Sri Guru Granth Sahib Ji — Ang 1231 (hindi)
ਸਾਰਗ ਮਹਲਾ ੫ ॥
सारग महला ५ ॥
ਲਾਲ ਲਾਲ ਮੋਹਨ ਗੋਪਾਲ ਤੂ ॥
हे जगत-रक्षक प्रभू ! तू सुंदर है। तू सुंदर है। तू मन को मोह लेने वाला है।
ਕੀਟ ਹਸਤਿ ਪਾਖਾਣ ਜੰਤ ਸਰਬ ਮੈ ਪ੍ਰਤਿਪਾਲ ਤੂ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
हे सबके पालनहार ! कीड़े। हाथी। पत्थरों के (में बसते) जंतु- इन सबमें ही तू मौजूद है। 1। रहाउ।
ਨਹ ਦੂਰਿ ਪੂਰਿ ਹਜੂਰਿ ਸੰਗੇ ॥
हे प्रभू ! तू (किसी जीव से) दूर नहीं है। तू सबमें व्यापक है। तू प्रत्यक्ष दिखता है। तू (सब जीवों के) साथ है।
ਸੁੰਦਰ ਰਸਾਲ ਤੂ ॥੧॥
तू सुंदर है। तू सब रसों का श्रोत है। 1।
ਨਹ ਬਰਨ ਬਰਨ ਨਹ ਕੁਲਹ ਕੁਲ ॥
हे नानक ! (कह- हे प्रभू ! लोगों द्वारा मिथे हुए) वर्णों में से तेरा कोई वर्ण नहीं है (लोगों द्वारा मिथी हुई) कुलों में से तेरी कोई कुल नहीं है (तू किसी विशेष कुल व वर्ण का पक्ष नहीं करता)
ਨਾਨਕ ਪ੍ਰਭ ਕਿਰਪਾਲ ਤੂ ॥੨॥੯॥੧੩੮॥
तू (सब पर) दयावान रहता है। 2। 9। 138।
ਸਾਰਗ ਮਃ ੫ ॥
सारग महला ५ ॥
ਕਰਤ ਕੇਲ ਬਿਖੈ ਮੇਲ ਚੰਦ੍ਰ ਸੂਰ ਮੋਹੇ ॥
हे भाई ! (माया अनेकों तरह के) रंग-तमाशे करती है। (जीवों को) विषौ-विकारों संग जोड़ती है। चंद्रमा-सूर्य आदि सब देवते इसने अपने जाल में फसा रखे हैं।
ਉਪਜਤਾ ਬਿਕਾਰ ਦੁੰਦਰ ਨਉਪਰੀ ਝੁਨੰਤਕਾਰ ਸੁੰਦਰ ਅਨਿਗ ਭਾਉ ਕਰਤ ਫਿਰਤ ਬਿਨੁ ਗੋਪਾਲ ਧੋਹੇ ॥ ਰਹਾਉ ॥
हे भाई ! (माया के प्रभाव के कारण जीवों के अंदर) झगड़ालू विकार पैदा हो जाते हैं। झांझरों की छनकार की तरह माया जीवों को प्यारी लगती है। यह माया अनेकों हाव-भाव करती फिरती है। जगत-रक्षक प्रभू के बिना माया ने सभी जीवों को ठॅग लिया है। 1। रहाउ।
ਤੀਨਿ ਭਉਨੇ ਲਪਟਾਇ ਰਹੀ ਕਾਚ ਕਰਮਿ ਨ ਜਾਤ ਸਹੀ ਉਨਮਤ ਅੰਧ ਧੰਧ ਰਚਿਤ ਜੈਸੇ ਮਹਾ ਸਾਗਰ ਹੋਹੇ ॥੧॥
हे भाई ! माया तीनों भवनों (के जीवों) को चिपकी रहती है। (पुन्य। दान। तीर्थ आदि) कच्चे कर्मों की (इस माया की चोट को) सहा नहीं जा सकता। जीव माया के मोह में मस्त और अंधे हुए रहते हैं। जगत के धंधों में व्यस्त रहते हैं (इस तरह धक्के खाते हैं) जैसे बड़े समुंद्र में धक्के पड़ते हैं। 1।
