Sri Guru Granth Sahib Ji — Ang 1177 (hindi)
ਇਨ ਬਿਧਿ ਇਹੁ ਮਨੁ ਹਰਿਆ ਹੋਇ ॥
हे भाई ! इस तरीके से (उसका) यह मन आत्मिक जीवन से भरपूर हो जाता है।
ਹਰਿ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਜਪੈ ਦਿਨੁ ਰਾਤੀ ਗੁਰਮੁਖਿ ਹਉਮੈ ਕਢੈ ਧੋਇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ कर (अपने अंदर से) अहंकार धो के निकाल देता है और दिन-रात हर वक्त परमात्मा का नाम जपता है। 1। रहाउ।
ਸਤਿਗੁਰ ਬਾਣੀ ਸਬਦੁ ਸੁਣਾਏ ॥
हे भाई ! जब यह जगत गुरू की बाणी सुनता है गुरू का शबद सुनता है और गुरू के प्यार में मगन होता है
ਇਹੁ ਜਗੁ ਹਰਿਆ ਸਤਿਗੁਰ ਭਾਏ ॥੨॥
तब यह आत्मिक जीवन से हरा-भरा हो जाता है। 2।
ਫਲ ਫੂਲ ਲਾਗੇ ਜਾਂ ਆਪੇ ਲਾਏ ॥
हे भाई ! (जीव के अपने वश की बात नहीं है। मनुष्य जीवन के वृक्ष को आत्मिक गुणों के) फूल-फल (तब ही) लगते हैं जब परमात्मा स्वयं ही लगाता है।
ਮੂਲਿ ਲਗੈ ਤਾਂ ਸਤਿਗੁਰੁ ਪਾਏ ॥੩॥
(जब प्रभू की मेहर से मनुष्य को) गुरू मिलता है। तब मनुष्य सारे जगत के सृजनहार में जुड़ता है। 3।
ਆਪਿ ਬਸੰਤੁ ਜਗਤੁ ਸਭੁ ਵਾੜੀ ॥
हे भाई ! यह सारा जगत (परमात्मा की) बगीची है। (इसको हरा-भरा करने वाला) बसंत भी वह स्वयं ही है।
ਨਾਨਕ ਪੂਰੈ ਭਾਗਿ ਭਗਤਿ ਨਿਰਾਲੀ ॥੪॥੫॥੧੭॥
हे नानक ! (माया के मोह से) निर्लिप करने वाली हरी की भक्ति बड़ी किस्मत से ही (किसी मनुष्य को मिलती है)। 4। 17।
ਬਸੰਤੁ ਹਿੰਡੋਲ ਮਹਲਾ ੩ ਘਰੁ ੨
बसंतु हिंडोल महला ३ घरु २
ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ੴ सतिगुर प्रसादि॥
ਗੁਰ ਕੀ ਬਾਣੀ ਵਿਟਹੁ ਵਾਰਿਆ ਭਾਈ ਗੁਰ ਸਬਦ ਵਿਟਹੁ ਬਲਿ ਜਾਈ ॥
हे भाई ! मैं गुरू की बाणी से गुरू के शबद से बलिहार जाता हूँ।
ਗੁਰੁ ਸਾਲਾਹੀ ਸਦ ਅਪਣਾ ਭਾਈ ਗੁਰ ਚਰਣੀ ਚਿਤੁ ਲਾਈ ॥੧॥
हे भाई ! मैं सदा अपने गुरू को सलाहता हूँ। मैं अपने गुरू के चरणों में चिक्त जोड़ता हूँ। 1।
ਮੇਰੇ ਮਨ ਰਾਮ ਨਾਮਿ ਚਿਤੁ ਲਾਇ ॥
हे मेरे मन ! परमात्मा के नाम में चिक्त जोड़।
ਮਨੁ ਤਨੁ ਤੇਰਾ ਹਰਿਆ ਹੋਵੈ ਇਕੁ ਹਰਿ ਨਾਮਾ ਫਲੁ ਪਾਇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
हे भाई ! परमात्मा का नाम-फल प्राप्त करके तेरा मन खिल उठेगा तेरा तन खिल उठेगा। 1। रहाउ।
ਗੁਰਿ ਰਾਖੇ ਸੇ ਉਬਰੇ ਭਾਈ ਹਰਿ ਰਸੁ ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਪੀਆਇ ॥
हे भाई ! गुरू ने जिन गुरमुखों की रक्षा की वे (माया के मोह के पँजे से) बच गए गुरू ने उनको आत्मिक जीवन देने वाला नाम-रस पिला के (बचा लिया)।
ਵਿਚਹੁ ਹਉਮੈ ਦੁਖੁ ਉਠਿ ਗਇਆ ਭਾਈ ਸੁਖੁ ਵੁਠਾ ਮਨਿ ਆਇ ॥੨॥
हे भाई ! उनके अंदर से अहंकार का दुख दूर हो गया। उनके मन में आनंद आ बसा। 2।
ਧੁਰਿ ਆਪੇ ਜਿਨੑਾ ਨੋ ਬਖਸਿਓਨੁ ਭਾਈ ਸਬਦੇ ਲਇਅਨੁ ਮਿਲਾਇ ॥
हे भाई ! धुर-दरगाह से परमात्मा ने स्वयं ही जिन पर बख्शिश की। उनको उसने (गुरू के) शबद में जोड़ दिया।
ਧੂੜਿ ਤਿਨੑਾ ਕੀ ਅਘੁਲੀਐ ਭਾਈ ਸਤਸੰਗਤਿ ਮੇਲਿ ਮਿਲਾਇ ॥੩॥
