे पर (जैसे) सारे रत्न जवाहर मोती और मणिं हैं (भाव। गुणों के कारण उनके माथे पर नूर ही नूर है)
ਨਾਨਕ ਜੋ ਪ੍ਰਭਿ ਭਾਣਿਆ ਸਚੈ ਦਰਿ ਸੋਹੰਨਿ ॥੨॥
हे नानक ! जो जीव प्रभू को प्यारे लगने लगे हैं वे उस सदा स्थिर रहने वाले के दर पर शोभा पाते हैं। । 2।
ਪਉੜੀ ॥
पउड़ी॥
ਸਚਾ ਸਤਿਗੁਰੁ ਸੇਵਿ ਸਚੁ ਸਮੑਾਲਿਆ ॥
जिन मनुष्यों ने सच्चे गुरू के हुकम में चल के सदा स्थिर रहने वाले प्रभू की आराधना की।
ਅੰਤਿ ਖਲੋਆ ਆਇ ਜਿ ਸਤਿਗੁਰ ਅਗੈ ਘਾਲਿਆ ॥
जो कमाई उन्होंने गुरू के सन्मुख हो के की है वह अंत समय (जब और सारे रास्ते खत्म हो जाते हैं) उनका साथ आ देती है।
ਪੋਹਿ ਨ ਸਕੈ ਜਮਕਾਲੁ ਸਚਾ ਰਖਵਾਲਿਆ ॥
सच्चा प्रभू उनके सिर पर रखवाला होता है। इसलिए मौत का डर उनको छू नहीं सकता।
ਗੁਰ ਸਾਖੀ ਜੋਤਿ ਜਗਾਇ ਦੀਵਾ ਬਾਲਿਆ ॥
गुरू की बाणी-रूप जोति (उन्होंने अपने अंदर) जगाई हुई है। बाणी रूपी दीया प्रज्जवलित किया हुआ है।
ਮਨਮੁਖ ਵਿਣੁ ਨਾਵੈ ਕੂੜਿਆਰ ਫਿਰਹਿ ਬੇਤਾਲਿਆ ॥
पर जो मनुष्य अपने मन के पीछे चलते हैं वे प्रभू के नाम से वंचित होए हुए हैं और झूठ के व्यापारी हैं। बेताले भटकते फिरते हैं;
ਪਸੂ ਮਾਣਸ ਚੰਮਿ ਪਲੇਟੇ ਅੰਦਰਹੁ ਕਾਲਿਆ ॥
वे (दरअसल) पशू हैं अंदर से काले हैं (देखने को) मनुष्य चमड़ी में लिपटे हुए हैं (भाव। देखने में मनुष्य दिखते हैं)। (पर। इस बारे में कुछ कहा नहीं जा सकता)
ਸਭੋ ਵਰਤੈ ਸਚੁ ਸਚੈ ਸਬਦਿ ਨਿਹਾਲਿਆ ॥
हर जगह सदा-स्थिर रहने वाला प्रभू स्वयं बसता है- ये बात गुरू के सच्चे शबद के द्वारा ही देखी जा सकती है।
ਨਾਨਕ ਨਾਮੁ ਨਿਧਾਨੁ ਹੈ ਪੂਰੈ ਗੁਰਿ ਦੇਖਾਲਿਆ ॥੧੪॥
हे नानक ! प्रभू का नाम ही (असल) खजाना है जो पूरे गुरू ने (किसी भाग्यशाली को) दिखाया है। 14।
ਸਲੋਕ ਮਃ ੩ ॥
श्लोक महला ३॥
ਬਾਬੀਹੈ ਹੁਕਮੁ ਪਛਾਣਿਆ ਗੁਰ ਕੈ ਸਹਜਿ ਸੁਭਾਇ ॥
जिस (जीव-) पपीहे ने आत्मिक अडोलता में टिक के गुरू के अनुसार चल के प्रभू का हुकम समझा है।
ਮੇਘੁ ਵਰਸੈ ਦਇਆ ਕਰਿ ਗੂੜੀ ਛਹਬਰ ਲਾਇ ॥