ਉਧਰੇ ਹਰਿ ਸੰਤ ਦਾਸ ਕਾਟਿ ਦੀਨੀ ਜਮ ਕੀ ਫਾਸ ਪਤਿਤ ਪਾਵਨ ਨਾਮੁ ਜਾ ਕੋ ਸਿਮਰਿ ਨਾਨਕ ਓਹੇ ॥੨॥੧੦॥੧੩੯॥੩॥੧੩॥੧੫੫॥
हे भाई ! (माया के असर से) परमात्मा के संत प्रभू के दास (ही) बचते हैं। प्रभू ने उनकी जमों वाली (आत्मिक मौत के) फंदे काट दिए होते हैं। हे नानक ! जिस प्रभू का नाम 'पतित पावन' (पापियों को पवित्र करने वाला) है। उसी का नाम सिमरा कर। 2। 10। 139। 155।
ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
ਰਾਗੁ ਸਾਰੰਗ ਮਹਲਾ ੯ ॥
रागु सारंग महला ९ ॥
ਹਰਿ ਬਿਨੁ ਤੇਰੋ ਕੋ ਨ ਸਹਾਈ ॥
हे भाई ! परमात्मा के बिना तेरा (और) कोई भी सहायता करने वाला नहीं है।
ਕਾਂ ਕੀ ਮਾਤ ਪਿਤਾ ਸੁਤ ਬਨਿਤਾ ਕੋ ਕਾਹੂ ਕੋ ਭਾਈ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
हे भाई ! कौन किसी की माँ। कौन किसी का पिता। कौन किसी का पुत्र। कौन किसी की पत्नी। (जब शरीर से साथ समाप्त हो जाता है तब) कौन किसी का भाई बनता है। (कोई नहीं)। 1। रहाउ।
ਧਨੁ ਧਰਨੀ ਅਰੁ ਸੰਪਤਿ ਸਗਰੀ ਜੋ ਮਾਨਿਓ ਅਪਨਾਈ ॥
हे भाई ! यह धन धरती सारी मायश जिन्हें (तू) अपनी समझे बैठा है।
ਤਨ ਛੂਟੈ ਕਛੁ ਸੰਗਿ ਨ ਚਾਲੈ ਕਹਾ ਤਾਹਿ ਲਪਟਾਈ ॥੧॥
जब शरीर से साथ छूटता है। कोई भी चीज़ (जीव के) साथ नहीं जाती। फिर जीव क्यों इनके साथ चिपका रहता है। 1।
ਦੀਨ ਦਇਆਲ ਸਦਾ ਦੁਖ ਭੰਜਨ ਤਾ ਸਿਉ ਰੁਚਿ ਨ ਬਢਾਈ ॥
हे भाई ! जो प्रभू गरीबों पर दया करने वाला है। जो सदा (जीवों के) दुखों का नाश करने वाला है। तू उससे प्यार नहीं बढ़ाता।
ਨਾਨਕ ਕਹਤ ਜਗਤ ਸਭ ਮਿਥਿਆ ਜਿਉ ਸੁਪਨਾ ਰੈਨਾਈ ॥੨॥੧॥
नानक कहता है- हे भाई ! जैसे रात का सपना होता है वैसे ही सयारा जगत नाशवंत है। 2। 1।
ਸਾਰੰਗ ਮਹਲਾ ੯ ॥
रागु सारंग महला ९ ॥
ਕਹਾ ਮਨ ਬਿਖਿਆ ਸਿਉ ਲਪਟਾਹੀ ॥
हे मन ! तू क्यों माया से (ही) चिपका रहता है।
ਯਾ ਜਗ ਮਹਿ ਕੋਊ ਰਹਨੁ ਨ ਪਾਵੈ ਇਕਿ ਆਵਹਿ ਇਕਿ ਜਾਹੀ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
(देख) इस दुनिया में (सदा के लिए) कोई भी टिका नहीं रह सकता। अनेकों पैदा होते रहते हैं। अनेकों ही मरते रहते हैं। 1। रहाउ।