हे भाई ! उनके चरण-धूड़ की बरकति से (माया से) निर्लिप हुआ जाता है (जिन पर बख्शिश करता है उन्हें) साध-संगति में मिला के (अपने चरणों में) जोड़ लेता है। 3।
ਆਪਿ ਕਰਾਏ ਕਰੇ ਆਪਿ ਭਾਈ ਜਿਨਿ ਹਰਿਆ ਕੀਆ ਸਭੁ ਕੋਇ ॥
हे भाई ! जिस परमात्मा ने हरेक जीव को जिंद दी है वह स्वयं ही (जीवों से सब कुछ) करवाता है स्वयं ही (सबमें व्यापक हो के सब कुछ) करता है।
ਨਾਨਕ ਮਨਿ ਤਨਿ ਸੁਖੁ ਸਦ ਵਸੈ ਭਾਈ ਸਬਦਿ ਮਿਲਾਵਾ ਹੋਇ ॥੪॥੧॥੧੮॥੧੨॥੧੮॥੩੦॥
हे नानक ! (कह-) हे भाई ! गुरू के शबद से जिस मनुष्य का मिलाप परमात्मा के साथ हो जाता है। उसके मन में उसके तन में सदा आनंद बना रहता है। 4। 1। 18। 12। 18। 30।
ਰਾਗੁ ਬਸੰਤੁ ਮਹਲਾ ੪ ਘਰੁ ੧ ਇਕ ਤੁਕੇ
रागु बसंतु महला ४ घरु १ इक तुके
ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ੴ सतिगुर प्रसादि॥
ਜਿਉ ਪਸਰੀ ਸੂਰਜ ਕਿਰਣਿ ਜੋਤਿ ॥
हे मेरी माँ ! जैसे सूरज के किरण की रौशनी (सारे जगत में) बिखरी हुई है।
ਤਿਉ ਘਟਿ ਘਟਿ ਰਮਈਆ ਓਤਿ ਪੋਤਿ ॥੧॥
वैसे ही सुंदर राम ताने-पेटे की तरह हरेक शरीर में मौजूद (ओत-प्रोत) है। 1।
ਏਕੋ ਹਰਿ ਰਵਿਆ ਸ੍ਰਬ ਥਾਇ ॥
हे मेरी माँ ! (चाहे सिर्फ) एक परमात्मा ही हर जगह मौजूद है।
ਗੁਰ ਸਬਦੀ ਮਿਲੀਐ ਮੇਰੀ ਮਾਇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
(फिर भी) गुरू के शबद के द्वारा ही (उसको) मिला जा सकता है। 1। रहाउ।
ਘਟਿ ਘਟਿ ਅੰਤਰਿ ਏਕੋ ਹਰਿ ਸੋਇ ॥
हे माँ ! वह एक परमात्मा ही हरेक शरीर के अंदर व्यापक है।
ਗੁਰਿ ਮਿਲਿਐ ਇਕੁ ਪ੍ਰਗਟੁ ਹੋਇ ॥੨॥
अगर (जीव को) गुरू मिल जाए। तब वह परमात्मा प्रत्यक्ष दिखाई दे जाता है। 2।
ਏਕੋ ਏਕੁ ਰਹਿਆ ਭਰਪੂਰਿ ॥
हे माँ ! एक परमात्मा ही हर जगह ज़ॅरे-ज़ॅरे में बस रहा है।
ਸਾਕਤ ਨਰ ਲੋਭੀ ਜਾਣਹਿ ਦੂਰਿ ॥੩॥
पर परमात्मा से टूटे हुए माया के लालची मनुष्य समझते हैं कि वह कहीं दूर बसता है। 3।
ਏਕੋ ਏਕੁ ਵਰਤੈ ਹਰਿ ਲੋਇ ॥
हे नानक ! एक परमात्मा ही सारे जगत में बरत रहा है।
ਨਾਨਕ ਹਰਿ ਏਕੋੁ ਕਰੇ ਸੁ ਹੋਇ ॥੪॥੧॥
वह सर्व-व्यापक प्रभू ही जो कुछ करता है वह होता है। 4। 1।
ਬਸੰਤੁ ਮਹਲਾ ੪ ॥
बसंतु महला ४॥
ਰੈਣਿ ਦਿਨਸੁ ਦੁਇ ਸਦੇ ਪਏ ॥
हे मेरे मन ! रात और दिन दोनों मौत का संदेशा दे रहे हैं (कि उम्र बीत रही है। और। मौत नज़दीक आ रही है)।
ਮਨ ਹਰਿ ਸਿਮਰਹੁ ਅੰਤਿ ਸਦਾ ਰਖਿ ਲਏ ॥੧॥
हे मन ! परमात्मा का नाम सिमरा कर। हरी-नाम ही अंत में सदा रक्षा करता है। 1।
ਹਰਿ ਹਰਿ ਚੇਤਿ ਸਦਾ ਮਨ ਮੇਰੇ ॥
हे मेरे मन ! सदा परमात्मा को याद किया कर।
ਸਭੁ ਆਲਸੁ ਦੂਖ ਭੰਜਿ ਪ੍ਰਭੁ ਪਾਇਆ ਗੁਰਮਤਿ ਗਾਵਹੁ ਗੁਣ ਪ੍ਰਭ ਕੇਰੇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
गुरू की मति ले के परमात्मा के गुण गाया कर। (जिस मनुष्य ने ये उद्यम किया। उसने) सारा आलस दूर करके अपने सारे दुख नाश कर के परमात्मा का मिलाप हासिल कर लिया। 1। रहाउ।
ਮਨਮੁਖ ਫਿਰਿ ਫਿਰਿ ਹਉਮੈ ਮੁਏ ॥
हे भाई ! अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्य बार-बार अहंकार के कारण आत्मिक मौत सहेड़ते रहते हैं।