(सतिगुरू-) बादल मेहर कर के लंबी झड़ी लगा के (उस पर 'नाम'-अमृत की) बरखा करता है।
ਬਾਬੀਹੇ ਕੂਕ ਪੁਕਾਰ ਰਹਿ ਗਈ ਸੁਖੁ ਵਸਿਆ ਮਨਿ ਆਇ ॥
उस (जीव-) पपीहे की कूक पुकार खत्म हो जाती है। उसके मन में सुख आ बसता है।
ਨਾਨਕ ਸੋ ਸਾਲਾਹੀਐ ਜਿ ਦੇਂਦਾ ਸਭਨਾਂ ਜੀਆ ਰਿਜਕੁ ਸਮਾਇ ॥੧॥
हे नानक ! जो प्रभू सब जीवों को रोज़ी पहुँचाता है। उसकी ही सिफतसालाह करनी चाहिए। 1।
ਮਃ ੩ ॥
महला ३॥
ਚਾਤ੍ਰਿਕ ਤੂ ਨ ਜਾਣਹੀ ਕਿਆ ਤੁਧੁ ਵਿਚਿ ਤਿਖਾ ਹੈ ਕਿਤੁ ਪੀਤੈ ਤਿਖ ਜਾਇ ॥
हे पपीहे (जीव) ! तुझे नहीं पता कि तेरे अंदर कौन सी प्यास है (जो तुझे भटकना में डाल रही है; ना ही तुझे यह पता है कि) क्या पीने से यह प्यास मिटेगी;
ਦੂਜੈ ਭਾਇ ਭਰੰਮਿਆ ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਜਲੁ ਪਲੈ ਨ ਪਾਇ ॥
तू माया के मोह में भटक रहा है। तुझे (प्यास मिटाने के लिए) आत्मिक जीवन देने वाला नाम-जल नहीं मिलता।
ਨਦਰਿ ਕਰੇ ਜੇ ਆਪਣੀ ਤਾਂ ਸਤਿਗੁਰੁ ਮਿਲੈ ਸੁਭਾਇ ॥
अगर अकाल-पुरख अपनी मेहर की नजर करे तो उसकी रज़ा में गुरू मिल जाता है।
ਨਾਨਕ ਸਤਿਗੁਰ ਤੇ ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਜਲੁ ਪਾਇਆ ਸਹਜੇ ਰਹਿਆ ਸਮਾਇ ॥੨॥
हे नानक ! गुरू से आत्मिक जीवन देने वाला नाम-जल मिलता है (और उसकी बरकति से) अडोल अवस्था में टिके रहा जा जाता है। 2।
ਪਉੜੀ ॥
पउड़ी॥
ਇਕਿ ਵਣ ਖੰਡਿ ਬੈਸਹਿ ਜਾਇ ਸਦੁ ਨ ਦੇਵਹੀ ॥
कई मनुष्य जंगल में किसी एकांत में जा बैठते हैं और मौन धार लेते हैं।
ਇਕਿ ਪਾਲਾ ਕਕਰੁ ਭੰਨਿ ਸੀਤਲੁ ਜਲੁ ਹੇਂਵਹੀ ॥
कई पाला-ओस तोड़ के ठंडा पानी सहते हैं (भाव। उस ठंडे पानी में बैठते हैं। जिस पर बर्फ जमी हुई है)।
ਇਕਿ ਭਸਮ ਚੜੑਾਵਹਿ ਅੰਗਿ ਮੈਲੁ ਨ ਧੋਵਹੀ ॥
कई मनुष्य शरीर पर राख मलते हैं और (शरीर की) मैल कभी नहीं धोते (भाव। स्नान नहीं करते);
ਇਕਿ ਜਟਾ ਬਿਕਟ ਬਿਕਰਾਲ ਕੁਲੁ ਘਰੁ ਖੋਵਹੀ ॥
कई मनुष्य मुश्किल डरावनी जटें बढ़ा लेते हैं (फकीर बन के अपनी) कुल और अपना घर गवा लेते हैं;