ਕਾਂ ਕੋ ਤਨੁ ਧਨੁ ਸੰਪਤਿ ਕਾਂ ਕੀ ਕਾ ਸਿਉ ਨੇਹੁ ਲਗਾਹੀ ॥
हे मन (देख) सदा के लिए ना किसी का शरीर रहता है। ना धन रहता है। ना माया रहती है। तू किससे प्यार बनाए बैठा है।
ਜੋ ਦੀਸੈ ਸੋ ਸਗਲ ਬਿਨਾਸੈ ਜਿਉ ਬਾਦਰ ਕੀ ਛਾਹੀ ॥੧॥
जैसे बादलों की छाया है। वैसे ही जो कुछ दिख रहा है सभ नाशवंत है। 1।
ਤਜਿ ਅਭਿਮਾਨੁ ਸਰਣਿ ਸੰਤਨ ਗਹੁ ਮੁਕਤਿ ਹੋਹਿ ਛਿਨ ਮਾਹੀ ॥
हे मन ! अहंकार छोड़। और। संत जनों की शरण पड़। (इस तरह) एक छिन में तू (माया के बँधनों से) स्वतंत्र हो जाएगा।
ਜਨ ਨਾਨਕ ਭਗਵੰਤ ਭਜਨ ਬਿਨੁ ਸੁਖੁ ਸੁਪਨੈ ਭੀ ਨਾਹੀ ॥੨॥੨॥
हे दास नानक ! (कह- हे मन !) परमात्मा के भजन के बिना कभी सपने में भी सुख नहीं मिलता। 2। 2।
ਸਾਰੰਗ ਮਹਲਾ ੯ ॥
रागु सारंग महला ९ ॥
ਕਹਾ ਨਰ ਅਪਨੋ ਜਨਮੁ ਗਵਾਵੈ ॥
हे भाई ! पता नहीं मनुष्य क्यों अपना जीवचन व्यर्थ में बरबाद करता है।
ਮਾਇਆ ਮਦਿ ਬਿਖਿਆ ਰਸਿ ਰਚਿਓ ਰਾਮ ਸਰਨਿ ਨਹੀ ਆਵੈ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
माया की मस्ती में माया के स्वाद में व्यस्त रहता है। और। परमात्मा की शरण नहीं पड़ता। 1। रहाउ।
ਇਹੁ ਸੰਸਾਰੁ ਸਗਲ ਹੈ ਸੁਪਨੋ ਦੇਖਿ ਕਹਾ ਲੋਭਾਵੈ ॥
हे भाई ! यह सारा जगत सपने जैसा है। इसको देख के। पता नहीं। मनुष्य क्यों लोभ में फसता है।
ਜੋ ਉਪਜੈ ਸੋ ਸਗਲ ਬਿਨਾਸੈ ਰਹਨੁ ਨ ਕੋਊ ਪਾਵੈ ॥੧॥
यहाँ तो जो कोई पैदा होता है वह हरेक ही नाश हो जाता है। यहाँ सदा के लिए कोई नहीं टिक सकता। 1।
ਮਿਥਿਆ ਤਨੁ ਸਾਚੋ ਕਰਿ ਮਾਨਿਓ ਇਹ ਬਿਧਿ ਆਪੁ ਬੰਧਾਵੈ ॥
हे भाई ! यह शरीर नाशवंत है। पर जीव इसको सदा कायम रहने वाला समझे रहता है। इस तरह अपने आप को (मोह की फंदों में) फसाए रखता है।
ਜਨ ਨਾਨਕ ਸੋਊ ਜਨੁ ਮੁਕਤਾ ਰਾਮ ਭਜਨ ਚਿਤੁ ਲਾਵੈ ॥੨॥੩॥
हे दास नानक ! वही मनुष्य मोह के बँधनों से स्वतंत्र रहता है। जो परमात्मा के भजन में अपना चिक्त जोड़ के रखता है। 2। 3।
ਸਾਰੰਗ ਮਹਲਾ ੯ ॥
रागु सारंग महला ९ ॥
ਮਨ ਕਰਿ ਕਬਹੂ ਨ ਹਰਿ ਗੁਨ ਗਾਇਓ ॥
हे प्रभू ! मैं मन लगा के कभी भी तेरे गुण नहीं गाता रहा।